निर्भीक, प्रखर , प्रवर, प्रणब दा

    दिनांक 31-अगस्त-2020   
Total Views |
प्रणब का अर्थ है ओंकार. संस्कृति की इन्ही जड़ों में से निकलकर बंगाल से एक प्रणब आए. बेहतरीन व्यक्तित्व, निर्भीक राजनेता, राष्ट्रीय चरित्र और अविस्मरणीय राष्ट्रपति के रूप में वो हमारे दिलों में बने रहेंगे

pranab_1  H x W
प्रणब दा अनेक कारणों से याद रखा जाएगा. राष्ट्रीय सोच, निर्भीक राजनेता, विद्वान,अनेक पुस्तकों के लेखक, गरिमामय राष्ट्रपति, जागरूक सांसद, मंत्री रहते हुए अपनी सरकारों के संकटमोचक, वित्त, रक्षा, उद्योग और विदेश मंत्रालय जैसी जिम्मेदारियाँ उठाने वाले. अनुभवी प्रणब मुखर्जी को देखकर-सुनकर उनके अंदर के युवा मन का अहसास होता था. कंप्यूटर – लैपटॉप से वो दोस्ती नहीं कर सके. उनका मन किताबों में रमता था, प्रणब दा अनेक अर्थों में आज के व्यक्ति थे. जीवन में कुछ ओढ़ने का प्रयास नहीं किया. कहते हैं कि एक बार इंदिरा गांधी ने उनके अंग्रेजी के ‘एक्सेंट’ ( उच्चारण ) को सुधारने के लिए प्रशिक्षक नियुक्त करने का सोचा था, लेकिन अपने विशिष्ट बंगाली अंदाज में बोलना पसंद करने वाले प्रणब दा ने कहा “मैडम ! जो हो चुका है उसे बदला नहीं जा सकता. प्लीज़ डोंट ट्राय टू मेक अ स्कवेयर आउट ऑफ़ अ सर्किल.” वो बेबाक थे, पर भरोसेमंद मित्र थे. अटल जी उन पर बड़ा विश्वास करते थे. सफ़दरजंग रोड पर रहते हुए ये दोनों पड़ोसी थे. अटल जी की दत्तक पुत्री का विवाह होने वाला था, तब अटल जी ने प्रणब दा और उनकी पत्नी श्रीमति गीता मुखर्जी से सारे इंतजाम देखने को कहा था. अमिताभ बच्चन की फिल्म ‘पीकू’ देखने के लिए उन्होंने लालकृष्ण आडवानी जी को राष्ट्रपति भवन आमंत्रित किया, साथ बैठे, भारतीय राजनीति के दो दिग्गजों ने एक साथ अच्छा समय बिताया.
राष्ट्रीय चरित्र -
प्रणब दा का चरित्र राष्ट्रीय चरित्र था. उन्होंने शुरुआत बंगाल की राजनीति से की. कांग्रेस के विरोध में संयुक्त मोर्चा बनाकर लड़ने का इरादा प्रकट किया और उस पर शिद्दत से काम करते रहे. इंदिरा के प्रखर विरोधी थे, लेकिन पूर्वी पाकिस्तान (अब बंग्लादेश) के मामले पर इंदिरा सरकार का पूर्ण समर्थन किया. जब पाकिस्तान की खूनी सेना पूर्वी पाकिस्तान में क्रूर दमन का दौर चला रही थी, तब प्रणब मुखर्जी ने केंद्र सरकार से बंग्लादेश को राजनैतिक मान्यता देने की माँग की थी. इंदिरा को यह सुझाव पसंद आया , और भावी बंग्लादेश को अंतर्राष्ट्रीय मान्यता दिलवाने वाली टीम का वो महत्वपूर्ण हिस्सा बने. यह अभियान ही उन्हें कांग्रेस में लाने का बहाना बना. जून 2018 में वो संघ के तृतीय वर्ष प्रशिक्षण कार्यक्रम के मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित थे. संघ के कार्यक्रम में उनके आने को लेकर कांग्रेस बड़ी बेचैन थी. कांग्रेस नेताओं की तरफ से बयानबाजी हो रही थी. कांग्रेस के वरिष्ठतम नेता और पूर्व राष्ट्रपति पर इस तरह से दबाव बनाया जा रहा था, लेकिन उन्होंने परवाह नहीं की. कार्यक्रम में बोलते हुए उन्होंने पहली बात कही “ मैं यहाँ आपसे भारत के संदर्भ में राष्ट्र, राष्ट्रीयता और देशभक्ति पर अपने विचार साझा करने आया हूँ. यह तीनो आपस में इतने गहरे गुंथे हुए हैं कि उन्हें अलग-अलग करके चर्चा करना कठिन है ” यह शुरुआत ही बतलाती है कि उन्हें भारत की गहरी समझ थी. कि भारत की राष्ट्रीय दृष्टि को विशुद्ध भारतीय तरीके से, उसकी संस्कृति के प्रकाश में ही समझा जा सकता है. अपने आगे के उद्बोधन में उन्होंने कहा “राष्ट्र सामान संस्कृति और इतिहास साझा करने वाले लोगों का समूह है.. “ उन्होंने कहा था कि राष्ट्र का हमारा सिद्धांत यूरोप से बहुत पहले का है. उन्होंने भारत की हजारों साल पुरानी उस सांस्कृतिक पहचान का जिक्र किया, जिससे भारत दुनिया में पहचाना गया. उन्होंने भारत के महान प्राचीन विश्वविद्यालयों और विशाल आर्थिक तंत्र की चर्चा की. भारत के संविधान के संदर्भ में आचार्य चाणक्य का जिक्र किया. प्राचीन और नवीन को मिलाता उनका यह भाषण बार-बार पढने –सुनने योग्य है.
स्वाभिमानी और आत्मनिर्भर प्रणब दा -
कांग्रेस में रहते हुए दो अवसर आए जब वो प्रधानमंत्री बनने की कतार में सबसे आगे और कांग्रेस के सबसे योग्य राजनेता के रूप में देखे जा रहे थे, पहला, 1984 में श्रीमती गांधी की हत्या के बाद,और दूसरी बार यूपीए 1 की शुरुआत में, जब सोनिया गांधी को अपनी प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा से पैर वापस खींचने पड़े थे. दोनों ही बार ऐसा न हो सका. आखिरकार कांग्रेस को परिवार के इर्दगिर्द ही घूमना था. 1984 में वो अंतरिम प्रधानमंत्री बनते हुए रह गए, और निष्ठावान मुखर्जी की ताकत को देखते हुए कैबिनेट में भी जगह नहीं दी गई, जबकि पूर्ववर्ती इंदिरा सरकार में वो वित्तमंत्री थे. फिर अचानक 1986 में उन्हें पार्टी से भी निष्कासित कर दिया गया. बाद में तब के कांग्रेस और सरकार के सर्वेसर्वा राजीव गांधी ने स्वीकार किया था कि उन्हें प्रणब दा के बारे में “असत्य बातें” बतलाई गईं थीं. राजनीति में गलती स्वीकार करनी पड़ जाए तो उसके भी तरीके विचित्र होते हैं. अगर ऐसा न होता तो शायद केंद्र सरकार के इतिहास में अनेक बातें कुछ और ढंग से हो सकती थीं. प्रधानमंत्री बनने का दूसरा अवसर आया जब अटल सरकार के जाने के बाद लोकसभा चुनाव में कांग्रेस बहुमत के आंकड़े से पीछे छूट गई. गठबंधन की सरकार बननी थी, और सबसे मिलने जुलने वाले, सबको सूत्र में बांध सकने वाले प्रणब मुखर्जी को स्वाभाविक रूप से भावी प्रधानमंत्री के रूप में देखा जा रहा था. प्रणब दा जानते थे कि विरोधी विचारों और टकराने वाले हितों के बीच चला कैसे जाता है. “गठबंधन का धर्म ही है विरोधाभासों को साधना..” वो कहा करते थे. लेकिन संभावना यथार्थ में नहीं बदल सकी. कांग्रेस की मुखिया को आत्मनिर्भर प्रधानमंत्री नहीं चाहिए था. मुखर्जी इस ढांचे में समा नहीं सकते थे, इससे कोई इनकार नहीं कर सकता.
देश की श्रद्धांजलि -
प्रणब मुखर्जी का जन्म पश्चिम बंगाल के बीरभूम के ग्रामीण परिवेश में हुआ था. देहात के चलन के चलते 10 वर्ष की उम्र तक विद्यालय का मुंह नहीं देखा था. पर परिवार के संस्कार उनका संबल बने. परमात्मा में उनकी आस्था थी. “देवी की कृपा ..” अक्सर वो बोलते थे. अपनी मेहनत और इरादे के दम पर उन्होंने लंबा और शानदार सफ़र तय किया. प्रणव का अर्थ है ओंकार. संस्कृति की इन्ही जड़ों में से निकलकर बंगाल से एक प्रणव आया. 50 दशकों की लंबी पारी खेली. प्रणब दा ने हजारों मन जीते. बेहतरीन व्यक्तित्व, राष्ट्रीय चरित्र और अविस्मरणीय राष्ट्रपति के रूप में वो हमारे दिलों में बने रहेंगे. इसलिए आज हर व्यक्ति उनको अपनी श्रद्धांजली अर्पित कर रहा है.