युगांतकारी घटना

04 Aug 2020 11:56:33
अयोध्या में श्रीराम मंदिर बनने का अर्थ है एक युग की समाप्ति और एक नए युग की शुरुआत। यह नया युग भारत के भाग्योदय का है। यह मंदिर रामभक्तों में ऐसी ऊर्जा पैदा करेगा, जिससे एक नए भारत का निर्माण होगा
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श्रीराम मंदिर का नया प्रारूप।
 

सिया राम मय सब जग जानी...। भगवान राम सिर्फ हमारे प्रभु, आराध्य, आदर्श और पथ प्रदर्शक नहीं हैं। वे सांस्कृतिक भारत के रक्षक भी हैं और भू-राजनीतिक भारत के भी। वे हमारे सामाजिक उन्नयन के स्रोत भी हैं और हमें अदैवमातृका कृषि जैसे असंख्य आदर्शों और लक्ष्यों के प्रदाता भी हैं। वे प्रेम के भी सागर हैं और शक्ति के भी। वह भगवान विष्णु के सातवें अवतार भी हैं, और जन-जन के राम भी हैं। वह मर्यादापुरुषोत्तम भी हैं, और हमारे निजी, सामाजिक, पारिवारिक, आर्थिक, राजनीतिक- हर तरह के आदर्श भी हैं।
भारत और चीन के तनाव के बीच कुछ दिन पहले एक रेखाचित्र मीडिया में बहुत प्रचलित हुआ था। उसमें फुफकारता हुआ ड्रैगन है और भगवान राम बाण से उसका वध कर रहे हैं। यह राम हैं। जन-जन के सर्वेसर्वा राम। राजा राम, तपस्वी राम, वनगामी राम, रक्षक राम, उद्धारक राम, दाता राम। ‘रमते कणे कणे इति राम:।’
अयोध्या में श्रीराम मंदिर के पुनर्निर्माण की प्रक्रिया शुरू होना एक युगांतकारी घटना है। यह कितनी बड़ी घटना है, इसका अनुमान न हम देखकर लगा सकते हैं, न सुनकर, न लिखकर उसका वर्णन कर सकते हैं। कुछ पहलुओं को समेटने का प्रयास इस लेख में है। लेकिन श्रीराम की या अयोध्या में श्रीराम मंदिर के निर्माण की घटना की व्यापकता के आगे वह एक कण मात्र ही है।
रामसेतु निर्माण में ऐसे कणों का भी योगदान था, और यह बात हमें अपना प्रयास करने की प्रेरणा और शक्ति देती है।
दो शब्द हैं। एक है गजवा-ए-हिंद। हालांकि शायद ही कोई पाठक इस शब्द से अनजान हो, लेकिन उसका सही अर्थ एक बार फिर समझिए। इसकी यह व्याख्या है कि गजवा-ए-हिंद 1400 वर्ष पुरानी अवधारणा है, तो उससे आंखों में आंखें डाल कर बात कीजिए। पूछिए कि क्या इसी बात का अर्थ यह नहीं है कि 1400 वर्ष से यह अवधारणा विफल होती आ रही है? हालांकि इसी बात का यह अर्थ जरूर है कि 1400 वर्ष से भारत इस्लामी हमलावरों के निशाने पर है।
ईसाइयत की कहानी ज्यादा साफ-साफ है। ईसाई ‘रिलीजियस’ विश्वासों के एक जानकार हैं डॉ. टिमोथी सी. टेनेंट। वह अमेरिका के विल्मोर, केंटकी स्थित ईसाई पादरियों को ‘कन्वर्शन’ कराने के लिए प्रशिक्षण देने वाली एक संस्था ‘एसबरी थियोलॉजिकल सेमिनरी’ के अध्यक्ष हैं।  उनका लक्ष्य 10 करोड़ हिंदुओं को कन्वर्ट करने का है। वास्तव में ईसाइयत के गजवा-ए-हिंद सरीखे सपने भी ईसाइयत जितने ही पुराने हैं।
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अयोध्या स्थित श्रीराम की विशाल मूर्ति

अगर आप पंथनिरपेक्षता और उदारवाद वगैरह बातों से भारत में हिंदू समाज को कमजोर होने देते हैं, यहां की सनातन आस्था और संस्कृति को खत्म होने देते हैं, तो इससे सिर्फ भारत की पंथनिरपेक्षता और संस्कृति को नुकसान नहीं होगा, बल्कि भारत का भौगोलिक अस्तित्व भी खतरे में पड़ जाएगा।

दोनों गजवा-ए-हिंदों में और भी कई बातें एक जैसी हैं। सबसे महत्वपूर्ण और सबसे सहज साझी बात यह है कि दोनों के लिए ‘अपने मजहब के विस्तार की दृष्टि से सबसे बड़ी चुनौती भारत है।’ आखिर कोई तो बात भारत में ऐसी होगी। मिस्र और रोम तो जाने कितनी बार नष्ट हुए।
आप दक्षिण भारत के भीतरी इलाकों में थोड़ा समय बिता कर देखें। या पूर्वोत्तर में या छत्तीसगढ़, झारखंड और गोवा में। कई इलाकों में से लगभग हर गली में छोटी-छोटी चर्चों की कतार देखी जा सकती है।
छोड़िए इसे। आपने पंजाब में सिखों और हिंदुओं की भारी संख्या में कन्वर्जन की खबरें पढ़ी और सुनीं जरूर होंगी। तमाम ऐसे वीडियो देखे होंगे, जिनमें कुछ जाने-पहचाने चेहरे भयावह, रहस्यमय या हास्यमय मुद्राएं बनाते हैं। बताया जाता है कि उन्हें कोई भयानक रोग हो चुका है, और उसका कोई इलाज ही नहीं है। फिर चोंगे में छिपा एक व्यक्ति कोई शाब्दिक-शारीरिक किस्म का आक्रमण करता है, और वह दशकों पुराना असाध्य, प्राणलेवा रोग तुरंत ठीक हो जाता है। अगला शो शुरू होने के पहले तक के लिए।
आप सबने देखा होगा बड़ी संख्या में पादरी हिंदू नामों से नमूदार होते हैं। कई बार वे तिलक वगैरह भी लगाए होते हैं। और ईसा मसीह को तो कई बार हिन्दू देवी-देवताओं का स्वांग करा कर प्रस्तुत किया जाता है। अल-तकिया बिन ईसा?
नहीं। वे उसे अल-तकिया बिन ईसा नहीं कहते। उसे क्रिप्टो-क्रिश्चियन कहते हैं। थोड़ी अलग पद्धति। अगर यह कहा जाए कि एक पंथनिरपेक्ष देश में किसी मजहब को मानना या न मानना व्यक्ति का अपना मामला है, तो उसमें गलत कुछ नहीं है, लेकिन उसके छिपे हुए या क्रिप्टो होने की क्या तुक है?
 टिमोथी सी. टेनेंट का विचार बहुत सपाट सा है। एक वीडियो में उन्होंने कहा है, ‘‘1950 के दशक में भारत में 2000 से 3000 मिशनरी दस्ते थे। आज 40,000 से 50,000 हैं, जो भारत के विभिन्न हिस्सों में काम कर रहे हैं। इसलिए भारत में आसानी से 10 करोड़ कन्वर्टेड ईसाई हो जाएंगे।’’
लेकिन इन सारी बातों की यहां चर्चा क्यों की जा रही है?
वास्तव में बात न कानून की है, न कानून में मौजूद छिद्रों (जैसे क्रिप्टो क्रिश्चियनिटी) की। बात भारत पर हो रहे सांस्कृतिक आक्रमण की है। इसे पंथनिरपेक्षता वगैरह बातों से भ्रमित नहीं किया जा सकता। वास्तव में भारत एक पंथनिरपेक्ष देश मात्र इस कारण ही है क्योंकि यहां हिंदू बहुमत में हैं और सनातन धर्म ही भारतवर्ष की प्राणवायु है। अगर आप पंथनिरपेक्षता और उदारवाद वगैरह बातों से भारत में हिंदू समाज को कमजोर होने देते हैं, यहां की सनातन आस्था और संस्कृति को खत्म होने देते हैं, तो इससे सिर्फ भारत की पंथनिरपेक्षता और संस्कृति को नुकसान नहीं होगा, बल्कि भारत का भौगोलिक अस्तित्व भी खतरे में पड़ जाएगा। इतिहास में भारत के जितने भी विभाजन हुए हैं, वे भारत की सनातन आस्था और संस्कृति को चुनौती दिए जाने के कारण ही हुए हैं।
इस प्रकार 5 अगस्त, 2020 को होने वाला अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि पर श्रीराम मंदिर के निर्माण के प्रारंभ का कार्य मात्र करोड़ों हिंदुओं की आकांक्षाओं और इच्छाओं को पूरा करने का ही कार्य नहीं, वरन भारत की सनातन आस्था और संस्कृति को पुनर्पुष्ट करने का भी कार्य होगा। लेकिन क्या 5 अगस्त, 2020 ही इस महान कार्य की सबसे महत्वपूर्ण तिथि है?
निश्चित रूप से मील के एक सबसे अहम पत्थर पर 6 दिसम्बर, 1992 की तिथि भी दर्ज है। उसके बाद दूसरा पड़ाव  9 नवम्बर, 2019 के ऐतिहासिक दिन का है, जिसमें श्रीराम जन्मभूमि को लेकर चला विवाद भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णायक रूप से और समाप्त कर दिया था। सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय का एक संक्षिप्त आलोकन जरूरी है। तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई के नेतृत्व में सर्वोच्च न्यायालय (सभी 5 न्यायाधीशों- डी. वाई. चंद्रचूड़, शरद अरविंद बोबड़े, एस. अब्दुल नाजेर और अशोक भूषण) ने एक सर्वसम्मत निर्णय दिया कि अयोध्या अधिनियम 1993 के तहत अधिग्रहीत भूमि के साथ-साथ 2.77 एकड़ की विवादित भूमि भी रामलला की और हिंदुओं की है। फैसले में मुसलमानों के लिए कहा गया कि उत्तर प्रदेश सरकार अयोध्या के आसपास के क्षेत्र में 5 एकड़ भूमि सुन्नी वक्फ बोर्ड को आवंटित करेगी। एक अन्य और तीसरा बड़ा ऐतिहासिक दिन 5 फरवरी, 2020 का था, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा में घोषणा की थी कि श्री रामजन्मभूमि तीर्थक्षेत्र ट्रस्ट शीर्ष अदालत के निर्देशों के अनुसार स्थापित किया जाएगा। इस ट्रस्ट की अगुवाई जीवन के नौ दशक पूर्ण कर चुके ‘युवा’ श्री के. ए. परासरण कर रहे हैं। सर्वोच्च न्यायालय में श्री रामलला विराजमान की ओर से तर्क रखने वाले श्री परासरण की भूमिका, उनकी ऊर्जा और उनकी अदम्य तर्कक्षमता अपने आपमें इतिहास का एक अध्याय है।
अब थोड़े और पीछे के इतिहास पर जाएं। मुगल हमलावर बाबर के सेनापति मीर बाकी ने मूल मंदिर का विध्वंस 1528 में शुरू किया था। मस्जिद बाद में बनाई गई, जिसे ‘बाबरी मस्जिद’ कहा गया।
यह ‘बाबरी मस्जिद’ शब्द कहां से आया, यह गंभीर विषय है। वास्तव में 1940 से पहले इसे मस्जिद-ए जन्मस्थान कहा जाता था। यहां तक कि आधिकारिक दस्तावेजों में भी इसका यही नाम था। इतिहास में एक प्रसंग यह भी है कि एक बार यहां मंदिर बनाने के लिए हिन्दू-मुसलमान प्रतिनिधियों में सहमति हो गई थी, लेकिन फूट डालो और राज करो की ब्रिटिश नीति से इसका मेल नहीं हो सका और यह सहमति विफल रही। मंदिर निर्माण के लिए सहमत होने वाले एक मुस्लिम फकीर और हिन्दू संतों को सार्वजनिक तौर पर फांसी पर लटका दिया गया, ताकि फिर कोई ऐसी हिमाकत न कर सके।
हिमाकत फिर भी होती रही और उसका प्रतिरोध भी होता रहा। ठीक फूट डालो और राज करो की ब्रिटिश नीति के अनुरूप। अब सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय से सभी कुछ शांतिपूर्वक निपट जाने का एक अर्थ यह भी है कि आजादी के इतने बरस बाद भारत अंग्रेजी नीतियों की छाया से बाहर निकल सका है।
23 दिसम्बर, 1949 मील का एक और पत्थर है। संत अभिरामदास ने कुछ अन्य साधु-संतों के साथ मिल कर ‘बाबरी मस्जिद’ के मुख्य गुंबद के नीचे हरि प्रेरित ढंग से रामलला की मूर्तियां स्थापित कर दीं। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने जिला मजिस्ट्रेट को आदेश देकर मूर्तियां हटाने का प्रयास किया। लेकिन महंत दिग्विजय नाथ ने नेहरू को चेतावनी दी कि जब तक वे जीवित हैं तब तक किसी को रामलला की मूर्तियों को छूने भी नहीं दिया जाएगा। उस दिन से लेकर 1984 तक उस स्थान पर लगातार सुबह-शाम पूजा होती रही।
श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन अपने आपमें एक लंबा और बहुत जटिलताओं भरा इतिहास है। इस इतिहास में एक अध्याय अगर मंदिर विरोधियों का है, तो एक अध्याय निश्चित रूप से भारत की न्यायपालिका का भी है।       (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
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