झूठ-वाहक वामपंथी

    दिनांक 24-अगस्त-2020   
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वामपंथी अपनी विचारधारा को पुष्ट करने के लिए झूठ लिखते हैं, बोलते  हैं और उसे प्रचारित भी करते हैं। ये लोग संघ को बदनाम करने के लिए फर्जी खबरें चलाते हैं और संघ की सही बातों को दबाने के लिए किसी भी सीमा तक गिर जाते हैं
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कोरोना काल में दिल्ली में जरूरतमंदों के बीच भोजन बांटते स्वयंसेवक, लेकिन कभी किसी वामपंथी पत्रकार ने इनके बारे में एक शब्द नहीं लिखा।


वामपंथी विचार को मानने वाले बुद्धिजीवी और पत्रकारों की विशेषता है कि वे सत्य की खोज करने का प्रयास नहीं करते। पहले से तय ‘एजेंडा’ के दायरे में रहते हुए झूठ को सच कहकर परोसने या प्रश्न खड़े कर भ्रम निर्माण का प्रयास करते रहते हैं। हालांकि यह तत्काल तो प्रभावी होता दिखता है पर अंतत: सत्य ही विजयी होता है। इस का ताजा उदाहरण अभी वामपंथी विचार की ओर झुकी  एक अंग्रेजी पत्रिका ‘कारवां’ है, जिसमें संघ के सेवाकार्य को लेकर ऐसी ही एक वृत्त-कहानी देखने को मिली।
कोरोना वायरस के इस अभूतपूर्व संकट के समय शासकीय और अर्ध-शासकीय कर्मचारियों के साथ-साथ समाज का बहुत बड़ा वर्ग अपने प्राण संकट में डाल कर पूरे देश में, पहले दिन से आज तक सतत सक्रिय रहा है। बाढ़, भूकंप जैसी अन्य नैसर्गिक आपदाओं के समय राहत कार्य करना और इस संक्रमणशील बीमारी के समय, स्वयं संक्रमित होने की आशंका को देखते हुए भी सक्रिय होना, इनमें अंतर है।

मैं आंबेडकरवादी और आरएसएस का विरोधी हूं। डॉ. आंबेडकर भगवान बुद्ध के आधुनिक अवतार हैं, ऐसा मेरा विश्वास है। पर आरएसएस के सेवा कार्य से मैं प्रभावित हूं। मेरा अनुभव है कि आप यदि आरएसएस को 100 रुपए सेवा कार्य करने के लिए देते हो तो आरएसएस वाले उसमें अपनी जेब से 10 रुपए जोड़कर, 110 रुपए सेवा कार्य  में लगाते हैं। इसलिए आप निश्चिन्त होकर आरएसएस के सेवा कार्य में सहायता करें।  — एम. डी. रामटेके, आंबेडकरवादी विचारक 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 4,80,000  स्वयंसेवकों ने अरुणाचल प्रदेश से लेकर कश्मीर और कन्याकुमारी तक 85,701 स्थानों पर  सेवा भारती के माध्यम से 1,10,55,000 परिवारों को राशन के किट पहुंचाए हैं।  7,11,46,000 भोजन के पैकेट्स जरूरतमंदों के बीच बांटे हैं।   लाखों की संख्या में मास्क का वितरण, विभिन्न राज्यों में रहने वाले अन्य राज्यों के 13,00000 लोगों की सहायता, 40,000 यूनिट्स रक्तदान, प्रवासी मजदूरों की सहायता हेतु 1,341 केंद्रों के माध्यम से 23,65,000 प्रवासी मजदूरों को भोजन तथा दवाई तथा अन्य वैद्यकीय सहायता, घुमंतू जनजाति, तृतीयपंथी किन्नर, देह विक्रय के व्यवसाय करने वाले, धार्मिक स्थानों पर परिक्रमवासियों  पर निर्भर बंदर आदि पशु-पक्षी, गोवंश, इन सभी की सहायता की है। अनेक स्थानों पर प्रत्यक्ष संक्रमित बस्ती में जाकर स्वयंसेवकों ने सहायता की है। किसी भी दल की सरकार हो, सभी राज्यों में जहां भी प्रशासन ने जो सहायता मांगी उसकी पूर्ति संघ के स्वयंसेवकों ने की है। भीड़ नियंत्रण, स्थानांतर करने वाले श्रमिकों के नाम दर्ज करना, ऐसे असंख्य कार्य प्रशासन के आह्वान पर जगह-जगह स्वयंसेवकों ने किए हैं।  पुणे में प्रशासन के आह्वान पर स्वयंसेवकों ने अन्य  स्वयंसेवी संस्थाओं के साथ मिलकर रेड जोन में घनी बस्तियों में जाकर 1,00000 लोगों की जांच की और संक्रमण की आशंका वाले व्यक्तियों को अधिक जांच के लिए प्रशासन को सौंपा।
इतना विशद-विस्तृत सेवा कार्य संघ के स्वयंसेवकों ने किया।  इसका थोड़ा भी वर्णन इस पत्रिका ने नहीं किया। क्योंकि संघ के अच्छे कार्य की जानकारी देना उनके एजेंडा का हिस्सा नहीं हो सकता। संघ के बारे में जितनी गलत बातें और झूठ वामपंथी बताते रहते हैं उन सारी बातों का उल्लेख सेवा कार्य का समाचार देने की आड़ में इन्होंने किया है। कहीं पर भी संघ के अखिल भारतीय पदाधिकारी को मिलकर उनका इसके बारे में क्या कहना है, यह पूछने का पत्रकार धर्म भी इन्होंने नहीं निभाया। ऐसी झूठी खबर लिखते समय इनकी आत्मा को जरा भी संकोच नहीं हुआ। वैसे भी ये वामपंथी धर्म या आत्मा इन बातों को मानते ही कहां हैं?
इस पत्रकार ने और एक झूठ, बिना सबूत के परोसने का प्रयास किया कि संघ ने सरकारी कोष   का उपयोग सेवा कार्य करने में किया। बिना यह बताए कि यदि सरकार पंजीकृत सेवा संस्थाओं के माध्यम से सरकारी कोष का विनियोग करती है तो इसमें गलत क्या है? संघ के स्वयंसेवक समाज से  जुटाए पैसे के आधार पर ही इतने बड़े पैमाने पर सेवा कार्य करते हैं। ये सभी सेवा कार्य पंजीकृत सेवा संस्थाओं के माध्यम से चलते हैं, जिन्हें नियमित रूप से अंकेक्षित (आॅडिट) किया जाता है। केदारनाथ  में जब अचानक बाढ़ की आपदा आयी थी तब भी समाज से धन एकत्र कर स्वयंसेवकों ने सेवा कार्य किया था। उस समय एम. डी. रामटेके नाम के एक व्यक्ति का पत्र पढ़ने में आया। उसमें वे लिखते हैं, ‘‘मैं आंबेडकरवादी और आरएसएस का विरोधी हूं। डॉ. आंबेडकर भगवान बुद्ध के आधुनिक अवतार हैं, ऐसा मेरा विश्वास है। पर आरएसएस के सेवा कार्य से मैं प्रभावित हूं। मेरा अनुभव है कि आप यदि आरएसएस को 100 रुपए सेवा कार्य करने के लिए देते हो तो आरएसएस वाले उसमें अपनी जेब से 10 रुपए जोड़कर, 110 रुपए सेवा कार्य  में लगाते हैं। इसलिए आप निश्चिन्त होकर आरएसएस के सेवा कार्य में सहायता करें।’’
सरकार यदि सेवा संस्थाओं के माध्यम से सेवा कार्य में सहायता करती है तो स्वयंसेवकों द्वारा चलाए जा रहे पंजीकृत ट्रस्ट के सरकारी अनुदान लेने में गलत क्या है? पर, फिर भी इस कोरोना महामारी के समय जो सेवा कार्य स्वयंसेवकों ने किए उनमें सर्वाधिक अनाज के किट का वितरण और भोजन पैकेट्स का वितरण था। केरल, असम, नागालैंड, त्रिपुरा और मुंबई में कुल 95 टन  अनाज (अधिकतर चावल) सरकार से नियत दर से खरीद कर लोगों को वितरित किया गया। केवल झारखंड की एक संस्था (सर्वांगीण ग्राम विकास समिति, खूंटी, झारखण्ड ) ने 12,000 भोजन पैकेट वितरण पर प्रति पैकेट 5 रु. ऐसे 60,000 रु. की सब्सिडी ली है। अन्य किसी भी राज्य में संघ ने सरकार से कोई आर्थिक सहायता नहीं ली है। पर संघ को बदनाम करने का कुछ लोगों का एजेंडा है, जो पत्रकारिता की आड़ में चलता है।
रिपोर्ट में इनके कहने का सार यह था कि संघ सेवा की आड़ में अपने पैर फैलाने की योजना करता है। साम्यवाद का मूल सेमेटिक विचारों से जुड़ने के कारण सेवा की आड़ में कन्वर्जन करने वालों के समान ही उनकी सोच रहने में कोई आश्चर्य नहीं है। भारतीय चिंतन, इस देश का समाज ‘वैष्णव जन तो तेणे रे कहिए जे पीड़ पराई जाने रे’ की टेक पर चलता है। यह हम सब जानते हैं परंतु इसके साथ ही यह बात गांठ बांध लेनी चाहिए कि वामपंथियों का भारतीय चिंतन से कोई लेना-देना ही नहीं है। कारण, भारतीय चिंतन का आधार आध्यात्मिक है और वामपंथ आध्यात्मिकता को मानता ही नहीं है।
सरसंघचालक जी ने अपने 19 अप्रैल, 2020 के उद्बोधन में स्वयंसेवकों से यही आह्वान किया था, ‘‘प्रचार या प्रसिद्धि का विचार भी मन में न लाते हुए केवल अपनेपन के भाव से हरसंभव, सभी की सहायता करनी है। एकान्त में साधना और अनेकान्त में सेवा यही संघ का संस्कार है।’’ संघ की यह उज्जवल परम्परा भी है।

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केरल में 2018 में आई बाढ़ के समय इस तरह स्वयंसेवकों ने लोगों तक राहत सामग्री पहुंचाई थी।
12 नवम्बर, 1996 के दिन रात्रि को हरियाणा के चरखी-दादरी के पास सऊदी अरब और कजाक एयरलाइंस के दो विमान आपस में टकराए और आग लगकर नीचे गिरे। दोनों विमानों में कुल 351 प्रवासी थे, जिनमें से 300 मुसलमान और 12 ईसाई थे। दुर्घटना के तुरंत बाद जिला संघचालक श्री जीतराम जी, अन्य स्वयंसेवक और डॉक्टर हेडगेवार चिकित्सालय  के चिकित्सक दुर्घटना स्थल पर पहुंचे। अंधेरे के कारण पैट्रोमेक्स और जेनरेटर का प्रबंध कराया। तत्काल सभी शवों को भिवानी के चिकित्सालय में पहुंचाया गया। सुबह तक समाचार फैलते ही मृतकों के परिजन, पुलिस प्रशासन, पत्रकार आदि वहां आने लगे। मृतकों के शव उनके परिजनों को सौंपे गए। जिनके बारे में ठीक जानकारी नहीं मिली ऐसे 76 मुसलमान तथा 3 ईसाई के शवों को उनकी आस्था, विधान के अनुसार दफनाया गया। इसमें स्थानीय मौलवी और मुंबई से आए कुछ लोगों ने सहयोग दिया। तीन दिन बाद 15 नवम्बर को दादरी की मस्जिद में आयोजित धन्यवाद सभा में जिला संघचालक श्री जीतराम जी को सम्मानित किया गया। अधिकांश समाचारपत्रों ने शीर्षक लगाया, ‘‘मस्जिद में खाकी निक्कर का सम्मान।’’
घटना स्थल पर आए केंद्रीय नागरिक उड्डयन मंत्री श्री इब्राहिम तथा पूर्व केंद्रीय मंत्री जी कूरियन ने कहा, ‘‘आपकी जितनी प्रशंसा की जाए वह कम है। मैं आपको धन्यवाद देता हूं।’’ सीकर के जाफर अली और हाकिम खान ने कहा, ‘‘इन खुदा के फरिश्तों को न जाने क्या क्या कहा जाता है, पर आज भ्रम मिट गया।’’ पुलिस अधीक्षक मोहम्मद शकील का कथन था, ‘‘संकट के समय में सर्वाधिक सहयोग संघ वालों का रहा। मुझे उनसे यही आशा थी।’’
इस प्रकार के असंख्य प्रसंग लिखे जा सकते हैं। यह थोड़ा विस्तार से इसलिए लिखा है क्योंकि सारे वामपंथी अप-प्रचार को  झुठलातीं ये स्वीकारोक्तियां खुद ईसाई-मुस्लिम समाज की हैं। प्रश्न उठता है कि वामपंथी इसमें कौन-सा एजेंडा देखते होंगे?
स्वामी विवेकानंद ने कहा था, ‘‘शिव भाव से जीव सेवा’’ यह हिंदुत्व सिखाता है। स्वयंसेवक शाखा में यही संस्कार पाता है कि सेवा करते समय किसी की जाति, उपासना, विचारधारा का भेद भूलकर अपनत्व के भाव से यथासंभव सेवा करने का प्रयत्न करना चाहिए। इसीलिए कुछ वर्ष पूर्व जब कश्मीर में या केरल में अभूतपूर्व बाढ़ आयी थी, अनेक घरों, दुकानों, कार्यालयों और अस्पतालों में पानी के कारण कीचड़ जम गया था, तब संघ के स्वयंसेवकों ने सफाई अभियान के दौरान मजहब या विचारधारा का भेद किए बिना सर्वत्र सेवा-सहयोग किया था। कुछ जगहों पर तो कम्युनिस्ट पार्टी के स्थानीय कार्यालयों की भी सफाई की थी। अब इसमें आत्मीयतापूर्ण सेवा के अलावा संघ का क्या एजेंडा हो सकता है?
वामपंथी विचार को मानने वालों की दूसरी ‘विशेषता’ यह है कि वे अपने आपको ‘लिबरल’ माने उदार कहते थकते नहीं हैं। असल में वे ऐसे होते बिल्कुल नहीं हैं। उदारता का अर्थ है दूसरे विचार को सुनना। यह पहली सीढ़ी है। फिर उसे समझना। उसके बाद उससे सहमत या असहमत होना। सहमत होने पर उसे प्रच्छन्न रीति से स्वीकार करना और आगे की कड़ी है उसे प्रकट स्वीकार करना। उसके आगे की सीढ़ियां हैं उसका समर्थन करना और यथासंभव सहयोग करना। परन्तु उदार कहलाने वाला वामपंथी विचार दूसरों को सुनने के पक्ष में ही नहीं है। प्रसिद्ध समाजसेवी और मैगसेसे पुरस्कार प्राप्त डॉ. अभय बंग को उनके सेवाकार्य का सम्मान करने हेतु संघ के एक  कार्यक्रम में प्रमुख अतिथि के नाते बुलाया था। वहां वे आए थे और उन्होंने अपने विचार खुलकर रखे। पर इन वामपंथी विचार के लोगों को यह रास नहीं आया, क्योंकि वे डॉ. बंग को अपने खेमे का मानते थे। उनकी साप्ताहिक पत्रिका में डॉ. बंग के खिलाफ अनेक लेख लिखे गए ताकि वे इस कार्यक्रम में जाने का अपना निर्णय बदलें। डॉ. बंग का कहना था, ‘‘संघ के लोग मेरी वैचारिक पृष्ठभूमि जानने के बावजूद मुझे बुला रहे हैं। इसमें संघ का खुलापन (उदारता) दिखता है। वहां भी मैं  अपनी बात ही कहने वाला हूं, जो हमेशा कहता आया हूं।’’ पर ये वामपंथी नहीं माने। कार्यक्रम के बाद डॉ. बंग ने अपने भाषण की पाण्डुलिपि भेज कर उसे उस साप्ताहिक पत्रिका में प्रकाशित करने के लिए कहा जिसमें उनके विरुद्ध अनेक लेख प्रकाशित हो चुके थे। पर उनका भाषण वहां प्रकाशित नहीं हुआ। यह वामपंथियों की ‘उदारता’ का असली चेहरा है!

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कोरोना काल में हैदराबाद में यातायात को सुचारू बनाने में लगे स्वयंसेवक।


कुछ वर्ष पूर्व जब कश्मीर में या केरल में अभूतपूर्व बाढ़ आयी थी, अनेक घरों, दुकानों, कार्यालयों और अस्पतालों में पानी के कारण कीचड़ जम गया था, तब संघ के स्वयंसेवकों ने सफाई अभियान के दौरान मजहब या विचारधारा का भेद किए बिना सर्वत्र सेवा-सहयोग किया था। कुछ जगहों पर तो कम्युनिस्ट पार्टी के स्थानीय कार्यालयों की भी सफाई की थी।

उसी तरह जयपुर ‘लिटरेचर फेस्टिवल’ में संघ के अधिकारियों को अपनी बात रखने के लिए आमंत्रण मिला तो उसका इन (उदार?) वामपंथियों ने खूब विरोध किया और अंत में उनके कुछ मूर्धन्य नेताओं ने पूरे ‘फेस्टिवल’ का ही बहिष्कार किया। पता नहीं वामपंथी सत्य का सामना करने से इतना डरते क्यों हैं!
तीसरी ‘विशेषता’ इन वामपंथियों की यह है कि वे संघ के खिलाफ, बिना आधार के, बिना तथ्यों को जाने, बिना थके झूठा प्रचार करते रहते हैं। विद्वता का मुखौटा पहनकर अपने ही लोगों द्वारा प्रतिपादित झूठ का सहारा लेकर बार-बार प्रकारान्त से संघ के विरुद्ध वही झूठ फैलाने का प्रयास करते दिखते हैं। इन आरोपों में महात्मा गांधीजी की हत्या के कारण संघ पर प्रतिबंध लगा था, ये मनुवादी, ब्राह्मणी-वर्चस्ववादी, महिला-विरोधी, सांप्रदायिक, मुस्लिम-विरोधी, प्रगति-विरोधी हैं, ऐसी बातें संघ के बारे में दोहराते रहते हैं। परन्तु वे स्वयं संघ के अधिकारियों से प्रत्यक्ष मिलना, स्वयं अनुभव ले कर देखने का प्रयत्न कभी नहीं करते, क्योंकि वे प्रामाणिक नहीं हैं।
यह सच है कि गांधी जी की हत्या का बहाना ले कर संघ को समाप्त करने की इच्छा उस समय के कांग्रेस के नेतृत्व ने की थी। इसलिए उसकी आड़ में संघ पर प्रतिबंध लगाया गया। सरसंघचालक श्रीगुरुजी को हत्या के आरोप में धारा 302 के तहत गिरफ्तार किया था। परन्तु कोई भी आधार या सबूत नहीं होने के कारण उन पर लगा 302 हटाकर उन्हें आंतरिक सुरक्षा का कारण दिखाकर गिरफ्तार रखा गया। जब गांधी हत्या का मुकदमा चला तो उसके आरोपपत्र में संघ का नाम तक नहीं था। गांधीजी की हत्या करने वाले नाथूराम गोडसे का सीधा संबंध हिन्दू महासभा से था। पर प्रतिबंध राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर लगा। कारण संघ की शक्ति और लोकप्रियता लगातार बढ़ रही थी। प्रतिबंध का कोई आधारभूत कारण सरकार नहीं बता पाई। स्वयंसेवकों ने अभूतपूर्व सत्याग्रह किया जिसमें भारत के सभी प्रांतों से 70,000  स्वयंसेवकों ने भाग लिया। इतना अनुशासित, देशव्यापी और शांतिपूर्ण सत्याग्रह भारत के इतिहास में पहली बार हुआ था। अंतत: इसी सरकार ने संघ पर लगा प्रतिबंध बिना किसी शर्त के वापस लिया। इस सच को ये झूठे वामपंथी नहीं बताते।
गत तीन वर्ष से एक ईसाई परिवार मेरे संपर्क में है। प्रारंभ में वे घोर संघ विरोधी थे। किसी कारण संपर्क हुआ तो उन्होंने लगातार डेढ़ घंटा मुझे खूब प्रश्न पूछे। उनका अंतिम प्रश्न था, ‘‘मैं नियमित चर्च जाने वाला, ईसाइयत का पालन करने वाला और मूर्तिपूजा को नहीं मानने वाला हूं। क्या मैं  संघ का सदस्य बन सकता हूं?’’ मैंने कहा- ‘हां’। फिर अनेक बार लगातार मुलाकात हुई। एक बार उन्होंने पूछा, ‘‘सर! संघ में सभी लोग आप जैसे हैं? या आप अपवाद हैं?’’ धीरे-धीरे परिचय बढ़ता गया। अब वे कहते हैं, ‘‘आप जो बताते हैं वह ईसाई समाज जानता ही नहीं है।’’ मेरे प्रवास में अनेक स्थानों पर उन्होंने ईसाई समाज के प्रमुख लोगों का मेरे साथ वार्तालाप आयोजित किया है। ईसाई समाज के लोग जब उन्हें मिलते हैं तो ये जानबूझकर संघ का विषय निकालते हैं। संघ का नाम सुनते ही वे अक्सर संघ को ईसाई विरोधी बताते हैं। यह सुनते ही वह परिवार उन्हें तीन प्रश्न पूछता है- 1. यह जो आप कह रहे हो कि आरएसएस ईसाई विरोधी है, यह आपका स्वयं का अनुभव है क्या? 2. आपने आरएसएस का कोई साहित्य पढ़ा है क्या? 3. आप आरएसएस के किसी वरिष्ठ व्यक्ति से मिले हो क्या?
इन तीनों प्रश्नों का उत्तर नकारात्मक ही आता है। फिर वे उनको स्वयं का संघ का अनुभव बताते हैं और संघ का कुछ साहित्य पढ़ने के लिए देते हैं। अपने घर में ही संघ की कुछ पुस्तकें उन्होंने रखी हुई हैं। 
ऐसा खुलापन इन वामपंथियों के साथ संभव नहीं हैं। वे सीधे संपर्क से कतराते हैं। शायद इस डर से कि उनका इतने वर्षों से पाला हुआ झूठ कहीं खुल न जाए।
14 अक्तूबर, 1949 को मुंबई विधानसभा के एक सत्र के दौरान संघ पर प्रतिबंध हटाए जाने के संबंध में पूछे गए प्रश्न तथा उनके उत्तर पढ़ने योग्य हैं। श्री लल्लूभाई माकनजी पटेल (सूरत जिला) का प्रश्न था, माननीय गृह एवं राजस्व मंत्री कृपया यह बताएं-
  1.   क्या यह सत्य है कि संघ (आरएसएस) से प्रतिबंध हटा लिया गया है?
  2. यदि यह सत्य है तो कृपया प्रतिबंध हटाने के कारण बताइए?
  3. क्या यह प्रतिबंध बिना शर्त हटाए गए हैं या फिर यह सशर्त हटाए गए हैं?
  4. यदि प्रतिबंध सशर्त हटाए गए हैं तो कृपया उन शर्तों को बताएं?
  5. क्या संघ के नेतृत्व ने सरकार को कोई वचन दिया है?
  6. यदि हां, तो वह वचन क्या है?
श्री मोरारजी देसाई की अनुपस्थिति के कारण श्री दिनकर राव ने उत्तर दिया- 
  1. जी हां।
  2. (संघ से) प्रतिबंध इसलिए हटाया गया, क्यों कि इसे जारी रखने का कोई औचित्य नहीं था। 
  3. यह (प्रतिबंध) बिना शर्त हटाया गया है।
  4. लागू नहीं।
  5. जी नहीं।
  6. लागू नहीं।
ये ऐसे तथ्य हैं जिन्हें वामपंथी कभी नहीं बताते।


विरोधी धारणा होने के बावजूद प्रामाणिकता हो तो सत्य जानने के बाद व्यक्ति अपना अभिगम बदलता भी है। तमिलनाडु में द्रविड़ आंदोलन के बारे में सभी जानते हैं। तमिलनाडु में उत्तर अर्काट जिले के मड़पल्ली गांव में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा के वार्षिक उत्सव में स्थानीय द्रविड़ कड़गम के नेता को प्रमुख अतिथि के नाते बुलाया था। उनके स्वीकृति देने से सभी को आश्चर्य हुआ। प्रमुख अतिथि के नाते अपने वक्तव्य में उन्होंने कहा, ‘‘कुछ दिन पहले मैं शाखा पर हमला कर उसे बंद करवाने के लिए अपने लोगों को लेकर आया था। पर यहां आने के बाद मैंने देखा कि गाँव के ब्राह्मण परिवार के बालक और हरिजन मोहल्ले के बालक आपस में उत्साह के साथ, मानो एक ही कुटुम्ब के हों, ऐसे आनंद से खेल रहे हैं, तो मुझे बहुत आश्चर्य हुआ और मैं परास्त हुआ। हमारे पेरियार का ऐसा ही जातिभेद रहित समाज निर्माण का स्वप्न था। हम तो उसे साकार नहीं कर सके पर आपने वह साकार कर दिखाया है। इसीलिए आपका अभिनंदन करने मैं आप सभी के लिए मिठाई लाया हूं।’’
परंतु वामपंथी लेखक या पत्रकारों से ऐसी प्रामाणिकता की अपेक्षा करना व्यर्थ है, ऐसा अनुभव है। ये लोग अपने स्वयं के अनुभव के आधार पर कुछ नहीं लिखते हैं।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सम्पूर्ण समाज को संगठित करने के प्रयास में लगा है। पहले से ही अधिकाधिक राज्यों में, अधिकाधिक जिलों में, अधिकाधिक खंडों तक और अधिकाधिक ग्रामों तक पहुंचने का उसका संकल्प और प्रयास भी रहा है और वह काफी मात्रा में सफल भी हुआ है, हो रहा है। संघ का यह विस्तार किसी की कृपा से, किसी के अनुदान से या अनुकंपा से नहीं हुआ है। संघ कार्यकर्ताओं के सतत, निरलस, दीर्घ परिश्रम, त्याग और बलिदानों के परिणामस्वरूप संघ कार्य का आज का विस्तृत और प्रभावशाली रूप दिख रहा है। अनेक राष्ट्रविरोधी ताकतों ने और निहित स्वार्थी राजनीतिक दलों ने संघ का विस्तार न हो इसका भरपूर प्रयास किया। संघ का विरोध किया है, संघ के बारे में अपप्रचार किया है। फिर भी संघ संस्थापक डॉ. हेडगेवार जी के दो सूत्र- ‘सर्वे२षाम् अविरोधेन और वादो ना२वलंब्य:’ (माने किसी का विरोध न करते हुए और बहुत वाद-विवाद में न उलझते हुए) के आधार पर आत्मविश्वास और अपनेपन के साथ काम करते रहने से आज की स्थिति आयी है।
शुद्ध, सात्विक, अपनत्व और कर्तव्य भावना से ही स्वयंसेवक सेवा कार्य के लिए सहज प्रवृत्त होता दिखता है। उसमें अन्य कोई उद्देश्य या एजेंडा देखना, घोड़े के आगे गाड़ी चलाने जैसी बात हुई।
संघ कार्य को समझना है तो पश्चिम की एकांगी सोच को छोड़कर भारतीय एकात्म दृष्टि से विचार करेंगे तो ही भारत को और संघ को आप ठीक समझ सकेंगे। एक वरिष्ठ मूलग्राही चिंतक संघ कार्यकर्ता की कही बात स्मरण आती है। उन्होंने कहा कि अभारतीय या पश्चिम के विचार के आधार पर संघ को समझना आसान नहीं है। संघ को समझना है तो  ‘ईशावास्योपनिषद’ को समझना आवश्यक है। इसमें परम-तत्व का वर्णन करते समय परस्पर विरोधी बातें कही हैं और उस परम-तत्व को ये दोनों परस्पर विरोधी बातें एक साथ लागू होती हैं। वह श्लोक है-
तदेजति तन्नैजति तद्दूरे तदवन्तिके।
तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यत:।।
(वह हिलता है, वह हिलता नहीं है। वह दूर है, वह नजदीक भी है, वह सबके अंदर है, वह सब के बाहर भी है।)
भौतिकी शास्त्र के परमाण्विक कणों के बारे में हैसनबर्ग का सिद्धांत भी यही कहता है, ‘‘ये कण भी है। तरंग भी है। वह दोनों है। एक निश्चित समय पर वह क्या है यह कह पाना कठिन, ना मुमकिन ही है।’’ यही भारतीय दर्शन कहता है।
भारतीय आर्ष दृष्टि के एकात्म और सर्वागींण चिंतन के आधार पर ही आप भारत को और संघ को भी समझ सकोगे। पर यह आर्ष दृष्टि से सोचते ही आप का वामपंथी होना समाप्त ही हो जाएगा! शायद इसी डर से ये वामपंथी संघ को प्रत्यक्ष जानने से कतराते होंगे। नहीं तो उनका हश्र उस नमक की गुड़िया जैसा होगा जो समुद्र की गहराई नापने के लिए समुद्र में कूद पड़ी पर अब तक बाहर नहीं आयी।    (लेखक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह हैं)