जिहादी गिरफ़्त में फंसता यूरोप

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यूरोप में बढ़ती इस्लामिक जनसांख्यिकी एक कड़वा सच है, जो आने वाले समय में ब्रसल्स जैसे महानगर को यूरोप में एक नया मदीना बना देगी। बुर्के और जालीदार टोपी अब यूरोप में एक सचाई है, जिसकी पहले कल्पना तक नहीं की जा सकती थी।
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लीबिया के पूर्व मृत तानाशाह मुयम्मर गद्दाफ़ी ने कहा था कि इस्लाम एक दिन यूरोप को हथियारों से नहीं अपितु जनसंख्या जिहाद से जीतेगा। उसकी यह भविष्यवाणी आज वास्तव में फलीभूत होती दिख रही है। फ्रांस से लेकर बेल्जियम और जर्मनी, ब्रिटेन सभी इस्लामिक कट्टरपंथी हिंसा से जूझ रहे हैं। इन राष्ट्रों के अनेक मुस्लिम नागरिक वैश्विक खिलाफ़त की स्थापना के लिए पश्चिमी एशिया से लेकर अफगानिस्तान तक जिहाद कर रहे हैं। इन जिहादी आतंकियों को वैश्विक वाममार्गी मीडिया इस्लामिक स्टेट के लड़ाके कह कर संबोधित करता है। वह इन्हें इस्लामिक आतंकी कहने में भी संकोच करता है।

वामपंथी आज विश्व में इस्लामिक शासन या खिलाफ़त की स्थापना का परोक्ष समर्थन करते देखे जा सकते हैं। विश्व का उच्च शिक्षित वर्ग विशेष रूप से इस जिहादी प्रक्रिया के वास्तविक स्वरूप को जनमानस तक पहुंचाने में अपने कर्तव्य का निर्वाह नहीं कर रहा है। “द क्लैश ऑफ सिविलाइजेसन एंड रिमेकिंग ऑफ वर्ल्ड ऑर्डर” पुस्तक के लेखक सैमुएल पी हंटिंगटन ने जिस इस्लामिक जनसंख्या वृद्धि और उसके फलस्वरूप होने वाले संघर्षों को निकट भविष्य में होने वाली अवश्यंभावी घटना बताया था, वह आज सम्पूर्ण यूरोप में अक्षरशः दिखाई दे रही है। हिंसा राजनीतिक इस्लाम का सदियों से सबसे प्रभावी शस्त्र रही है। लोकतान्त्रिक व्यवस्था में यही हिंसा भीड़ आतंकवाद के रूप में परिलक्षित होती है।
दिल्ली, बंगलुरु की इस्लामिक हिंसा के बाद स्वीडन की हिंसा समूचे विश्व के लिए चिंता का सम्मिलित विषय होना चाहिए क्योंकि इसके पीछे काम कर रही जिहादी विचारधारा एक ही है और उस विचारधारा का एक ही लक्ष्य है, “वैश्विक खिलाफ़त” की स्थापना। यह विश्व पर्यन्त प्रायोजित हिंसा धीरे-धीरे राजनीतिक इस्लाम की राजनीतिक और सामाजिक वर्चस्व स्थापना के लिए है। जिसका सशक्त प्रतिकार न होने के कारण वह और उन्मुक्त और दुस्साहसी हो रही है। पूर्व में फ्रांस, बेल्जियम, ब्रिटेन, होलैंड और स्पेन में हुयी इस्लामिक आतंकी घटनाएं इसी क्रम का हिस्सा थीं। यह संकर या हाइब्रिड युद्ध आज के युग का सच है। इस्लाम ईसाई यूरोप को मनोवैज्ञानिक रूप से दुर्बल करने के अपने सुनियोजित दुष्चक्र में सफल हो रहा है। मुस्लिम शरणार्थी से धीरे-धीरे सशक्त राजनीतिक और सामाजिक इकाई बनता जा रहा है। वह अनेक यूरोपीय देशों के बहुत से मुस्लिम बहुल क्षेत्रों को काफ़िर मुक्त करने की ओर बढ़ रहा है। राजनीतिक सत्ता प्राप्ति उसका स्पष्ट लक्ष्य है।
स्वीडन की इस्लामिक हिंसा के पीछे के कारण इतने महत्वपूर्ण नहीं हैं, जितना कि राजनीतिक इस्लाम का अकारण भी अपनी सामाजिक शक्ति का प्रदर्शन करना आवश्यक है। तुर्की में चर्चों का मस्जिद बनाया जाना या अफगानिस्तान में बुद्ध प्रतिमा को मुसलमानों द्वारा खंडित करना अथवा पाकिस्तान और बांग्लादेश में मंदिरों का प्रतिदिन तोड़ा जाना कोई विषय नहीं होता है लेकिन उनकी कुरान को जलाना या मुहम्मद पर कोई टिप्पणी एक अक्षम्य अपराध बन जाता है। यह मुस्लिम मानसिकता राजनीतिक इस्लाम के मध्ययुगीन राजनीतिक शक्ति संपन्नता से प्रेरित है।

मुसलमान आज भी उसी राजनीतिक शक्ति की प्राप्ति के लिए प्रयासरत है। यूरोप में बढ़ती इस्लामिक जनसांख्यिकी एक कड़वा सच है, जो आने वाले समय में ब्रसल्स जैसे महानगर को यूरोप में एक नया मदीना बना देगी। बुर्के और जालीदार टोपी अब यूरोप में एक सच्चाई है, जिनकी पहले कल्पना तक नहीं की जा सकती थी। इस्लाम बोस्निया, कोसोवो, अल्बानिया और हरज़ेगोविना से अब पश्चिमी यूरोप में पहुँच चुका है। फ्रांस में उनकी जनसंख्या 8.8% और स्वीडन में 8.1% है। यही कारण है इन दोनों देशों में बढ़ रही इस्लामिक हिंसा का। इस्लामिक हिंसा का सीधा संबंध है उसकी बढ़ती जनसांख्यिकी से और उसी आधार पर भविष्य में राजनीतिक हिस्सेदारी की मांग। यह राजनीतिक इस्लाम की एक चरणबद्ध सामरिक कार्ययोजना है, जिस पर वह निरंतर सदियों से कार्यरत है। भारत का विभाजन और पाकिस्तान का जन्म इसी सिद्धान्त पर हुआ।