इतिहास का अनमोल पल

    दिनांक 03-अगस्त-2020
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‘जय रामजी की’ या ‘राम-राम’ के सम्बोधन से जहां लोगों की सुबह होती है और जीवन का सूरज डूबने पर भी जिस समाज की यात्रा ‘राम नाम सत्य है’ उच्चारते हुए आगे बढ़ जाती है उस धरती के लोगों के लिए 5 अगस्त, 2020 का सवेरा कुछ अलग है

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हजारों बरस से रामजी को अपने दिल में बैठाकर रखने वाला यह समाज पिछले 500 साल से जिस काम को पूरा करने की सौगंध लिए कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा था उस काम का श्रीगणेश इस समाज, इस राष्ट्र के इतिहास का अनमोल पल है।
किन्तु उत्सव के इस उजाले से धुंधलके में लिपटे उन प्रश्नों का साफ होना बहुत जरूरी है जो समाज को उलझन और आक्रोश में धकेलते रहे, आपस में लड़ाते रहे।
प्रश्न है कि 500 वर्ष से जारी यह लड़ाई किससे थी? क्या सरकार से या फिर मुसलमानों से?
ध्यान से देखेंगे तो पाएंगे कि यह लड़ाई किसी सत्ता या वर्ग से थी ही नहीं। इसकी बजाय इसे अन्याय के विरुद्ध आधुनिक इतिहास का सबसे बड़ा सामाजिक आंदोलन कहना ज्यादा ठीक है। शासन के विरुद्ध आंदोलन सत्ता पलटने और सत्ता हासिल करने के चक्र में घूमकर रह जाते हैं। किंतु समाज को बार-बार एक साथ लाने वाले इस आंदोलन की विशेषता रही कि न तो राजसिंहासन इसकी इच्छा के केंद्र में था और न ही समुदाय विशेष से प्रतिशोध। 1528 में जब बाबर के फौजदार मीर बाकी ने मंदिर को तोड़ा तो अयोध्या के निकट हंसवर रियासत के राजा रणविजय सिंह, भीटी रियासत के राजा महताब सिंह, रानी जयराज कुंवरि और राजगुरु पं. देवीदीन पांडेय ने एकजुट होकर युद्ध छेड़ दिया। यह लड़ाई बाबर के तख़्त-ताज के लिए नहीं, जमीन के उस पावन खण्ड के लिए थी जिसके कण-कण में ‘ठुमक चलत रामचन्द्र’ की स्मृतियां बसी थीं। उस संघर्ष में करीब 1,75,000 हिंदुओं की लाशें गिरने की बात लॉर्ड कनिंघम ने लखनऊ गजट में लिखी है। क्या एक स्थान के लिए ऐसा भारी बलिदान देने के बाद भी हिंदुओं ने मुसलमानों से व्यवहार बन्द किया? नहीं!
6 दिसम्बर, 1992 का घटनाक्रम भी इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। लाखों रामभक्तों के सम्मुख अपमानकारी ढांचा भरभराकर गिर गया, किन्तु इस स्थान के अतिरिक्त अयोध्या में किसी मुसलमान या किसी मस्जिद पर किसी ने कोई कंकरी तक नहीं उछाली।
प्रश्न यह भी है कि क्या सेकुलर होने की ताल ठोकने वाली राजनीति इस मुद्दे से अलिप्त रह पाई?
गौर करने पर पता चलता है कि खुद अपनी अचकन पर ‘सेकुलर-प्रगतिशील’ होने का बिल्ला टांकने वाले राजनीतिक दल इस मुद्दे को साम्प्रदायिक रंग देने में सबसे आगे रहे। बिना विषय की पृष्ठभूमि और गंभीरता को जाने नेहरू, अपनी सीमित राजनीतिक समझ और कुछ मुस्लिम लोगों के प्रभाव में, इस स्थान से बलपूर्वक मूर्तियां हटाने का आदेश जारी करने की हद तक बढ़ गए थे। (देखें सन्दर्भ, पृष्ठ-10)। कहना होगा कि जनमानस के हृदय से जुड़ा यह मुद्दा सही मायनों में कोई राजनीतिक दल सिर माथे लेकर चला तो वह हैै भारतीय जनता पार्टी।
1 फरवरी, 1986 को जन्मभूमि के द्वार पर लगा ताला खुला तो इसका श्रेय भी कांग्रेस की भलमनसाहत को नहीं जाता, बल्कि देशभर में रथयात्रा के उत्साहपूर्ण वातावरण की पृष्ठभूमि में और शाहबानो केस में मुस्लिम महिलाओं पर अन्याय को वैधानिक तौर पर सही ठहराने के बाद प्रधानमंत्री राजीव गांधी के लिए यह तुष्टीकरण के धब्बे से बचने की मजबूरी और देश में राम मंदिर के लिए उत्तरोत्तर प्रबल होते उफान को थामने की कवायद थी।
प्रश्न यह भी है कि क्या वास्तव में मुसलमान इस मामले पर हिंदुओं से लड़ रहे थे?
निश्चित ही नहीं! पहले तो यह समझें कि अयोध्या इस देश को विभाजित करने वाली फांस नहीं, बल्कि हिंदू मुसलमान, सिख, जैन, बौद्ध सबके दिलों को जोड़ने वाला सेतु है। यह उस इक्ष्वाकु वंश के जैन तीर्थंकरों की जन्मस्थली है, जिसमें स्वयं प्रभु रामचन्द्र का जन्म हुआ। जन्मभूमि वह स्थान है जिसके दर्शन करने (1510-11 में) स्वयं गुरुनानक देव जी पधारे थे। वास्तव में 1857 में ब्रिटिश राज के विरुद्ध छिड़ा प्रथम स्वतंत्रता आंदोलन वह पहला मौका था जब हिन्दू-मुसलमान मिलकर अंग्रेजों से लड़े। दोनों ने एकता की शक्ति को समझा और यह भी कि ‘बाबरी’ दोनों के बीच विवाद की जड़ है। दोनों समुदायों में इस विचार ने जोर पकड़ना शुरू किया कि आपस में मनमुटाव पैदा करने वाले बाबरी ढांचे को हिंदुओ को सौंप देना चाहिए।
तब मुस्लिम नेता मौलाना अमीर अली ने मुसलमानों से आह्वान किया था, ‘‘फर्जे इलाही हमें मजबूर करता है कि हिन्दुओं के खुदा रामचंद्र जी की पैदाइशी जगह पर जो बाबरी ‘मस्जिद’ बनी है, वह हम हिन्दुओं को बखुशी सुपुर्द कर दें, क्योंकि हिन्दू-मुस्लिम नाइत्तफाकी की सबसे बड़ी जड़ यही है...।’’
अंग्रेज यह बात भांप गए कि हिंदू-मुस्लिम एकता और इस देश के दिलों को जोड़ने वाली राम की शक्ति उनके लिए कितनी खतरनाक हो सकती है। सो, जन्मभूमि विवाद को समाप्त करने के लिए आवाज उठाने वाले मौलाना अमीर अली तथा हनुमान गढ़ी के महंत बाबा रामचरण दास को अंग्रेजों ने 18 मार्च, 1858 को अयोध्या में हजारों हिन्दुओं और मुसलमानों के सामने कुबेर टीले पर फांसी दे दी।
भूमि पूजन की घोषणा के बाद से ही कारसेवा के लिए आग्रह करते मुस्लिम युवाओं के स्वर, मंदिर की नींव में डाली जाने वाली मठ, मंदिरों की पवित्र मिट्टी (जिसमें बुद्ध, महावीर के निर्वाण स्थल की मिट्टी भी शामिल है), यह वह सूत्र हैं जिनका जुड़ना राष्ट्रीय एकता के सन्दर्भ में देखा जाना चाहिए।
अगला सवाल यह उठता है कि यदि मुस्लिम इस मुद्दे पर नहीं लड़ रहे थे तो फिर लड़ कौन रहा था? और क्या वाकई जन्मभूमि के अस्तित्व को नकारने वालों के दावों में दम था?
जवाब के लिए 70 वर्ष चले उस मुकदमे के कुछ दिलचस्प प्रकरणों से गुजरना होगा जब मुस्लिम समुदाय की आड़ में न्यायालय और समाज को गुमराह करते ‘छलिया’ वामपंथी रंगेहाथ पकड़े गए। इतिहास समय के फलक पर घटता है। इसे घटाया- बढ़ाया, बदला नहीं जा सकता। मंदिर के अस्तित्व को नकारने वाले इतिहासकारों की कड़ी में अग्रणी इरफान हबीब मार्क्सवादी ठप्पे के इतिहासकार हैं। इतिहास की कसौटी कहती है कि यदि कोई किसी वाद या पूर्वाग्रह से ग्रस्त है तो इतिहासकार नहीं हो सकता और वामपंथ का तकाजा है कि मजहबी आस्था-पहचान है तो आप वामपंथी नहीं हो सकते। फिर इरफान हबीब क्या हैं? न मुसलमान, न ही इतिहासकार!
डी.एन. झा और हबीब जैसे लोग मुस्लिम पैरोकारी के चोगे में अपना अलग एजेंडा लिए बैठे थे। गौर करने लायक बात है कि दोनों बुद्धिजीवी भारतीय पुरातात्विक विशेषज्ञों को नकारते हुए जिस फ्रांसिस बुकानन के संदर्भ उछाल रहे थे वह वनस्पतिशास्त्र और प्राणिशास्त्र का जानकार ब्रिटिश फौजी था, इतिहासकार नहीं।
भारतीय पुरातत्व विभाग पर सवाल उठाने वाले एक और वामपंथी विद्वान थे सुरेश चंद्र मिश्रा। इनकी दो गवाही हुई। पहली पेशी में इन्होंने बताया कि बाबरी ढांचे में फारसी में एक शिलालेख लगा था। दूसरी बार बोले कि शिलालेख अरबी में था! आखिरकार यह बात खुल ही गई कि उन्हें न तो अरबी आती है, और न फारसी। हां, राजनीति जरूर आती रही होगी। वामपंथ की ओर से थोथे ज्ञान का तीसरा नमूना सुवीरा जायसवाल ने प्रस्तुत किया। जन्म स्थान पर मंदिर न होने की बात तो जोरदार तरीके से कही मगर अपनी बात के पक्ष में कोई प्रमाण नहीं दे सकीं। अदालत में प्रस्तुत डॉ. अजीज अहमद की किताब उनके दावों के उलट जाती थी। यह बात ध्यान दिलाने पर उन्होंने पहले तो पुस्तक से असहमति जताई। अदालत द्वारा जानकारी की छान-फटक होने पर पता चला कि उन्होंने वह किताब कभी पढ़ी ही नहीं!
एक अन्य वामपंथी बुद्धिजीवी सुशील श्रीवास्तव भी मुस्लिम पक्ष की ओर से गवाह के रूप में आए। मामले की जटिलताओं पर जरा सी चर्चा से यह खुलासा हो गया कि उन्हें न तो फारसी आती है, न अरबी, न संस्कृत और न ही उन्हें इतिहास की ठीक जानकारी है। उनका सारा ज्ञान इस बात पर आधारित दिखा कि उनके ससुर जी ने उन्हें यह सब बताया था। यह तथ्य भी अदालत में खुला कि जानकारी का स्तर चाहे जो हो किंतु सुशील श्रीवास्तव (उर्फ सज्जाद साहब) ने अयोध्या पर एक किताब भी लिख मारी थी।
पुरातात्विक साक्ष्यों को नकारने और हिंदू-मुसलमान पक्षों के बीच बहस गरमाए रखने का यह वामपंथी एजेंडा मुस्लिम मुखौटे की आड़ में कई बरस चला। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने तो इस खेल को उजागर करने वाली एक कड़ी टिप्पणी भी की। अदालत ने कहा, ‘‘जिन लोगों को ‘स्वतंत्र’ गवाह बताकर अदालत में प्रस्तुत किया गया है वे सब आपस में संबंद्ध हैं। एक ने दूसरे के मार्गदर्शन में पीएचडी की है, तो दूसरे ने तीसरे के साथ मिलकर किताब लिखी है।’’
बहरहाल, 5 अगस्त का सूर्योदय भारतीय समाज को अनूठी ऊर्जा देने वाला है, उसके पावन आस्था स्थान पर आक्रांता आघातों पर मरहम रखने वाला है। वैसे, राष्ट्रीय आस्था और सद्भाव की इस नई रोशनी में आयातित विचार की उस पौध, उस वामपंथी विषबेल का मुरझाना तय है, जो स्वतंत्रता के बाद भी भारत के आंगन में फैलती रही।
जय राम जी की!
@hiteshshankar