संस्कृत साहित्य : भारत की जय-जय!

    दिनांक 25-अगस्त-2020
Total Views |
श्रीश देवपुजारी 

केवल अर्थ की प्रगति से ही भारत स्वावलंबी नहीं हो सकता। भारत क्या है, यह भी जानना होगा और इसके लिए वे पुस्तकें पढ़नी होंगी, जो संस्कृत में लिखी हैं।
 
p50_1  H x W: 0

दिल्ली के मंडोली स्थित संवादशाला में संस्कृत पढ़ते छात्र प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के समय श्रावण पूर्णिमा को संस्कृत दिवस घोषित किया गया था। तब से संस्कृत भारती इसे मनाती है। साथ में कुछ शैक्षिक संस्थान भी आयोजन में सक्रिय रहते हैं, किन्तु बौद्धिक एवं सामाजिक संस्थान जैसा अपेक्षित है वैसा आयोजन नहीं करते। इस उपेक्षा के कारण भी हैं। उन्हें भारतीय अस्मिता के बिंदुओं का बोध नहीं है। प्रगति के मापदंडों में वे भौतिकता को ही स्थान देते हैं, कारण वे पश्चिम की तुलना भारत से करते रहते हैं।

भारतीय अस्मिता
भारत में ऐसा क्या है जो अन्यों से हमें विशिष्ट बनाता है? हमारे आदर्श भिन्न हैं, जीवन को देखने का दृष्टिकोण भिन्न है, संस्कार भिन्न होने के कारण संस्कृति भिन्न है। हम ज्ञान के उपासक हैं। धर्म हमारे जीवन का केंद्र बिंदु है। कृपया ज्ञान को ‘नॉलेज’ और धर्म को ‘रिलीजन’ न समझें। हम भारत को अंगे्रजी में समझने का प्रयत्न न करें। भारतीय पारिभाषिक शब्दावली के अनुसार नश्वर जगत से संबंधित बोध को अविद्या कहते हैं और शाश्वत से संबंधित बोध को विद्या या ज्ञान। इसीलिए उपनिषद् का वाक्य है- ‘सा विद्या या विमुक्तये’ अर्थात् विद्या वही जो मुक्ति प्रदान करे। भारत के बाहर कहीं भी शाश्वत या नित्य को जानने के लिए शास्त्र विकसित नहीं हुए। वहां केवल इस दृश्यमान जगत तक की सोच का विकास हुआ। जगत के निर्माता को जानने का उन्होंने कभी यत्न ही नहीं किया। यह पथप्रदर्शन केवल भारत में उपलब्ध है। इसलिए यहां उस नित्य का साक्षात्कार करने वाले अनगिनत साधक उत्पन्न हुए। विदेशियों ने भी जाना कि ‘शुद्ध बुद्ध’ का साक्षात्कार करना है तो भारत में आना पडेÞगा और शास्त्रों को पढ़कर नित्य आचरण में उन्हें लाना होगा। यह सब शास्त्र संस्कृत में है इसलिए संस्कृत पढ़नी पड़ेगी।

अभौतिक शास्त्रों के साथ-साथ भौतिक शास्त्रों का भी विकास भारत में हुआ। भारत की भौतिक समृद्धि के यही कारक बने। ये शास्त्र थे- कृषि, वाणिज्य, अर्थ, धर्म (विधि), वस्त्र, सौंदर्य प्रसाधन, गंध, वर्ण, शस्त्र, नौका, रथ, मार्ग, सेतु, वास्तु निर्माण (स्थापत्य-सिविल इंजीनियरिंग), धातु, रसायन, खनन, भौतिकी, वनस्पति, यंत्र, खगोल, गणित, चिकित्सा (काष्ट औषधि, रसायन, शल्य, दैवव्यपाश्रय), वृक्षचिकित्सा, भाषा, काव्य, व्याकरण, शिक्षा, इत्यादि।

कलाएं थीं- युद्ध, मूर्ति, चित्र, नृत्य, संगीत, नाट्य, वाद्य, पुष्प रचना, पाक (भोजन), अश्वकला, गज को पालना, शस्त्र चलाना, इंद्रजाल (जादू), वशीकरण, वस्त्र सिलना, पशुपालन, गुप्त भाषा, द्युत क्रीड़ा, आभूषण, खिलौने, पेय (आसव, सुरा) इत्यादि का निर्माण, मल्ल विद्या, व्यायाम, लिखना (भूर्ज पत्र, ताम्रपत्र, शिला लेख), सुतार, लोहार, चर्मकार, कुम्भकार, नापित (केशकर्तन), रत्न परीक्षा इत्यादि। ये शास्त्र और कला से संबंद्ध ग्रंथ संस्कृत भाषा में निबद्ध हैं क्योंकि शिक्षा का माध्यम संस्कृत भाषा था। निर्माणों और कलाओं का स्तर उत्तम था। अंग्रेजों ने पहले इन शास्त्रों को पाठ्यक्रम से हटाया और पश्चिम में विकसित शास्त्रों को पढ़ाने लगे। कलाओं के कारीगरों को समाप्त किया और अपना विधिशास्त्र लाया। उसी का परिणाम है कि हम संस्कृत की उपयोगिता को नकारने लगे, जिससे अपने ज्ञान प्राप्ति के मार्गों को भी हमने बंद कर दिया।

संस्कृत दिवस के उपलक्ष्य में हम समाज को इस हानि से परिचित कराएं। पुन: संस्कृत पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करें। राष्ट्र का पुनरुत्थान नकलची बनने से नहीं होगा।