कंगना से डरे हुए हैं बॉलीवुड के कायर

    दिनांक 11-सितंबर-2020
Total Views |
डॉ. अजय खेमरिया
अभिनेत्री कंगना ने वह हिम्मत दिखाई है, जो कम लोगों में दिखती है। उन्होंने उस बॉलीवुड को चुनौती दी है, जिस पर एक गिरोह की ही चलती है। उनके साहस को देखकर उस गिरोह के सदस्य और उनके आका डरते हुए दिखने लगे हैं

kangana_1  H x
गत 9 सितंबर को मुम्बई में अभिनेत्री कंगना रनौत के कार्यालय को बृहन्मुम्बई म्युनिसिपल कॉरपोरेशन (बीएमसी) ने अवैध निर्माण के नाम पर तोड़ दिया। देश का हर निष्पक्ष व्यक्ति कह रहा है कि यह कार्रवाई सत्तारूढ़ शिवसेना के इशारे पर हुई। पिछले कुछ दिनों में शिवसेना और कंगना के बीच क्या हुआ, यह तो सबको पता है। इसलिए यहां यह देखने वाली बात है कि कंगना ने सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद जो मुद्दे उठाए हैं, वे कितने महत्वपूर्ण हैं। कंगना ने बॉलीवुड में भाई-भतीजावाद, वहां के पाखंड और कथित सेकुलरवाद को लेकर जो बातें कही हैं, उन पर पूरे देश को विचार करना चाहिए। दरअसल, बॉलीवुड का अपना एजेंडा है, जो वामपंथी विचारधारा से प्रेरित है। इसके अंतर्गत कला और अभिनय के नाम पर जिहादी बौद्धिक जमात ने अपना सांस्कृतिक साम्राज्य खड़ा कर लिया है। इस साम्राज्य में वही फलता-फलता है, जो उसकी हां में हां मिलाता है। बाकी को ये लोग किसी न किसी बहाने किनारे कर देते हैं। दुर्भाग्य से ऐसे लोगों को कुछ दिनों से शिवसेना का साथ मिल रहा है। इसलिए जब कंगना ने बॉलीवुड पर अंगुली उठाई तो शिवसेना उनके विरोध में उतर गई। जिन लोगों को लग रहा था कि उनके साम्राज्य को कोई चुनौती नहीं दे सकता है, उनकी धारणा को कंगना ने एक झटके में खत्म कर दिया है। उन्होंने उनके 70 साल पुराने एजेंडे को ही चुनौती दे दी है। कंगना के इस व्यवहार से बॉलीबुड के कथित सितारों को भी डर सताने लगा है कि अब उनकी भी असलियत बाहर आ जाएगी।
इसमें कोई दो राय नहीं है कि देश के बौद्धिक विमर्श को दूषित करने में बॉलीवुड की एकपक्षीय भूमिका रही है। इसलिए इसे गहराई से समझने की आवश्यकता है। वास्तव में पूरा सिने जगत उसी बौद्धिक जिहाद को आगे बढ़ाने में संलग्न रहा है, जिसकी पटकथा वामपंथियों द्वारा लिखी गई है। उदारवाद और सेकुलरवाद, ऐसे खतरनाक वैचारिक हथियार हैं, जिनके माध्यम से वामपंथियों ने अपनी विचारधारा को सफलतापूर्वक भारतीय लोकजीवन में स्थापित किया है। इस धीमे वैचारिक बिषरोपण का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि ‘पीके’ जैसी फिल्में भगवान शंकर का सार्वजनिक अपमान करती हैं, लेकिन हमारा समाज उसे कला के नाम पर न केवल अधिमान्यता देता है, बल्कि करोड़ों की कमाई से आमिर खान की झोली भर देता है। ऐसा वामपंथी विचारधारा के बढ़ते प्रभाव के कारण होता है। लोग अपने आराध्य के अपमान को कला के नाम पर सह जाते हैं। हमारी इसी उदारता का लाभ उठाकर आमिर उस तुर्की के प्रथम परिवार का मेहमान बनते हैं, जिसने दुनियाभर में भारत विरोध का झंडा उठा रखा है।
हम सबको यह पता है कि बॉलीबुड की तमाम फिल्मों में हमारे देवी-देवताओं को अदालत में खड़ा कर दिया जाता है। मन्दिर के पुजारी को बलात्कारी और किसी मौलवी को एक नेक इंसान के रूप में ही दिखाया जाता है। ध्यान से देखें तो कला और अभिनय का पूरा एजेंडा ही सदियों पुरानी सनातन जीवनशैली को लांछित करना रहा है। अभिनय के माध्यम से पाकिस्तानी कलाकारों को स्थापित करने का कोण भी समझा जाना चाहिए, जो अंतत: खान गैंग की उसी मनोवैज्ञानिक और प्रत्यक्ष उपस्थिति को स्वयंसिद्ध करता है, जिसकी झलक हमें आमिर खान, शाहरुख खान,नसीरुद्दीन, सलमान जैसे अभिनेताओं के बयानों में दिखती है।
70 के दशक में इतिहासकार बिपिन चंद्रा ने कहा था,‘‘हम भारत में साम्प्रदायिक राजनीति को खत्म कर देंगे।’’ इसका आशय केवल सेकुलर राजनीति की उस मान्यता को मजबूत करना था, जो अल्पसंख्यकवाद की वकालत और हिंदुत्व को अपमानित करने के धरातल पर टिकी है। याद कीजिए कठुआ बलात्कार कांड को। करीना कपूर खान, शबाना आजमी, श्रुति सेठ, जावेद अख्तर, फरहान अख्तर, महेश भट्ट, करन जौहर, दीपिका, स्वरा भास्कर जैसे सेकुलर कलाकार हिंदुओं को बदनाम करने के लिए सड़कों पर कूद पड़े थे। भारत को ‘बलात्कारियों की धरती’ तक कहा गया, क्योंकि तब राहुल गांधी भी इस मुद्दे को हिन्दू-मुस्लिम के नजरिए से उठा रहे थे। दादरी की घटना के बाद तो शबाना,स्वरा, शाहरुख, आमिर, नसीर सहित तमाम कलाकारों को परिवार सहित डर लगने लगा था भारत में। लेकिन कुछ दिनों बाद मंदसौर, अर्थला, सासाराम और राजस्थान की मस्जिदों में बलात्कार की घटनाएं हुईं तो यह पूरा कुनबा ऐसे चुप हो गया, मानो इन्हें कुछ भी पता नहीं। ऐसे ही कुछ मुसलमानों की हत्या पर जिन लोगों को देश में असिहष्णुता फैलने का डर सता रहा था, वे लोग पालघर और पुणे में साधुओं की हत्या पर चुप हो गए। दिल्ली में 2016 से अब तक डॉ. पंकज नारंग, अंकित सक्सेना सहित चार लोगों की हत्या मुसलमानों की भीड़ ने की, लेकिन न तो किसी बॉलीवुड वाले ने कुछ कहा और न ही किसी सेकुलर बुद्धिजीवी ने। सबरीमाला, तीन तलाक, अनुच्छेद 370, राम मंदिर, गौरी लंकेश, वेमुला से लेकर सीएए ,एनआरसी के मुद्दों को ध्यान से देखें तो बॉलीवुड का दोगला रवैया स्पष्ट प्रमाणित होता आया है। इसे आप केवल सरकार से असहमति के सतही अर्थ में समझने की भूल न करें। यह उसी एकपक्षीय अभिव्यक्ति का हिस्सा है जो भारत और भारतीयता विरोधी तत्वों को महिमामंडित करता है। असल में महेश भट्ट, अनुराग कश्यप, करन जौहर, एकता कपूर जैसे आज के बड़े नाम ‘खान गैंग’ के मोहरे भर हैं।
बॉलीवुड के सांस्कृतिक साम्राज्यवाद को ‘शिकारा’ जैसी फिल्मों के जरिए समझने की आवश्यकता है। यह फिल्म कश्मीरी पंडितों पर बनाई गई है, पर इसमें उन मुसलमानों को ही ‘इंसानियत का सिपाही’ बताया गया है, जिन्होंने कश्मीरी पंडितों को अपने ही देश में शरणार्थी बना दिया, उनकी बहू-बेटियों के साथ बलात्कार किया, और जिन्होंने अपने ही पड़ोसियों की हत्या करने में कोई संकोच नहीं किया। इसी से पता चलता है कि बॉलीवुड में क्या चल रहा है।
आज कंगना ने कश्मीरी पंडितों पर फिल्म बनाने की घोषणा की है तो ‘खान गैंग’ के लिए यह अभिनेत्री मानसिक रूप से विक्षिप्त नजर आने लगी है। कंगना प्रकरण ने कथित नारीवादियों को भी बेनकाब कर दिया है। उनके साथ इतना कुछ हो गया, लेकिन बॉलीवुड में नारीवाद की बात करने वालों में से किसी ने भी उनके पक्ष में एक बयान देना भी ठीक नहीं समझा। कल्पना कीजिए अगर कंगना की जगह शबाना,स्वरा, दीपिका, एकता में से किसी के कार्यालय पर भाजपा सरकार के समय बुलडोजर चलता तो क्या होता? पूरा बॉलीवुड सर पर पहाड़ उठा लेता और सेकुलर पत्रकार बढ़-चढ़कर उस खबर को दिखाते या छापते। इतनी ही नहीं, पूरी दुनिया में एक अभियान चलाया जाता और लोग चिल्लाते, ‘‘देखो भारत में सांप्रदायित ताकतें कितनी मजबूत हो गई हैं। एक नारी का अपमान किया जा रहा है।’’
यह अच्छी बात है कि सुशांत की मौत के बहाने जांच एजेंसियां बॉलीवुड की कुंडली खंगाल रही हैं। उम्मीद है बॉलीवुड में जो सड़ांध है, वह दूर होगी और इसमें ऐसे कलाकारों की चलेगी, जो वास्तव में कलाकार हैं।