"खिलाफ़त का ब्रांड एंबेसडर आमिर खान"

    दिनांक 19-अगस्त-2020
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डॉ.चन्द्र प्रकाश सिंह

तुर्की के राष्ट्रपति अर्दोआन की पत्नी का आमिर खान से मिलना एक विशेष संदेश का द्योतक है। आमिर खान तुर्की में पुनः हिजाब की मानसिकता खड़ी करने में ब्रांड एंबेसेडर के रूप में अर्दोआन का सहयोग कर रहे हैं। वह कट्टर इस्लामी खिलाफ़त स्थापित करने के मजहबी एजेंडे के अनुसार कार्य कर रहे हैं

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भारत में आमिर खान जैसे लोग इसके ब्रांड एंबेसडर के रूप में उभरना चाहते हैं। आमिर खान का तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैयब अर्दोआन की पत्नी अमीन अर्दोआन से मिलना कोई नई घटना नहीं है। आमिर खान इससे पहले भी 2017 में ही अर्दोआन से मिल चुके हैं। तुर्की के संस्कृति मंत्रालय के साथ मिलकर उन्होंने वहां एक फिल्म का प्रमोशन किया था। उसकी पिक्चर “सीक्रेट सुपर स्टार” का मुख्य कथानक हिज़ाब में रहते हुए भी कम्प्यूटर सनसनी बनने वाली एक लड़की की कहानी पर आधारित था। कमाल पाशाके समय से ही तुर्की में सार्वजनिक स्थल पर हिज़ाब पहनने पर प्रतिबंध रहा है, जबकि अर्दोआन की पत्नी हमेशा हिजाब में रहती हैं, इसलिए वे सार्वजनिक कार्यक्रमों में भाग नहीं लेती। यहां तक कि अर्दोआन ने अपनी बेटियों को इंडियाना यूनिवर्सिटी पढ़ने के लिए भेजा क्योंकि वहां वो हिजाब पहन सकती थीं|
आमिर खान ने 2015 में एक बयान दिया था जिसमें उन्होंने कहा था कि 'देश में असहिष्णुता के माहौल के चलते उन्हें और उनकी पत्नी को भारत में रहने से डर लगता है|’ उनकी पत्नी ने भारत छोड़ने की सलाह दी थी, लेकिन अर्दोआन के कट्टर इस्लाम की तरफ बढ़ते कदम को देखकर उन्हें डर नहीं लगता और न ही उसे अर्दोआन के भारत विरोधी रुख से उसे कोई दिक्कत है। अपने कार्यक्रम में हिन्दुओं की परम्पराओं पर ज्ञान देने वाले अर्दोआन जनसंख्या नियंत्रण के लिए क्यों नहीं ज्ञान देते और उनकी पत्नी को हिज़ाब से बाहर निकल कर महिला कमाल अतातुर्क की भावना के सम्मान की शिक्षा क्यों नहीं देते ? बल्कि तुर्की जैसे आधुनिक देश में जा कर हिज़ाब में कंप्यूटर चलने की शिक्षा देते हैं। तुर्की के राष्ट्रपति अर्दोआन की पत्नी का आमिर खान से मिलना एक विशेष संदेश का द्योतक है। आमिर खान तुर्की में पुनः हिजाब की मानसिकता खड़ी करने में ब्रांड एंबसेडर के रूप में अर्दोआन का सहयोग कर रहे हैं। वह कट्टर इस्लामी खिलाफ़त स्थापित करने के मजहबी एजेंडे के अनुसार कार्य कर रहे हैं
जब दुनिया के अधिकांश देशों के मुसलमान तुर्की के खलीफा के समर्थन में नहीं खड़े हुए, मक्का और मदीना जैसे इस्लाम के प्रमुख स्थान आटोमन साम्राज्य से बाहर हुए, सउदी अरब एक स्वतंत्र देश बन गया तब केवल भारत के कुछ मुसलमान खिलाफत के लिए तड़प रहे थे। गांधी जी ने सन् 1920 खिलाफत का समर्थन एक गलती साबित हुआ, इसने भारत में साम्प्रदायिक विभाजन की दीवार को मजबूत कर दिया। भारत के मुहम्मद अली, शौकत अली, अब्दुल कलाम आजाद जैसे मुस्लिम नेता और गांधी ने तुर्की के ख़लीफा की गद्दी के लिए मालाबार के निर्दोष हिन्दुओं का नरसंहार भले ही करा दिया, लेकिन ख़लीफा की गद्दी नहीं बचा सके। कमाल अतातुर्क ने 1924 में खलीफा के पूरे परिवार को निर्वासित कर तुर्की को सेक्युलर देश घोषित कर दिया।
इस्लाम के पैगम्बर मुहम्मद के बाद मुहम्मद साहब के प्रतिनिधि के रूप में ख़लीफा को इस्लाम का सर्वोच्च नेता माना गया। पहले चार ख़लीफा अबूबक्र, उमर, उस्मान और अली बने। ख़लीफा के पद को लेकर इस्लाम में प्रारंभ से ही विवाद रहा। सन् 1453 में कॉन्स्टेंटिनोपल ( इस्ताम्बुल का पूर्व नाम) पर विजय के पश्चात् उस्मानी ( ऑटोमन) साम्राज्य इस्लाम का सबसे ताकतवर साम्राज्य बन गया। तुर्की के शासक को वंशानुगत ख़लीफा के रूप में पूरी दुनिया के मुस्लिम शासन का प्रमुख माना जाने लगा। उसकी आज्ञाप्ति और आदेश से ही दुनिया के सभी मुस्लिम शासक शासन किया करते थे। भारत के भी मुसलमान शासक बाबर हो या टीपू सभी स्वयं को उसी का प्रतिनिधि मानते थे और शासन के लिए उसका फरमान मानते थे। सन् 1924 तक उस्मानिया या ऑटोमन साम्राज्य खिलाफ़त का प्रतीक तो बना रहा, लेकिन इस्लाम जगत पर उसका प्रभाव न के बराबर ही था, खिलाफ़त के अन्त से भारत के मुसलमानों के अतिरिक्त और किसी ने हाय-तौबा नहीं मचाई।
मुस्तफ़ा कमाल पाशा ने सन् 1923 में तुर्की को गणराज्य घोषित कर दिया तथा 1924 के मार्च में खिलाफत प्रथा का अन्त किया और तुर्की को धर्म-निरपेक्ष देश घोषित करते हुए एक विधेयक संसद में रखा, तुर्की सौ वर्षों तक मुस्लिम बाहुल्य होते हुए भी गैर मुस्लिम राज्य बना रहा, लेकिन भारत के कुछ मुसलमानों के मन में उसकी स्मृति खिलाफ़त की ही बनी रही, क्योंकि भारत के मुसलमानों नें सन् 1919 से 1921 तक ख़लीफा के शासन को बचाने के लिए बहुत बड़ा आन्दोलन किया, जिसे महात्मा गांधी का भी सहयोग प्राप्त हुआ और इस आन्दोलन का अंत मालाबार में निर्दोष हिन्दुओं के नरसंहार से हुआ। दुनिया के हर मुस्लिम देश के मुसलमान अपने देश के अनुसार अलग-अलग टोपियां पहनते हैं, लेकिन भारत का मुसलमान अपने आप को मुस्लिम दिखाने के लिए तुर्की टोपी ही पहनता है। अर्दोआन के शासन में तुर्की को मुस्लिम राष्ट्र घोषित कर दिए जाने के बाद फिर एक बार कट्टरपंथियों ने खिलाफ़त का सपना देखना प्रारम्भ कर दिया है। यद्यपि ख़लीफा के वंशज न्यूयार्क में निर्वासित जीवन व्यतीत करते हुए भी कमाल पाशा के विरुद्ध एक शब्द भी बोलने को तैयार नहीं हैं और न ही पुनः खिलाफ़त स्थापित करने की बात करते हैं, लेकिन हागिया सोफिया को पुनः मस्जिद बनाए जाने के बाद कट्टरपंथियों उत्साह और बढ़ा है। तुर्की को मुस्लिम एकता का प्रतीक बनाए जाने के पुनः प्रयास किए जा रहे हैं। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान जैसे लोग अपने देश की पहचान को तुर्की से जोड़कर इसका प्रचार कर रहे हैं । तुर्की के राष्ट्रपति की पाकिस्तान यात्रा के समय पाकिस्तान की पहचान को तुर्की से जोड़ते हुए इमरान खान ने यहां तक कहा कि हिंदुस्तान पर छः सौ वर्षों तक तुर्की का शासन रहा है। तुर्की का राष्ट्रपति खुलकर पाकिस्तान के कट्टरपंथ के साथ खड़ा है और भारत के विरुद्ध स्वर अलाप रहा है। अर्दोआन विश्व समुदाय का पाकिस्तान के अतिरिक्त अकेला ऐसा शासक था जिसने ने कश्मीर से धारा 370 हटाने का विरोध किया ।
अर्दोआन को देखकर यह कोई नहीं कह सकता कि यह कमाल अतातुर्क की तुर्की के उत्तराधिकारी हैं। अर्दोआन अपने आप को ख़लीफा के रूप में प्रदर्शित करने का प्रयास कर रहे हैं। ऑटोमन साम्राज्य को पुनः स्थापित कर दुनिया के मुसलमानों का नया ख़लीफा बनाना चाहते हैं । हागिया सोफिया को पुनः मस्जिद बना कर वे तुर्की में कट्टर इस्लाम की भावना को पुनः खड़ा करने का प्रयास कर रहे हैं ।  2003 में पहली बार तुर्की के प्रधानमंत्री बनने के बाद अर्दोआन ने न्यूयॉर्क टाइम्स को दिए इंटरव्यू में कहा था, ''मैं कुछ भी होने से पहले एक मुसलमान हूं. एक मुसलमान के तौर पर मैं अपने मज़हब का पालन करता हूं । अल्लाह के प्रति मेरी ज़िम्मेदारी है। उसी के कारण मैं हूं । मैं कोशिश करता हूं कि उस ज़िम्मेदारी को पूरा कर सकूं|'' 2016 में इस्तांबुल में एक भाषण के दौरान अर्दोआन ने कहा था, ''महिलाओं की यह ज़िम्मेदारी है कि वो तुर्की की आबादी को दुरुस्त रखें. हमें अपने वंशजों की संख्या बढ़ाने की ज़रूरत है। लोग आबादी कम करने और परिवार नियोजन की बात करते हैं, लेकिन मुस्लिम परिवार इसे स्वीकार नहीं कर सकता है. हमारे अल्लाह और पैग़म्बर ने यही कहा था और हम लोग इसी रास्ते पर चलेंगे.''
पूरी दुनिया के मुसलमानों में खिलाफ़त की गौरव गाथा और कट्टरता के वर्णन के लिए तुर्की में वेब सीरीज बनाई जा रही है| 'दिरलिस एर्तरुल' एक ऐसा ही टीवी धारावाहिक है जिसमें ऑटोमन साम्राज्य की स्थापना के समय के समय के संघर्षों को दिखाया गया है, इसमें दिखाई गई बर्बरता आइएसआइएस को भी पीछे छोड़ देती है, यह टीवी ड्रामा कई इस्लामिक देशों में प्रतिबंधित है. सऊदी अरब, मिस्र और संयुक्त अरब अमीरात में दिरलिस: एर्तरुल पर पाबंदी लगी हुई है, परन्तु पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने अपने देश के नागरिकों से इसे देखने का आह्वान किया| जबकि कई मुस्लिम विद्वानों का यह मानना है कि इसे देखने से दुनिया में और इस्लामोफोबिया ही बढ़ेगा |
( लेखक अरुंधती वशिष्ठ अनुसन्धान पीठ के निदेशक हैं )