दवा के दावे और मुनाफे के इरादे

    दिनांक 01-सितंबर-2020
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डॉ. राजेन्द्र ऐरन

दुनिया में वैज्ञानिकों के 170 से ज्यादा समूह चायनीज वायरस के इलाज की वैक्सीन पर अलग-अलग चरणों में जांच कर रहे हैं। भारत की भी कंपनियां कई चरणों की सफल जांच कर चुकी हैं और एक उम्मीद जगा रही हैं। ऐसे में कुछ बड़ी फार्मा कंपनियां संकट के इस काल में भी मोटा मुनाफा कमाने की ओछी सोच पाले हैं 
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भारत में कोरोना वैक्सीन की जांच अंतिम चरणों में है

पिछले लगभग 8 महीनों में विश्व के 213 देशों के लगभग ढाई करोड़ व्यक्ति चायनीज वायरस कोरोना की चपेट में आ चुके हैं। इसमें से 8 लाख से ज्यादा की मृत्यु हो चुकी है जबकि इससे संघर्ष करके पूरी तरह स्वस्थ होने वालों की बहुत बड़ी संख्या है। भारत में अभी तक लगभग 32 लाख व्यक्तियों के संक्रमण होने की पुष्टि हुई है और करीब 60 हजार की मृत्यु हो चुकी है। हालांकि मृत्यु दर में तेजी से गिरावट दर्ज की जा रही है। इस सबके बीच हर एक की आस अब कारगर वैक्सीन से बंधी है। लेकिन इतने वक्त के बाद भी कोई प्रभावी दवा नहीं खोजी जा सकी है। इसका प्रमुख कारण यह है कि कोरोना अलग-अलग व्यक्तियों में 6 प्रकार से संक्रमण दर्शा रहा है-वायरस, बैक्टीरिया, एचआईवी के समान, इम्युनोइंफ्लेमेशन, थ्रोम्बोइंफ्लेमेशन और साइटोकाइन स्टॉर्म। इस सबके साथ ही जहां कहीं से किसी प्रभावी वैक्सीन के बनने की भनक सुनाई देती है तो वहीं नामी फार्मा कंपनियों की उसके खिलाफ तमाम तरह के दुष्प्रचार भी सुनने में आते हैं, क्योंकि वे नहीं चाहती कि 'मोटा मुनाफा कमाने का यह मौका' उनके बजाया किसी दूसरे के हाथ जा लगे। फिर भी पूरे विश्व में वैक्सीन बनाने को लेकर वक्त के साथ दौड़ चल रही है, जो राहत का कुछ अहसास तो कराती ही है। 

कोरोना महामारी विश्व को पूर्व के देश चीन की देन है। और इस महामारी से मुक्ति की उम्मीद भी विश्व को पूर्व के ही देश भारत से है। वैक्सीन के निर्माण और आपूर्ति में भारत की सामर्थ्य सुपरिचित है। यूनिसेफ को तमाम तरह की 60 फीसदी वैक्सीन भारत ही भेजता है। विश्व के 150 से अधिक देशों में भारत निर्मित दवा भेजी जाती हैं। डब्ल्यूएचओ के अनुसार भी वैक्सीन निर्माण का भारत गढ़ है। अत: साफ है कि विश्व में कोरोना की वैक्सीन का विकास कहीं पर भी हो, पर निर्माण और आपूर्ति में भारत की भूमिका महत्वपूर्ण रहेगी। कोरोना की वैक्सीन के निर्माण में कुछ अग्रणीय कंपनियों ने अभी से भारत की वैक्सीन निर्माण करने वाली कंपनियों से अनुबंध कर लिया है।

डब्ल्यूएचओ के अनुसार 170 से अधिक वैज्ञानिकों की टीमें कोरोना की वैक्सीन के शोध और निर्माण में लगी हैं। सामान्य तौर पर वैक्सीन के शोध, जांच और व्यावसायिक निर्माण होने में 5 से 10 वर्ष और कई बार इससे अधिक समय भी लगता है, परन्तु कोरोना महामारी से पैदा हुए हालात को देखते हुए कई चरणों पर तीव्रता से काम करते हुए इसके एक से डेढ़ वर्ष में बाजार में आ जाने की प्रबल संभावना है।

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रूस में लोगों पर पहली कोरोना वैक्सीन की जांच में कुछ दुष्प्रभाव देखने में आए थे  (फाइल चित्र) 

क्या होती है वैक्सीन?
किसी भी व्यक्ति में संक्रमण होने पर शरीर के प्रतिरोधक तंत्र में किसी वायरस या बैक्टेरिया के लिए रोग प्रतिरोधक शक्ति विकसित होती है। यह ऐंटीबॉडी (सूक्ष्म रासायनिक संरचना) या रोग प्रतिरोधक कोशिकाओं के रूप में हो सकते हैं। यह प्रतिरोधक तंत्र अगली बार उस संक्रमण के शरीर मे आने पर बहुत तेजी से उसे पहचान जाता है और उस वायरस द्वारा रोग उत्पन्न होने से पहले ही उसको समाप्त कर देता है। वैक्सीन किसी स्वस्थ व्यक्ति को बगैर बीमार करे उसके प्रतिरोधक तंत्र में यही ताकत उत्पन्न कर देती है। वैक्सीन के रूप में पूरा निष्क्रिय वायरस या उसका वह अंश दिया जाता है।

भारत में अभी 8 वैक्सीन पर काम हो रहा है, जिनमें से दो पहले चरण में सफलता प्राप्त कर दूसरे चरण में पहुंच चुकी हैं। सीरम इंस्टीट्यूट आफ इंडिया आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के साथ एक वैक्सीन बना रहा है जिसके दूसरे और तीसरे चरण के परीक्षण चल रहे हैं। भारत बॉयोटेक की कोवैक्सीन का दूसरे चरण का परीक्षण शुरू हो रहा है। जायड्स कैडिला की वैक्सीन जयकोव-डी का भी दूसरे चरण का परीक्षण पूरा होकर तीसरा चरण शुरू हो रहा है।


वैक्सीन के बाजार में आने से पहले उसे कई चरणों से गुजारा जाता है। सबसे पहले वैक्सीन जानवरों को दी जाती है और देखा जाता है कि इससे प्रतिरोधक तंत्र सक्रिय होता है कि नहीं। यह 'प्रिक्लीनिकल स्टेज' कहलाती है। दूसरे चरण में कुछ लोगों को वैक्सीन यह देखने के लिए दी जाती कि यह कितनी सुरक्षित है और इससे प्रतिरोधक तंत्र कितना सक्रिय होता है। इसके बाद सैकड़ों व्यक्तियों को वैक्सीन देकर देखा जाता है कि वह कितनी सुरक्षित है। तीसरे चरण 'डबल ब्लाइंड' और 'मल्टीसेंट्रिक ट्रायल' होता है यानी हजारों व्यक्तियों पर इसका असर और प्रतिरक्षा की ताकत देखी जाती है।इसका कोई खतरनाक दुष्प्रभाव तो नहीं है, यह प्रमाणित किया जाता है। इन सभी चरणों से सफल होने के बाद इसके निर्माण और बाजार में उतारने का लाइसेंस दिया जाता है। वर्तमान में कोरोना की विभिन्न वैक्सीन विभिन्न चरणों में हैं। 'प्रिक्लीनिकल स्टेज' में 138 वैक्सीन, पहले चरण में 25 वैक्सीन, दूसरे चरण में 15 वैक्सीन, तीसरे चरण में 7 वैक्सीन हैं। इस बीच चीन ने एक वैक्सीन सेना के सीमित उपयोग के लिए स्वीकृत करी है। चीन ने अपनी सरकारी कंपनी साईनोफार्मा द्वारा विकसित वैक्सीन, जिसका तीसरे चरण का परीक्षण संयुक्त अरब अमीरात में चल रहा है, को 22 जुलाई से अपने चिकित्साकर्मियों और कुछ सरकारी कर्मचारियों को आपात स्वीकृति देकर लगानी शुरू कर दी है।

इधर रूस ने अपनी स्पूतनिक-5 वैक्सीन को स्वीकृति दी है, पर इसमें विवाद यह है कि इस वैक्सीन ने तीसरे चरण का परीक्षण पूरा नहीं किया है। बाजार में आते ही इसके दुष्प्रभाव भी सामने आने लगे थे।

भारत में कहां तक पहुंची वैक्सीन
भारत में फिलहाल कम से कम 8 वैक्सीन पर काम हो रहा है, जिनमें से दो वैक्सीन पहले चरण में सफलता प्राप्त कर दूसरे चरण में पहुंच चुकी हैं। इंडियन काउंसिल आफ मेडिकल रिसर्च के महानिदेशक डॉ. बलराम भार्गव की मानें तो भारत में 19 कोरोना वैक्सीन दौड़ में हैं। उनके अनुसार, सीरम इंस्टीट्यूट आॅफ इंडिया आॅक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के साथ एक वैक्सीन बना रहा है जिसके दूसरे और तीसरे चरण के परीक्षण चल रहे हैं। भारत बॉयोटेक की कोवैक्सीन का दूसरे चरण का परीक्षण शुरू हो रहा है। जायड्स कैडिला की वैक्सीन जयकोव-डी का भी दूसरे चरण का परीक्षण पूरा होकर तीसरा चरण शुरू हो रहा है।

चुनौतियां, अवरोध और सावधानियां
किसी भी संक्रामक महामारी का एक निश्चित इलाज न होने पर वैक्सीन ही एकमात्र उपाय बचती है। किसी भी आबादी में जब एक निश्चित प्रतिशत से ऊपर लोगों में उस बीमारी के लिए प्रतिरोधक तंत्र तैयार हो जाता है तो उस बीमारी का फैलना रुक जाता है, क्योंकि उसे संक्रमण के लिए नये व्यक्ति नहीं मिल पाते हैं। इसको 'हर्ड इम्युनिटी' कहते हैं। कोरोना के मामले में यह तादाद बहुत बड़ी हो सकती है जिनको सुरक्षित तरीके से वैक्सीन द्वारा 'इम्युनॉइज' कर महामारी को नियंत्रित किया जा सकता है। इस महामारी के दौरान एक असरदार, दुष्प्रभाव रहित वाजिब कीमत की वैक्सीन पूरे विश्व को उपलब्ध करवाना एक बड़ी चुनौती है। ध्यान रखिए, हम तभी सुरक्षित हैं जब पूरा विश्व समुदाय सुरक्षित है। कोरोना वैक्सीन के शीघ्र व्यावसायिक उत्पादन के लिये कई अभूतपूर्व कदम उठाये गये हैं।

लेकिन इनमें सावधानी और मुनाफा कमाने की सोच को दूर रखने की बेहद जरूरत है। कमाई की इच्छा रखने वाली कुछ विदेशी फार्मा कंपनियों के बयान और करार हैरान करने वाले हैं। वैक्सीन बनाने और जल्दी से बाजार में उतारने के हक अपने कब्जे में करने की आपाधापी मची है। ऐसे में हमें अमेरिकी नेशनल इंस्टीट्यूट आॅफ एलर्जी और इंफेक्शियस डिसीज के निदेशक एंथनी फॉसी की बात ध्यान रखनी होगी जिनका कहना है कि किसी भी एक वैक्सीन को पूर्ण परीक्षण के बिना अनुमति देना घातक होगा। इससे दूसरी सम्भावित वैक्सीन के परीक्षण के लिए व्यक्तियों को जुटाना बहुत मुश्किल हो जाएगा। बेशक, वैक्सीन के साथ व्यावसायिक हितों को जरूरत से ज्यादा प्रमुखता देना मानव जाति के लिए घातक होगा।

मोटी कमाई की इच्छा रखने वाली कुछ विदेशी फार्मा कंपनियों के बयान और करार हैरान करने वाले हैं। वैक्सीन बनाने और जल्दी से बाजार में उतारने के हक अपने कब्जे में करने की आपाधापी मची है। ऐसे में हमें अमेरिकी नेशनल इंस्टीट्यूट आॅफ एलर्जी और इंफेक्शियस डिसीज के निदेशक एंथनी फॉसी की बात ध्यान रखनी होगी जिनका कहना है कि किसी भी एक वैक्सीन को पूर्ण परीक्षण के बिना अनुमति देना घातक होगा।

कई व्यावसायिक घरानों, सरकारों, स्वास्थ्य संगठनों और विश्वविद्यालयों ने तमाम वैक्सीन के निर्माताओं के साथ आर्थिक अनुबंध किये हैं। बाजार आधारित वैक्सीन का निर्माण और आपूर्ति नुकसानदेह साबित हो सकती है। इससे सिर्फ वैक्सीन की कीमत ही आसमान नहींं दुएगी बल्कि अमीर देशों को वैक्सीन प्राथमिकता पर उपलब्ध करवाई जाएगी। उन गरीब देशों को लंबा इंतजार करना पड़ेगा जहां महामारी ज्यादा है। अमेरिका ने एस्ट्राजेनेका कंपनी के साथ वैक्सीन के निर्माण के पूर्व ही 1.2 अरब डॉलर में 300 मिलियन वैक्सीन की खुराक का अनुबंध कर लिया है। शंका यह भी है कि कुछ देश जहां वैक्सीन का निर्माण होगा, वे उसके निर्यात पर प्रतिबंध लगाकर वैक्सीन को अपने देश के लिए सुरक्षित कर लें। इसको 'वैक्सीन सोवेरेनिटी' कहा जाता है। 'कोएलिशन फॉर एपिडेमिक प्रिपेअर्डनेस इन्नोवशंस' ने सभी को जरूरत के हिसाब से समान रूप से वैक्सीन मिल पाये इसके लिये अनुदान के पूर्व कुछ शर्तें तय की हैं-1. जहां महामारी ज्यादा है वहां न्यूनतम कीमतें रखी जायेंगी। 2. वैक्सीन निर्माण की सारी जानकारी कंपनियां उससे साझा करेंगी जिससे अगर कंपनी अपने दायित्वों से मुकरती है तो वह उस क्षेत्र में सस्ती वैक्सीन का निर्माण करवा सके। 3. उसे वैक्सीन निर्माण के पेटेंट का अधिकार होगा। 4. अगर कंपनी को वैक्सीन से आर्थिक लाभ होता है तो उसमें उसका हिस्सा होगा जिससे वह जरूरतमंद क्षेत्रों में सस्ती वैक्सीन उपलब्ध करवा सके। 5. कंपनियां डब्ल्यूएचओ के अनुसार समस्त डाटा साझा करेंगी।

क्या कहते हैं विशेषज्ञ           
मेडिकल काउंसिल आॅफ इंडिया की पूर्व अध्यक्ष डॉ. जयश्री बेन मेहता का कहना है कि वैक्सीन को सर्वसाधारण को उपलब्ध करवाने से पहले उसकी सुरक्षा और असर की कड़ी जांच होनी चाहिए। वैक्सीन ही इस महामारी में एकमात्र उम्मीद है, पर इसको कसौटी पर परखे बिना बाजार में उतारना नुकसानदेह भी हो सकता है। आईएमए के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं एशिया और ओसियान देशों की मेडिकल एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष डॉ. विनय अग्रवाल का कहना है कि कोरोना से वर्तमान में बचाव बहुत महत्वपूर्ण है। इसकी कोई कारगर औषधि नहीं होने के कारण वैक्सीन को लेकर काफी उम्मीदें हैं। आशा करता हूं कि इस वर्ष के अंत या अगले वर्ष के शुरू में एक असरदार वैक्सीन आ जायेगी। भारत सरकार ने एक कदम आगे जाकर अभी से इस वैक्सीन के बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए धन मुहैया कराने की व्यवस्था कर दी है। अंतरराष्ट्रीय बायोएथिक्स प्रोग्राम की भारतीय इकाई के अध्यक्ष और दत्ता मेघे यूनिवर्सिटी के प्रति उपकुलपति डॉ. वेदप्रकाश मिश्र का कहना है कि आज तक दुनिया में जितनी भी बड़ी महामारियां हुई हैं उनका एकमेव इलाज वैक्सीन ही रहा है, चाहे वह स्मालपॉक्स हो या पोलियो, अत: इस महामारी का भी एकमात्र उपाय वैक्सीन ही होगा। वर्ल्ड मेडिकल एसोसिएशन के कोषाध्यक्ष एवं आईएमए के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. रवि वानखेडेकर का कहना है कि जिस अभूतपूर्व गति से कोरोना वैक्सीन बनाने का काम विश्व एवं भारत में चल रहा है, वह उम्मीद जगाता है।            (लेखक ‘इंडियन मेडिकल एसोसिएशन’ की ‘एथिक्स कमेटी’ के अध्यक्ष हैं)