1400 सालों की ‘जिद’ सब कुछ खत्म कर देगी

    दिनांक 10-सितंबर-2020
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सिद्धार्थ ताबिश की फेसबुक वॉल से 


आपके मजहब और रसूल को मानने से इनकार का मतलब आपके लिए युद्ध ही है। अफगानिस्तान के बामियान में पत्थरों पर खुदे बुद्ध से कैसा युद्ध था? वहां कौन से बौद्ध थे, जिन्होंने जमीनें कब्जा ली थीं आपकी?

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आपने अपने मजहब को ‘जिद’ बनाया और उसकी नींव ‘जिद’ पर ही रखी। कुरैशों को उनके देवताओं को पूजने से मना किया। वे नहीं माने तो उनसे युद्ध किया। यहूदियों को उनकी किताबें पढ़ने और पूजा करने से रोका, नहीं माने तो उनसे भी युद्ध किया। इसी तरह, ईसाइयों, पारसियों और हर कौम के मूर्ति पूजकों, इबादत करने वालों पर अपनी बात थोपी, जो नहीं माना उसके साथ युद्ध किया और उसे अपनी बात मानने के लिए मजबूर किया। यह युद्ध 1400 साल से अनवरत जारी है। कहीं जाहिर है, कहीं छिपा हुआ है। मगर सब जानते हैं कि यह दुनिया आपके लिए ‘दारुल हर्ब’ है, क्योंकि आपके मजहब और रसूल को मानने से इनकार का मतलब आपके लिए युद्ध ही है। अफगानिस्तान के बामियान में पत्थरों पर खुदे बुद्ध से कैसा युद्ध था? वहां कौन से बौद्ध थे, जिन्होंने जमीनें कब्जा ली थीं आपकी?

शांत होने और इस पागलपन का हिस्सा न होना अपने आप में कितना सुकूनदेह है। शांत होकर आप भजन में भी आनंद पाते हैं और कव्वाली में भी। इसे आप क्या समझेंगे, क्योंकि आपका मजहब ‘जिद’ है।

बहरहाल, अब सारी दुनिया जिद पर आ गई है। अब वो अपनी बात मनवाएगी। अब यह नहीं चल पाएगा कि पारसियों को उनके देश से आप बेदखल कर दें और वो बेचारे यहां-वहां शरण मांगते फिरें। यहूदियों को आप मदीना से बेदखल कर दें और वो इधर-उधर भटकें। अब वह दौर गया। पचास से अधिक देश को इस्लामिक देश बनाने के बाद भी आपकी प्यास नहीं बुझ रही है और आप अभी भी तुर्की की हागिया सोफिया चर्च के मस्जिद बनने पर जश्न मनाते हैं और यहां बाबरी पर रोते हैं। यह अब सब अयां है, सब खुला हुआ है।
देखिये, आपका मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड कह रहा है कि ‘बाबरी हमेशा हमारे लिए मस्जिद रहेगी और हागिया सोफिया (तुर्की का चर्च जिसे अब जबरदस्ती मस्जिद बना दिया गया है) हमारे लिए सबसे बड़ा उदाहरण है। अन्याय, प्रताड़ना और शर्मनाक तरीके से जमीन हथिया कर बहुसंख्यकों का तुष्टिकरण करने वाले न्याय से उस स्थान की वस्तु-स्थिति बदल नहीं जाएगी। दिल छोटा न करें, यह समय सदैव के लिए नहीं है।’ अब वे दूसरी जिद पर अड़े हैं तो उन्हें भी थोड़ा जिद कर लेने दीजिए।
सोचिये कैसा लगा होगा मक्का के पुराने धर्म वालों को? कैसा लगा होगा ईरान के पारसियों को? कैसा लगा होगा मदीना के यहूदियों को? आप सोच पाएंगे? न... न... न... आप कहां सोचेंगे! आप तो बताएंगे कि हागिया सोफिया को आपने खरीद लिया है और मदीना के यहूदी तो अपना सबकुछ छोड़कर, अपना सबकुछ रसूल के हाथ में सौंपकर खुशी-खुशी, नाचते-गाते वहां से गए थे। आपका और दूसरों का यह पागलपन अब मैं दूर बैठकर देखता हूं। यकीन मानिये बड़ा मजा आता है। ऐसी ‘जिद’ और ‘उग्रता’ के साथ न होना और उसका हिस्सा न होना मुझे शांति से भर देता है। आप लोगों के लिए शांति कभी नहीं आएगी, आने वाले सैकड़ों सालों में भी नहीं। आपका यह युद्ध अनवरत चलेगा, क्योंकि इसे आपने चुना है।
शांत होने और इस पागलपन का हिस्सा न होना अपने आप में कितना सुकूनदेह है। शांत होकर आप भजन में भी आनंद पाते हैं और कव्वाली में भी। इसे आप क्या समझेंगे, क्योंकि आपका मजहब ‘जिद’ है। हागिया सोफिया पर कब्जा
आपके लिए गर्व है और किसी का बाबरी पर कब्जा आपके लिए ‘जुल्म’। यह ‘जिद’ आपकी सारी नस्लों को खत्म कर देगी।