‘खारिज करने की वामपंथी संस्कृति को भारत में घुसने नहीं देना है’

    दिनांक 10-सितंबर-2020   
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देश में बीते कुछ वर्षों से अभिव्यक्ति की आजादी और असहिष्णुता को लेकर विमर्श तेज हुआ है। ढिंढोरा पीटा जा रहा है कि सरकार की ओर से खतरा है, लेकिन सच्चाई बिल्कुल इसके उलट है। दरअसल, अभिव्यक्ति की आजादी की आड़ में कुछ लोग मनमानी करना चाहते हैं, इसलिए इसके सूत्रधारों ने परदे के पीछे रहते हुए इस विमर्श को खड़ा किया। कुछ माह पहले उत्तर-पूर्वी दिल्ली में जो दंगे हुए, उसकी जांच में यह खुलासा हुआ कि इसके पीछे भी एक सुनियोजित और गहरी साजिश थी। दिल्ली दंगों पर लिखी गई एक किताब के प्रकाशक ‘ब्लूम्सबरी’ पर तथाकथित बुद्धिजीवी और नामचीन लेखकों ने दबाव डालकर उस किताब को बाजार में आने से रोकने की कोशिश की। प्रकाशक ने लेखकों को बाकायदा 100 प्रतियां भी सौंप दी थीं, लेकिन जिस दिन किताब का विमोचन होना था, उस दिन ‘ब्लूम्सबरी’ ने कह दिया कि वह पुस्तक प्रकाशित नहीं करेगा। सवाल है कि वह कौन सी ताकतें हैं, जो नहीं चाहतीं कि दिल्ली दंगों की सच्चाई लोगों के सामने आए? क्या इनके चेहरे पर से नकाब नहीं उठना चाहिए? क्या सरकार की आलोचना ही अभिव्यक्ति की आजादी है? ‘अभिव्यक्ति की आजादी और असहिष्णुता’ विषय पर ‘शब्दउत्सव’ ने 30 अगस्त, 2020 को एक कार्यक्रम का आयोजन किया, जिसमें वरिष्ठ पत्रकार कंचन गुप्ता, प्रभात प्रकाशन के प्रभात कुमार, वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक संदीप देव तथा अमेरिका में स्तंभकार व लेखक संक्रांत सानू शामिल थे। कार्यक्रम का संचालन दैनिक जागरण के सह संपादक अनंत विजय ने किया। प्रस्तुत हैं कार्यक्रम के प्रमुख अंश-


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कंचन गुप्ता, अनंत विजय

कंचन गुप्ता जी आपने इस पूरे प्रकरण को देखा है। एक तरफ ब्लूम्सबरी किताब छापने के लिए तैयार हो जाता है। लेखक और प्रकाशक के बीच समझौता भी हो गया, लेकिन अचानक ऐसा क्या हुआ कि प्रकाशक मुकर गया?
यदि पूरे प्रकरण को देखें तो किताब जारी हो गई थी। लेकिन जिस दिन इसका विमोचन होना था, उसी दिन ब्लूम्सबरी ने कह दिया कि वह किताब नहीं छापेगी। इसके लिए उसने दो कारण गिनाए- एक तो इसके विमोचन कार्यक्रम में शामिल होने वाले लोगों से प्रकाशक जुड़ना नहीं चाहता था और दूसरा था सामाजिक दायित्व, जिसके कारण उसने किताबें वापस ले लीं। प्रकाशक का संकेत भाजपा नेता कपिल मिश्रा की ओर था। कपिल मिश्रा पर दिल्ली दंगे से जुड़ा कोई आपराधिक मुकदमा दर्ज नहीं है, इसलिए वह कहां जाएंगे, किस मंच से बोलेंगे इसका निर्णय वह करेंगे। यदि कोई उन्हें आमंत्रित करता है तो उसे इसकी पूरी आजादी है। कपिल मिश्रा कार्यक्रम के मंच पर अपनी बात रख सकते हैं। क्या सही है और क्या गलत है, इसका निर्णय दर्शक करेंगे। यदि किसी को यह पसंद नहीं है तो वह इस पर अपनी असहमति जता सकता है। लेकिन ब्लूम्सबरी यह तय नहीं कर सकता कि पुस्तक विमोचन कार्यक्रम में कौन आएगा और कौन नहीं। जैसे कोई प्रकाशक यह तय नहीं कर सकता कि किताब की समीक्षा कौन और कैसे करेगा? अगर प्रकाशक ही यह तय करने लग जाए तब तो मुश्किल है। इसका दूसरा पहलू है छुआछूत। वाम-लिबरल बड़ी-बड़ी बातें करते हैं कि वह छुआछूत में विश्वास नहीं करते हैं। छुआछूत का मतलब जातिगत या शारीरिक भेदभाव नहीं है, बल्कि इससे भी बढ़कर किसी के सोच से सहमत नहीं होने पर उसे अलग-थलग कर देने से है। रही बात प्रकाशक के सामाजिक दायित्व की, तो प्रकाशक का काम पुस्तक को छापना और उसे दुकानों तक पहुंचाना ही उसकी सामाजिक जिम्मेदारी है।

यह कैसा सामाजिक दायित्व है जो इस प्रकाशक को शाहीन बाग पर पुस्तक छापने की अनुमति तो देता है, लेकिन दिल्ली दंगों पर जब पुस्तक प्रकाशित करने की बात आती है तो वह मुकर जाता है?
शाहीन बाग पर जितनी भी किताबें छपे, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन प्रकाशक उसका समर्थन करे, ऐसा मैंने पहले कभी नहीं देखा। दिल्ली दंगे पर लिखी गई किताब की पांडुलिपि को प्रकाशक ने जरूर देखा होगा। उस पर कानून सलाह ली होगी। उसके संपादक ने भी पांडुलिपि पढ़ी होगी और उसके बाद ही प्रकाशक ने लेखक के साथ करार किया होगा। अब इसके पीछे जो भी कारण बताया जाए, उसका कोई मतलब नहीं है। किताब नहीं छापने का बस एक ही कारण है कि प्रकाशक पर दबाव बनाया गया, जिसके कारण उसने किताब को लुगदी बना दिया। यह एक ‘कैंसिल कल्चर’ है। वामपंथियों की यह संस्कृति अमेरिका में चलन में है, लेकिन भारत में इसका पनपना चिंताजनक है। आज यह एक पुस्तक को लेकर है, कल किसी फिल्म के बारे में होगी, परसों कहेंगे कि अमुक रेस्तरां में फलां व्यक्ति जाता है (जिसे वह पसंद नहीं करते) इसलिए उस रेस्तरां का बहिष्कार करेंगे। हमें खारिज करने वाली इस संस्कृति को भारत में नहीं घुसने देना है। आज अगर हम खड़े होकर इसका मुकाबला नहीं करेंगे तो कल हमें बहुत परेशानी होगी।

प्रभात जी, अब आप इस पुस्तक का प्रकाशन कर रहे हैं और एक ही रात में इसकी 15,000 प्रतियों की मांग आ गई। इसके साथ दिल्ली दंगों पर दूसरी पुस्तक का भी प्रकाशन कर रहे हैं। आप पर भी कोई दबाव तो नहीं बनाया जा रहा है?
सत्य नहीं छापने का नैतिक दबाव तो हमारे ऊपर रहता ही है। लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। जो सच है वह छापा जाएगा, क्योंकि सत्य सामने आना चाहिए। यह कैसा सामाजिक दायित्व है जो सच को सामने आने से रोकना चाहता है? जो पुस्तक हम प्रकाशित करने वाले हैं, वह तथ्यान्वेषी दल की एक रिपोर्ट है। हम दो किताबें छाप रहे हैं, इनमें हिन्दी में ‘दिल्ली दंगे की साजिश का खुलासा’ और अंग्रेजी में ‘दिल्ली राइट्स कॉन्सपिरेसी अनवेल्ड’ यह तथ्यों पर आधारित है। इसमें कहीं कोई कपोल कल्पना नहीं है। किस प्रकार सुनियोजित ढंग से दंगों की साजिश रची गई, इसमें उसका एक-एक प्रमाण है। यानी किस प्रकार सच को छिपाया गया, उसका खुलासा इसमें किया गया है।

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संदीप देव, संक्रांत सानू , प्रभात कुमार

संदीप जी, आपने ‘कम्युनिस्टों की कहानी’ किताब लिखी है। कम्युनिस्टों के लिए अभिव्यक्ति की आजादी प्रचार का हथकंडा है या अपना हित साधने के लिए राजनीतिक औजार है?
वास्तव में यह दूसरों की आवाज को दबाने का एक उपकरण है। अभिव्यक्ति की आजादी से उनका मतलब है एकतरफा यातायात। मैं जो बोलूं वही लोग सुनें। मैं जो लिखूं वही लोग पढ़ें। मैं जो दिखाऊं लोग वही देखें। दूसरा न कोई बोल सकता है, न कोई लिख सकता है और न कोई देख सकता है। यही अभिव्?यक्ति ये चाहते थे और लगातार इसी का प्रयास कर रहे हैं। जब आप इसकी पृष्ठभूमि में देखेंगे तो पाएंगे कि रूस में जब बोल्शेविक क्रांति हुई, तब लेनिन के बाद स्टालिन आया। उसने सबसे पहले पुराने इतिहास और साहित्य को नष्ट करवा कर अपने तरीके से नया इतिहास और नया साहित्य भी लिखवाया। 1917 से पहले भी रूस में बड़े-बड़े साहित्यकार हुए, लेकिन 1917 के बाद ऐसा क्या हुआ कि रूस में उस स्तर का लेखन नहीं हुआ। भारत में भी यह सब हुआ कि अभिव्यक्ति यानी मेरी अभिव्यक्ति, तेरी नहीं। दिल्ली दंगों में भी यही हुआ। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से भी अधिक जो बात मुझे चुभी, वह है ब्लूम्सबरी की औपनिवेशिक मानसिकता। ब्लूम्सबरी भारत के साथ मेरे टकराव की वजह यही है। ब्लूम्सबरी भारत अगर ब्लूम्सबरी ब्रिटेन के दबाव में भारत के लेखकों की किताबें प्रकाशित करना बंद करने लगे तो मुझे नहीं लगता कि भारत के एक लेखक को भी इसके साथ रहना चाहिए। फिर भी वह रहते हैं तो 1947 में मिली आजादी व्यर्थ है। अब अंग्रेज तय करेंगे कि भारत में क्या छपेगा? भारत अपने संविधान के मुताबिक चलेगा, न कि ब्रिटिश कानून और संविधान के अनुसार। ब्लूम्सबरी ने यही साबित करने का प्रयास किया। ब्लूम्सबरी की कानूनी टीम बहुत मजबूत है और संपादकीय कार्यों में वह बहुत अधिक हस्तक्षेप करती है। मेरी किताब ‘कहानी कम्युनिस्टों की’ के प्रकाशन के तीन साल हो गए, लेकिन इसका अंग्रेजी संस्करण आज तक नहीं आया। उन्हें इस बात की तकलीफ है कि नेहरू को कम्युनिस्ट क्यों साबित किया गया। इसलिए ब्रिटेन के वामपंथी लेखकों के दबाव में उसने मेरी पुस्तक नहीं छापी। मेरे लिए देश का संविधान, देश का कानून ज्यादा महत्वपूर्ण है। ब्लूम्सबरी ने सीधे-सीधे भारत की संप्रभुता पर आघात किया है। मैं उसके साथ नहीं रह सकता। इसलिए अपने सभी 9 टाइटल उससे वापस ले लिए और उसे कानूनी नोटिस तक भेजकर कहा है कि अब वह इन किताबों को नहीं छाप सकता। इसके अलावा, उसने जो किताबें छापी हैं, उन्हें भी नष्ट करने के लिए हमने 60 दिन का समय दिया है। इसके बाद अगर ये किताबें कहीं बिकती दिखीं तो वह अदालत का सामना करने के लिए तैयार रहे।

आप प्रकाशक हैं और प्रकाशन जगत को अच्छी तरह जानते हैं। क्या लेखक मिलकर प्रकाशकों पर दबाव बनाते हैं?
पहली बार इस प्रकार का बयान दिया गया है। दिल्ली दंगों में सत्य को छिपाया गया। जब तथ्यान्वेषी दल की रिपोर्ट सामने आने लगी और पार्षद ताहिर हुसैन पर यह आरोप लगने लगा कि उसने राजनीति से प्रेरित होकर इस हिंसा को अंजाम दिया तो इन लोगों को लगा कि उनकी करतूत लोगों के सामने आ जाएगी। इसलिए कथित बुद्धिजीवी जगत ने उस तथ्य को छिपाने की कुचेष्टा की। इसलिए मुझे लगता है कि ब्लूम्सबरी की भारतीय इकाई पर उन्होंने सामूहिक रूप से दबाव बनाने का षड्यंत्र रचा। हालांकि ब्लूम्सबरी की भारत इकाई को स्वतंत्र मानसिकता से काम करना चाहिए था। प्रकाशन की प्रक्रिया पूरी करने के बाद पुस्तक पर रोक लगाना उचित नहीं है। जैसा कि कंचन दा ने कहा कि अगर इस प्रकार की मनोवृत्ति को अभी नहीं कुचला गया तो आने वाले समय में इसके घातक परिणाम सामने आएंगे।

मेरा सवाल प्रभात जी और संदीप देव से है। असहिष्णुता के मुद्दे पर के. सच्चिदानंद व अशोक वाजपेयी ने रवींद्र भवन में कदम नहीं रखने की कसम खाई थी। लेकिन पिछले साल शशि थरूर को जो पुरस्कार दिया गया, उसकी ज्यूरी में शामिल थे और वह बैठक रवींद्र भवन में हुई थी। पिछले दिनों नेमीचंद जन्म शताब्दी पर साहित्य अकादमी ने रवींद्र भवन में कार्यक्रम किया था, जिसमें अशोक वाजपेयी गए थे। वामपंथी जो कहते हैं, वह बिल्कुल नहीं करते? इस दोहरे चरित्र पर आप क्या कहेंगे?

प्रभात कुमार- ये छद्म भेष धारण करके घूमते हैं। इनकी कथनी और करनी में बहुत अंतर है। ये लोग कहते कुछ हैं और करते कुछ हैं। लेकिन अब लोगों को यह पता चल गया कि इनका चरित्र क्या है। इनके कथन में कोई सच्चाई नहीं है। भले ही विलंब हुआ, लेकिन अब वो समय आ गया है, जब इनका सच सामने आएगा। इसलिए हम जो पुस्तक छाप रहे हैं, उसे रोकने के लिए हम पर दबाव बना रहे हैं, परंतु हम दबाव में आने वाले नहीं हैं।

संदीप देव- वामपंथ के साथ दिक्कत यह है कि तर्क और तथ्य का सामना नहीं कर सकता और उसको अपनी बौद्धिक विलास के अपने आवरण में छिपा ले जाता है। और कहता है कि हम संघियों के साथ नहीं बैठेंगे, राष्ट्रवादियों के साथ नहीं बैठेंगे, दक्षिण पंथियों के साथ नहीं बैठेंगे। असल में वह उनके सवालों से असहज होता है, इसलिए भागता है। ऐसा मानक बना दिया गया है कि केवल संघी ही संघ के ऊपर लिखेगा। नेहरू पर लिखने वाला लिबरल कहलाएगा। गोलवलकर जी पर लिखने वाला फासिस्ट कहलाएगा। इस परिपाटी को तोड़ने के लिए मैंने ‘हमारे गुरुजी’ पुस्तक की प्रस्तावना की पहली पंक्ति में लिखा है कि मैं संघ से नहीं हूं, लेकिन संघ के लोगों पर स्वतंत्र लेखक, स्वतंत्र चिंतक, स्वतंत्र पत्रकार को लिखना चाहिए। वामपंथियों के पाखंड को तो अरुण शौरी ने उजागर किया है कि वामपंथी इतिहासकार इस तरह से लिख रहे थे, जिस प्रकार कोई ठेकेदार सड़क बनाने के लिए ठेका लेता है। पैसे के लिए लिखने वाले स्वतंत्र चिंतक और लिबरल कैसे हो गए? वास्तव में ये लेफ्ट फासिस्ट हैं। इन्हें लिबरल कहना बंद करना होगा, क्योंकि ये अधिनायकवादी हैं, फासिस्ट हैं। जब तक सामूहिक रूप से इनके पाखंड का नकाब नहीं नोचा जाएगा, तब तक कितने ही विमर्श हो जाएं, इनका नहीं हिलाया जा सकता। हमारी विचार की धार तलवार की तरह होगी, तभी ये ध्वस्त होंगे।