हिन्दी एक कठिन भाषा है ! उर्दू, फारसी और अंग्रेजी सीखिए जनाब !

    दिनांक 26-अगस्त-2020
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देवांशु झा की फेसबुक वॉल से
हिन्दी चैनलों की पत्रकारिता का मूल स्वर है- सरलीकरण। सरल लिखो! सरल लिखो यानी स्थान को जगह लिखो, समाचार को खबर लिखो, पाठशाला को मदरसा लिख दो। कठिन को भी कठिन नहीं लिखो वरना मुश्किल होगी!
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करीब दस साल पहले एक चैनल से विदा होते हुए जब मैं अपने साथियों से अंतिम बार मिल रहा था, तब एक कम उम्र लड़की ने मुझसे बाय कहा। मैंने जवाब दिया, ‘देखो, जल्दी ही भेंट होगी!’ वह कुछ विस्मय से बोली, ‘सर, आप हिन्दी के बड़े अच्छे और भूले-बिसरे शब्द बोलते हैं।’ मैं आश्चर्य से भर उठा कि भेंट अच्छा शब्द होकर भी क्या भूला-बिसरा शब्द हो रहा है? या इस शब्द से मेरी भेंट ही बड़े दिनों के बाद हो रही! सच ऐसा ही है। हिन्दी चैनलों की पत्रकारिता का मूल स्वर है- सरलीकरण। सरल लिखो! सरल लिखो यानी स्थान को जगह लिखो, समाचार को खबर लिखो, पाठशाला को मदरसा लिख दो। कठिन को भी कठिन नहीं लिखो वरना मुश्किल होगी!

अरे कौन पढ़ता है यह सब यार! विद्वान संपादक महोदयों की ऐसी कितनी ही टिप्पणियां मैंने सुनी होंगी। दुख यह कि जो पढ़े-लिखे, समझदार लोग हैं वे भी कहते हैं कि मैं कठिन लिखता हूं। फेसबुक पर भी बहुतेरे लोग ऐसे हैं और निजी जीवन में भी। मैं क्या कठिन लिखता हूं? यह मेरी समझ में कभी नहीं आया। जो लोग मेरी भाषा को कठिन कहते हैं, क्योंकि उसमें कुछ संस्कृतनिष्ठ शब्द होते हैं, वही उर्दू फारसी के घोर एलियन शब्दों का रस घोल-घोल कर पीते हैं। बाजीचाए अतफाल है दुनिया मेरे आगे और किसी को दे के दिल कोई नवासंज-ए-फुगां क्यों हो! और ऐसी कितनी ही अपरिचित शब्दावलियों का अर्थ बतलाते हुए, उन्हें गौरव का अनुभव होता है, लेकिन तत्सम शब्दों को पढ़ते हुए वे उदास हो जाते हैं। कितनी अजीब बात है!

मैं संस्कृत के सुन्दर शब्दों को अपनी भाषा में प्रयोग करते हुए आनंदित होता हूं। ऐसा लगता है, जैसे अपने महान पूर्वजों को धन्यवाद कह रहा हूं। संस्कृत के वे शब्द, शब्दमात्र नहीं, बल्कि हमारे संस्कार हैं। हमारी संस्कृति, वाक्, वांग्मय की आत्माएं हैं। उन्हें त्याग देना वैसा ही है जैसा कि अपने पितामह को खटिया पर छोड़ देना। तुम मरो वृद्ध, अब तुम्हारा क्या काम! संस्कृत की विशाल शब्द संपदा भारतीय भाषाओं को एक सूत्र में पिरोती है। आज अगर तमिल और मलयालम का कुछ अंश हम समझ पाते हैं तो उसका कारण संस्कृत है। एक समान पूजा पद्धति ने छोटी-मोटी विभिन्नताओं के बाद भी सनातन को जोड़े रखा है तो वह संस्कृत के कारण है। संस्कृत न होती तो क्या हम हिन्दी में जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, अज्ञेय, मुक्तिबोध, रामधारी सिंह दिनकर की कल्पना कर पाते? संस्कृत न होती तो भारत यही भारत रहा होता

क्या? संस्कृत विश्व सभ्यता के इतिहास में आविष्कृत होने वाली सबसे सुंदर, सुघड़ घटना है। उसे भाषामात्र कहना तो भूल होगी।

हर भाषा का अपना सौन्दर्य है। अपनी शक्ति है। अपनी छटा है। अपनी रागात्मकता है। संस्कृत इन सभी अर्थों में अनन्य है। यह तो कल्पना से भी परे लगता है कि किसी एक पाणिनी जैसी महान प्रतिभा ने ऐसा व्याकरण रचा। ऐसे भाषासूत्र का निर्माण कर डाला कि ब्लूमफील्ड से लेकर नोम चोमस्की तक उसे चुरा लेता है और एक हम हैं कि अपनी भाषा के दिव्यतम स्वरूप को प्रकट करते हुए शंकाकुल होते हैं। ग्लानि से भर उठते हैं। हमें कष्ट होता है कि सामने वाला उन शब्दों को नहीं समझ पा रहा। हद है, यह कैसी मानसिकता है! अगर उन शब्दों के प्रयोग से मेरी भाषा बंधती है, उसमें कोई रुकावट आती है या वह जड़ीभूत हो जाती है तो मैं अवश्य ही उन पर विचार करूं। किन्तु कोई व्यक्ति एक साधारण से शब्द या शब्दयुग्म का अर्थ नहीं जानता तो लेखक की भाषा को दोष क्यों देता है? क्या उसे अपनी भाषा को समृद्ध नहीं बनाना चाहिए? क्या अपनी शब्द संपदा को उसे संपन्न नहीं करना चाहिए?

मैं कोई महान लेखक नहीं हूं। लेकिन लिखते हुए सचेत रहता हूं। शब्दों के प्रयोग पर ध्यान देता हूं। उनकी ध्वनियों से कहे का तादात्म्य बिठाता हूं। यह सब सचेष्ट, सायास तो होता ही है और कई बार बस हो जाता है। उनसे मेरी मुक्ति नहीं। कोई उस भाषायी संस्कार से विलगा कर मुझे लेखक रूप में नहीं पा सकता!