कोरोना ने जगाई जनचेतना!

    दिनांक 01-सितंबर-2020
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पूनम नेगी
एक छोटे से अदृश्य विषाणु ने जिंदगी के प्रति लोगों का नजरिया पूरी तरह बदल दिया है। विपदा का यह दौर हर खासोआम को सावधानी व जागरूकता का अनूठा पाठ पढ़ा रहा है। प्रकृति से सामंजस्य बनाकर जीने की प्रेरणा दे रहा है
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कोरोना की सीख है कि मनुष्य प्रकृति का सम्मान करे

एक ओर जहां इन दिनों एक छोटे से विषाणु से फैले संक्रमण ने समूचे विश्व के चिकित्सा विज्ञानियों की नींद हराम कर रखी है; वहीं दूसरी ओर भविष्य की दुनिया को लेकर एक नई सोच इंसान के मन-मष्तिस्क में आकार लेने लगी है। वैश्विक आपदा के इस संकटकाल ने लोगों को पारिवारिक सामंजस्य व अनावश्यक खर्चों पर रोक लगाना सिखाया है। योग, आयुर्वेद व शाकाहार पर हुई शोधों के चमत्कारी नतीजों ने सहज ही लोगों का रुझान इस ओर बढ़ाया है। वायु प्रदूषण व शारीरिक सक्रियता के प्रति जगी चेतना ने लोगों को साईकिल चलाने को प्रेरित किया है। आॅनलाइन खरीदारी के नाम पर महिलाओं की तमाम अनाप-शनाप व फालतू खर्च करने की आदत पर अंकुश लगा है। वे अपनी दादी-नानी की इस नसीहत को अमल में ला रही हैं कि जब तक किसी भी चीज का इस्तेमाल हो सकता है, उसे फेंका न जाए।

घरेलू महिलाएं इन दिनों बचत को लेकर भी जागरूक हुई हैं। पुरुषों के मन में गृहणियों के काम को कमतर समझने की मानसिकता बदली है और कामगारों व सफाई-कर्मियों के प्रति लोगों में संवेदना बढ़ी है। एक ओर महानगरों के यांत्रिक जीवन की आपाधापी से आजिज मनुष्य फिर परिवार के साथ एकजुट हुए हैं, तो दूसरी ओर महामारी के डर से शहरों में विस्थापित आबादी अनायास ही अपने घरों की ओर लौट रही है; जबकि कुछ समय पहले तक बढ़ता विस्थापन देश की एक बड़ी समस्या थी। बीते दिनों के बंदी काल में शुद्ध हुए पर्यावरण ने मानव जाति को यह अनूठा संदेश दिया है कि यदि वह प्रकृति को प्रदूषित व उसके अनावश्यक दोहन के कुकृत्य बंद कर दे तो धरती माता अपना प्यार-दुलार उस पर फिर लुटा सकती है। इन तमाम बदलावों को सकारात्मक रूप में देखा जाना चाहिए। 

यह समय अंधेरे में हाथ थामने का है। सहारा देने का है। एक-दूसरे को धीरज बंधाने का, अडिग रहने, साथ चलने और यह गुनगुनाने का है- जीत जाएंगे हम तू अगर संग है...। मन जब ऊपर वाले से जुड़ता है तो नई ऊर्जा मिलती है।
-सुभाष घई, जाने-माने फिल्मकार

अब हमें विकास के नए मापदंड अपनाने होंगे, ताकि कोरोना के बाद नई दुनिया का विकास पर्यावरण संरक्षण के साथ हो और वन्य प्राणियों पर विशेष ध्यान दिया जा सके। खाद्य सुरक्षा के अंतर्गत आने वाले पशु-पक्षियों में संक्रमण न फैले, इसके लिए उनके रखरखाव संबंधी नए कानून बनाने होंगे।
-डॉ. सुरजीत सिंह,  सहायक अध्यापक, बीएसएम पीजी कॉलेज, रुड़की

गौरतलब हो कि इस महामारी के दौरान मनुष्य को चिकित्सा विज्ञान व उन्नत प्रौद्योगिकी की असहायता का भी बोध हुआ है। लोगों को यह अहसास होने लगा है कि केवल अत्याधुनिक विज्ञान के बल पर ऐसी महामारियों पर विजय मुश्किल है। इन संकटकालीन परिस्थितियों में देशवासियों को यह अहसास होने लगा है कि हमारी भारतभूमि के सनातन जीवन-मूल्यों का अनुपालन ही हमें इस आपदा से मुक्ति दिला सकता है। ‘भा’ यानी प्रकाश व ‘रत’ माने अन्तर्लीन। दुनिया के तमाम अन्य देशों की तरह हमारा भारत महज एक निर्जीव भूखंड नहीं है। आध्यात्मिकता इस राष्ट्र का प्राणतत्व है। गौरवशाली अतीत वाले इस राष्ट्र की प्रकाशमान प्राणऊर्जा युगों-युगों से समूचे विश्व ब्रह्माण्ड का सशक्त मार्गदर्शन करती आई है। हमारी ऋषि मनीषा द्वारा रोपे गए सनातन संस्कार व दिव्य जीवन-मूल्य वर्तमान संकट की इस भयावह बेला में भी न सिर्फ हमारा अपितु समूची जगती का रक्षण व मार्गदर्शन करने में पूर्ण सक्षम हैं। यही वजह है कि इन दिनों देश-दुनिया के बुद्धिजीवियों का ही नहीं, आम जन का ध्यान भी भारतीय परम्पराओं की ओर तेजी से आकृष्ट हो रहा है।

 सनद रहे कि हमारे ऋषियों ने युगों पूर्व स्वच्छता, प्रणाम, योग, आयुर्वेद, शाकाहार व सृष्टि के पंचतत्वों के पूजन की परम्पराएं डाल कर स्वास्थ्य व प्रकृति के संरक्षण की जो महत्ता हर खासोआम को बताई थी; उनकी अहमियत आज के इस विषम समय में कहीं कई गुना अधिक बढ़ गई है। यही वजह है कि कोरोना के फैलाव को रोकने के लिए हाथ मिलाने व गले मिलने के स्थान पर प्रणाम की भारतीय परम्परा जो हमारी ऋषि संस्कृति का महत्वपूर्ण अंग है; का अनुसरण इन दिनों व्यापक रूप में समूची दुनिया में हो रहा है। इसी तरह भारतीय संस्कृति की आहार व योग परम्परा भी इन दिनों लोकप्रिय हो रही है। कोरोना वायरस ने लाखों लोगों को स्वास्थ्य के प्रति काफी जागरूक कर दिया है। लोगों की खाने-पीने की आदतों में भारी बदलाव आया है। ज्यादातर लोगों ने मांसाहार त्याग दिया है। अब लोग मांस, मछली व अण्डों के स्थान पर फल और सब्जियां ज्यादा ले रहे हैं। रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाले भोजन में भी लोगों की रुचि बढ़ रही है। साथ ही योग व आयुर्वेद की ओर भी लोगों का रुझान काफी बढ़ रहा है। योग गुरु स्वामी रामदेव का कहना है कि योग व प्राणायाम कोरोना वायरस से बचने का रामबाण उपाय है। अनुलोम-विलोम, कपालभाति, भ्रस्त्रिका, भ्रामरी और सूर्य नमस्कार का नियमित अभ्यास व्यक्ति की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बहुत मजबूत कर देता है।

जल पुरुष के नाम से विख्यात सुप्रसिद्ध पर्यावरण विज्ञानी राजेंद्र सिंह के अनुसार हिन्दू संस्कृति की मान्यता है कि ‘योगी’ रोगी नहीं होता। हमारे यहां योगी का अर्थ है पंचमहाभूतों (भूमि, गगन, वायु, अग्नि व नीर) से निर्मित मानव शरीर का पूर्ण सम्मान करके जीने वाला। प्रकृति से शरीर की जरूरत पूरा करने जितना ही लेना ताकि मानवीय शरीर का संतुलन बना रहे और प्रकृति में भी बिगाड़ न हो। मगर जब इंसानी लालच पंचमहाभूतों के योग पर अतिक्रमण करने लगता है तो प्रकृति का शोषण शुरू हो जाता है। हमारा लोभ हमें योगी से भोगी  और फिर भोगी से रोगी बना देता है। कोरोना इसी प्रक्रिया की उपज है। आज का आयुर्वेद केवल भारतीय चिकित्सा पद्धति बन गया है, जबकि भारतीय वैदिक चिंतन में पंचमहाभूतों के योग से समस्त जड़ चेतन के आरोग्य रक्षण की शिक्षा को आयुर्वेद का मूल तत्व माना गया है। समझना होगा कि भारत में उन्हीं को भगवान ( भ-भूमि, ग-गगन, व-वायु, अ-अग्नि, न- नीर ) कहा गया, जिन्होंने स्वयं की शक्ति से इन पंचमहाभूतों की रक्षा कर प्रकृति को उत्पादक बनाया, जैसे राम। राम और रावण भारतीय संस्कृति में दो विपरीत मानवीय नायक हैं।

एक ओर राम संस्कृति व प्रकृति के संरक्षण में अपना समूचा जीवन लगाते हैं, तो दूसरी ओर रावण सदैव प्रकृति (सीता) पर अतिक्रमण करने में जुटा रहता है। जहां राम प्रकृति से समता, सादगी का व्यवहार करके प्राकृतिक योग का नेतृत्व करते हैं, वहीं रावण अपने जीवन में अतिक्रमण, शोषण और प्रकृति के विनाश का। आज ऐसी ही लड़ाई पूरी दुनिया में हो रही है। एक समय था जब हम भारतवासी हमारे शरीर में पैदा होने वाले विषाणुओं को हमारी भोजन व्यवस्था एवं वनौषधियों से उपचार करके सहज ही आरोग्य प्राप्त कर लेते थे। मगर आज प्राकृतिक विविधता- प्रभावित होने से उन औषधियों की गुणवत्ता बौनी हो रही है, क्योंकि मानवीय लालच बड़ा बन गया है। इसने हमारे समाज को बीमार बना दिया है। आजादी के बाद से देश में अतिक्रमण, प्रदूषण और शोषण सिखाने वाली आधुनिक शिक्षा को बढ़ावा दिए जाने का नतीजा आज हमारे सामने है।

भारतीय जीवन-मूल्यों से कटी आधुनिक शिक्षा, हमारे स्वास्थ्य और जीवन के लिए दिन-प्रतिदिन संकट, आपदा और महामारी पैदा करने वाली बन रही है। हमने प्रकृति पर कब्जा करके, पहले उसका शोषण किया, परिणामस्वरूप हमारी धरती, नदियां व संपूर्ण प्रकृति में प्रदूषण बढ़ गया। इस बढ़े हुए प्रदूषण ने हमारे आचार-विहार में चमगादड़, कॉकरोच, मछली, मूली, गाजर, पालक इन सबके भेद मिटा दिए।  हमारे खान-पान में भी चुनाव करने का व्यवहार और संस्कार मिट गया। जिससे, जिसको जो मिल जाए, उसे खाने का आदी हो गया। परिणामस्वरूप देखते-देखते प्रकृति चक्र विखंडित होता चला गया। इससे सबसे ज्यादा बिगाड़ जलवायु परिवर्तन में आया। इस असंतुलन के कारण कोरोना वायरस को नष्ट करने वाली जैव विविधता नहीं बची।

 
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अब दुनिया ‘नमस्ते’ करने लगी है

वैश्विक आपदा के इस संकटकाल ने लोगों को पारिवारिक सामंजस्य व अनावश्यक खर्चों पर रोक लगाना सिखाया है। योग, आयुर्वेद व शाकाहार पर हुई शोधों के चमत्कारी नतीजों ने सहज ही लोगों का रुझान इस ओर बढ़ाया है। वायु प्रदूषण व शारीरिक सक्रियता के प्रति जगी चेतना ने लोगों को साईकिल चलाने को प्रेरित किया है।

दरअसल, कोरोना वायरस के संकट ने मनुष्य को उसके विकास के पुनर्मूल्यांकन के दोराहे पर खड़ा कर दिया है। इस विषय पर बीएसएम पीजी कॉलेज, रुड़की के सहयक अध्यापक डॉ. सुरजीत सिंह कहते हैं, ‘‘अब हमें विकास के नए मापदंड अपनाने होंगे, ताकि कोरोना के बाद नई दुनिया का विकास पर्यावरण संरक्षण के साथ हो और वन्य प्राणियों पर विशेष ध्यान दिया जा सके। खाद्य सुरक्षा के अंतर्गत आने वाले पशु-पक्षियों में संक्रमण न फैले, इसके लिए उनके रखरखाव संबंधी नए कानून बनाने होंगे व जो कानून मौजूद हैं उनका कड़ाई से पालन हो जिससे ऐसी महामारियों को रोका जा सके। हमें अपनी आहार शैली बदलने की सख्त जरूरत है। मनमाने मांसाहार के बुरे नतीजे सबके सामने हैं।’’

 इससे एक बात साफ होती है कि परिस्थितिकी के एक हिस्से में छोटी-सी हलचल दूसरे हिस्सों में तबाही ला सकती है। हम विकास के नाम पर पृथ्वी को बर्बाद करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं, फिर बात चाहे पर्यावरण की हो, प्राकृतिक संसाधनों की हो या फिर जैव विविधता की। हमारी लालच भरी कारगुजारियों का ही यह नतीजा है कि धरती पर मौजूद तमाम जीवों के विलुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है। कई तो विलुप्त भी हो चुके हैं। हमें यह तय करना होगा कि हम क्या खा सकते हैं और क्या नहीं? समझना होगा कि मानव का वजूद प्रकृति से है न कि मानव से प्रकृति का। इस सचाई को जब तक मनुष्य स्वीकार नहीं करेगा, उसकी जीवनशैली में बदलाव भी नहीं होगा। इसके लिए मनुष्य को अधिक संवेदनशील होना होगा और वैश्विक समाज को एकजुट होकर काम करना होगा। साथ ही प्रकृति को अपने एक अंग के रूप में स्वीकार करना होगा।

वाकई चेतने का वक्त है यह। हमें भ्रमित करने वाली शिक्षा के स्थान पर भारतीय ज्ञानतंत्र का सम्मान करके अपनी जैवविविधता की रक्षा करनी होगी, ताकि हमारी जीवन-पद्धति में प्रकृति की शिक्षा का सम्मान सुनिश्चित हो। जब यह सम्मान  सुनिश्चित होगा, तभी प्रकृति का संतुलन बनेगा और कोरोना जैसी आपदाओं का प्रकोप थमेगा। 
 
  हालांकि आध्यात्मिकता से उपजा आत्मविश्वास हम भारतवसियों की शक्ति का मूल स्रोत है। यह शक्ति युगों-युगों से हम भारतीयों के रक्त में प्रवाहित होकर हमें सदैव संकटों से उबारती रही है। हमारी ऋषि मनीषा के दिव्य उद्बोधन, प्रार्थनाएं व उपदेश और उपनिषदों के प्रेरक प्रसंग ऐसे झंझावातों से जूझने को हमें उत्प्रेरित करते हैं। इसी कारण हम भारतीय ऐसे आघातों से नहीं घबराते। पहले भी देश में कई महामारियां आई थीं। 18वीं शताब्दी में प्लेग, 19वीं शताब्दी में हैजा, 20वीं शताब्दी में स्पेनिश फ्लू जैसी महामारियों में लाखों लोग काल के ग्रास बने थे। अब समय आ गया है कि हम प्रकृति माता के कोप के कारणों को समझें व उन्हें शांत प्रसन्न रखें।

 इस बाबत जाने-माने फिल्मकार सुभाष घई बहुत प्रेरक बात कहते हैं, ‘‘यह समय अंधेरे में हाथ थामने का है। सहारा देने का है। एक-दूसरे को धीरज बंधाने का, अडिग रहने, साथ चलने और यह गुनगुनाने का है- जीत जाएंगे हम तू अगर संग है...। मन जब ऊपर वाले से जुड़ता है तो नई ऊर्जा मिलती है।’’ इसी तरह मशहूर कार्टूनिस्ट आबिद सुरती के मुताबिक, ‘‘कोरोना के इस संकट काल ने मानव जाति को ऊपर वाले से जुड़ने का अनोखा सुअवसर दिया है। वे रोज सुबह एक घंटा ध्यान लगाते हैं। इसलिए मायूसी उन्हें छू भी नहीं सकती।’’

  सार रूप में कहें तो संकट का यह दौर दूरगामी परिवर्तनों का संदेश दे रहा है। हमें ईश्वर का शुक्रगुजार होना चाहिए कि उसने हमें एक ऐसे देश में जन्म दिया जिसकी परम्पराओं, संस्कारों व मूल्य मान्यताओं में ‘राष्ट्र उत्थान’ के साथ ही ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का उदात्त विचार निहित है।