दागी पर दांव

    दिनांक 01-सितंबर-2020   
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आजादी के समय देश के भावी कर्णधारों ने महात्मा गांधी के ‘रामराज्य’ के स्वप्न को साकार करने का संकल्प लिया था। लेकिन जिस रफ्तार से भारतीय राजनीति का अपराधीकरण हो रहा है, उससे यह स्पष्ट है कि राजनेता और राजनीतिक दल अपने लक्ष्य से पूरी तरह भटक चुके हैं। अब न तो कोई राजनीतिक शुचिता की बात करता है और न ही राजनीति को आपराधिक तत्वों से मुक्त कराने का प्रयास दिखता है
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कांग्रेस ने हार्दिक पटेल को गुजरात का कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष बनाया है, जिसे दंगा और आगजनी मामले में अदालत ने दोषी ठहराया है। 

देश में राजनीतिक के अपराधीकरण को लेकर छिड़ी बहस के बीच कांग्रेस आलाकमान ने दंगा और आगजनी करने के दोषी हार्दिक पटेल को गुजरात प्रदेश कांग्रेस की बागडोर सौंप दी है। हार्दिक को प्रदेश का कार्यकारी अध्यक्ष बनाने के बाद यह सवाल उठ रहा है कि क्या आपराधिक मामले में अदालत से दोषी ठहराए गए लोगों को राजनीतिक दलों में प्रमुख पद पर आसीन करके राजनीति का अपराधीकरण होने से रोका जा सकता है? अगर अदालत द्वारा दोषी ठहराया गया व्यक्ति ऊपरी अदालत से बरी होने तक चुनाव लड़ने के अयोग्य है तो क्या उसे राजनीतिक दल की बागडोर सौंपना या पदाधिकारी नियुक्त करना नैतिक रूप से सही है? जहां तक जनप्रितिनिधित्व कानून का सवाल है, अदालत द्वारा दोषी ठहराए गए व्यक्ति द्वारा राजनीतिक दल बनाने या उसकी बागडोर संभालने पर कोई पाबंदी नहीं है। लेकिन जब बात राजनीतिक शुचिता और राजनीति को आपराधिक तत्वों से मुक्त कराने की हो तो इस तरह के सवाल उठना स्वाभाविक है। सवाल तो यह भी है कि क्या उच्चतम न्यायालय चिंताओं का संज्ञान लेकर सरकार आपराधिक मामले में दोषी ठहराए गए लोगों को राजनीतिक दलों की बागडोर संभालने या इनमें पदाधिकारी बनने के अयोग्य करने के लिए कोई कानून बनाएगी?

गुजरात में पटेल समुदाय के लिए आरक्षण की मांग को लेकर आन्दोलन शुरू करने पर चर्चा में आए हार्दिक पटेल को 2015 में मेहसाणा में दंगा और आगजनी से जुड़े एक मामले में अदालत ने जुलाई, 2018 में दोषी ठहराते हुए दो साल की सजा सुनाई थी। हार्दिक ने हालांकि निचली अदालत के इस फैसले के खिलाफ उच्च न्यायालय में अपील की थी, लेकिन पिछले साल लोकसभा चुनाव के दौरान उन्हें निराशा ही हाथ लगी। इसके बाद उन्होंने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था। उच्च न्यायालय और फिर उच्चतम न्यायालय से राहत नहीं मिली, इसलिए जन प्रतिनिधित्व कानून के प्रावधानों के तहत वह चुनाव लड़ने के अयोग्य हैं। इस कानून की धारा आठ के तहत आपराधिक मामले में दो साल या इससे अधिक की सजा पाने वाला व्यक्ति सजा भुगतने के बाद अगले छह साल तक चुनाव नहीं लड़ सकता है। हालांकि, अदालत ने 26 सितंबर, 2018 को एक फैसले में यह दोहराया था कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 389 के तहत अगर दोषी व्यक्ति की दोषसिद्धि पर अपीलीय अदालत रोक लगाती है तो जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 8 में प्रदत्त अयोग्यताएं लागू नहीं होंगी। ऐसी स्थिति में व्यक्ति चुनाव लड़ सकता है।

इस संबंध में पूर्व क्रिकेटर नवजोत सिंह सिद्धू और अकाली नेता बीबी जागीर कौर के मामलों में शीर्ष अदालत की व्यवस्थाएं महत्वपूर्ण रही हैं। 1988 में कार पार्किंग विवाद में एक व्यक्ति की मौत से संबंधित मामले में उच्च अदालत ने सिद्धू को दोषी ठहराते हुए दिसंबर 2006 में तीन साल की सजा सुनाई थी। लेकिन 2007 में उच्चतम न्यायालय ने इस पर रोक लगा दी थी। इसके बाद उन्होंने अमृतसर संसदीय सीट से उप-चुनाव लड़ा था। हालांकि, बाद में मई 2018 में उच्चतम न्यायालय ने उनकी दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुए उन पर केवल 1,000 रुपये का जुमार्ना लगाया था। इसी तरह, शिरोमणि अकाली दल की बीबी जागीर कौर को एक आपराधिक मामले में निचली अदालत ने 2012 में पांच साल की सजा सुनाई थी, जिसकी वजह से उन्हें बादल सरकार से इस्तीफा देना पड़ा था। लेकिन दिसंबर 2018 में पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने उन्हें अपनी बेटी की रहस्यमय परिस्थितियों में मृत्यु के मामले में बरी कर दिया था। इसके बाद वह जनप्रतिनिधत्व कानून के तहत चुनाव लड़ने के योग्य हो गई थीं। इसी को आधार बनाते हुए भाजपा नेता और अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय ने उच्चतम न्यायालय में एक याचिका दायर की थी। इसमें सजायाफ्ता नेताओं को राजनीतिक दल गठित करने या उसका पदाधिकारी बनने से प्रतिबंधित करने और उम्र भर के लिए राजनीतिक गतिविधियों में हिस्सा लेने से वंचित करने का निर्देश देने का अनुरोध किया गया था। अपनी याचिका में उन्होंने राजद नेता लालू प्रसाद यादव, हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ओम प्रकाश चौटाला और तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री  जे. जयललिता की सहयोगी शशिकला की घटनाओं का जिक्र किया था।

2 दिसंबर, 2017 को तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस याचिका पर विचार करने से इनकार करते हुए सवाल किया था, अदालतें किस सीमा तक जा सकती हैं? सरकार और संसद को इस पर गौर करने दीजिए। क्या हम आपराधिक मामले में दोषी व्यक्ति को राजनीतिक दल का मुखिया बनने से रोक सकते हैं? क्या अदालत दोषी व्यक्तियों को अपने राजनीतिक दृष्टिकोण का प्रचार-प्रसार करने से रोक सकती है? इसी याचिका पर सुनवाई के दौरान एक अवसर पर न्यायालय ने सजायाफ्ता नेताओं के राजनीतिक दलों का मुखिया होने पर चिंता व्यक्त की थी और केंद्र सरकार तथा चुनाव आयोग से जानना चाहा था कि ऐसा व्यक्ति राजनीतिक दल कैसे बना सकता है या लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए उम्मीदवारों का चयन कैसे कर सकता है? इस सवाल के पीछे पाकिस्तान की सर्वोच्च अदालत का वह फैसला भी था, जिसमें कहा गया था कि संविधान के अनुच्छेद-62 और 63 के अंतर्गत अयोग्य व्यक्ति राजनीतिक दल का मुखिया नहीं बन सकता। इसका नतीजा यह हुआ था कि पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को अपनी पार्टी के सभी पदों से इस्तीफा देना पड़ गया था। लोकतांत्रिक प्रक्रिया को आपराधिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्तियों से मुक्त कराने के लिए लंबित एक मामले में नरेंद्र मोदी सरकार ने मार्च 2018 में शीर्ष अदालत में एक हलफनामा दाखिल किया था। इसमें कहा गया था कि कर कहा था कि आपराधिक पृष्ठ भूमि वाले व्यक्ति को राजनीतिक दल बनाने या दल में कोई पद ग्रहण करने से नहीं रोका जा सकता है। सरकार का कहना था कि जनप्रतिनिधित्व कानून में प्रदत्त चुनाव लड़ने की अयोग्यता का राजनीतिक दल गठित करने या इस तरह की गतिविधियों में शामिल होने का परस्पर कोई लेना-देना नहीं है। चुनाव आयोग ने भी कहा था कि जन प्रतिनिधित्व कानून की धारा 29ए के तहत उसे राजनीतिक दल को पंजीकृत करने का अधिकार तो है, लेकिन किसी दल का पंजीकरण रद्द करने का अधिकार नहीं है। इसके लिए संसद को कानून में संशोधन करना होगा।

यह सही है कि अदालत से सजा पाए दोषियों को ऊपरी अदालत से बरी होने तक राजनीतिक दल बनाने, उसका मुखिया बनने या प्रत्याशियों के चयन की प्रकिया में शामिल होने पर कोई रोक नहीं है। लेकिन राजनीति में आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों के बढ़ते दखल को देखते हुए अदालत द्वारा दोषी ठहराए गए लोगों को राजनीतिक दलों की बागडोर संभालने या कोई राजनीतिक पद सौंपने के अयोग्य बनाने के लिए जन प्रतिनिधित्व कानून में अपेक्षित संशोधन क्या नहीं किया जाना चाहिए।

शीर्ष अदालत ने ऐसे कई बिन्दुओं को सरकार और संसद के विवेक पर छोड़ रखा है। उम्मीद है कि देश की राजनीति को आपराधिक पृष्ठभूमि वाले या सजायाफ्ता लोगों से मुक्त कराने की दिशा में न्यायालय द्वारा फैसलों में जताई जाने वाली चिंताओं पर विचार किया जाएगा। राजनीतिक शुचिता की खातिर राजनीतिक दलों को ऐसे लोगों को पार्टी का पदाधिकारी बनाने से गुरेज करना चाहिए। प्रमुख राजनीतिक दलों के प्रयास से ही क्षेत्रीय या छोटे राजनीतिक दलों को ऐसा करने से रोका जा सकेगा।