मोरोपंत पिंगले : ‘‘हमारे साथ धोखा हुआ’’

    दिनांक 04-अगस्त-2020
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प्रसिद्ध इतिहासविद् और अयोध्या आंदोलन के शिल्पकार रहे स्व. मोरोपंत पिंगले को 14 दिसम्बर, 1992 को गिरफ्तार कर लिया गया था। प्रतिबंध कानून की धारा 13 के तहत उन्हें अधिक समय तक जेल में रखने की योजना थी, लेकिन अंतत: अदालत ने उनकी गिरफ्तारी को अनुचित बताया और उन्हें जमानत दे दी। जमानत पर छूटने के बाद पाञ्चजन्य ने उनसे बातचीत, जिसके प्रमुख अंश 3 जनवरी, 1993 के अंक में प्रकाशित हुए थे। यहां उसी बातचीत को पुन: प्रकाशित किया जा रहा है-

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6 दिसम्बर को अयोध्या में जो कुछ हुआ, उस पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है?
6 दिसम्बर को जर्जर ढांचे को गिराया जाना हमारी योजना का अंग नहीं था। वह गत कई दशकों से उपेक्षित जनता के रोष का परिणाम था। कारसेवा हेतु वहां डेढ़ लाख से अधिक लोग आए थे, यह कैसे उम्मीद की जा सकती है कि वे कुछ करेंगे नहीं। लेकिन यह भी सच है कि जो कुछ भी हुआ, वह हम नहीं चाहते थे। हमारी योजना वह नहीं थी। जो कुछ भी हुआ, उसके लिए प्रधानमंत्री और कांग्रेस सरकार मुख्य रूप से दोषी हैं। 2.77 एकड़ अधिग्रहीत भूमि के बारे में फैसला अगर 11 दिसम्बर को आ सकता है तो वह 6 दिसम्बर के पूर्व क्यों नहीं आ सकता है। अगर फैसला 6 दिसम्बर से पूर्व आ जाता तो संभवत: उस घटना को टाला जा सकता था। सैकड़ों वर्षों से हिन्दू समाज पर अन्याय हो रहा है, वह जारी भी है। 6 दिसम्बर को उसी अन्याय के प्रतिकार की भावना का प्रकटीकरण हुआ। रेडियो से, टीवी से, समाचारपत्रों के माध्यम से प्रधानमंत्री नरसिंह राव अयोध्या विवाद के बारे में गलत प्रचार करते रहे। एक तरफ बातचीत का नाटक रचा, तो दूसरी ओर संतों को अलग-अलग बुलाकर बातचीत करते रहे। उनको हमसे अलग करने की योजना बनाते रहे। मेरा तो कहना है कि इस विवाद के समाधान में वह कभी गंभीर रहे ही नहीं। 6 दिसम्बर से पूर्व त्वरित कार्रवाई बल व अन्य केन्द्रीय सुरक्षा बलों को अयोध्या भेजना भी उत्तेजना का कारण बना।

 प्रधानमंत्री तो कहते हैं कि उनके साथ धोखा हुआ। उनको बताया कुछ गया, किया कुछ गया?
धोखा तो हमारे साथ हुआ। वह धोखा किया प्रधानमंत्री नरसिंह राव ने। उन्होंने कहा था कि न्यायालय का निर्णय 13 अक्तूबर तक आ जाएगा। वह 13 अक्तूबर को नहीं आया। 13 अक्तूबर से 6 दिसम्बर के बीच लगभग दो माह बीत गए। फिर भी फैसला नहीं आया। 40 वर्ष से अधिक समय से मुकदमा न्यायालय में पड़ा है। उस पर कोई निर्णय ही नहीं आ रहा है। मामले के प्रति यह अगंभीरता नहीं तो और क्या है?
मेरा तो यहां तक कहना है कि सरकार को मालूम था कि 6 दिसम्बर को वहां कारसेवा होनी है। कारसेवा का फैसला 2.77 एकड़ पर किया गया था।  हमारी अपेक्षा थी कि 6 दिसम्बर से पूर्व निर्णय आ जाएगा। आखिर शिलान्यास (9-10 नवम्बर, 1989) की अनुमति कैसे दी गई थी? 7 नवम्बर, 1989 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ ने कहा था कि शिलान्यास स्थल विवादित है, बाद में 8 नवम्बर को कैसे निर्णय दिया कि वह स्थल अविवादित है?
बूटा सिंह ने कहा कि शिलान्यास स्थल अविवादित है। उस समय शांतिपूर्ण ढंग से शिलान्यास हो गया। ढांचा सुरक्षित रहा। जुलाई, 92 में 2.77 एकड़ पर कारसेवा हुई। शांतिपूर्ण ढंग से हुई। ढांचा सुरक्षित रहा। इसका मतलब हमारी मंशा साफ थी। हम ढांचे को छेड़ना नहीं चाहते थे। 6 दिसम्बर को भी हमारी ढांचे को छेड़ने की योजना नहीं थी। रा.स्व.संघ, विश्व हिन्दू परिषद् आदि संगठनों के नेताओं ने कारसेवकों को मना भी किया था। अगर शिलान्यास के दिवस के एक दिन पूर्व न्यायालय कह सकता है कि शिलान्यास स्थल अविवादित है तो 4 नवम्बर को हुआ निर्णय 11 दिसम्बर तक के लिए सुरक्षित क्यों रखा गया? इसका मतलब साफ है। सरकार चाहती ही नहीं थी कि अयोध्या में किसी भी तरह की कारसेवा हो।

 लेकिन आरोप तो यह लग रहा है कि वहां निर्माण नहीं, विध्वंस हुआ?
वह भी एक प्रकार की कारसेवा है। कारसेवक तो उसे कारसेवा ही मान रहे हैं।

एक केन्द्रीय मंत्री ने कहा कि गुजरात में सरखेज नामक स्थान पर ढांचे को तोड़ने का पूर्वाभ्यास कराया गया था और यह भी कि वीडियो फिल्मों से भी साबित होता है कि ढांचे का ध्वंस पूर्व नियोजित था?
इस आरोप में कोई सच्चाई नहीं है। बिल्कुल निराधार आरोप है। जिस सरखेज नामक स्थान की चर्चा की जा रही है, वहां 4 वर्ष पूर्व विश्व हिन्दू परिषद् का साधारण अभ्यास वर्ग हुआ था। अगर सरकार के पास इसके प्रमाण हैं तो वह मुकदमा क्यों नहीं दायर करती है। वह जो वीडियो दिखाकर भ्रम फैलाने की कोशिश कर रही है, टीवी पर कुछ खास लोगों को बुलाकर बहस करा रही है, हमें भी तो अवसर दे। हमारे पास भी वीडियो है। सरकार एक सेमिनार आयोजित करे, वहां सभी उपलब्ध वीडियो रिकार्डिंग दिखाई जाएं, सच्चाई सामने आ जाएगी। सरकार के पास विभिन्न तरह की खुफिया एजेंसियां हैं,उनसे मामले की जांच करवाए।


सैकड़ों वर्षों से हिन्दू समाज पर अन्याय हो रहा है, वह जारी भी है। 6 दिसम्बर को उसी अन्याय के प्रतिकार की भावना का प्रकटीकरण हुआ। रेडियो से, टीवी से, समाचारपत्रों के माध्यम से प्रधानमंत्री नरसिंह राव अयोध्या विवाद के बारे में गलत प्रचार करते रहे। एक तरफ बातचीत का नाटक रचा, तो दूसरी ओर संतों को अलग-अलग बुलाकर बातचीत करते रहे। उनको हमसे अलग करने की योजना बनाते रहे।

6 दिसम्बर की घटना के बाद जिस तरह रा.स्व.संघ, विश्व हिन्दू परिषद् व बजरंग दल पर प्रतिबंध लगा। भाजपा व विश्व हिन्दू परिषद् के शीर्ष नेताओं को गिरफ्तार किया गया और भाजपा की राज्य सरकारों को बर्खास्त किया गया। सरकार और भी कदम उठा सकती है। इस पूरे परिप्रेक्ष्य में आपका क्या कहना है?

यह सरासर अन्याय है। हम इसका प्रतिकार करेंगे। राजनीतिक लाभ को ध्यान में रखकर सरकार सभी कदम उठा रही है। न्याय, सत्य, इतिहास सभी को नजरअंदाज किया जा रहा है। सरकार सिर्फ आपातकाल का नाम नहीं ले रही है, सभी काम आपातकाल की तरह किए जा रहे हैं। लोकतंत्र व संविधान का बहाना लेकर सभी कदम उठाए जा रहे हैं। सब कुछ गैरकानूनी है। जबलपुर न्यायालय ने, इंदौर न्यायालय ने प्रतिबंध को गलत माना। मेरी गिरफ्तारी हुई। गलत धारा लगाई गई। न्यायिक हिरासत की तारीख बढ़ाई गई। अंतत: न्यायालय ने मुझे जमानत पर रिहा कर दिया। हम लंबी लड़ाई लड़ने के लिए तैयार हैं।
लोकतंत्र में जितने कानूनी तरीके हैं, सब तरह से लड़ेंगे। सभी नियमों का पालन करते हुए कानून के ही माध्यम से रास्ता निकालेंगे। इससे पूर्व भी हम पर प्रतिबंध लगे हैं। हमने उन प्रतिबंधों का प्रतिकार किया। पहले पत्र लिखा कि वह अन्याय है, इसे वापस लो। न्यायालय में गए। मुकदमे चले। न्यायालय ने कहा कि प्रतिबंध गलत है। संघ का दोष नहीं है, फिर भी सरकार नहीं मानी तो सत्याग्रह किया। लेकिन हमने मकान नहीं जलाए। सत्याग्रह करना हम हिन्दुओं की विशेषता है। हमारा अधिकार है। गांधी जी ने सत्याग्रह किया था, उसमें भी गड़बड़ हुई थी, लेकिन हमारे सत्याग्रह में ऐसी कोई घटना नहीं हुई। वैसी ही लड़ाई हम पुन: लड़ेंगे।

6 दिसम्बर की घटना के बाद हुए दंगों के बारे में कुछ कहेंगे?

अब यह छिपी बात नहीं रह गई कि दंगे कांग्रेसियों ने करवाए। दंगों का कारण सरकार की गलत नीति है। दंगे मुसलमानों व कांग्रेसियों द्वारा प्रायोजित थे। कांग्रेसी नेताओं ने अपने आदमी भेजकर दंगे करवाए। आप समझ लीजिए कि ये वहीं राहत राशि बांट रहे हैं जहां मुसलमानों को नुकसान हुआ है। जहां हिन्दू मरे हैं, वहां कोई नहीं जा रहा है।

अब सरकार अयोध्या में मस्जिद बनाने की बात कर रही है?
मंदिर या मस्जिद बनवाना सरकार का काम नहीं है। अब वह संपूर्ण राम जन्मभूमि को हिन्दुओं को सौंप दे। मंदिर निर्माण की सभी बाधाओं को दूर करे। समाज राम मंदिर का निर्माण करेगा। न्यायालय वगैरह बीच में न आएं। इस समस्या का समाधान जितनी देर से होगा, परेशानी उतनी ही बढ़ेगी।
सरकार के अनुसार उसकी सभी परेशानियों का एक ही हल है, वह यह कि सभी हिन्दू मुसलमान हो जाएं। और सभी मंदिरों को गिराकर मस्जिद बना दी जाएं। जब सभी मुसलमान हो जाएंगे तो कोई झगड़ा ही नहीं होगा। सरकार ऐसा करके देखे तो।