गेशे जम्पा

    दिनांक 26-अगस्त-2020
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नीरजा माधव
तिब्बती शरणार्थियों की एक बड़ी संख्या हमारे भारत देश में है। चीन की विस्तारवादी नीति के परिणामस्वरूप एक अहिंसक धार्मिक देश तिब्बत पराधीन हो गया। 1959 में इसका चरमोत्कर्ष देखने को मिला जब तिब्बत के राष्ट्राध्यक्ष परम पावन दलाई लामा को अपने लाखों अनुयायियों के साथ अपना देश छोड़ भारत में शरण लेनी पड़ी।  भारत में रह रहा तिब्बती समुदाय तिब्बत में रह रहे चीनी सत्ता से संघर्षरत तिब्बतियों की सबसे बड़ी ताकत बने रहे। 19वीं सदी के अन्त तक तिब्बत स्वतंत्र था। तिब्बत के राजनीतिक, सांस्कृतिक और मानवीय अधिकारों के प्रश्न पर छाई वैश्विक चुप्पी को तोड़ने और उन्हें स्वाधीनता दिलाने की जद्दोजहद करता है सुप्रसिद्ध लेखिका नीरजा माधव द्वारा लिखा भारत में हिन्दी साहित्य का पहला उपन्यास-गेशे जम्पा। प्रस्तुत है इस उपन्यास की छठी कड़ी

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बनारस के घाटों और इस पार रेती में अक्सर ही देशी-विदेशी पर्यटक आते रहते हैं। गंगाजी तुम्हारी बपौती है क्या जो मनमाना लूटोगे? दस साल पहले एक नाव बना दिया और जरा छपाक्-छपाक् करते इधर से उधर हो लिए तो बन गया तुम्हारा हिसाब। उन सभी की अकड़ देख शीतल पटेल भी गुर्रा उठा। नाव वाला थोड़ा सहम गया था। शीतल ने जेब से पुड़िया जैसा कुछ निकाला था। आज कश लेंगे, यार। पेमा ने ललचाई नजरों से देखते हुए कहा। अरे तो कब नहीं लेते हो? यहां का मजा ही कुछ और है।
तुम्हारे तिब्बत में क्या हाल है गुरु? शीतल नशे में बहकने लगा था। हूं, किताबों की पढ़ी हुई बातें बता सकता हूं। मां-बाप बचपन में ही जब यहीं आ गए तो मैं क्या जानूं वहां का हाल! अरे, वहां का हाल जानना चाहोगे तब न जानोगे? शीतल मजाक में छेड़ रहा था उन्हें। जब वहां के बड़े-बड़े आका लोग ही यहां-वहां पड़े हुए हैं तो हमें क्या कुत्ते ने काटा है जो भौंकते हुए वहां चले जाएं? फुंग्चुंग् ने हाथ हवा में लहराते हुए जवाब दिया।
अरे, ज्यादातर लोग तो लामा हो जाते हैं। फुंग्चुंग् ने बात को दूसरी ओर मोड़ दिया।
इसीलिए तो तिब्बत की यह दुर्दशा हो रही है। अरे, हमने तो यहां तक सुना है कि लामा लोगों के लिए वहां के लोगों में बहुत सम्मान है। शीतल चटखारे लेकर बोल पड़ा। अतिथि के साथ ऐसा व्यवहार नहीं करते, शीतल। हम तुम्हारे अतिथि हैं। हम तुम्हारे देश में नौकरी करने कहां आए हैं? हम तो अतिथि हैं। डोलकर ने बहुत विनम्रता से समझाने का प्रयास किया। आवाज लड़खड़ा रही थी।
देखे शीतल, अब अगर हमें तुम वापस भेजना चाहते हो तो, जरा सोचो वहां हमारी ये हिंदी भाषा कौन समझेगा? तिब्बती खास आती ही कहां है हमें। वहां तो चीनी सैनिकों ने डेरा डाला हुआ है। स्कूलों, दफ्तरों, सभी जगहों पर बस चीनी कब्जा हो गया है। तिब्बतियों को नौकरी कहां मिलेगी? विरोध करने पर जेलों में ठूंस दिया जाता है। अब तुम्हीं बताओ शीतल, छोटे-छोटे बच्चों तक को छीनकर सेना में भर्ती कर लिया जाता है। मां-बाप को उनके सामने ही गोलियों से उड़ा दिया जाता है। लेटे-लेटे फुंग्चुंग् कह रहा था। नहीं, वापस तो जाना ही पड़ेगा, फुंग्चुंग्। अपने चाट के ठेले के बगल में ठेला नहीं लगाने दूंगा। समझ लो तुम लोग। शीतल नशे में चूर लेटे-लेटे सिसकने लगा। थोड़ी ही देर में वहां एक सन्नाटा खिंच गया था। वे सभी पर लेटे नशे में धुत थे। नाव वाला डरते-डरते पास आया था। फिर वह उन सबको कोसता हुआ पंचगंगा घाट की ओर जा रहा था।
अपने कक्ष में बैठे हुए गेशे जम्पा की उंगलियां कालबेल पर पहुंच गई थीं। उन्होंने उसे धीरे-से दबाया और दोनों हाथों को सिर के पीछे ले जाकर टेक लिया था। कुर्सी पर धीरे-धीरे आगे-पीछे झूलते हुए उनका मन आज भी अस्थिर था। जी, गेला? संस्थान का चपरासी हाथ बांधे खड़ा था। एसी बंद कर दो और सारी खिड़कियां खोल दो। जी, गेला। और चपरासी ने सारी खिड़कियां खोल दी थीं। देखो, इस समय मुझसे मिलने किसी को न भेजना। बस देवयानी मैडम अपना पीरियड लेने के बाद आएंगी। मुझे सूचित कर देना। उन्हें मैंने किसी काम से बुलवाया है, उन्हें आने देना। जी, गेला। कहते हुए चपरासी चला गया। गेश जम्पा की दृष्टि खिड़की से बाहर सारनाथ के लॉन में खड़े अशोक स्तंभ पर गड़ गई थी। एक विशाल नरसंहार के बाद उपजी करुणा का प्रतीक। शांति का स्मृति-चिन्ह। अनेक वर्षों से यूं ही तना खड़ा। क्या फिर कोई अशोक पैदा होगा जो कर सकेगा पश्चाताप आज के नरसंहारों पर? बनवाएगा वह भी स्तूप अपने भीतर उपजी करुणा के कारण? शांति और सह-अस्तित्व का प्रतीक चिन्ह? उनका मन शांति और अशांति की वीथियों में भटकता हुआ अपनी जन्मभूमि पर पहुंच चुका था।
मग्-पा रात के अंधेरे में नंग्-गर-चे स्थित उनके घर आए थे। दरवाजे पर आहट सुन पिताजी ने पूछा था-कौन है? उनकी आवाज में थोड़ा भय था, कारण-दो दिन से ल्हासा के बारे में उड़ती—उड़ती सी भयानक खबरें। लाखों की भीड़ ने ल्हासा शहर से निकलकर नोर्बूलिंग्खा को घेर रखा है, ताकि परम पावन दलाई लामा को चीनियों द्वारा बंदी न बनाया जा सके। चीनी सेना और खम्पा गुरिल्ला में दो-दो बार झड़पें हो चुकी हैं। तिब्बती जनता बहुत आक्रोश में है। दमन का इतना बड़ा विरोध शायद पहली बार हो रहा है तिब्बत जैसे शांत देश में। पिताजी रेडियो से कान सटाए रहते। वायस आफ अमेरिका और बीबीसी से खबरें प्रसारित हो-होकर लोगों की धड़कनें तेज कर रही थीं। दूर-दराज के गांवों के लोग भी किसी आशंका से सहमे हुए थे। मार्च के महीने में जब तिब्बत का मौसम सुहाना रहता है, तब भी नंग्-गर-चे गांव अन्य स्थानों की अपेक्षा ठंडा रहता है। सभी अपने घरों में सहमे-से पड़े थे।


ल्हासा शहर में कितने लोग मारे गए, यह तो नहीं ज्ञात हो सका पर नोर्बूलिंग्खा के भीतर-बाहर हजारों लाशें गिरी थीं। मग्-पा के स्वर में बेचैनी थी पर भय नहीं था। क्या परम पावन..? पिताजी अपना प्रश्न पूरा नहीं कर सके थे। नहीं, वे दो दिन पूर्व ही सुरक्षित दूसरे स्थान पर पहुंचा दिए गए थे। मग्-पा के स्वर में आश्वस्ति का भाव था।

खोलिए, मैं हूं छेरिंग। मग्-पा आ गए, मां। वे अंदर की ओर भागे थे। इतनी तेज क्यों चिल्ला रहे हो जम्पा? धीरे बोलो। मां हिदायत देते हुए रसोई से बाहर निकल आई थी।
दीये को उन्होंने रसोई की चौखट के पास रख दिया ताकि दोनों तरफ उजाला रहे। दरवाजा खुलने की चरमराहट से बगल के ओसारे में बैठी भेड़ें कुनमुना उठी थीं। ऊपता जी ने मग्-पा को भीतर करते हुए पुन: दरवाजे की सिटकिनी लगा दी। बगल में लटक रहे बड़े से लोहे के रॉड को बीचोंबीच इस पार से उस पार सटाकर उढ़का दिया था। अंदर आते ही मग्-पा कराहते हुए पास पड़ी चौकी पर औंधे मुंह लेट गए थे।
क्या हुआ मग्-पा? मां घबड़ा उठी थीं। ओह, पानी..पानी..। वे कराह रहे थे। कैसे चोट लगी। पिताजी लगभग चीख पड़के थे। मग्-पा की पीठ से खून बह रहा था। बड़ा-सा सुराख नन्हे जम्पा ने भी देखा था मग्-पा की पीठ पर। किसी तरह बचकर आ पाया हूं पिताजी। यहां बहुत-से लोग मारे गए हैं। मग्-पा ने बताने का प्रयास किया था। मां पानी ले आई थीं। पानी नहीं दो जम्पा की मां। पी-मिश्रित चाय ले आओ। मग्-पा बुरी तरह घायल है। उपचार करना पड़ेगा। कहते हुए पिताजी अंधेरे में ही उपत्यका में दौड़ गए थे। शायद कोई जड़ी लाने। 
घाव को अच्छी तरह धोकर पिताजी ने लेप लगाया था। घी-मिश्रित नमक वाली चाय पीकर मग्-पा कुछ चैतन्य हुए तो पिताजी ने पूछा-कहां लड़ाई हुई? नोर्बूलिंग्खा पर। परम पावनजी की सुरक्षा में कई तिब्बती संगठन और खम्पा गुरिल्ला के लोग बाहर जमा थे। मग्-पा की आंखों के सामने बीता दृश्य सजीव-सा हो उठा था। फिर? पिताजी बौखलाए-से पूछ रहे थे। उन्होंने तमाम दिन नोर्बूलिंग्खा पर बमबारी की। फिर तोपों का मुंह शहर की ओर मोड़ दिया। पोताला मंदिर और आसपास के मठों को भी नहीं छोड़ा उन्होंने। हे भगवान! बहुत नरसंहार हुआ होगा? मां लगभग रो पड़ी थीं। हां, ल्हासा शहर में कितने लोग मारे गए, यह तो नहीं ज्ञात हो सका पर नोर्बूलिंग्खा के भीतर-बाहर हजारों लाशें गिरी थीं। मग्-पा के स्वर में बेचैनी थी पर भय नहीं था। क्या परम पावन..? पिताजी अपना प्रश्न पूरा नहीं कर सके थे। नहीं, वे दो दिन पूर्व ही सुरक्षित दूसरे स्थान पर पहुंचा दिए गए थे। मग्-पा के स्वर में आश्वस्ति का भाव था। नोर्बूलिंग्खा की कई इमारतें क्षतिग्रस्त हुई हैं। बस आश्चर्यजनक रूप से महाकाल का मंदिर सुरक्षित है। मैं उसी के पास था इसीलिए शायद बच गया।
कोन्-चोंग् कहां है मेरा? मां विक्षिप्त-सी थीं। हां, हां, कोन्-चोग् कहां है? पिताजी को भी याद आया था। एक सप्ताह पूर्व ही कोन्-चोग् भइया मग्-पा के साथ गए थे। कहां गए थे, उसके बारे में उन लोगों ने कुछ भी साफ-साफ नहीं बताया था। वह शायद पूरी तरह सुरक्षित हो। खम्पा सिपाहियों के साथ वह पहले ही केशुंग् गांव पहुंच गया था। मग्-पा धीरे-धीरे भेद खोल रहे थे। क्यों, केशुंग् क्यों? वहां गांव के लोगों के साथ वह भी सुरक्षा में है परम पावन दलाई लामाजी की। पर वह कब खम्पा सिपाही बना? मां के चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं। बहुत पहले मां।
बताया क्यों नहीं तुम लोगों ने, बोलो? मां ने मग्-पा की हथेली पकड़कर धीरे से हिलाया। उचित समय की प्रतीक्षा कर रहे थे हम। मग्-पा की आंखें कोठरी की धुंआई छत पर जमी थीं। वह सुरक्षित तो है? कहां तक यात्रा करनी है उसे? दोनों ही प्रश्नों का उत्तर अनिश्चित है अभी। मग्-पा ने मां को ध्यान से देखते हुए कहा था। क्या वे लोग तिब्बत छोड़ जाएंगे? अब पिताजी पूछ रहे थे। यहां खतरा अधिक है अब। जनता के कल्याण और देश के लिए कुछ करने के उद्देश्य की पूर्ति के लिए यह कदम आवश्यक समझा गया। मग्-पा का यह स्वरूप नन्हे जम्पा ने कभी न देखा था। इस समय वे कहानी सुनाने और ठहाके लगाने वाले मग्-पा नहीं लग रहे थे। कुछ विचित्र-सी उनकी मुख-मुद्रा थी। कितने लोग और हैं साथ? मां हताश थी। बहुत-से लोग हैं। क्या सब छोड़ जाएंगे अपना देश? मां का प्रश्न निराशा और द्वंद्व से भरा था। नहीं, कुछ बाहर जाकर सहयोग करेंगे हमें। हम उपनिवेश नहीं बनने देंगे इसे। वे बाहर से हमें संबल प्रदान करेंगे।
    (जारी...)