‘राजनीतिक दिशानिर्देश’ पर खबरें गढ़ता मीडिया

    दिनांक 05-अगस्त-2020
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कुछ मीडिया घरानों की फर्जी खबर और रिपोर्ट पर प्रियंका वाड्रा बहुत फुर्ती से ट्वीट करती हैंभातीय मीडिया के
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एक वर्ग विशेष के लिए बीता सप्ताह बहुत कठिन रहा। राम मंदिर को लेकर अकुलाहट तो है ही, राफेल और नई शिक्षा नीति को लेकर भी कुलबुलाहट मची रही। खुद को सेकुलर बताने वाले सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से लेकर रक्षा और शिक्षा तक की नीतियों में हिंदू-मुसलमान का कोण तलाश रहे हैं। मीडिया का यह रवैया कई तरह की समस्याएं पैदा करता है। कोई झूठी या मनगढ़त खबर अचानक सुर्खियों में छा जाती है और कोई वास्तविक मुद्दा कभी उभर भी नहीं पाता। कारण, अधिकतर चैनल और अखबार पहले देखते हैं कि घटना जिस राज्य में हुई है, वहां सरकार किसकी है। बंगाल में भाजपा और संघ के लोगों की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत का समाचार स्थानीय और राष्ट्रीय मीडिया में ‘सेंसर’ हो जाता है, लेकिन लखनऊ में सरकारी भवन के बाहर दो महिलाओं का प्रायोजित आत्मदाह बड़ी खबर बन जाती है। 

उत्तर प्रदेश को लेकर मीडिया का एक बड़ा वर्ग कुछ समय से ‘राजनीतिक दिशानिर्देश’ के अंतर्गत काम करता दिख रहा है। उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में सरकार की आलोचना के लिए वास्तविक मुद्दों की कमी नहीं होती। लेकिन मीडिया का जोर उन सनसनीखेज बातों पर है, जिनसे नकारात्मकता पैदा की जा सके। चूंकि ऐसे मुद्दे हैं नहीं, इसलिए कुछ चैनल और अखबार इन्हें गढ़ने में लगे हैं। कानपुर के महिला आश्रय केंद्र में यौन शोषण का झूठ नवभारत टाइम्स ने फैलाया। आजतक-इंडिया टुडे समूह ने चित्रकूट में खदानों में काम करने वाली लड़कियों के यौन शोषण की फर्जी रिपोर्ट दिखाई। इन सभी पर प्रियंका वाड्रा फुर्ती से ट्वीट करती हैं। फिर चैनल उसे ब्रेकिंग न्यूज बताकर दिखाते हैं। वाराणसी में नेपाल के कथित नागरिक के मुंडन की खबर स्थानीय नेताओं और मीडिया की साठगांठ का मामला ही निकला। एक साथ लगभग सभी ने इसे प्रमुखता के साथ चलाया। लेकिन यह जानने का प्रयास नहीं किया कि कथित पीड़ित नेपाली व्यक्ति आखिर कहां है।

देखते-देखते यह अपुष्ट समाचार दुनियाभर के समाचार माध्यमों पर छा गया। समझना मुश्किल नहीं कि इसका प्रयोग भारत की छवि खराब करना था। मीडिया में आए दिन मचने वाले ऐसे हंगामों के बीच छत्तीसगढ़, राजस्थान जैसे राज्य भी हैं। वहां कितनी भी बड़ी घटना क्यों न हो जाए, दिल्ली तक नहीं पहुंचती। बीते सप्ताह छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री आवास के सामने धमतरी के एक बेरोजगार युवक आत्मदाह कर लिया। उसकी मौत भी हो गई। लेकिन कुछ स्थानीय समाचारपत्रों को छोड़ दिल्ली की कथित राष्ट्रीय मीडिया ने इस पर ध्यान तक नहीं दिया। इसी स्तंभ में हमने बताया था कि कैसे राजस्थान में कमजोर वर्गों की महिलाओं और बच्चियों से बलात्कार की घटनाएं बढ़ी हैं। लेकिन ऐसे समाचारों को राष्ट्रीय मीडिया तूल नहीं देता, क्योंकि राजस्थान में मनमुताबिक सरकार है। उधर, प्रधानमंत्री की हत्या की साजिश में जेल में बंद नक्सली वरवरा राव के कोरोना संक्रमित होने का समाचार आते ही मीडिया में बैठे नक्सलियों का दिल भारी होने लगा।अधिकतर ने उसे ‘आरोपी’ या ‘नक्सली’ के बजाय ‘सामाजिक कार्यकर्ता’ बताया। यह मीडिया का वास्तविक चरित्र भी बताता है। जो अपराधियों, आतंकवादियों और नक्सलियों के प्रति समय-समय पर अपनी सहानुभूति दिखाता है। आजतक की वेबसाइट पर प्रकाशित लेख में उसे ‘विद्रोही कवि’ कहा गया। लेख में इस नक्सली की तारीफों के पुल बांधे गए और उसके बारे में ऐसे बताया गया मानो वह कोई बड़ा स्वतंत्रता सेनानी हो।

मीडिया हो या फिल्म जगत, यह समस्या दोनों के साथ है। अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या को लेकर जो तथ्य सामने आ रहे हैं, वह भी यही इशारा कर रहे हैं। ध्यान से देखें तो पता चलता है कि वह कौन से समाचार संस्थान हैं, जिन्होंने अपराधियों को बचाने की कोशिश की। यह मामला सीधे तौर पर फिल्म उद्योग के उन तत्वों से जुड़ा है, जिनका चरित्र ही भारत विरोधी है।

रिपब्लिक टीवी ने जोरशोर से यह मुद्दा उठाया। अभिनेत्री कंगना रनौत से साक्षात्कार में कई ऐसी बातें सामने आईं, जिनकी जांच होनी चाहिए। देश को पहली बार पता चल रहा है कि जिन कथित नायकों मीडिया के जरिये बड़ा बनाया जाता रहा है, वे वास्तव में कितने बौने हैं। इसमें बड़े फिल्मकार ही नहीं, फिल्म आलोचक के भेष में घूम रहे लोग भी हैं। सोशल मीडिया की कृपा से इन मुद्दों पर सार्वजनिक चर्चा हो रही है और लोग भी अपनी राय बना रहे हैं। आने वाले समय में इसका प्रभाव अवश्य ही देखने को मिलेगा।