सांस्कृतिक जागरण की बेला

    दिनांक 20-अगस्त-2020
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डॉ. प्रणव पंड्या 

1947 में देश को राजनीतिक स्वतंत्रता तो मिली, पर सांस्कृतिक स्वतंत्रता नहीं मिली। लोगों में इस स्वतंत्रता की चेतना न जग पाए, इसके लिए जाति, मजहब, भाषा, प्रांत की दीवारें खड़ी की जाती रहीं। इसके बावजूद कुछ लोग और संगठन इस कार्य में लगे रहे। अब उनकी मेहनत के सुफल का स्वाद लोगों को मिल रहा है और वे सांस्कृतिक रूप से जागरूक हो रहे हैं
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अंदमान निकोबार द्वीप समूह में जनजाति महिलाओं द्वारा निकाली गई कलशयात्रा। ये महिलाएं वनवासी कल्याण आश्रम से जुड़ी हैं और उनमें अपनी संस्कृति के प्रति जबर्दस्त जागरूकता बढ़ी है। (फाइल चित्र)

स्वाधीनता प्राप्ति की घड़ी में भारत माता की आंखें छलक पड़ी थीं। इस सच की अनुभूति उस समय सभी ने की थी, परंतु इस तथ्य को कम ही लोग अनुभव कर पाए थे कि भारत मां की एक आंख में खुशी के आंसू छलक रहे थे, जबकि दूसरी आंख दु:ख के आंसुओं से डबडबाई हुई थी। खुशी स्वाधीनता-स्वतंत्रता की थी और दु:ख राजनीतिक-सांस्कृतिक विभाजन का था। अपनी ही संतानों ने माता के अस्तित्व एवं अस्मिता के हिस्से को काटकर अलग कर दिया था। जबकि भौगोलिक दृष्टि से उनकी संस्कृति, खान-पान, रहन-सहन में समानताएं थीं। विभाजन की यह पीड़ा बड़ी दारुण थी और यातना बड़ी असहनीय। फिर भी उम्मीद थी कि स्वाधीन देशवासी संभवत: समझदार हो जाएंगे और अपनी मां को अब यह पीड़ा नहीं देंगे।

परंतु दुर्देव और दुर्भाग्य। स्वाधीनता प्राप्ति के पश्चात् भी  विभाजन के नए-नए रूप सामने आते गए। भूमि तो नहीं बंटी, पर भावनाएं बंटती गर्इं। संस्कृति बंटती गई। भूगोल तो वही रहा, परंतु उसमें खिंची संवेदनाओं की लकीर मिटती गई। संवेदनाओं की सरिता को सोखने वाले, इसे दूषित-कलुषित करने वाले विभाजनकारियों के कितने ही रूप सामने आते गए। विभाजन मजहब के नाम पर, विभाजन जाति के नाम पर, विभाजन भाषा के नाम पर, विभाजन सांप्रदायिकता और क्षेत्रीयता के नाम पर, विभाजन संस्कृति के नाम पर। स्वाधीनता की हर वर्षगांठ पर भारत माता की आंखें छलकती तो जरूर हैं, परंतु यह अनुभूति गिने-चुने लोग ही कर पाते हैं कि अब उसकी दोनों आंखों में खुशी  के आंसू  नहीं, दु:ख  के आंसू डबडबा रहे हैं। लेकिन ये आंसू खून के आंसू हैं। इनमें जातीयता के संघर्ष का खून है।  पता नहीं उसकी अपनी संतानों में से कौन और कितने मां की इस पीड़ा की अनुभूति कर पाएंगे, क्योंकि यह अनुभूति तो राष्टÑीयता की अनुभूति से जुड़ी है, सांस्कृतिक स्वतंत्रता से जुड़ी है। सांस्कृतिक स्वतंत्रता की अनुभूति प्रत्येक भारतवासी का राष्ट्रीय कर्तव्य है।

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हमारा लक्ष्य जनमानस का भावनात्मक नवनिर्माण है। राष्ट्र की सांस्कृतिक आजादी है। नैतिक-चारित्रिक उत्थान है। शिक्षा एवं विद्या का समन्वय कर शिक्षण तंत्र में आमूलचूल परिवर्तन है। आत्मबल संवर्द्धन कर राष्ट्र को समर्थ सशक्त नागरिक देना है।— पं. श्रीराम शर्मा आचार्य, संस्थापक, अखिल विश्व गायत्री परिवार


1947 में विश्व का यह सबसे बड़ा लोकतंत्र अंग्रेजों के हाथ से स्वतंत्र हुआ था। ढेरों ने अपनी कुर्बानियां दी थीं। अगणित अज्ञात स्थिति में ही शहीद हो गए। न कहीं किसी का नाम आया, न प्रशस्तिपत्र ही मिला, पर उन्होंने इसकी चिंता नहीं की। दक्षिणेश्वर की माटी हाथ में लिए, जेब में गीता की छोटी-सी पुस्तिका रखे न जाने कितने फांसी पर चढ़ गए, न जाने कितनों ने सारा जीवन  अविज्ञात स्थिति बिताकर देश की आजादी के लिए स्वयं व परिवार को भूखा, नगण्य से साधनों में जिए एवं गुमनामी के परदे के पीछे चले गए। ढेरों साहित्यकार, स्वयंसेवक स्तर के कार्यकर्ता, आजादी के आंदोलन के सिपाही, सत्याग्रही, सविनय अवज्ञा आंदोलन का पालन करने वाले गांधी के अनुचर, खादी को जीवनव्रत बना लेने वाले व्यक्ति एक उज्जवल भविष्य वाले भारतवर्ष की उम्मीद में जीवन जीते रहे, पर नाउम्मीद होकर इस धरती से चले गए।

भारत में ‘राष्ट्र’ सदैव एक सांस्कृतिक शब्द रहा है, राजनीतिक नहीं। राष्ट्र उपास्य है, ईष्ट है। विविधताओं के बावजूद भारत एक राष्ट्र रहा है। हमारे ऋषियों ने संसार की प्रकृति-प्रदत्त विविधताओं को बहुत सहज भाव से स्वीकार किया। किन्तु मनुष्य के अन्त:करण में स्थित परिष्कृत चेतना को लक्ष्य करके सांस्कृतिक एकता के भाव भरे सूत्रों को विकसित एवं प्रतिष्ठित करने में सफलता पाई। हमारे मनीषियों ने सांस्कृतिक आधारों को ही प्राथमिकता दी। सांस्कृतिक सूत्रों को उन्होंने जन-जन के भावनात्मक स्तर तक गहराई से बिठाने में सफलता पाई। यही कारण है कि हम गर्व से कह पाते हैं, ‘‘कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी।’’ भले ही सदियों तक ‘दौरे जमां’(सांसारिक राजनीतिक चक्र) हमारा दुश्मन रहा है।

सांस्कृतिक अवधारणा हर भारतीय की रगों में रक्त की तरह सतत प्रवाहित है। अयोध्या में जन्मे राम कन्याकुमारी में रामेश्वरम्  की स्थापना करते हैं। बृज के श्रीकृष्ण द्वारिका में अपना आवास बनाते हैं। बंगाल के चैतन्य बृज में आकर अपने इष्ट के लीला क्षेत्र को खोजते हैं। केरल में जन्मे शंकराचार्य चारों दिशाओं में चारधामों की स्थापना करके काश्मीर के सरस्वती मन्दिर के पट खोले बिना अपनी यात्रा पूर्ण नहीं मानते। वे अपना शरीर दक्षिण में नहीं, उत्तराखण्ड में छोड़ना पसंद करते हैं। गंगोत्री का जल पिये बिना रामेश्वरम् की प्यास नहीं बुझती। उत्तराखण्ड के देवालयों के देवता दक्षिण के पुजारी मांगते हैं। भक्त को रामेश्वरम्, केदारनाथ, सोमनाथ, विश्वनाथ, पशुपतिनाथ, महाकालेश्वर, अमरनाथ आदि सभी जगह एक ही इष्ट के दर्शन होते हैं। वैष्णव देवी से कन्याकुमारी तथा अम्बाजी (गुजरात) से कामाख्या (असम) तक एक ही मातृसत्ता को नमन किया जाता है। देश के वर्तमान प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी भी इसी सांस्कृतिक अवधारणा का समर्थन करते हैं।

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अपनी संस्कृति, अपनी पहचान

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी सांस्कृतिक नवोन्मेष को जाग्रत करते हुए भारत के पूरब-पश्चिम, उत्तर-दक्षिण को सांस्कृतिक दृष्टि से जोड़ने वाले सूत्रों को अपने उद्बोधनों मे रखते हैं। भगवान राम, भगवान श्रीकृष्ण, भगवान शिव के साम्राज्य को वे राजनीतिक सीमा में न बांधकर सांस्कृतिक दृष्टि से नेपाल, भूटान, बाली, सुमात्रा, इंडोनेशिया, मलेशिया, श्रीलंका, मॉरीशस, सूरीनाम, फीजी, अमेरिका, जापान, चीन, त्रिनिदाद,  टोबेगो ब्राजील जैसे देशों से जोड़ते हैं। यह भाव भरी सांस्कृतिक चेतना ही उस कालजयी राष्ट्र को बनाती है, जो ‘भारत’ कहलाता है।

श्री मोदी सांस्कृतिक नवोन्मेष को जाग्रत करते हुए भारत के पूरब-पश्चिम, उत्तर-दक्षिण को सांस्कृतिक दृष्टि से जोड़ने वाले सूत्रों को अपने उद्बोधनों मे रखते हैं। भगवान राम, भगवान श्रीकृष्ण, भगवान शिव के साम्राज्य को वे राजनीतिक सीमा में न बांधकर सांस्कृतिक दृष्टि से नेपाल, भूटान, बाली, सुमात्रा, इंडोनेशिया, मलेशिया, श्रीलंका, मॉरीशस, सूरीनाम, फीजी, अमेरिका, जापान, चीन, त्रिनिदाद,  टोबेगो ब्राजील जैसे देशों से जोड़ते हैं। यह भाव भरी सांस्कृतिक चेतना ही उस कालजयी राष्ट्र को बनाती है, जो ‘भारत’ कहलाता है। इस राष्ट्र का संगठन राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं से न कभी किया जा सका है और न कभी किया जा सकेगा। किन्तु सांस्कृतिक सूत्रों में बंधकर यह राष्ट्र सदैव विश्व मुकुट बना है और पुन: बनकर रहेगा। आज की परिस्थितियों में मनुष्य मात्र को उन सांस्कृतिक सूत्रों की खोज है जिनके आधार पर असमानता मिटें और स्वर्गिक परिस्थितियों का निर्माण किया जा सके। मनुष्यों में देवत्व का उदय हो एवं धरती पर स्वर्ग की परिस्थिति उत्पन्न हो सके। ऋषियों की धरोहर-देव संस्कृति और समय के अनुकूल व्यावहारिक सूत्रों को जन-जन तक पहुंचाना आज की अनिवार्यता है। उसी आधार पर व्यक्तियों में देवत्व का विकास एवं धरती पर स्वर्ग का अवतरण संभव होगा।

अखिल विश्व गायत्री परिवार ने सांस्कृतिक स्वतंत्रता के लिए जमीनी स्तर से प्रयास किया है। भारतीय संस्कार पद्धति के अन्तर्गत धर्म-सम्प्रदाय से हटकर ऊंच-नीच, जाति-पाति मिटाने  के लिए गायत्री परिवार ने बढ़-चढ़ कर प्रयास किया है।  वनवासी, जनजाति एवं अन्त्योदय बहुल क्षेत्रों (झारखंड, छत्तीसगढ़, राजस्थान, असम, पश्चिम बंगाल, महाराष्टÑ के पिछड़े इलाके) में समानता का संदेश देने, उन्हें यज्ञोपवीत धारण करवा कर पौरोहित्य का प्रशिक्षण देने का कार्य किया है। उन्हें स्वावलम्बी बनाया है। युग तीर्थ शान्तिकुंज उसका जीता-जागता उदाहरण है। इन क्षेत्रों में लाखों की संख्या में संस्कारों का क्रम सम्पन्न हुआ। संस्कारों के क्रम में नामकरण, अन्नप्राशन, विद्यारम्भ, यज्ञोपवीत, विवाह संस्कार प्रमुख हैं।

क्या यही स्वतंत्रता है?
हमें राजनीतिक स्वतंत्रता तो मिल गई, किन्तु सांस्कृतिक स्वतंत्रता चाहिए और यह तब तक नहीं मिलेगी, जब तक जातिवाद का विष वृक्ष फलता-फूलता रहेगा। सारी राजनीति इसी से संचालित है। जाति, संप्रदाय और मजहब के नाम पर भाई को भाई से, पड़ोसी को पड़ोसी से और देशवासी को देशवासी से दूर करने का प्रयास हो रहा है। यह प्रयास देश की सांस्कृतिक चेतना को भी नष्ट कर रहा है। वहीं दूसरी ओर धनी और धनी बनते जा रहे हैं एवं गरीब और निर्धन। गांव उजड़ रहे हैं, शहरों के पेट में समा रहे हैं। अब कोई गांव में रहना नहीं चाहता। अपसंस्कृति और अपराधों ने वहां भी पैठ बना ली है। सरपंचों की भ्रष्ट राजनीति ने गांवों की एकता नष्ट कर, उन्हें भी बांट दिया है एवं लगता है कि सब कुछ दांव पर लग गया है। क्या यही स्वतंत्रता है, क्या यही लोकतंत्र है, जिसमें एक वैज्ञानिक-मनीषी-ऋषि स्तर का व्यक्ति पुन: राष्ट्रपति नहीं बन सकता, क्योंकि दलीय राजनीति का समीकरण उसके पक्ष में नहीं है?

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सांस्कृतिक समरसता उत्पन्न करने, विभिन्न जातियों के बीच भावनात्मक ऐक्य स्थापित करने का एक ही सूत्र है-सांस्कृतिक क्रांति। ऐसी सांस्कृतिक क्रांति, जो आध्यात्मिक भावापन्न हो।
— डॉ. हेडगेवार, आद्य सरसंघचालक

अखिल विश्व गायत्री परिवार के संस्थापक, संरक्षक, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी परमपूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी ने गायत्री परिवार का लक्ष्य सुनिश्चित करते हुए लिखा है, ‘‘हमारा लक्ष्य जनमानस का भावनात्मक नवनिर्माण है। राष्ट्र की सांस्कृतिक आजादी है। नैतिक-चारित्रिक उत्थान है। शिक्षा एवं विद्या का समन्वय कर शिक्षण तंत्र में आमूलचूल परिवर्तन है। आत्मबल संवर्द्धन कर राष्ट्र को समर्थ सशक्त नागरिक देना है।’’ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक एवं प्रकाण्ड क्रांतिकारी डॉ. बलिराम हेडगेवार जी भी सांस्कृतिक स्वतंत्रता के पुरोधा थे। उनके एवं अखिल विश्व गायत्री परिवार के संस्थापक पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी के विचारों में काफी समानताएं हैं। वनवासी बहुल क्षेत्रों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के आनुषांगिक संगठनों के लाखों कार्यकर्ता सांस्कृतिक नवोन्मेष के लिए दिन-रात जुटे रहते हैं। डॉ. हेडगेवार ने सांस्कृतिक समरसता की नई परिभाषा लिखी है। उन्होंने लिखा है, ‘‘सांस्कृतिक समरसता उत्पन्न करने, विभिन्न जातियों के बीच भावनात्मक ऐक्य स्थापित करने का एक ही सूत्र है-सांस्कृतिक क्रांति। ऐसी सांस्कृतिक क्रांति, जो आध्यात्मिक भावापन्न हो।’’ नवजागरण काल में राजाराम मोहन राय, केशवचन्द्र सेन आदि ने यही सूत्र खोजने शुरू किए थे। उनके इन प्रयासों से भारतीयता अंगड़ाई लेने लगी थी। भारतीय राजनीति में एक प्रयोग हो चुका है। उसे गांधी जी ने अपने समय में सफलतापूर्वक लागू किया था। इसके द्वारा उन्होंने एक बड़े पैमाने पर आम भारतीय का राजनीतिकरण किया था, उन्हें अहिंसक सविनय अवज्ञा आंदोलन से जोड़ा था एवं आजादी के लक्ष्य को नजदीक ला दिया था। गांधी जी की खादी, विदेशी कपड़ों की होली और स्वदेशी आंदोलन ने एक नया जीवन-दर्शन दिया था। आज भी देश को हजारों-लाखों-करोड़ों कार्यकर्ता चाहिए, जो संघबद्ध हो गांव-मुहल्ले-प्रखंड स्तर पर अन्याय और शोषण के खिलाफ लड़ सकें। भ्रष्ट प्रशासनिक मशीनरी को ठीक करने का प्रयास करें। कहीं रिश्वतखोरी हो तो उससे भी जूझ सकें।

भारत को सांस्कृतिक दासता से मुक्ति दिलाने के लिए वीरभद्रों की जरूरत पड़ेगी। आने वाले दिनों में ऐसे गांडीवधारियों की आवश्यकता पड़ेगी, जो अर्जुन की तरह कौरवों की अक्षौहिणी सेनाओं को धराशायी कर दे। ऐसे हनुमानों की जरूरत होगी, जो ‘एक लाख पूत-सवा लाख नाती’ वाली लंका को पूंछ से जलाकर खाक कर दे। ऐसे कलाकारों की आवश्यकता है, जो चैतन्य महाप्रभु, मीरा, सूर, कबीर की भावनाओं को इस प्रकार लहरा सकें, जैसे सपेरा सांप को लहराता है। ऐसे धनवानों की जरूरत है, जो अपने पैसे को विलास में खर्च करने की अपेक्षा सम्राट अशोक की तरह अपना सर्वस्व समय की आवश्यकता पूरी करने के लिए लुटा सकें। तभी सच्चे अर्थों में सांस्कृतिक आजादी मिलेगी।
(लेखक देव संस्कृति विश्वविद्यालय, हरिद्वार के कुलाधिपति हैं)