साहित्यिक माफियागिरी

    दिनांक 01-सितंबर-2020   
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वामपंथी और जिहादी तत्वों ने ब्लूम्सबरी प्रकाशन पर ऐसा दबाव डाला कि उसने ‘दिल्ली रॉयट्स 2020, द अनटोल्ड स्टोरी’ पुस्तक को सारी प्रक्रिया पूरी होने के बाद भी छापने से मना कर दिया। दरअसल, इन लोगों ने ऐसा करके बता दिया है कि साहित्य जगत में असहिष्णुता की दादागिरी चरम पर है
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पुस्तक ‘दिल्ली रॉयट्स 2020, द अनटोल्ड स्टोरी’ का आवरण।

दिल्ली दंगों पर लिखी किताब ‘दिल्ली रॉयट्स 2020, द अनटोल्ड स्टोरी’ के प्रकाशन रोकने के प्रकाशक ब्लूम्सबरी के फैसले को लेकर वामपंथी लेखक-पत्रकार या कलाकार आदि बेहद खुश नजर आ रहे थे। उनको लग रहा था कि मोनिका अरोड़ा, सोनाली चीतलकर और प्रेरणा मल्होत्रा की इस किताब का प्रकाशन ब्लूम्सबरी प्रकाशन से रुकवाकर उन्होंने बड़ा तीर मार लिया है। लेकिन वे यह भूल गए कि यह भारतभूमि है, जहां शब्दकोश में विकल्पहीनता शब्द नहीं है। ब्लूम्सबरी के प्रकाशन से इंकार के फौरन बाद गरुड़ प्रकाशन ने इस पुस्तक को प्रकाशित करने की घोषणा करते हुए ‘अग्रिम बुकिंग’ शुरू कर दी। पाठकों का इतना प्यार मिला कि एक बार तो गरुड़ प्रकाशन की वेबसाइट ही काम नहीं करने लगी। प्रकाशक के आंकड़ों के मुताबिक ‘दिल्ली रॉयट्स 2020, द अनटोल्ड स्टोरी’ को जबर्दस्त शुरुआत मिली और चंद घंटों में ही 15,000 प्रतियों का अग्रिम आदेश मिला। यह तो खैर इसकी लोकप्रियता का एक पक्ष है। लेकिन इस पूरी घटना से वामपंथी बौद्धिकों का खोखलापन उजागर हो गया। वामपंथ के ये झंडाबरदार लगातार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर छाती कूटते रहते हैं। हर छोटी-बड़ी घटना पर उनको लगता है कि देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बाधित किया जा रहा है और उनको जब यह लगता है तो सोशल मीडिया पर हाथों में तख्ती लेकर फोटो लगाने लगते हैं। इस बार जब उन्होंने ‘दिल्ली रॉयट्स 2020, द अनटोल्ड स्टोरी’ को रोकने के लिए अभियान चलाया तो वे यह भूल गए कि इस अभियान से उनकी खुद की पोल खुलने वाली है, उनके चेहरे पर लगा मुखौटा तार-तार होने वाला है। जब वे इस किताब के प्रकाशन को रोककर जश्न मनाने में लगे थे तो वे कुछ साल पहले का एक वाकया भूल गए थे। भूल तो यह भी गए थे कि उस वक्त उन्होंने क्या-क्या कहा था। छह साल पहले की ही बात है। हिंदू धर्म पर कई किताबें लिखने वालीं लेखिका वेंडी डोनिगर की किताब ‘द हिंदूज, एन अल्टरनेटिव हिस्ट्री’ को पेंग्विन बुक्स ने भारतीय बाजार से वापस लेने और छपी हुई अनबिकी प्रतियों को नष्ट करने का फैसला लिया। यह फैसला अदालत में उस किताब पर चल रहे मुकदमे के मद्देनजर याची के साथ समझौते के बाद हुआ। दरअसल, ‘शिक्षा बचाओ आंदोलन’ नामक एक संगठन को इस किताब के कुछ अंशों पर आपत्ति थी। इसलिए इस संगठन के सर्वेसर्वा श्री दीनानाथ बत्रा ने 2011 में इस किताब को लेकर एक मामला दर्ज करवाया था। तीन साल बाद अदालत के बाहर एक समझौता हुआ जिसके तहत किताब को वापस लेने का फैसला हुआ। श्री बत्रा ने पुस्तक को पढ़ने के बाद उस पर अपनी आपत्ति जताई थी। उन्होंने वामपंथियों की तरह बिना पढ़े शोर नहीं मचाया। 
वेंडि डोनिगर की पुस्तक छपने के बाद से ही उस पर विवाद शुरू हो गया था। इसके विरुद्ध अमेरिका में विरोध प्रदर्शन हुआ, लंदन में तो लेखिका पर अंडे तक फेंके गए थे। तब पेंग्विन के फैसले के बाद कुछ लोग इसको अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला करार देने लगे थे। कुछ वामपंथियों ने इसको हिंदुत्वनिष्ठ संगठनों की कथित फासीवादी मानसिकता करार दिया था। सेकुलरवाद के नाम पर अपनी दुकान चलाने वालों को हिंदुत्वनिष्ठ संगठनों पर हमलावर होने का बहाना चाहिए होता है। पेंग्विन के उस फैसले में भी उनको संभावना नजर आई थी और वे फासीवाद-फासीवाद चिल्लाने लगे थे। उस समय कुछ लोगों ने सवाल उठाया था कि 2009 में किताब छपी। उसके पांच साल बाद इस किताब को वापस लेने का फैसला प्रकाशक ने लिया। इसमें फासीवाद कहां से आ गया? क्या शांतिपूर्ण तरीके से विरोध जताना और संविधान से प्रदत्त अधिकारों का उपयोग करना फासीवाद है? यह तो वैश्विक चलन है कि अगर किसी किताब पर या उसके अंश पर आपत्ति हो तो अदालत का दरवाजा खटखटाया जाता है। वेंडि डोनिगर की पुस्तक के खिलाफ भी याचिकाकर्ता ने भारतीय संविधान के तहत मिले अपने नागरिक अधिकारों का उपयोग करते हुए न्यायालय में मामला दर्ज कराया था। अदालत में मुकदमा चल ही रहा था कि दोनों पक्षों ने समझौता कर लिया।

जिस तरह से पाकिस्तानी पिता की संतान लेखक आतिश तासीर ने ब्रिटेन के लेखक विलियम डेलरिंपल को ‘दिल्ली रॉयट्स 2020, द अनटोल्ड स्टोरी’ के प्रकाशन को रोकने के लिए सार्वजनिक रूप से बधाई दी उससे भारत के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय साजिश के भी संकेत मिलते हैं

प्रकाशक के उस फैसले के बाद लेखकों के एक बड़े समुदाय में इस बात को लेकर खासी निराशा देखी गई थी।  विवादास्पद लेखिका अरुंधति राय से लेकर पत्रकार और लेखक सिद्धार्थ वरदराजन आदि भी उस वक्त विवाद में कूदे थे। सिद्धार्थ ने तो पेंग्विन से अपनी किताबों को नष्ट करने और कॉपीराइट वापस करने की मांग भी की थी। सिद्धार्थ वरदराजन ने अपने पत्र में साफ लिखा था, ‘‘ उन्हें अब पेंग्विन पर भरोसा नहीं रह गया, लिहाजा वे गुजरात दंगों पर लिखी गई उनकी किताब ‘दे मेकिंग आॅफ अ ट्रेजडी’ के अधिकार वापस कर दें।’’ सिद्धार्थ वरदराजन ने तब कहा था, ‘अगर किसी समूह की भावना इस किताब से आहत हो जाती है और वह भारतीय दंड विधान की धारा 295 के तहत मुकदमा कर देता है, तो संभव है कि पेंग्विन उनकी किताब को भी वापस लेने का फैसला कर दे।’ पता नहीं उनकी पुस्तकें नष्ट की गर्इं या नहीं, लेकिन अब भी सिद्धार्थ वरदराजन की ये किताब पेंग्विन बेच रहा है। यह है इनका विरोध। समय पर घोषणा करो, प्रचार हासिल करो और फिर भूल जाओ। यह है मार्क्सवाद का अर्धसत्य। वामपंथियों का झूठ का प्रचार एक बार होकर रुकता नहीं है, वह सतत चलता रहता है। वेंडि डोनिगर के मसले के दो साल बाद पीईएन इंटरनेशनल ने एक रपट प्रस्तुत की थी, ‘‘इमपोजिंग साइलेंस, द यूज आॅफ इंडियाज लॉज टू सप्रेस फ्री स्पीच।’’ पेन कनाडा, पेन इंडिया और यूनिवर्सिटी आॅफ टोरेंटो के फैकल्टी आॅफ लॉ ने संयुक्त रूप से इस अध्ययन को करने का दावा किया था। पेन इंटरनेशनल कवियों, लेखकों और उपन्यासकारों की एक वैश्विक संस्था है। इसका दावा है कि वह पूरी दुनिया में साहित्य और अभिव्यक्ति की आजादी के लिए काम करती है। उस रपट में कहा गया था कि भारत में अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर स्थिति बेहद विकट है। उस रपट की आरंभिक पंक्तियों से ही शोधकर्ताओं के मंसूबे साफ दिखे थे, ‘‘भारत में इन दिनों असहमत होने वालों को खामोश कर देना बहुत आसान है...दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के लिए यह स्थिति बेहद शर्मनाक है। भारत में धर्म पर लिखना मुश्किल होता जा रहा है।’’ इस संबध में डोनिगर की ही किताब का उदाहरण दिया गया था।
अब यह देखना दिलचस्प होगा कि पेन इंटरनेशनल की रपट में ‘दिल्ली रॉयट्स 2020, द अनटोल्ड स्टोरी’ के प्रकाशन को रोकने का जिक्र होता है या नहीं। वे इस तरह का शोध प्रस्तुत करते भी हैं या नहीं। अगर इनकी रपट में एक पुस्तक के प्रकाशन को रोकने की इन चालों का जिक्र नहीं होता है तो इनकी साख पर बड़ा सवालिया निशान लगेगा। दरअसल,  ‘दिल्ली रॉयट्स 2020, द अनटोल्ड स्टोरी’ का प्रकाशन नहीं होने देना एक प्रकार की साहित्यिक माफियागिरी भी है। जिस तरह से पाकिस्तानी पिता की संतान लेखक आतिश तासीर ने ब्रिटेन के लेखक विलियम डेलरिंपल को ‘दिल्ली रॉयट्स 2020, द अनटोल्ड स्टोरी’ के प्रकाशन को रोकने के लिए सार्वजनिक रूप से बधाई दी उससे भारत के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय साजिश के भी संकेत मिलते हैं। ‘दिल्ली रॉयट्स 2020, द अनटोल्ड स्टोरी’ का प्रकाशन रोका जाना कोई साधारण घटना नहीं है, बल्कि इसके दूरगामी असर होंगे।