रामत्व की स्थापना का महायज्ञ

04 Aug 2020 12:41:44
आलोक कुमार

अयोध्या में बनने जा रहा मंदिर केवल एक पूजा-स्थल नहीं होगा, बल्कि यह भारत में रामत्व यानी स्वाभिमान, समरसता, समृद्धि, सुख, शांति और सौहार्द की स्थापना करेगा। यह विशाल मंदिर भारत के विराट स्वरूप का भी दर्शन कराएगा। इसलिए तन-मन-धन से इस यज्ञ को सफल बनाएं 
alokgi_1  H x W
 अयोध्या में रामभक्तों का विराट स्वरूप (फाइल चित्र) 

श्री रामचरितमानस पढ़ते-पढ़ते राजा राम और उनकी अयोध्या मानो साकार हो जाते हैं। चक्रवर्ती राम की राजधानी अयोध्या अनंत वैभव से विभूषित थी। राजा और प्रजा बड़े-बड़े भवनों में रहते थे। सब सुखी थे। कोई बीमार नहीं होता था। सब धर्म के मार्ग पर चलते थे। नदियों में स्वच्छ जल था। पर्यावरण स्वस्थ था।
जब श्रीराम अपनी लीला समेट कर बैकुण्ठ चले गए तो उनके जन्मस्थान पर बड़ा मंदिर बन गया। महाराजा विक्रमादित्य ने उसका पुनरुद्धार किया। भारत के कोने-कोने से राम भक्त यहां अराधना करने आते थे।
फिर दुर्भाग्य का समय आया। बाबर ने हमला किया। हम पराजित हो गए। किसी मौलवी के कहने से बाबर ने मंदिर को गिराने का हुक्म दे दिया। पराजित हो गई जाति ने अपनी आंखों के सामने मंदिर को ढहाते देखा। राम दरबार के विग्रह भी नहीं बचे। उनको तोड़ कर फर्श के मसाले में मिला दिया। वह अपमान और जिल्लत का स्मारक था।
हिन्दुओं का यह संकल्प हमेशा बना रहा कि यहां मंदिर पुन: बनाएंगे। अकबर के राज में जन-दबाव को समझते हुए ढांचे से जुड़े हुए चबूतरे तक भक्तों को आने और रामलला के पूजन का अधिकार मिल गया। ढांचे में नमाज पढ़ी जाती रही।
1934 में अयोध्या में गो-हत्या के विरोध में बड़ा संघर्ष हुआ और इसके बाद से बाबरी ढांचे में मुसलमानों का जाना और नमाज पढ़ना बंद हो गया। यह पूरी जगह हिन्दुओं के पास आ गई। पर ढांचे के बीच वाले गुम्बद के नीचे श्रीराम जन्मस्थान पर हिन्दू नहीं जा सकते थे।
23 दिसम्बर, 1949 को बीच वाले गुम्बद में आधी रात में अकस्मात् रामलला प्रकट हुए। हम सब लोगों को इस दृश्य की कल्पना अवश्य करनी चाहिए। सवेरे तक अयोध्या और इसके आसपास के सभी गांवों के लोग दर्शन करने के लिए आ गए। मेला लग गया। श्री नरसिम्हा राव ने अयोध्या विषय पर अपनी पुस्तक में लिखा है, ‘‘कुछ मुस्लिम नेता इस बारे में प्रधानमंत्री श्री नेहरू से मिले। नेहरू जी ने जांच के आदेश नहीं दिए। उत्तर प्रदेश सरकार से तथ्य भी नहीं पूछे, पर आदेश दिया कि मस्जिद से तत्काल मूर्तियां हटा दी जाएं।  उत्तर प्रदेश सरकार ने आदेश आगे दे दिया कि मूर्तियां हटा दी जाएं और जरूरत पड़े तो बल प्रयोग द्वारा भी।’’ उस समय श्री के. के. नायर, वहां उपायुक्त थे। अपने 27 दिसम्बर, 1949 के पत्र में राज्य के मुख्य सचिव को उन्होंने लिखा, ‘‘रामलला को उनके जन्मस्थान से हटाने के गंभीर परिणाम होंगे।’’ उन्होंने यह भी कहा, ‘‘यदि सरकार किसी भी कीमत पर रामलला को हटाने पर तुली हो तो वह यह काम नहीं करेंगे। सरकार इसे किसी और से करा ले।’’ यानी रामलला बीच वाले गुम्बद के नीचे ही विराजमान रहे। 
न्यायालय के आदेश से गुम्बद के दरवाजे पर रेलिंग लगा कर उसमें ताला लगा दिया। केवल पुजारी अन्दर जाता था। बाकी लोग बाहर से दर्शन करते थे। अपमान का ढांचा वही था।
इसके बाद के दृश्य आंखों देखे हैं। 1984 में दिल्ली के विज्ञान भवन में विश्व हिन्दू परिषद ने पहली धर्म संसद बुलाई। इसमें सभी भारतीय मत-पंथों के आध्यात्मिक महापुरुषों ने श्रीरामजन्मभूमि पर भव्य मंदिर बनाने का संकल्प लिया था। इसके लिए ‘श्रीरामजन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति’ का गठन कर लिया गया। शंखनाद हो गया।
1984 में ही देशभर में राम-जानकी रथयात्रा निकाली गई। देशभर में अद्भुत मार्मिक दृश्य होते थे। लोग घंटों प्रतीक्षा करते थे। रथों में विराजमान भागवत प्रतिमाओं का दर्शन करते थे। अयोध्या के अपमान के ढांचे से व्यथित होते थे और संकल्प करते थे कि वहीं मंदिर बनाएंगे।
हिन्दुओं के हाथ पहली सफलता लगी जब 1 फरवरी, 1986 को न्यायालय के आदेश से गुम्बद के नीचे 37 साल से लगा हुआ ताला खोल दिया गया। भक्त अपने भगवान के निकट जाकर दर्शन कर सकते थे। आन्दोलन सफलता की ओर था।
जन्मस्थान पर रामलला का मंदिर सब हिन्दुओं के सामूहिक पुरुषार्थ से बनना है। 1989 में हर गांव से मंदिर के लिए एक र्इंट मांगी गई और हर परिवार से सवा रुपया। 2,75,000 गांवों में एक शिला का पूजन करके समारोहपूर्वक पूरे गांव में सवारी निकाली गई। पूरा गांव बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक उस शिला का दर्शन करते थे, प्रणाम करते थे, आनंदित होते थे कि वह र्इंट जन्मस्थान के मंदिर में लगेगी और अपने मन में श्री सोमपुरा द्वारा बनाए गए मंदिर के नक़्शे के अनुसार भव्य श्रीराम मंदिर बनाने के लिए जीवन समर्पण करने की तैयारी रखते थे।
यह चुनौती 1990 में आ गई। श्रीरामजन्मभूमि न्यास ने देशभर से कारसेवकों को मंदिर बनाने के लिए अयोध्या बुलाया। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री मुलायम सिंह यादव ने इस पर प्रतिबंध लगा दिया। उन्होंने अहंकार से भरी हुई भाषा में कहा, ‘‘अयोध्या में किसी पक्षी को भी पर नहीं मारने देंगे।’’ लखनऊ से आगे ट्रेनों का जाना बंद कर दिया। बसों की  आवाजाही रोक दी। सड़कों पर प्रतिरोध लगा दिए।
समाज ने चुनौती का पूरा उत्तर दिया। लखनऊ से सर्दी के दिनों में पैदल चले। गांवों से होते हुए नदी-नाले पार करते हुए सब बाधाओं के सीने पर पैर रख कर बढ़े। सब गांवों में स्वागत होता था। भोजन प्रसाद मिलता था। अयोध्या में धर्मशालाएं और होटल बंद कर दिए गए थे। पर अयोध्या के लोगों ने रामभक्तों के लिए अपने घर के दरवाजे खोल दिए।
30 अक्तूबर, 1990 को सवेरे लगभग 11 बजे श्री अशोक सिंहल अयोध्या पहुंच गए। कुछ लोग जुड़ गए। ढांचे की ओर बढ़ना शुरू किया, तभी एक पत्थर अशोक जी के सर पर आकर लगा। खून बहने लगा। कुर्ते से होता हुआ नीचे धोती तक आ गया। अशोक जी को मानो वह पता ही न चला हो। वह संकल्प से ढांचे की ओर बढ़ रहे थे। यह चमत्कारी दृश्य था। सब कारसेवक और अयोध्या निवासी सड़कों पर उतर गए। सबकी दिशा थी ढांचा। गोलियां चलीं, लोग मारे गए।  शायद सरयू को पता हो कि कितने मरे, पर किसी की पीठ पर गोली नहीं लगी थी। नौजवानों ने ढांचे पर चढ़कर भगवा ध्वज लहराया। मुलायम का अहंकार चूर-चूर हो गया।

alokgi_1  H x W
30 अक्तूबर, 1990 को कारसेवा के दौरान अयोध्या में घायल हुए श्री अशोक सिंहल

मंदिर निर्माण के साथ बनेगा ऐसा भारत, जिसमें सबको रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा और रोजगार की आश्वस्ति होगी। मंदिर निर्माण के साथ बनेगा ऐसा भारत, जिसमें सब लोग दैवी सम्पदा से संपन्न होंगे।

आन्दोलन का अगला चरण था 6 दिसम्बर, 1992। असंख्य कारसेवक अयोध्या में इकट्ठा हुए। विश्व हिन्दू परिषद ने उच्च न्यायालय से कहा था कि ढांचे के पास की परिषद की जमीन को समतल करने की अनुमति दी जाए। न्यायालय ने सुनवाई पूरी कर ली पर फैसला नहीं दिया। लोगों का गुस्सा फूट गया। 5 फुट चौड़ी पत्थर की दीवारें अपने गुम्बद समेत उस गुस्से में ढह गर्इं। कोई विस्फोटक नहीं था, कोई औजार नहीं, केवल हनुमान जी का स्मरण और अपने हाथ-पैरों की शक्ति के भरोसे ढांचा विलुप्त हो गया। एक छोटा टेंट बना कर अपने जन्मस्थान पर श्री रामलला विराजित हुए। जन्मस्थान पर मंदिर का संकल्प पूरा हो गया था, पर भव्य मंदिर बनाना अभी भी शेष था।
मामला न्यायालय में था। एक लम्बी प्रतीक्षा, कभी-कभी तो लगता था कि यह अंतहीन प्रतीक्षा है। अकुलाहट बढ़ रही थी। लोग हमारा मजाक उड़ाते थे कि क्यों मंदिर वहीं बनाएंगे? पर...तारीख नही बताएंगे। न्यायालय में जब कभी भी तारीख बढ़ जाती थी तो सारा देश और मीडिया अपनी निराशा और नाराजगी को सार्वजनिक रूप से कह देता था।
आखिर सर्वोच्च न्यायालय ने 5 न्यायाधीशों की पीठ बना कर मामले की रोज सुनवाई की। 9 नवम्बर, 2019 को फैसला आ गया। सभी न्यायाधीशों ने एक मत से निर्णय दिया, ‘‘विवादित भूमि श्री रामलला की है।’’ भव्य मंदिर बनाने का रास्ता खुल गया।
सरकार ने इसके लिए श्री रामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र के नाम से ट्रस्ट का गठन किया। ट्रस्ट ने तेजी से काम शुरू किया। 25 मार्च, 2020 को श्री रामलला और किशोरी जी को तंबू से लाकर एक सुन्दर अस्थायी मंदिर में विराजित किया।
अब 5 अगस्त को प्रधानमंत्री जी की उपस्थिति में मंदिर का निर्माण कार्य शुरू हो जाएगा। सब हिन्दू मिलकर बनाएंगे। विश्व हिन्दू परिषद लगभग 4,00000 गांवों में 10 करोड़ हिन्दू परिवारों के दरवाजे खटखटाएगी। सबकी नेक कमाई से आसमान को छूता यह मंदिर बनेगा। 
यह पुण्य बेला है। कितने पूर्वजों के आशीर्वाद फल रहे हैं। कितनी पुण्य आत्माएं स्वर्ग से इस दृश्य को देखने उपस्थित होंगी। पूज्य देवराहा बाबा, श्री अशोक सिंहल, आचार्य गिरिराज किशोर, संत वामदेव, महंत आदित्यनाथ जी, श्री मोरोपंत पिंगले और कितने सारे ज्ञात और अज्ञात योद्धा, शहीद और अन्य पुण्यात्माएं।
भारत राम का है। राम भारत की अन्तश्चेतना के स्वर हैं। वह मर्यादापुरुषोतम जीवन के हर क्षेत्र में और हर संबंध में हमारे आचरण के मानदंड हैं। 
यह एक और मंदिर बनाने का मात्र काम नहीं है। यह तो सबके हृदय में व्यक्तिश: और सामूहिक रामत्व की स्थापना का महायज्ञ है। हमको विश्वास है कि यह मंदिर    विदेशी आक्रमणकारियों द्वारा किए गए अपमान को हटाकर राष्ट्रीय स्वाभिमान को स्थापित करेगा और मंदिर के निर्माण के साथ ही होगा ऐसा भारत जो अहिल्या, शबरी और निषादराज के यहां मित्रता और प्रेम से जाएगा और ऊंच-नीच के भ्रम दूर कर समरस समाज का निर्माण करेगा। मंदिर के निर्माण के साथ बनेगा ऐसा भारत, जहां वानर-भालू जैसी पिछड़ी समझी जाने वाली जनजातियों को शिक्षा, कौशल और सम्मान के साथ अपनी सर्वोच्च क्षमताओं तक पहुंचने का अवसर मिलेगा। मंदिर के निर्माण के साथ बनेगा ऐसा भारत, जिसमें अहंकार, दमन व अत्याचार की आसुरी शक्तियों का नामोनिशान भी नहीं होगा। मंदिर निर्माण के साथ बनेगा ऐसा भारत, जिसमें परिवार के सदस्यों में परस्पर प्रेम होगा और वह संस्कारशाला के रूप में काम करेंगे। मंदिर निर्माण के साथ बनेगा ऐसा भारत, जिसमें सबको रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा और रोजगार की आश्वस्ति होगी। मंदिर निर्माण के साथ बनेगा ऐसा भारत, जिसमें सब लोग दैवी सम्पदा से संपन्न होंगे और आत्मविश्वस्त, आत्मनिर्भर और उत्कृष्ट भारत विश्व में सुख और शांति स्थापित करने के अपने ईश्वरीय दायित्व को पूर्ण करेगा।
(लेखक विश्व हिन्दू परिषद के कार्याध्यक्ष हैं)
Powered By Sangraha 9.0