गेशे जम्पा -8

    दिनांक 11-सितंबर-2020
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नीरजा माधवतिब्बती शरणार्थियों की एक बड़ी संख्या हमारे भारत देश में है। चीन की विस्तारवादी नीति के परिणामस्वरूप एक अहिंसक धार्मिक देश तिब्बत पराधीन हो गया। 1959 में इसका चरमोत्कर्ष देखने को मिला जब तिब्बत के राष्ट्राध्यक्ष परम पावन दलाई लामा को अपने लाखों अनुयायियों के साथ अपना देश छोड़ भारत में शरण लेनी पड़ी।  भारत में रह रहा तिब्बती समुदाय तिब्बत में रह रहे चीनी सत्ता से संघर्षरत तिब्बतियों की सबसे बड़ी ताकत बने रहे। 19वीं सदी के अन्त तक तिब्बत स्वतंत्र था। तिब्बत के राजनीतिक, सांस्कृतिक और मानवीय अधिकारों के प्रश्न पर छाई वैश्विक चुप्पी को तोड़ने और उन्हें स्वाधीनता दिलाने की जद्दोजहद करता है सुप्रसिद्ध लेखिका नीरजा माधव द्वारा लिखा भारत में हिन्दी साहित्य का पहला उपन्यास-गेशे जम्पा। प्रस्तुत है इस उपन्यास की आठवीं कड़ी

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एक सिपाही ने लपककर जम्पा को कंधे से दबोच लिया था। नन्हे जम्पा भय से चिल्ला उठे-मां..बचाओ। उसे छोड़  दीजिए।...मैं बताती हूं..। वो पीछे से भाग गया है। मां ने पीछे की ओर इशारा किया। ‘भगाकर बता रही है। ले चलो इसके बच्चे को।’ जम्पा को पकड़े सिपाही ने उन्हें दरवाजे की ओर धकेलते हुए कहा। नहीं, मैं मां को छोड़कर नहीं जाऊंगा। वे बिलख पड़े थे। चुप्प...उनकी पीठ पर भी एक हंटर पड़ा था। वे बिलबिलाकर रो पड़े थे। कौन था वह तेरा? कहां गया भागकर? एक पूछ रहा था। मेरा मग्-पा। मां बता रही थी। क्या नाम था तेरे मग्-पा का? छेरिंग। उसका पता दे, अन्यथा इस बच्चे को ले जा रहे हैं हम। पहाड़ों में इसे तुम्हारे ही खिलाफ गुरिल्ला बना देंगे तब पता चलेगा। दूसरे सिपाही ने पिताजी को आग्नेय नेत्रों से घूरते हुए कहा।
आप मेरा विश्वास मानिए साहब! मैं उसे जल्दी ही ढूंढकर आपके पास पहुंचा दूंगा। पिताजी ने हाथ जोड़ते हुए प्रार्थना की। अच्छा तो आप हमें कहां ढूंढेंगे? सिपाही हंस पड़ा था व्यंग्य से। विश्वास मानिए साहब, वह कोई अपराधी नहीं था। बस, आप लोगों की आहट सुनकर न जाने क्यों बाहर निकल गया। शायद डर गया था। पिताजी ने मग्-पा की सुरक्षा में एक और बहाना गढ़ा था।
हम लोग तुम्हीं लोगों की सुरक्षा और सुधार के लिए परेशान हैं और तुम लोग हमारा विरोध करते हो। नहीं साहब, विरोध क्यों करेंगे? हम तो बहुत प्रसन्न हैं आपकी नीतियों से...! जम्पा समझ रहे थे कि पिताजी तात्कालिक बुद्धि से परिस्थिति को सुलटाना चाह रहे हैं।
छोड़ दो इसके बच्चे को। पर एक हफ्ते बाद हम फिर आएंगे। हमें तुम्हारे मग्-पा का पता चाहिए, नहीं तो ठीक नहीं होगा। हो सकता है यह भी रहा हो इन दंगों में।
वे सब चले गए थे। मग्-पा का कोई पता नहीं चला था, परंतु मां और पिताजी ने दूसरे गांव के अन्य बच्चों के साथ उन्हें भी तिब्बत की सीमा के उस पार भेज देने का निर्णय ले लिया था। ‘पर मां, मैं यहां जाकर किसके पास रहूंगा।’ नन्हे जम्पा ने मां और पिताजी के इरादे को सुना तो बेचैनी में पूछ बैठे थे। कई दिनों से गुपचुप उन्हें भेजने की तैयारी चल रही थी। रात में ही मां ने रास्ते में खाने के लिए मासुड् और ज्यूपा की पोटली बांधकर तैयार कर ली थी। रो-रोकर उनका बुरा हाल था। कोन्-चोग् भैया और चिनये दीदी से बिछुड़कर अब अपने नन्हे जम्पा से अलग होने का दुख विकराल था उनके लिए। पिताजी किंकर्तव्यविमूढ़ से कभी मां को और कभी जम्पा को देख लिया करते। उनकी तो जैसे जुबान ही किसी ने छीन ली थी। जम्पा के माथे को अपने ओठों से चूमते हुए बुदबुदा उठते-ऊं मणिपद्मे हूं...रक्षा करना भगवान।
अभी पिछले दिनों यहां सारनाथ में भी एक सौ बासठ तिब्बतियों को भिक्षु बनाया गया। एक तरफ तिब्बत में पराधीन तिब्बतियों की शिक्षा पर भी पहरे हैं और यहां पुन: उसी प्राचीन रीति-रिवाज को कसकर पकड़ने की कोशिश। क्या आप समझते हैं कि इन भिक्षुओं  के  द्वारा आजादी मिल  जाएगी?

मैं नहीं जाऊंगा पिताजी। जम्पा मां—पिताजी की विह्वलता देख उद्विग्न हो उठे थे। नहीं बेटा, हम तुम्हें यहां रोक नहीं सकते। वहां जाओगे तो जीवन सुरक्षित है, पर यहां वे सब ले जाएंगे तो क्या होगा? पिताजी की पथराई-सी आंखें शून्य में टंग गई थीं।
अगर मग्-पा आ जाएंगे तो वे मुझे नहीं ले जाएंगे? भयभीत थे जम्पा भी।
कुछ कहा नहीं जा सकता, बेटा। न तो मग्-पा के लौट आने का भरोसा है और न ही उन सबों की मानसिकता का। सुना है बच्चों को ले जाकर अपने ही देश और संस्कृति के खिलाफ बंदूकें उठाने का प्रशिक्षण देते हैं। पिताजी किसी अशुभ बात को मुंह से न निकालते हुए भी उसकी भयावहता की कल्पना से कांप उठे थे। बहुत बाद में जम्पा को भी उस स्थिति का आभास हुआ था जब उन्होंने कहीं-कहीं पढ़ा कि तिब्बती बच्चों को बलात् उठा ले जाते हैं। इसके पीछे चीनियों का यह तर्क होता था कि अपने बच्चों के बिना माता-पिता अच्छा काम कर सकते थे या फिर बच्चों को उचित शिक्षा के लिए चीनी केंद्र्रों में भेजा गया है। जम्पा ने यह भी खबर सुनी कि लामाओं को विशेष रूप से सताया जा रहा है। उनके ऊपर यह आरोप लगाया जा रहा है कि बिना श्रम किए वे दूसरों के धन पर जीते हैं। इसीलिए उनके साथ क्रूरता का व्यवहार करते हुए उन्हें श्रम केंद्र्रों को भेज दिया जाता है। खासतौर से वृद्ध लामाओं को सता-सताकर मौत के मुंह तक पहुंचा दिया जाता है।
आखिर वह घड़ी आ गई थी जब जम्पा से मां की उंगली हमेशा के लिए छूट गई थी। मां जबरदस्ती अपनी रुलाई रोक रही थीं। खच्चर पर उनकी आवश्यकता का सारा सामान लाद, पिताजी ने मां की उंगली को अपनी नन्ही हथेली में मजबूती से पकड़े जम्पा को अलग किया तो जम्पा का कलेजा सहम गया था। भीतर से विछोह की पीड़ा की तेज लहर उनके हृदय को डुबाती हुई गलीे में आकर फंस गई थी। घबड़ाकर वे मां को कमर से पकड़कर झूल गए थे।
मां, मैं नहीं जा सकूंगा। मुझे मत मेजो मां। वे बिलख पड़े।
मां के धैर्य का बांध टूट गया था। बेटे के सिर को सीने से चिपका लिया और पिताजी से विनती की थी-भगवान के लिए आप और हम भी चलें जम्पा के साथ। ये कैसे पहुंच पाएगा पहाड़ों के उस पार? पिताजी का स्वर भीग गया था। भर्राए गले से बोले-जम्पा की मां, क्या मैं अपने बेटे के प्रति निष्ठुर हूं? हम-तुम यहां की जमीन-जायदाद सब छोड़कर कैसे चले जाएं? फिर दोरजे का हाल नहीं सुना था? बच्चों को लेकर सीमा पार जा रहा था पर इसी पार उसे गिरफ्तार कर जेल में ठूंस दिया गया और बच्चों को गायब कर दिया गया। केवल बच्चे रहते हैं तो जल्दी किसी को शक नहीं होता है अन्यथा मैं कभी अपने जम्पा को अकेले नहीं भेजता। पिताजी ने तर्क दिया था। 
विवशता में अपने से अलग किया था मां ने उन्हें और हिदायतें देने लगी थीं-देखो, संभलकर चढ़ना चोटियों पर। ज्यादा ठंड लगे तो चुक-टू भी ओढ़ लेना। जम्पा उदास आंखों से ताकते, सिर हिला हामी भर रहे थे। रात में सभी बच्चों के बीच में सोना। हूं। जम्पा को तेजी से रुलाई फूट पड़ी। घबराओ नहीं जम्पा। उस पार तुम लोगों के लिए उचित व्यवस्था है। अनाथ नहीं रहोगे तुम। भारत सरकार के सहयोग से शरणार्थियों के लिए रहने और पढ़ने की व्यवस्था परम पावनजी ने की है। यही बच्चे उनकी उम्मीद हैं। बहुत ध्यान से वहां उनका पालन-पोषण होता है।
पिताजी एक ही उत्तर से मां और उन्हें दोनों को आश्वस्त करने में लगे थे। आप सीमा तक इसके साथ जाएंगे न? मां अधीर होकर पूछ रही थीं। पूरा प्रयास करूंगा कि अपने सामने ही इन सबको चोटियों पर चढ़ाकर तब लौटूं। आगे भगवान जानें। उन्होंने जम्पा की उंगली पकड़ ली थी।
अपना हाल किसी भी तरह भेजना बेटा। मां का करुण क्रंदन युम् डोग्-छो की निस्तब्ध वादियों को भंग करने लगा था।
जम्पा बेचैनी में उठकर खड़े हो गए थे। कमरे के भीतर तक आज भी मां की सिसकियां सुनाई पड़ रही थीं। तब से लेकर आज तक न तो मां की ही कोई खबर मिली और न ही वे किसी भी तरह अपना हाल मां तक पहुंचा पाए। न जाने किस हाल में होंगे मां और पिताजी? मां तो अब इतनी बूढ़ी हो गई होंगी कि शायद ही सूरत से पहचान में आएं। पर उनके सीने की ऊष्मा और ममतामयी धड़कनें ही उसका पता होंगी। स्वयं उन्हें भी तो देखकर शायद ही मां पहचान सके। नन्हे से जम्पा का ध्यान होगा उसे। इन तीस-पैंतीस वर्षों में कितना कुछ तो बदल चुका है। उनकी मठ में शिक्षा पूरी हुई, फिर गेशे की पदवी के साथ ही उन्हें इस संस्थान के अध्यक्ष के रूप में बच्चों को शिक्षित करने और अपनी जड़ों से जुड़े रहने की दीक्षा देने का दायित्व भी सौंपा गया है। काश! मां होतीं इस समय यहां। वे बेचैनी में टहलने लगे। सामने खिड़की से सांची का अशोक स्तंभ साफ दिखाई दे रहा था। उन्होंने घड़ी की ओर देखा। याद आया, इस समय देवयानी का अंतिम पीरियड चल रहा होगा। कुछ ही देर में वह आएगी। कितनी आत्मीय-सी लगती है बातचीत में। अपने विषय के साथ ही आसपास के परिवेश पर भी कितनी सशक्त पकड़ है उसकी। पैनी दृष्टि से चीजों को परखती है और फिर अपनी निर्भीक टिप्पणी दे डालती है, बिना यह परवाह किए कि सामने वाले को बुरा भी लग सकता है।
सर, क्या आपको भी यह नहीं लगता है कि आज के वैज्ञानिक युग में वह भी जब आपके समुदाय को आजादी चाहिए, भिक्षु नहीं बलिक वीर सैनिक बनाए जाने चाहिए? एक दिन धर्म पर बातें करते-करते एकाएक गेशे जम्पा के सामने ही बोल पड़ी थी।
क्या तात्पर्य है? गेशे जम्पा ने शांत स्वर में पूछा था।
यही कि अभी पिछले दिनों यहां सारनाथ में भी एक सौ बासठ तिब्बतियों को भिक्षु बनाया गया। एक तरफ तिब्बत में पराधीन तिब्बतियों की शिक्षा पर भी पहरे हैं और यहां पुन: उसी प्राचीन रीति-रिवाज को कसकर पकड़ने की कोशिश। क्या आप समझते हैं कि इन भिक्षुओं के द्वारा आजादी मिल जाएगी? (जारी...)