सुशांत से और भी प्रेम कराती है ‘दिल बेचारा’

    दिनांक 02-अगस्त-2020
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प्रदीप सरदाना
जन्म कब लेना है और मरना कब है, हम डिसाइड नहीं कर सकते, पर कैसे जीना है वो हम डिसाइड कर सकते हैं। यह सशक्त संवाद है, सुशांत सिंह राजपूत की अंतिम फिल्म ‘दिल बेचारा’ का। यह संवाद इसलिए और भी ज्यादा झकझोरता है क्योंकि सुशांत अब इस दुनिया में नहीं है

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अपनी इस फिल्म के प्रदर्शन से पूर्व ही सुशांत इस दुनिया से चले गए। सुशांत के निधन को करीब डेढ़ महीना हो गया है, लेकिन उनके प्रशंसकों के आँसू अभी भी नहीं थम रहे हैं। जिसे देखो उनके गम में डूबा दिखाई देता है।
सुशांत के प्रशंसकों की उनके प्रति कैसी दीवानगी है, इस बात का पता इससे भी लगता है कि जब गत 24 जुलाई को ‘दिल बेचारा’ डिज्नी प्लस हॉटस्टार पर रिलीज हुई तो दर्शक इसे देखने के लिए उमड़ पड़े। ‘इंटेरनेट मूवी डेटा बेस’ के आंकड़ों के अनुसार इसे 24 घंटों में ही लगभग साढ़े 9 करोड़ दर्शकों ने देख लिया। अभी तक किसी भी और फिल्म को इतने दर्शक नहीं मिले।
असल में सुशांत सिंह को लेकर जब गत 14 जून को यह खबर आई कि उन्होंने अपने मुंबई स्थित फ्लैट में आत्महत्या कर ली है, तभी से लोग यह सोच सोच कर परेशान हैं कि सुशांत जैसा अभिनेता आत्महत्या कैसे कर सकता है।
तब से आए दिन सुशांत केस में रोज नई नई बातें सामने आ रही हैं। लेकिन सुशांत के निधन की गुत्थी अभी तक सुलझी नहीं है। अब जब सुशांत के पिता के के सिंह ने इस सबके लिए सुशांत की तथाकथित ‘गर्ल फ्रेंड’ रिया चक्रवर्ती के खिलाफ बयान देकर मामला दर्ज कराया है, तब से इस प्रकरण में नया मोड़ आ गया है। इससे पहले कंगना रानौत तो लगातार यह कहती आ रही है कि सुशांत की आत्महत्या नहीं, हत्या है। उधर सुशांत की पुरानी दोस्त अंकिता लोखण्डे ने भी सामने आकर यह साफ शब्दों में कहा है कि मैं डंके की चोट पर कह सकती हूँ कि सुशांत अवसाद में नहीं था। वह रियल हीरो था। उसे अवसाद का रोगी बताकर उसकी छवि खराब की जा रही है।
अब बात फिल्म ‘दिल बेचारा’ की करें तो यह मूलतः दो युवा कैंसर रोगियों की कहानी है। जिसमें एक है मेन्युअल राजकुमार जूनियर उर्फ मैनी ( सुशांत सिंह राजपूत) और दूसरी है किजी बासु (संजना सांघी)। इसी के साथ एक और युवा कैंसर रोगी जेपी (साहिल वैद) की कहानी को भी फिल्म में दिखाया गया है।
देखा जाये तो फिल्म में 6 ही मुख्य किरदार हैं। इन तीनों के अलावा किजी के माता- पिता ( स्वास्तिका नुखर्जी और शाश्वत चटर्जी) और कैंसर रोगियों के डॉक्टर झा (सुनीत टंडन)। यूं एक और पात्र अभिमन्यु वीर (सैफ अली खान) को कहानी के संवादों में लगातार हिस्सा बनाया गया है लेकिन अभिमन्यु वैसे फिल्म के सिर्फ एक ही दृश्य में है।
यदि फिल्म के शीर्षक ‘दिल बेचारा’ पर जाएँ तो कहानी के हिसाब से इस शीर्षक का कोई मतलब नहीं है। फिल्म का संदेश और सार यह है कि ज़िंदगी में चाहे कितनी भी गंभीर और मुश्किल समस्याएँ आ जाएँ लेकिन उनसे घबराना नहीं चाहिए। ज़िंदगी को मजे में, सहजता से जीना चाहिए। यानि कुल मिलाकर यह फिल्म ज़िंदगी जीने का सलीका सीखाती है।
इस तरह के कुछ मिलते जुलते कथानक पर हमारे यहाँ पहले भी कई यादगार फिल्में बन चुकी हैं। जिनमें कैंसर जैसे अत्यंत गंभीर रोग से पीड़ित होने के बावजूद नायक या नायिका अपने अंदाज़ में ज़िंदगी जीते हैं। जैसे आनंद, मिली, अँखियों के झरोखे से, कल हो न हो और वी आर फैमिली।
हालांकि ‘दिल बेचारा’ असल में जून 2014 में प्रदर्शित एक अमेरिकन फिल्म ‘द फ़ाल्ट इन अवर स्टार्स’ का रिमेक है। यह फिल्म लेखक जॉन ग्रीन के इसी नाम के 2012 में प्रकाशित उपन्यास पर आधारित है। ‘दिल बेचारा’ में यूं कुछेक दृश्य बिलकुल ‘द फाल्ट इन अवर स्टार्स’ जैसे ही हैं। जबकि कहानी के कथानक में दो मुख्य परिवर्तन किए गए हैं।
एक यह कि ‘दिल बेचारा’ की किजी बासु एक संगीतज्ञ अभिमन्यु के एक अधूरे गीत ‘मैं तुम्हारा’ की दीवानी है। लेकिन किजी को यह बात हमेशा कचोटती है कि अभिमन्यु ने इस मधुर गीत को अधूरा क्यों छोड़ दिया। किजी की एक ही इच्छा है, अभिमन्यु से मिलकर यह जानना कि यह गीत अधूरा क्यों छोड़ा। फिल्म में अभिमन्यु से मिलने के लिए पेरिस तक जाती है।
जबकि ‘द फाल्ट इन अवर स्टार्स’ में अभिमन्यु वाला किरदार (वेन हौटेन) एक लेखक है और नायिका उसके उस उपन्यास की दीवानी है जिसे लेखक अधूरा छोड़ देता है। उस अमेरिकन फिल्म में नायिका उससे मिलने पेरिस नहीं एम्स्टर्डम जाती है। वैसे कहानी में ऐसे छोटे परिवर्तन कोई खास मायने नहीं रखते। लेकिन उपन्यास को अधूरा छोड़ना किसी में भी उत्सुकता जगा सकता है। लेकिन दिल बेचारा में गीत अधूरा छोड़ने पर उतनी उत्सुकता दिखाना खास जमता नहीं।
निर्माता फॉक्स स्टार की इस फिल्म का निर्देशन मुकेश छाबडा ने किया है। बतौर निर्देशक मुकेश की यह पहली फिल्म है। फिल्म में यूं कुछ खामियां खलती हैं। लेकिन सुशांत के प्रति प्रेम और सहानुभूति के चलते वे कमियाँ कुछ हद तक दब सी जाती हैं। पूरी फिल्म में सबसे ज्यादा ध्यान सुशांत की ओर लगा रहता है। जिस तरह असल में सुशांत दुनिया से कूच कर गए उसी तरह फिल्म में भी उनका चरित्र मैनी मर जाता है तो दर्शक और भी ज्यादा भावुक हो जाते हैं।
‘दिल बेचारा’ को जमशेदपुर की पृष्ठभूमि में दिखाया गया है। जहां का टाटा कैंसर अस्पताल भी मशहूर है। कहानी में किजी को थायराड कैंसर है। उसकी तकलीफ इतनी है कि उसे सांस लेने के लिए हमेशा अपने कंधे पर बैग की तरह ऑक्सीजन का सिलेन्डर साथ लेकर चलना पड़ता है, उस सिलेन्डर का किजी ने नाम दिया है पुष्पिंदर। किजी एक बंगाली परिवार से है। इसलिए घर में बंगाली खान पान और बातचीत के भी कुछ प्रसंग चलते रहते हैं। घर में किजी की माँ और पिता उसकी चिंता करने के साथ उसे हिम्मत भी खूब देते हैं।
उधर एक दिन कॉलेज के बाहर किजी का सामना मैनी से होता है। मैनी जोश उत्साह से भरा मस्त युवक है। हालांकि कैंसर के चलते वह अपनी टांग गंवा चुका है। लेकिन कृत्रिम टांग से वह वह हंसी खुशी अपनी ज़िंदगी जी रहा है। कॉलेज के एक कार्यक्रम में वह अपने डांस से सभी का दिल भी जीत लेता है। साथ ही तभी वह किजी के करीब आने की कोशिश भी करता है। लेकिन किजी मैनी से प्रभावित तब होती है जब वह डॉक्टर झा के साथ काउंसिलिंग में उसकी बातें सुनती है।
इसके बाद जल्द ही किजी और मैनी में प्यार हो जाता है। लेकिन उनके प्यार में, रोमांस में शादी की चाह या शारीरिक मिलन नहीं दिल का मिलन दिखाया है। मैनी से मिलने के बाद जहां किजी ज़िंदगी जीना सीखती है, वहाँ एक दूसरे की इच्छाओं को पूरा करना ही इनका प्रेम है।
फिल्म अभिनेता रजनीकान्त का जबर्दस्त फैन मैनी, किजी के साथ मिलकर अपने दोस्त मैनी की भोजपुरी वेब फिल्म को पूरा कराता है। मैनी उसमें हीरो बनता है और किजी हीरोइन। जेपी आँख के कैंसर के चलते अपनी एक आँख तो पहले ही गंवा चुका है। उसकी दूसरी आँख भी फिल्म की शूटिंग के दौरान चली जाती है।
उधर किजी की तबीयत अचानक बिगड़ जाती है। उसे अस्पताल में दाखिल करना पड़ता है। लेकिन इसके बावजूद वह पेरिस जाकर अभिमन्यु से मिलना चाहती है। उसके इस सपने को पूरा करने के लिए मैनी किजी को उसकी माँ के साथ पेरिस ले जाता है। वहाँ अभिमन्यु से वे मिलते तो हैं। लेकिन उसका सनकीपन उन्हें तकलीफ देता है। जिससे वे तुरंत जमशेदपुर वापस आ जाते हैं।
मैनी और किजी जानते हैं दोनों इस बीमारी से ज्यादा दिन जिंदा नहीं रह पाएंगे। लेकिन किजी को हंसी खुशी जीना सिखाते हुए मैनी दुनिया से विदा हो जाता है। उसकी मौत के बाद उनकी फिल्म प्रदर्शित होती है। ठीक ऐसे ही जैसे सुशांत के निधन के बाद उनकी फिल्म ‘दिल बेचारा’ प्रदर्शित हुई है।
फिल्म में सुशांत का अभिनय इतना अच्छा है कि वह दिल को छू लेता है। मैनी के किरदार में वह इतने ढल गए कि लगता ही नहीं वह अभिनय कर रहे हैं। सुशांत की नेचुरल एक्टिंग के साथ उनकी मुस्कुराहट और शरमाने का अंदाज़, सभी के सिर चढ़ कर बोलता है। हालांकि सुशांत जिस कोटि के अभिनेता थे, उनकी प्रतिभा का उतना इस्तेमाल नहीं किया जा सका। बीच बीच में दो तीन जगह सुशांत के संवाद इतने धीमे हैं कि समझ नहीं आते।
उधर संजना की बतौर नायिका यह पहली फिल्म है। लेकिन अपने खूबसूरत अभिनय से वह इतना आकर्षक करती है कि जल्द ही दर्शकों के दिलों में घर कर जाती है। संजना को इस फिल्म में देखने के बाद कहा जा सकता है कि भारतीय सिनेमा को एक और अच्छी अभिनेत्री मिल गयी है। यदि उसे आगे अच्छे मौके मिले तो वह निश्चय ही अपनी विशिष्ट पहचान बना लेगी।
इनके साथ साहिल वैद, स्वास्तिका मुखर्जी, शाश्वत बनर्जी, साहिल वैद और सुनीत टंडन ने भी अपनी अपनी भूमिकाओं में अच्छा प्रदर्शन किया है। मुकेश छाबड़ा इससे पहले बतौर कास्टिंग डायरेक्टर मशहूर रहे हैं. इसलिए अपनी फिल्म में भी उन्होंने पात्रों के लिए एक दम सही कलाकार चुने हैं। हालांकि सैफ अली खान अपने एक दृश्य में वह कमाल नहीं दिखा सके जिसकी उम्मीद थी।
मुकेश छाबड़ा ने कुछ जगह तो अच्छा निर्देशन किया है। कुछ पलों में उन्होंने पेरिस की खूबसूरती को बहुत अच्छे ढंग से दिखाया है। लेकिन सुशांत जैसे बेहतरीन अभिनेता ने जिस तरह ‘एम एस धोनी – द अनटोल्ड स्टोरी’ और ‘छिछोरे’ जैसी शानदार फिल्में की हैं, यह वैसी अच्छी फिल्म नहीं है। ‘दिल बेचारा’ सुशांत और संजना की फिल्म तो है लेकिन इसे निर्देशक की फिल्म नहीं कहा जा सकता। फिल्म में कोई भी दृश्य इतना बेहतरीन नहीं है कि इस फिल्म को निर्देशक की फिल्म कहा जा सके।
जहां तक फिल्म के संगीत की बात की जाये तो संगीत ए आर रहमान का है। फिल्म में कुल 7 गीत हैं। फिल्म के शीर्षक गीत ‘दिल बेचारा’ को रहमान ने खुद ही गाया है। संगीत को ज्यादा उम्दा न भी कहा जाये लेकिन संगीत कुल मिलाकर अच्छा है। हालांकि अमिताभ भट्टाचार्य के अच्छे गीत और रहमान के मधुर संगीत के बावजूद गीतों का फिल्मांकन ऐसा है कि ‘दिल बेचारा’ को छोड़कर किसी भी गीत को देखने में आनंद नहीं आता। इससे अच्छे गीत भी जाया हो गए हैं।
जबकि फिल्म के गीतों को सिर्फ सुना जाये तो गीतों में एक अलग मिठास, एक अलग सुकून, एक अलग मस्ती की अनुभूति होती है। चाहे वह चाँद सितारों के प्रेमी सुशांत को समर्पित गीत ‘तारे गिन’ हो जिसे श्रेया घोषाल और मोहित चौहान ने गाया है। या फिर अरिजीत सिंह और शाशा त्रिपाठी का गाया गीत ‘खुलके जीने का सलीका’ हो। ऐसे ही सुनिधि चौहान, हृदय गटानी का गाया ‘मसखरी’ और जोनीता गांधी और हृदय का गाया ‘तुम न हुए मेरे तो क्या...मैं तुम्हारा’ को सुनने का मज़ा कुछ और ही है।
सुशांत सिंह राजपूत को श्रद्धाजंलि देने के लिए डिज्नी प्लस हॉटस्टार ने ‘दिल बेचारा’ की स्ट्रीमिंग सभी के लिए निशुल्क रखी है। इसलिए सुशांत सिंह के प्रशंसक इस फिल्म को कभी भी मुफ्त में देख सकते हैं। फिल्म चाहे ज्यादा अच्छी न भी लगे मगर इतना जरूर है कि ‘दिल बेचारा’ सुशांत से और भी प्रेम कराती है।
( लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं फिल्म समीक्षक हैं )