‘पश्चिमी जीवन में खालीपन है, पर भारत में आध्यात्मिक उत्थान के मार्ग खुले हैं’

    दिनांक 25-अगस्त-2020
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मारिया विर्थ

जर्मनी में पली-बढ़ी मारिया विर्थ 38 साल पहले हैम्बर्ग विश्वविद्यालय से मनोविज्ञान की पढ़ाई पूरी करने के बाद आस्ट्रेलिया जाते समय भारत में कुछ दिन ठहरी थीं। और फिर भारत के अलौकिक आध्यात्मिक दर्शन और संस्कृति से ऐसी प्रभावित हुईं कि उन्होंने भारत को ही अपना घर बना लिया। वह प्राचीन भारतीय पंरपरा और वैज्ञानिक जीवनशैली का समर्पित भाव से पालन करती आई हैं। उनका कहना है कि जहां ईसाइयत और इस्लाम एक गॉड या एक खुदा के प्रसारक है, वहीं सनातन धर्म में अपने विश्वास का मार्ग खुद तलाश करने का सूत्र दिया गया है। मारिया सभी से ‘सनातन’ जीवन शैली का पालन करने का आग्रह करती हैं जो न सिर्फ हिंदुओं, बल्कि संपूर्ण मानवता के लिए हितकारी है। प्रस्तुत हैं पाञ्चजन्य के लिए प्रदीप कृष्णन से हुई उनकी विस्तृत बातचीत के प्रमुख अंश:- 
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आप हिंदू धर्म के प्रति से कैसे आकर्षित हुईं?

मार्च 1980 में आॅस्ट्रेलिया जाते समय मैं बीच में भारत में कन्याकुमारी पहुंची जहां स्वामी विवेकानंद स्मारक से मैंने ज्ञान योग की पुस्तक खरीदी। स्वामी विवेकानंद को पढ़ने से मुझे वेदांत दर्शन की जानकारी मिली और हिंदू धर्म की अद्भुत ज्ञान पंरपरा का एहसास हुआ। मेरे मन में इस विशाल ज्ञान भंडार को खंगालने की इच्छा जगी और मैं इसी दिशा में चल पड़ी। जल्दी ही मैंने हरिद्वार में अर्ध कुंभ मेले में भाग लिया जहां मेरी मुलाकात देवरहा बाबा और श्री आनंदमयी मां से हुई जिन्होंने मुझे ‘सभी जीव एक हैं’ का प्राचीन दर्शन समझाया। उन्होंने मुझे साधना का मार्ग अपनाने के लिए प्रेरित किया जिसके जरिए जीव की वास्तविक पहचान पर पड़े आवरण को हटाया जा सकता है।

क्या आपको लगता है कि हिंदू धर्म अन्य मतों, विशेष रूप से ईसाइयत और इस्लाम से अलग है?
सनातन धर्म या हिंदू धर्म ही सबसे प्राचीन और पूर्ण है जो हमारे अस्तित्व और ब्रह्मांड के संबंध में सत्य का ज्ञान देता है। हालांकि किसी ‘वाद’ का अर्थ आमतौर पर एक निश्चित सिद्धांत होता है, लेकिन हिंदू धर्म में ऐसा नहीं है। इसमें ‘आत्म’ से जुड़ने की स्वतंत्रता, संकेत और विधान बताए गए हैं जो अंत:करण की आवाज के खिलाफ कदम नहीं उठाते। इसके विपरीत, ईसाइयत और इस्लाम के मत-सिद्धांत व्यक्ति की अंतरात्मा की आवाज से संचालित नहीं होते, इसलिए मानवता को बहुत कष्ट पहुंचाते हैं। अब्राह्मिक मतों में न सिर्फ एक ईश्वर के प्रति अंधभक्ति पर जोर दिया गया है, बल्कि उस ईश्वर के बारे में अतिवादी दावों को भी शिरोधार्य करने पर जोर दिया गया है जिनमें सत्य का कोई अंश नहीं होता और जो सामंजस्यपूर्ण सह-अस्तित्व के लिए बहुत हानिकारक हैं। हिंदू धर्म सत्य की खोज संबंधित प्रश्न पूछने के लिए प्रोत्साहित करता है, जबकि ईसाइयत और इस्लाम में अनुयायियों को सवाल पूछने की अनुमति नहीं है।

भारत में बसने और हिन्दू धर्म को अपनाने का विचार कैसे आया?
भारत आने के बाद मुझे अपने अंदर खुद को तलाशने की इच्छा जागी और इसके लिए भारत से बेहतर जगह नहीं है। भारतीयों को इसका एहसास नहीं है कि पश्चिम में माहौल कितना अलग है। पश्चिमी जीवन में खालीपन है, पर भारत में आध्यात्मिक उत्थान के मार्ग खुले हैं, क्योंकि यहां जीवन दर्शन उच्च भावों से युक्त है। दरअसल, मैंने अपनी किशोरावस्था में ही खुद को ईसाई मत से दूर कर लिया था। मैं एक प्रतिशोधपूर्ण भावना रखने वाले ईश्वर पर विश्वास नहीं कर सकती थी, जो मुझे उसकी आज्ञाओं का पालन न करने पर सदा के लिए ‘नरक की आग में धकेल देगा’। भारत में जब मैंने महसूस किया कि जीवन की सनातन परंपरा सबसे स्वाभाविक और आदर्श है, तो मैं हिंदू बन गई। हिंदू धर्म एक सर्वोच्च प्रज्ञावान (ब्रह्म/ ईश्वर) अस्तित्व को संसार की हर वस्तु के कारण और आधार के रूप में स्वीकार करता है। 

भारत के युवा अपनी पहचान पर गर्व करें। अपना शीष ऊंचा रखें। अगर आपके पूर्वजों ने अद्वितीय ज्ञान की गंगा न बहाई होती तो ‘पश्चिमी विज्ञान’ का कोई वजूद ही नहीं होता। पश्चिम की नकल में कुछ नहीं रखा। अपनी मूल ज्ञान संपदा की खोज करें। वही सच्चिदानंद है। 


आप अनेक संतों से मिली हैं। उसके बारे में बताएं।
मुझे कई संतों से मिलने का सौभाग्य मिला, जिनमें ओशो, देवरहा बाबा, आनंदमयी मां, स्वामी चिन्मयानंद, हेड़ाखान बाबा, रामसूरत कुमार, अम्मा, श्री श्री रविशंकर, बाबारामदेव, सद्गुरु जग्गी आदि प्रमुख हैं। हालांकि, मैं सभी की आभारी हूं, पर मैं श्री सत्य सार्इं बाबा और कोडगु गुरु को अपना गुरु मानती हूं जिन्होंने मुझे सही मार्ग से परिचित कराया। आनन्दमयी मां से मैंने ईश्वर का साक्षात्कार करने का मार्ग सीखा। उनसे मुझे अपने अंदर स्थित चेतना के प्रति प्रेम करना और अपने इष्ट का जप करने की प्रेरणा मिली।

अब्राह्मिक मतों और हिंदू धर्म में भगवान की अवधारणा में क्या अंतर पाती हैं?
दोनों में ये बहुत अलग है। सनातन धर्म के चार महावाक्यों में ईश्वर का वर्णन करते हुए उन्हें शाश्वत और सर्वव्यापी चेतना माना गया है जो आधुनिक विज्ञान के अनुरूप है। कोई भी व्यक्ति उस परमब्रह्म को महसूस कर सकता है। लेकिन, अब्राह्मिक मतों का भगवान (एक पुरुष) अपनी सृष्टि से अलग विराजता है और अपने अनुयायियों के प्रति पक्षपाती है। हैरानी की बात है कि अधिकांश पश्चिमी लोग, जो खुद को तार्किक और बौद्धिक मानते हैं, एक ऐसे ईश्वर पर विश्वास करते हैं युक्तिसगंत सवालों की कसौटी पर खरा नहीं उतरता। अगर वह सर्वशक्तिमान और सर्वव्यापी है तो अपनी सृष्टि से अलग कैसे हो सकता है? अगर वह सर्व-शकितशाली है, तो शैतान पर उसका नियंत्रण क्यों नहीं?

‘पंथनिरपेक्ष’ शब्द को भारत में सेकुलर राजनीतिक दलों ने काफी हद तक विकृत कर दिया है, आपका क्या कहना है?
बिल्कुल। दुख की बात है कि हिंदू दर्शन को पढ़ाना पंथनिरपेक्षता विरोधी और कट्टरता माना जा रहा है, जबकि ईसाई मत और इस्लाम को ‘पंथनिरपेक्ष’ कहा जा रहा है। पश्चिम में पंथनिरपेक्षता का प्रसार चर्च की शक्ति को कम करने के लिए हुआ, क्योंकि चर्च ने ईशनिंदा कानूनों के साथ अपने मत को लागू करने के लिए राज्य शक्ति का उपयोग किया था। पुर्तगाली शासन के दौरान गोवा में हुई दिल दहलाने वाली घटनाओं को याद करें। जब विज्ञान का ज्ञान, मुख्यत: भारत से यूरोप पहुंचा तो चर्च ने वैज्ञानिकों को सच बताने के लिए दंडित किया। सनातन धर्म की विभिन्न धाराओं में तर्क और विवेक को अहम माना गया है, लिहाजा इस ज्ञान को निश्चित रूप से स्कूलों में पढ़ाना चाहिए। मुझे उम्मीद है कि ऋषियों की युक्तिसंगत और गहन अंतर्र्दृष्टि पर आधारित ज्ञान मंजूषा जल्दी ही तर्कहीन और मतांध विचारधाराओं के अंधेरे से आजाद हो जाएगी।

 भारत में, विशेष रूप से केरल में, ईसाई, मुस्लिम और मार्क्सवादी हिंदुओं का कन्वर्जन कर रहे हैं। इस पर क्या कहेंगी?
ईसाइयत, इस्लाम और साम्यवाद-ये तीन ताकतें हिंदू धर्म के लिए बहुत खतरनाक हैं क्योंकि वे पृथ्वी से प्राचीन संस्कृतियों को खत्म करने में जुटे हैं। आमतौर पर हिंदू इस खतरे से अवगत नहीं हैं। हिंदू वसुधैव कुटुम्बकम् के दर्शन को मानते हैं। लेकिन जब कोई आपसे वैर रखे और आपकी जड़ें काटना चाहे तो वह परिवार का हिस्सा नहीं कहला सकता। ये तीनों बल हिंदू धर्म को खत्म करना चाहते हैं। यहां तक कि महात्मा गांधी भी इस्लाम के ऐसे लक्ष्य के बारे में अनभिज्ञ थे और खिलाफत आंदोलन का समर्थन करते थे। केरल के हिंदुओं ने इसके लिए भारी कीमत चुकाई है। हिंदुओं, विशेषकर ब्राह्मणों के खिलाफ मीडिया के माध्यम से दुष्प्रचार चल रहा है, हिंदुओं की गौरवपूर्ण परंपरा को मलिन करने का प्रयास किया जा रहा है। जबकि सच तो यह है कि हिंदुओं के बजाय मुसलमानों और ईसाइयों को शर्मिंदा होना चाहिए।


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हिंदुओं, विशेषकर ब्राह्मणों के खिलाफ मीडिया के माध्यम से दुष्प्रचार चल रहा है, हिंदुओं की गौरवपूर्ण परंपरा को मलिन करने का प्रयास किया जा रहा है। जबकि सच तो यह है कि हिंदुओं के बजाय मुसलमानों और ईसाइयों को शर्मिंदा होना चाहिए।

ईसाई और मुस्लिम नेताओं के इस दावे पर क्या कहेंगी कि ‘मोक्ष’ उनके चुने हुए मार्ग से ही संभव है?
ईसाइयत और इस्लाम कभी नहीं कहेंगे कि सभी पंथ समान हैं। वे हिंदू धर्म का कभी सम्मान नहीं करेंगे क्योंकि इससे उनके ‘साम्राज्य’ का अंत हो जाएगा। ये दो संस्थागत मत इस धारणा पर दृढ़ हैं कि परमात्मा ने केवल यीशु या मोहम्मद के लिए पूर्ण सत्य को ‘प्रकट’ किया है और सभी मनुष्यों को उनके प्रवचनों का पालन करना चाहिए। लेकिन उनके झूठे दावे ही उनकी पहचान के ‘दैवीय सार’ को नष्ट करते हैं और उनका अस्तित्व धराशायी हो जाता है। भारतीय ईसाई यूरोपीय ईसाइयों की तुलना में ज्यादा मतांध और कठोर हैं। हिंदुओं को खुलकर बहस करनी चाहिए और कड़े सवालों की आंच में इन ताकतों के मनमाने दावों की असंगतियों को उजागर करना चाहिए।

भारतीय युवाओं से क्या कहना चाहेंगी?

आपका सौभाग्य है कि आप भारत में पैदा हुए हैं। अपनी पहचान पर गर्व करें। अपना शीष ऊंचा रखें। आप दुनिया की सबसे प्राचीन सभ्यता में जन्मे हैं जिसने दुनिया को श्रेष्ठ ज्ञान सौंपा है। अगर आपके पूर्वजों ने अद्वितीय ज्ञान की गंगा न बहाई होती तो ‘पश्चिमी विज्ञान’ का कोई वजूद ही नहीं होता। आपके हाथ में मानवता के बेहतर भविष्य की मशाल है। पश्चिम की नकल में कुछ नहीं रखा। वह एक दिशाहीन मंजर है। अपनी मूल ज्ञान संपदा की खोज करें। वही सच्चिदानंद है। स्वयं को यह अहसास कराएं कि भगवान सच में हर जगह विद्यमान है।