हो.वे. शेषाद्रि : ‘‘अब हिन्दू अन्याय नहीं सहेगा’’

    दिनांक 04-अगस्त-2020
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बाबरी ढांचे के ढहने के लगभग एक माह बाद पाञ्चजन्य ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन सरकार्यवाह श्री हो.वे.शेषाद्रि से बातचीत की, जिसके प्रमुख अंश 24 जनवरी, 1993 के अंक में प्रकाशित हुए थे। उसी बातचीत को यहां पुन: प्रकाशित किया जा रहा है-

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 6 दिसम्बर की घटना के बारे में क्या आकलन है?
6 दिसम्बर की घटना और कुछ नहीं, राष्ट्र की अपनी नियति में प्रखर श्रद्धा की जोरदार अभिव्यक्ति थी। भीड़ के गुस्से के बाहरी प्रदर्शन के बावजूद, सभी प्रकार की संवैधानिक और कानूनी भलमनसाहत को हवा में उड़ा देने के बावजूद, अपने सम्मानित नेताओं की अवज्ञा के अपराध को करने के बावजूद, अनुशासन के अपने सुप्रतिष्ठित कीर्तिमान को धब्बा लगाने का जोखिम उठाने के बावजूद, 6 दिसम्बर की घटना अनिवार्यतया राष्ट्र द्वारा अपनी सनातन चेतना के गौरव को बनाए रखने हेतु अटूट संकल्प का प्रतीक है, जो कि राष्ट्र के अस्तित्व का ही मूल कारण है।
 
तो इसका अर्थ हुआ कि अब से संविधान, कानून, अनुशासन इत्यादि बातों का अर्थ ही नहीं रहेगा?
ऐसा नहीं है। इसके विपरीत वर्तमान संकट और 6 दिसम्बर का विस्फोट इन तमाम बाहरी ढांचों और मार्गदर्शक सिद्धांतों को एक नया अर्थ, एक उद्देश्यपूर्ण और समग्र विषवस्तु प्रदान करेगा। बाबरी ढांचा अत्यंत उत्तेजक रूप में तमाम अकल्पनीय विकृतियों और उनमें घुस चुकी राष्ट्रविरोधी बातों का प्रतीक बन गया था। इस सबके पीछे अराष्ट्रीयकृत हो चुके नेताओं का सत्तापिपासु मानस भी था। उस प्रतीक के ध्वंस ने इन सब विकृतियों से छुटकारा पाने हेतु राष्ट्र की राम-सौगंध का संकेत ही दिया है। देश को 6 और 7 दिसम्बर की मध्यरात्रि को उतना ही नहीं, बल्कि उससे भी अधिक महत्वपूर्ण संकेत मिला था- ढांचे के मलबे को हटाना और वहां राम मंदिर के लिए एक नए ढांचे को खड़ा करने के रूप में। इसके दो कारण हैं। एक स्वाभाविक स्तर पर कारण यह है कि यदि ऐसा न किया होता और राम जन्मस्थान पर रामलला की मूर्तियां पुन: स्थापित न की होंती तो पूरी कसरत मंदिर विरोधियों के लिए वरदान रूप बन जाती। तब दृश्य यह होता कि पहले से चला आ रहा मंदिर हिन्दुओं द्वारा खुद हटा दिया गया और श्रद्धा केन्द्र लुप्त हो गया। फलत: पिछले चार दशक के कठिन परिश्रम से आंदोलनात्मक और कानूनी स्तर पर जो लड़ाई लड़ी गई और उनकी जो उपलब्धियां हुइं, वे सब खत्म हो जातीं।
परंतु इसके अलावा एक और अधिक मूलभूत बात यह थी कि जिस प्रेरणा ने इन हाथों और पांवों के पीछे काम किया, जिन्होंने तुरंत श्रीराम के उस छोटे से स्थान को बनाया, वह प्रेरणा थी श्रीराम के प्रति सकारात्मक एवं चिरंतन श्रद्धा। उस कुरूप ढांचे को हटाया जाना एक प्रकार से इन श्रद्धा का नकारात्मक हिस्सा था, जिसका अर्थ था कि एक श्रेष्ठ पहलू की रचना की प्रारंभ से पहले बुराइयों का ध्वंस कर देना चाहिए।
अब मंदिर निर्माण के दूसरे चरण तथा हमारे चिरंतन जीवन-मूल्यों के राष्ट् जीवन में पुन: जागरण का यह कार्य वास्तव में हम सभी हिन्दू-सेवाव्रतियों के सामने सबसे वास्तविक चुनौती है। पहले तो हम यह समझें कि 6 दिसम्बर की घटना को हम पूरी तरह से विशुद्ध एक ऐसा अपवाद मानें जो सिर्फ एक बार घटित होता है और जिसकी बार-बार पुनरावृत्ति नहीं होती। क्योंकि इसने अपना लक्ष्य पूरा कर लिया है और वह लक्ष्य इस काम को करने वाले युवाओं ने जैसा सोचा होगा, उससे भी सौ गुणा ज्यादा प्रभावशाली ढंग से सिद्ध हुआ है। इसने सभी संबंधित लोगों को यह संदेश दे दिया है कि अब हिन्दू घुटनों के बल बैठकर सब अन्याय सहने के लिए तैयार नहीं है, कि अब से हमारा देश अपनी आत्मा की आवाज पर खरा सिद्ध होने के लिए उठ खड़ा होगा, कि अब से हमारा देश सारे विश्व में एक वास्तविक हिन्दू राष्ट्र के रूप में जाना जाएगा और हमारा देश ही संघर्ष से जकड़ी हुई मानवता की आध्यात्मिक अभिव्यक्ति के लिए संदेश देने का अपना प्राचीन जीवन लक्ष्य पूरा करने का काम फिर से संभालेगा।
 
बाबरी ढांचा अत्यंत उत्तेजक रूप में तमाम अकल्पनीय विकृतियों और उनमें घुस चुकी राष्ट्रविरोधी बातों का प्रतीक बन गया था। इस सबके पीछे अराष्ट्रीयकृत हो चुके नेताओं का सत्तापिपासु मानस भी था। उस प्रतीक के ध्वंस ने इन सब विकृतियों से छुटकारा पाने हेतु राष्ट्र की राम-सौगंध का संकेत ही दिया है।
परन्तु इस घटनाक्रम के तात्कालिक परिणाम के बारे में आपका का क्या कहना है? उदाहरण के लिए मुसलमानों के मन में अपने भविष्य के बारे में संदेह तथा असुरक्षा की तीव्र भावना? 
उनके विचारशील वर्गों में निराशा की हवा बहनी शुरू हो गई है। इस प्रकार के स्वर समाचार पत्रों में अधिक तीव्र होते जा रहे हैं कि कैसे उनके राजनीतिक नेताओं ने उन्हें अपने हाथों का खिलौना समझा और कट्टरपंथी मजहबी नेताओं ने अपने स्वार्थ के लिए उनका इस्तेमाल किया। वे पहली बार भारतीय स्थिति की कठोर वास्तविकता से रूबरू हुए हैं। अब तक वे प्रत्येक राष्टÑीय प्रयास और प्रत्येक वैध हिन्दू दावों को ‘अल्पसंख्यक अधिकार’ तथा ‘इस्लाम खतरे में है’ का नारा उठाकर तथाकथित सेकुलर पार्टियों पर दबाव डालकर लोकतांत्रिक प्रक्रिया को ही भंग करते हुए दबा देते थे। अब उन्हें इस सत्य का साक्षात्कार हो रहा है, जिसके बारे में पं. नेहरू और श्रीमती इंदिरा गांधी भी उन्हें बताने के लिए विवश हुई थीं, कि उनका हित अपने अल्पसंख्यक अधिकारों के लिए चीखने-चिल्लाने में निहित नहीं है, बल्कि बहुसंख्यक हिन्दुओं की सद्भावना ही उनके हितों की सबसे बड़ी गारंटी है। वह शीघ्र ही यह महसूस करेंगे कि इस दिशा में बढ़े उनके हर एक कदम पर हिन्दू दो कदम आगे बढ़ाएंगे।
पहले ही हिन्दुओं ने तीन हजार ध्वस्त किए गए मंदिरों पर अपना दावा छोड़कर, केवल तीन-मथुरा, काशी और अयोध्या के मंदिरों तक ही सीमित रहने का प्रस्ताव रखकर मुसलमानों की ओर मित्रता का हाथ बढ़ाया है। वह उसी प्रकार है जैसे श्रीकृष्ण ने पांडवों के लिए कौरवों से सिर्फ पांच गांव मांगे थे, जबकि उनका हक आधे राज्य पर था। मुस्लिम अब नियति का लेख पढ़ रहे हैं और वह यह है कि दुर्योधन के रास्ते पर चलकर वैसी ही गति होगी। इसलिए वर्तमान स्थिति ने वास्तव में मुसलमानों तथा राष्ट्रीय मुख्यधारा के बीच की दूरी को कम करने का स्वर्णिम अवसर प्रदान किया है।

राष्ट्रीय धारा में मिलने की बात सुनते ही मुसलमान घबरा रहे हैं। उनकी मुस्लिम पहचान को खत्म करने का एक चतुराई भरा तरीका है। इससे तो आने वाले अनेक सालों के लिए संघर्ष की बुनियाद पड़ जाएगी?
निश्चित रूप से मुसलमानों को अपनी पहचान की वर्तमान अवधारणा में बहुत अधिक परिवर्तन करना होगा। उन्हें तय करना होगा कि क्या उनकी पहचान एक बर्बर विदेशी हमलावर को अपना नायक मानने से होती है? क्या उन्हें ऐसी पहचान स्वीकार है जो उन्हें किसी विदेशी प्रकाशन में उनके पैगम्बर के बारे में लिखी हुई कुछ बातों पर हमारे देश में हिन्दुओं की हत्या और विध्वंस की प्रेरणा देती है? (थोमस एंड थोमस द्वारा लिखित पुस्तक ‘द स्टोरी आफ पैगम्बर साहब’ पर दंगे हुए)। यदि किसी विदेश में अन्य विदेशियों द्वारा उनकी मस्जिद पर हमला हो तो भी वे इस देश में हिन्दुओं पर हमला करें? क्या यह पहचान उनके लिए ठीक है? या भुट्टो को पाकिस्तान में फांसी दी जाए तो भी वे भारत में दंगे करें? ऐसी पहचान जो उन्हें राष्ट्रसम्मान के प्रत्येक बिन्दु के विरुद्ध विद्रोह के लिए उत्तेजित करती है- फिर चाहे वन्देमातरम का प्रश्न हो, गोरक्षा का, छत्रपति शिवाजी का या श्रीराम का? ऐसी पहचान जो उन्हें पाकिस्तान और बांग्लादेशी घुसपैठियों के साथ अपनी पहचान जोड़ने की ओर प्रवृत्त करे- वास्तव में ऐसी किसी भी पहचान का हमारे देश की राजनीति में कोई स्थान नहीं हो सकता।

लेकिन यह तो सब नकारात्मक है?
निश्चय ही नकारात्मक पहलू उस समय तक महत्वपूर्ण है कि वह उन्हें अपनी सकारात्मक पहचान की कोरी स्लेट पर नई इबादत लिखने में मदद करें और सकारात्मक पहलू का निचोड़ यह है कि वे स्वयं को मजहबी सहिष्णुता, सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय आकांक्षाओं में अन्य देशवासियों से एकरूप कर दें। ऐसा रुख न केवल धार्मिक विभिन्नता में एकता की अनोखी भारतीय सांस्कृतिक चेतना को समृद्ध करेगा, बल्कि उनकी अपनी नैतिक और आध्यात्मिक अवधारणा का भी विस्तार होगा।

तो एक प्रकार से हिन्दू और मुस्लिम दोनों ही एक नाव में सवार हैं। और दोनों को ही अपने नकारात्मक पहलू छोड़कर एक समान राष्ट्रीय पहचान के सकारात्मक पहलू को अपनाने की जरूरत है?
हां, ऐसा ही है।