प्रो. राजेन्द्र सिंह : ‘‘हर राम विरोधी को सत्ता से हटना पड़ा है’’

    दिनांक 04-अगस्त-2020
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अयोध्या में 6 दिसम्बर, 1992 को बाबरी ढांचा टूटा। इसके बाद 10 दिसम्बर को रा.स्व.संघ, विश्व हिन्दू परिषद् और बजरंग दल पर केंद्र सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया। इस प्रतिबंध और उस समय की परिस्थितियों पर 11 दिसम्बर, 1992 को दिल्ली स्थित संघ कार्यालय ‘केशव कुंज’ में संघ के तत्कालीन सह-सरकार्यवाह श्री रज्जू भैया से पाञ्चजन्य ने बातचीत की। उनका यह साक्षात्कार पाञ्चजन्य (20 दिसम्बर, 1992) में प्रकाशित हुआ था। उसी को पुन: यहां प्रकाशित किया जा रहा है-

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विश्व हिन्दू परिषद्, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तथा बजरंग दल के साथ-साथ दो मुस्लिम संगठनों पर भी प्रतिबंध लगा है। इसके बारे में आपकी क्या टिप्पणी है?
यह बहुत ही घबराहट में की गई कार्रवाई है, यह कोई सोच-समझ कर बुद्धिमानी से लिया गया निर्णय नहीं है। मुसलमानों के दोनों संगठन तो बहुत छोटे संगठन हैं, एक केरल में तो दूसरा कश्मीर में सीमित है। परंतु विश्व हिन्दू परिषद् और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पूरे देश में फैले हुए जबरदस्त संगठन हैं, जिनकी अनेक गतिविधियों से समाज बहुत प्रभावित है। अयोध्या में जो घटना हुई उसमें इन संगठनों का कितना हाथ है, उससे कितना संबंध है यह जाने बिना इन पर प्रतिबंध लगाना बहुत बड़ी अन्याय की बात है।

क्या इसका प्रतिकार करने के लिए आप सत्याग्रह भी कर सकते हैं?
प्रारंभ में तो हम लोग कुछ संवैधानिक तरीकों जैसे न्यायालय से, समाचारपत्रों से जुलूस और पर्चे छपवाकर इसका विरोध करेंगे। परंतु आवश्यकता पड़ने पर हम उस स्थिति पर भी जा सकते हैं कि हम सत्य के लिए आग्रह करें कि रा.स्व.संघ पर प्रतिबंध नहीं लगना चाहिए।

ऐसा क्यों हुआ कि आजादी के बाद अब तीसरी बार रा.स्व.संघ पर प्रतिबंध की घोषणा सरकार ने की? और तीनों बार ऐसा कांग्रेस शासन में ही हुआ?
मुझे लगता है कि पहले दो बार तो संघ की बढ़ती लोकप्रियता और संघ ने समाज में जो कार्य किया उससे हिन्दू समाज में उसके बढ़ते हुए असर से घबराकर प्रतिबंध लगाया होगा और इस बार ये जानते हुए कि अब संघ का असर और प्रभाव क्षेत्र बहुत बड़ा हो गया है। गलती से वामपंथी दलों और वीपी सिंह आदि के दबाव में आकर प्रतिबंध घोषित किया है, परंतु बहुत बड़ी भूल है यह।

संघ और विश्व हिन्दू परिषद पर दंगे भड़काने का जो आरोप लगाया जा रहा है, उसके बारे में आप क्या कहेंगे?
असल में आरोप तो सरकार पर लगाया जाना चाहिए। वह कोई ‘मस्जिद’ नहीं थी, वह तो एक बड़ा जर्जर ढांचा था। जो वास्तव में विश्व हिन्दू परिषद को और राम जन्मभूमि न्यास को देने की चर्चा चल रही थी। उसको ‘मस्जिद’ कहने और उसके बारे में उनके द्वारा इस प्रकार के उद्गार निकलने के कारण दंगे भड़के हैं। प्रधानमंत्री ने जो बातें कही हैं, वे अनुचित हैं और उससे देश की इज्जत को उन्होंने क्षति पहुंचाई है।
जिसने भी राम का विरोध किया उसे जाना पड़ा है, यह श्री नरसिंह राव समझ लें।
यह ढांचा कोई ऐसा नहीं था, कि उसमें नमाज पढ़ी जाती रही हो। जहां लोगों को ठीक ढंग से समझाने की आवश्यकता थी, वहां उन्हें भड़काया गया। कश्मीर में 55 मंदिर टूटे, कितने लोगों ने कितनी बार कहा कि हम यहां पर पुन: मंदिर बनवाएंगे? और इस घटना के बाद उन्होंने तुरंत कह दिया कि वहां फिर से ‘मस्जिद’ बनवाई जाएगी। हिन्दू संगठनों के बड़े-बड़े नेताओं को बंद कर दिया, उन पर प्रतिबंध लगाने की बात की। इन सब बातों से दंगे भड़के हैं, और भड़केंगे। ये दंगे तभी रुक सकते हैं जब सरकार सारी घटना को सही तरीके से जनता के समक्ष रखे।



कश्मीर में 55 मंदिर टूटे, कितने लोगों ने कितनी बार कहा कि हम यहां पर पुन: मंदिर बनवाएंगे? और इस घटना के बाद उन्होंने तुरंत कह दिया कि वहां फिर से ‘मस्जिद’ बनवाई जाएगी। हिन्दू संगठनों के बड़े-बड़े नेताओं को बंद कर दिया, उन पर प्रतिबंध लगाने की बात की। इन सब बातों से दंगे भड़के हैं, और भड़केंगे।


यदि इस स्थिति में सरकार भाजपा और अन्य हिन्दू संगठनों के नेताओं को विश्वास में लेकर कार्य करती तो दंगों पर जल्दी काबू पाया जा सकता था?
निश्चित रूप से सरकार को अधिक सुविधा रहती, क्योंकि आज की यह विस्फोटक स्थिति सरकार और सत्ताधारी दल के कुछ नेताओं के गलत आचरण के कारण ही पैदा हुई है। अत: यदि सरकार समझदारी से काम लेती तो हम भी पूरी ताकत से शांति स्थापित करने में उसकी मदद करते। परंतु सरकार ने तो हम पर ही आरोप लगाने शुरू कर दिए। ऐसे में हम उसकी कैसे और क्या सहायता कर सकते हैं?

जैसा आपने कहा कि वह जर्जर ढांचा गत 43 वर्ष से मंदिर के रूप में ही प्रयुक्त हो रहा था और उसे क्रुद्ध कारसेवकों ने तोड़ दिया तो क्या ऐसे जर्जर ढांचे के ऊपर इतनी हिंसक प्रतिक्रिया होना न्यायोचित है?
यह प्रतिक्रिया तो इसलिए हुई, क्योंकि कुछ राजनीतिक लोगों ने इस घटना को बेहद तूल दिया। जैसे किसी ने कहा दिया कि यह गांधी जी की हत्या के बाद दूसरी सबसे बड़ी शर्मनाक साम्प्रदायिक घटना है। विडम्बना है कि इन नेताओं को कश्मीर में तोड़े गए सैकड़ों मंदिर एवं हजारों हिन्दुओं की हत्याएं, बांग्लादेश से लाखों हिन्दुओं का शरणार्थी बनकर आना और पड़ोसी देशों से करोड़ों की संख्या में मुस्लिम घुसपैठियों का भारत में आकर बसना कोई विशेष घटना नजर नहीं आता। जबकि एक जर्जर ढांचे की घटना को वे इतना तूल दे रहे हैं। उनका यह व्यवहार ही इस हिंसात्मक प्रतिक्रिया का कारण है।

उक्त घटना सिर्फ समय से पूर्व मंदिर निर्माण की शुरुआत है या कुछ और?
हमारी योजना तो शांतिपूर्वक ढंग से कारसेवा करने की थी। लेकिन दुर्भाग्य से केन्द्र सरकार ने जिस तरीके से समस्या को उलझाया और उ.प्र. सरकार को बर्खास्त करने के तेवर दिखाए एवं उच्च  न्यायालय ने निर्णय लेने में जिस तरह से देरी की, उससे कारसेवक क्रुद्ध हो गए। हां, यह ठीक है कि हमारे मतानुसार इस ढांचे को एक दिन वहां से हटना ही था। परंतु हमारी योजना अभी और इस तरह यह सब करने की नहीं थी। यह थोड़ा जल्दी और एकपक्षीय हो गया।

इस घटना पर देश के सेकुलर प्रचार माध्यम जिस ढंग से शोक मना रहे हैं, उसके पीछे क्या कारण है?
बस और कुछ नहीं, उन लोगों का सोचने का जो एकतरफा ढंग है उसी का यह फल है। हालांकि मैं भी मानता हूं कि यह ठीक नहीं हुआ, इससे विश्वसनीयता घटती है। परंतु यह भी देखना चाहिए कि कारसेवक भी इंसान हैं उन्हें भी गुस्सा आ सकता है। यह कैसे हो सकता है कि एक ओर तो कुछ लोग मंदिर तोड़ते और लोगों को मारते घूमें और दूसरी ओर किसी को गुस्सा भी न आए।

7 दिसम्बर को भाजपा और संघ की ओर से तात्कालिक प्रतिक्रिया स्वरूप जो बयान दिए गए, उनसे ऐसा आभास होता था जैसे आपको बड़ी लज्जा और अपराध बोध हो रहा हो। और जैसे कोई बहुत बड़ी दुखद घटना हो गई हो?
नहीं, ऐसा कुछ नहीं है कि हम लज्जा या अपराध बोध से ग्रस्त हों। ढांचा तो हटना ही था। उसके गिरने का हमें दुख नहीं है। हां, यह अवश्य है कि यह सब हमारी योजना में नहीं था।

 क्या आप यह मानते हैं कि वहीं मंदिर निर्माण करना हिन्दुओं का अधिकार था और वही उन्होंने किया है?
यह तो अकाट्य पुरातात्विक प्रमाणों द्वारा सिद्ध हो चुका है कि वहां मंदिर तोड़कर ही यह ‘मस्जिद’ बनाई गई थी। सो वहां मंदिर निर्माण करना तो हिन्दुओं का जन्मसिद्ध अधिकार ही है। बस इस निर्माण की शुरुआत थोड़ी जल्दी हो गई।