फिर जातिवाद को हवा

    दिनांक 31-अगस्त-2020   
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इन दिनों उत्तर प्रदेश में एक बार फिर से जातिवादी भावनाएं भड़काने की कोशिश हो रही है। सपा, बसपा और कांग्रेस के नेता अपने भविष्य को सुधारने के लिए प्रदेश के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। ये लोग एक अपराधी की आड़ में राज्य को जातिवादी राजनीति की आग में झोंकना चाहते हैं
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उत्तर प्रदेश में जातिवादी राजनीति को सुलगाने वाले (बाएं से) अखिलेश यादव, मायावती और प्रियंका गांधी वाड्रा।

बहुत मुश्किल से उत्तर प्रदेश जातिवादी राजनीति से निकला है और विकास की राजनीति पर सरपट दौड़ रहा है। लेकिन यह दौड़ राज्य के विपक्षी दलों को सुहा नहीं रही है। इसलिए विपक्षी नेता अपराधी विकास दुबे की आड़ में प्रदेश में यह माहौल बनाने में लगे हैं कि भाजपा सरकार और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ब्राह्मण विरोधी हैं। चाहे सपा हो, बसपा हो या कांग्रेस-इनके नेता दिन-रात जातिवाद को उभारने में लगे हैं। उन्हें लग रहा है कि प्रदेश में जातिवादी राजनीति बंद होने से ही उनकी लगातार हार हो रही है। इसलिए इन लोगों ने पुलिस द्वारा मुठभेड़ में मारा गया अपराधी विकास दुबे की आड़ में ब्राह्मणों को भड़काना शुरू किया है। साथ ही ये सभी राजनीतिक दल अपने-अपने तरीके से इस बात का भ्रम फैलाने में लगे हैं कि अगर उन्हें अवसर दिया जाए तो ब्राह्मण जाति के उत्थान के लिए जी-जान लगा कर कार्य करेंगे।
विपक्ष की राजनीति का घटिया स्तर भी देखने लायक है। विकास दुबे दुर्दांत अपराधी था। उसके खिलाफ 52 से ज्यादा मुकदमे दर्ज थे। उसने 2001 में दर्जा प्राप्त राज्यमंत्री संतोष शुक्ला की हत्या की थी। उसने क्षेत्राधिकारी देवेंद्र मिश्र को अत्यंत बेरहमी से मारा था। सभी जानते हैं कि विकास दुबे ने सबसे अधिक ब्राह्मणों की ही हत्या की, लेकिन दुर्भाग्य देखिए कि उसकी आड़ में ब्राह्मणों को भड़काया जा रहा है कि देखो योगी सरकार तुम्हारे लोगों की हत्या करवा रही है, भाजपा और योगी ब्राह्मण विरोधी हैं। इसी के साथ ही अन्य जातियों के बीच भी जातिगत भावना को उभारने का भरपूर प्रयास हो रहा है। 


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भगवान श्रीराम और परशुराम में तात्विक रूप से कोई भेद नहीं है। दोनों ही भगवान विष्णु के अवतार हैं। यह सिर्फ बुद्धि का भेद है। जहां बुद्धि का स्तर संकीर्ण और छोटा होता है, वहां लोग भ्रमित रहते हैं।
-योगी आदित्यनाथ, मुख्यमंत्री, उ.प्र.



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सपा, बसपा, कांग्रेस ये सब हताश, निराश और उदास हैं। इसलिए ये लोग जाति के नाम पर लोगों को भड़का रहे हैं, लेकिन जनता सब समझ रही है। हमारी सरकार किसी के साथ भेदभाव नहीं करती है। सभी को साथ लेकरसभी का विकास किया जा रहा है। जो अपराधी हैं उनके खिलाफ कानून अपना काम करता रहेगा। 
-केशव प्रसाद मौर्य, उप मुख्यमंत्री, उ.प्र.

योगी सरकार के साढ़े तीन साल के कार्यकाल में 124 अपराधी अलग-अलग मुठभेड़ों में मारे गए। इनमें 45 अल्पसंख्यक, 11 ब्राह्मण और 8 यादव शामिल हैं। अन्य 58 अपराधियों में क्षत्रिय, वैश्य, पिछड़े और अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के थे। गत 8 माह में 8 ब्राह्मण अपराधी मारे गए। इनमें से 6 अपराधी कानपुर के बिकरू कांड में विकास दुबे के साथ शामिल थे। स्पष्ट है कि अभी तक 11 ब्राह्मण अपराधी मारे गए। इनमें से 6 अपराधी विकास दुबे के लिए काम करते थे। इसके बावजूद यह शोर मचाया गया कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के कार्यकाल में एक जाति विशेष के लोगों को निशाना बनाया जा रहा है।
उत्तर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य कहते हैं, ‘‘अब वह दौर समाप्त हो गया, जब जाति के नाम पर वोट मिलता था। अब जनता किसी एक बिरादरी के आधार पर वोट नहीं दे रही है। विकास और सुशासन के मुद्दे पर जनता, भाजपा के साथ है। मोदी जी के प्रधानमंत्री बनने के बाद विकास और प्रगति का मार्ग प्रशस्त हो रहा है। सपा, बसपा, कांग्रेस ये सब हताश, निराश और उदास हैं। इसलिए ये लोग जाति के नाम पर लोगों को भड़का रहे हैं, लेकिन जनता सब समझ रही है। हमारी सरकार किसी के साथ भेदभाव नहीं करती है। सभी को साथ लेकरसभी का विकास किया जा रहा है। जो अपराधी हैं उनके खिलाफ कानून अपना काम करता रहेगा।’’
लेकिन राज्य के विपक्षी नेताओं को लग रहा है कि यदि वे जातिवाद को हवा देते रहेंगे तो फिर से प्रदेश में जातिवादी राजनीति का दौर शुरू हो सकता है।
बता दें कि 90 के दशक में उत्तर प्रदेश में जातिवादी राजनीति जोर पकड़ने लगी थी। योग्यता, आवश्यकता और जन कल्याण से इतर ‘जाति’ के आधार पर यह तय किया जाने लगा था कि किस जाति की ‘सत्ता’ में कितनी भागीदारी होगी। जनता दल की सरकार बनने के बाद मुलायम सिंह यादव पहली बार 5 दिसंबर, 1989 को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। उन्होंने बाबरी ढांचे की सुरक्षा के नाम पर रामभक्तों पर गोलियां चलवार्इं। इसके बाद मुसलमान उनके साथ हो गए। मुसलमान वोट बैंक खिसक जाने से कांग्रेस उत्तर प्रदेश में कमजोर पड़ गई।


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कभी ऐसी जातिवादी राजनीति होती थी। अब उसे फिर से लाने की कोशिश हो रही है।

उस समय तक मुलायम सिंह को यादव समेत कुछ पिछड़ी जातियों का समर्थन हासिल हो चुका था। 1993 के आस-पास मुलायम सिंह ने यह महसूस किया कि अगर बसपा का वोट बैंक उनके साथ जुड़ जाए तो उत्तर प्रदेश की सत्ता पर आसानी से कब्जा किया जा सकता है। उस समय बसपा के पास दलित बिरादरी का वोट तो था मगर बसपा ने सत्ता का स्वाद नहीं चखा था। इसलिए बसपा और सपा एक साथ आ गए। दोनों ने गठबंधन कर लिया। 1993 के चुनाव में सपा-बसपा गठबंधन ने सभी राजनीतिक दलों का समीकरण बिगाड़ दिया और सत्ता पर कब्जा कर लिया। 4 दिसंबर, 1993 को मुलायम सिंह यादव दूसरी बार मुख्यमंत्री बने। लेकिन इस बेमेल गठबंधन के सत्ता में आने के बाद से ही बयानबाजी का दौर शुरू हो गया। अंतत: 2 जून, 1995 को मुलायम सरकार गिर गई। उस समय मुलायम सिंह यादव अक्सर कहते थे, ‘‘जब तक मेरा माई (एम से मुसलमान और वाई से यादव) मेरे पास है तब तक मेरा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता।’’
2 जून, 1995 की रात ही मायावती मुख्यमंत्री बनीं। जातिवादी राजनीति का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उस समय कांशीराम ने कहा था, ‘‘जिस जाति का सीएम हो उसी जाति का डीएम हो।’’ राजनीतिक गलियारों में इस बयान की कड़ी आलोचना हुई थी। इसके बाद तो उत्तर प्रदेश जातिवादी राजनीति का ऐसा अखाड़ा बना कि लोग जाति के नाम पर ही सब कुछ करने लगे। इससे प्रदेश का कितना नुकसान हुआ, इसका अंदाजा अब लोगों को हो रहा है।
2014 में लोकसभा चुनाव के दौरान राजनीति की तस्वीर बदल गई। लोगों ने जातिवादी राजनीति को छोड़कर विकास की राजनीति को अपनाया। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने जातिवाद की राजनीति करने वाली सपा, बसपा और कांग्रेस को ऐसी पटखनी दी कि इनके नेता अभी भी अपने भविष्य को लेकर चितिंत हैं।
अखिलेश यादव ने अपने कार्यकाल में अनेक हज हाउस का निर्माण कराया। अब वही अखिलेश कह रहे हैं कि भगवान विष्णु के सभी अवतार हमारे हैं। उन्होंने लोकसभा चुनाव के पहले अपने गांव सैफई में भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति लगवाने की घोषणा की थी। इस घोषणा का लोकसभा चुनाव में कोई फायदा नहीं मिला। अब ब्राह्मण वोट बैंक को साधने के लिए अखिलेश ने भगवान परशुराम की मूर्ति लगवाने की बात कही है। करीब 18 महीने बाद उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने हैं। अब अखिलेश को भगवान परशुराम की याद आई है। 2007 में जब विधानसभा चुनाव नजदीक आया था तब तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने परशुराम जयंती पर सार्वजनिक अवकाश घोषित किया था। नि:संदेह उन्होंने ब्राह्मणों को अपनी ओर खींचने के लिए ऐसा किया था, लेकिन उनकी यह नीति काम नहीं आई और वे चुनाव हार गए।
प्रदेश में जैसे ही भगवान परशुराम के बहाने ब्राह्मण वोट की राजनीति शुरू हुई तो कांग्रेस पार्टी के नेता जितिन प्रसाद ने परशुराम जयंती पर सार्वजनिक अवकाश घोषित करने की मांग की, लेकिन शायद उन्होंने बहुत देर कर दी है। अब उनके झांसे में कोई नहीं आने वाला है।
इसके तुरंत बाद मायावती सक्रिय हुर्इं। उन्होंने कहा, ‘‘अगर प्रदेश में 2022 में बसपा की सरकार बनती है तो ब्राह्मण समाज की आस्था के प्रतीक परशुराम और सभी जातियों के महान संतों के नाम पर अस्पतालों व सुविधायुक्त ठहरने के स्थानों का निर्माण कराया जाएगा।’’ लेकिन मायावती शायद यह भूल गई हैं कि 90 के दशक में उन्होंने ‘तिलक, तराजू और तलवार’ सरीखा अपमानजनक नारा देकर जाहिर कर दिया था कि बसपा ब्राह्मण विरोधी राजनीतिक दल है। इसके बावजूद ब्राह्मणों ने 2007 के विधानसभा चुनाव में मायावती का साथ दिया था। मायावती ने ब्राह्मण वोट हासिल करने के लिए सतीश चंद्र मिश्र की अगुआई में ‘ब्राह्मण भाईचारा समिति’ का गठन किया। बसपा ने जातिगत राजनीति को जमकर उभारा। हरेक जाति की ‘भाईचारा समिति’ बनाई गई और उस समिति के अध्यक्ष से यह कहा गया कि वह अपनी जाति के लोगों के बीच जाकर बसपा का प्रचार करें और प्रत्येक दशा में उन्हें बसपा को वोट देने के लिए सहमत करें। इसका उन्हें लाभ भी मिला और वह मुख्यमंत्री बनीं। लेकिन 2012 के विधानसभा चुनाव में बसपा को हार का मुंह देखना पड़ा। इसके बाद से बसपा उबर नहीं पा रही है। 2014 के लोकसभा चुनाव में बसपा को भारी पराजय का सामना करना पड़ा था। 2017 के विधानसभा चुनाव में भी बसपा बुरी तरह हारी। 2019 के लोकसभा चुनाव में भी बसपा को वैसी सफलता नहीं मिली, जैसी मायावती उम्मीद कर रही थीं। यही हाल सपा और कांग्रेस का भी है। इसलिए इन लोगों को लगने लगा है कि जब तक जातिवाद को हवा नहीं दी जाएगी तब तक भाजपा को हराना मुश्किल है।
अब वक्त बताएगा कि इन लोगों की जातिवादी राजनीति का दौर लौटेगा या प्रदेश के लोग विकास की राजनीति को ही तरजीह देंगे।