हार्दिक आनंद

    दिनांक 14-अगस्त-2020   
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राम का वनवास खत्म हुआ। हार्दिक आनंद! किन्तु ध्यान रखिए, अयोध्या से निकलने वाली शांति-सौहार्द की राह के कई कांटे अभी बाकी हैं। एक संघर्ष समाप्त हुआ किन्तु सरकार और समाज दोनों के लिए आने वाला दौर निश्चित ही परीक्षाओं का दौर है। नहीं भूलना चाहिए कि कुछ तत्व ऐसे भी हैं जिनकी ‘दाल-रोटी’ इस देश में नफरत का चूल्हा सुलगाए रहने से ही चलती है।
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36 संप्रदायों के 140 संत, देश की समस्त पावन नदियों का निर्मल जल, विभिन्न तीर्थक्षेत्रों की मिट्टी और विविधता के इस सागर में मानवता को मर्यादा की दिशा देता श्रीराम का जयघोष। यह ऐसा क्षण था जब लगातार दौड़ता समय राष्ट्र स्मृति में स्थिर हो गया। 
5 अगस्त! एक दिन जो कैलेंडर के सहज पलट और बिसरा दिए जाने वाले अल्पजीवी पृष्ठ से बदलकर अयोध्या के आंगन में गड़ा शिलास्तम्भ बन गया।
राम का वनवास खत्म हुआ। हार्दिक आनंद!
किन्तु ध्यान रखिए, अयोध्या से निकलने वाली शांति-सौहार्द की राह के कई कांटे अभी बाकी हैं।
एक संघर्ष समाप्त हुआ किन्तु सरकार और समाज दोनों के लिए आने वाला दौर निश्चित ही परीक्षाओं का दौर है। नहीं भूलना चाहिए कि कुछ तत्व ऐसे भी हैं जिनकी ‘दाल-रोटी’ इस देश में नफरत का चूल्हा सुलगाए रहने से ही चलती है।
शांत अयोध्या भारत के आंगन में दबे उपद्रवी तत्वों की अशांति का चरम है।
देश को उत्पात का अखाड़ा बनाने में लगे इन तत्वों को आप मोटे तौर पर तीन हिस्सों में बांट सकते हैं-
पहला, कट्टरवाद की बिसात पर मुसलमानों को मोहरों की तरह चलाने के अभ्यस्त संगठन।
दूसरा, लोकतंत्र के आंगन में खूनी क्रांति की चिंगारी लिए बैठे वामपंथी।
और तीसरा, शक्तिसम्पन्न भारत की अंतरराष्ट्रीय राजनीति और समीकरणों पर पड़ने वाले प्रभावों से चिंतित विदेशी गुट-गुर्गे।
हैरानी नहीं कि ‘अयोध्या से आगे’ बढ़ते भारत के रास्ते में अगला मोर्चा उत्पात के इसी त्रिकोण से हो। बहुत सम्भव है कि तीनों की छीजती ताकत से पैदा बौखलाहट इन्हें एक कर दे!
संशय दूर करने के लिए तीन झलकियां देखिए-
पहला नजारा भूमिपूजन के बाद सोशल मीडिया पर आई ऐसी सारी ‘पोस्ट’ का जहां विवाद के पटाक्षेप के बाद पहली बार खुलकर बाहर निकले उन मुस्लिम बंधुओं के चेहरे देश-दुनिया के सामने आए, जो आमतौर पर मिंबरों पर काबिज कट्टरपंथियों के हल्लेगुल्ले में छिप जाते हैं। इन चेहरों ने मुस्लिम समाज की वह तस्वीर दिखाई जो यह बताती है कि आॅल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड जैसी उन्माद से भरी, पिद्दी-सी संस्थाएं इस पूरे वर्ग का प्रतिनिधित्व नहीं करतीं।
दूसरा दृश्य उन वामपंथियों की पोल खुल जाने का था जो मुस्लिम समाज की आड़ में बरसों से अदालत में अयोध्या को अखाड़ा बनाए थे।
विचार का तीसरा झरोखा, उन यूरोपीय विचार समूहों की पड़ताल से खुलता है जिनका मानना है कि गलवान में भारत के जबरदस्त पलटवार और तनकर खड़े हो जाने से ड्रैगन आशंका और हैरानी से भर गया है।
उपरोक्त तीनों स्थितियां बताती हैं कि भारत जैसे-जैसे उलझनों को हटाते हुए आगे बढ़ रहा है इसकी राह में परेशानियां खड़ी करने वालों की बेचैनी भी उससे ज्यादा अनुपात में बढ़ रही है।
ध्यान दीजिए, शाहीन बाग का हिंसक समर्थन, दिल्ली दंगों में तेजाब के पाउच, बम-पिस्तौलें और लद्दाख में तनाव के बीच चीनी कम्पनियों और कारोबार की पैरवी करने के लिए लोग मंगल ग्रह से नहीं आए थे!
इसलिए सीमापर युद्ध और समाज में टकराव टालने की अगली दवा इस भारत विरोधी ‘त्रिकोण’ का इलाज है। उपचार का प्रारंभ होने से ही शरीर में आशा और उत्साह के संकेत उठने लगे हैं।
बड़े नीतिगत निर्णयों के साथ-साथ अब यह उपचार छद्म सूचनाओं की छंटाई और राष्ट्रीय एकता के विमर्श को बढ़ाते हुए जरा लम्बा चलेगा।
 देश ने पिछले कुछ सालों में कई पुरानी बीमारियों का इलाज किया है, राष्ट्रीय अस्मिता और एकता के कई मोर्चों पर पताका फहराई है।
धैर्यपूर्वक, कंधे से कंधा मिलाकर डटे रहे तो भले एकबार में न सही किन्तु अंत में (और निकट भविष्य में) इस त्रिकोण का टूटना तय है।
@hiteshshankar