संकल्प सृष्टि रक्षा का

    दिनांक 11-सितंबर-2020
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  पाञ्चजन्य ब्यूरो 

30 अगस्त को विश्वभर में करोड़ों लोगों ने फेसबुक और अन्य साधनों के जरिए प्रकृति वंदन कार्यक्रम में हिस्सा लिया और प्रकृति की रक्षा का संकल्प दुहराया

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प्रकृति वंदन कार्यक्रम के दौरान पेड़ की पूजा करता एक परिवार।

गत 30 अगस्त को ‘हिन्दू अध्यात्म-सेवा प्रतिष्ठान’ तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ‘पर्यावरण संरक्षण गतिविधि’ के संयुक्त प्रयास से प्रकृति वंदन कार्यक्रम आयोजित हुआ। प्रात: 10 बजे भारत में पंजीकृत 12,00000 परिवारों के साथ करोड़ों प्रकृति प्रेमियों ने विश्वभर में प्रकृति वंदन किया। लोगों ने फेसबुक के सहारे उसे देखा एवं दिखाया। इसका उद्देश्य था लोगों में प्रकृति की रक्षा के भाव को जगाना। कार्यक्रम के लिए घरों-मोहल्लों को सजाया गया। पेड़, पौधा, तुलसी, के साथ गोमाता, गज आदि का वंदन किया गया। वृक्ष की आरती तथा प्रकृति वंदन का महत्व समझाने वाले गीत गाए गए। बिहार प्रदेश ने एक नया कीर्तिमान स्थापित किया। डाक-विभाग के प्रमुख अधिकारी के निवेदन के परिणामस्वरूप प्राय: 10,000 डाकघरों में इस अवसर पर 5-5 पौधे रोपे गए।

इस कार्यक्रम को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत का विशेष आशीर्वाद मिला। इसके अलावा माता अमृतानंदमयी, श्रीश्री रविशंकर, स्वामिनारायण सम्प्रदाय के प्रमुख स्वामी, कांची कामकोटी तथा श्रृंगेरी मठ के शंकराचार्य, साध्वी ऋतंभरा, स्वामी अवधेशानंद गिरि जी महाराज तथा देशभर में कार्यरत कई मठ-आश्रमों के महंत-संत, जैन मुनि तथा कई गणमान्य शिक्षाविद्, कुलपति, समाजसेवी  आदि सैकड़ों श्रेष्ठ जन ने इस महती कार्य में हार्दिक समर्थन एवं सहयोग देने का संदेश प्रसारण हेतु उपलब्ध कराया। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने जनता से आह्वान किया कि प्रकृति वंदन आज के संकट से मुक्ति दिलाने वाला एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम है। इसमें भारत की संपूर्ण जनता सहभागी हो।



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अभी पर्यावरण शब्द बहुत सुनने को मिलता है। मनाने का दिन भी तय है। यह सब इसलिए करना पड़ रहा है कि हम इस सोच के साथ जी रहे हैं कि प्रकृति का दायित्व मनुष्य पर नहीं है। मनुष्य का पूरा अधिकार प्रकृति पर है। पिछले 300 वर्ष से इसी सोच के साथ जी रहे हैं जिसका दुष्परिणाम सबके सामने है। यदि ऐसे ही चलता रहा तो न हम लोग बचेंगे और न ही सृष्टि बचेगी। -मोहनराव भागवत, सरसंघचालक

भारत से बाहर नेपाल, श्रीलंका, त्रिनिदाद, हंगरी, जर्मनी, कनाडा, हॉलैण्ड, इंग्लैंड, मॉरिशस, अमेरिका, यूरोप, अफ्रिका आदि कई देशों में बसे भारतीय मूल के लोगों के साथ स्थानीय नागरिकों ने भी आनलाइन प्रकृति वंदन कार्यक्रम में भगीदारी की।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरंसघचालक श्री मोहनराव भागवत ने प्रकृति वंदन कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि विश्व में अभी जीवन जीने का जो तरीका प्रचलित है, वह पर्यावरण के अनुकूल नहीं है। यह तरीका प्रकृति को जीतकर मनुष्य को जीना सिखाता है। जबकि हमें प्रकृति का पोषण करना है, शोषण नहीं। भारत में यह तरीका 2000 वर्ष से प्रचलित है।
उन्होंने कहा कि इस तरह के कार्यक्रम के माध्यम से उस संस्कार को जीवन में पुनर्जीवित करना है और आने वाली पीढ़ी भी यह सीखे, यह ध्यान रखना है। उन्?होंने कहा कि अभी पर्यावरण शब्द बहुत सुनने को मिलता है। मनाने का दिन भी तय है। यह सब इसलिए करना पड़ रहा है कि हम इस सोच के साथ जी रहे हैं कि प्रकृति का दायित्व मनुष्य पर नहीं है। मनुष्य का पूरा अधिकार प्रकृति पर है। पिछले 300 वर्ष से इसी सोच के साथ जी रहे हैं जिसका दुष्परिणाम सबके सामने है। यदि ऐसे ही चलता रहा तो न हम लोग बचेंगे और न ही सृष्टि बचेगी। इसलिए जब विश्व के लोगों का ध्यान इस ओर गया तो पर्यावरण दिवस मनाने लगे, मनाया जाना भी चाहिए। पर्यावरण का संरक्षण कैसे हो, इस पर सभी को सोचना चाहिए।

वामन अवतार का संदेश
30 अगस्त को भाद्रपद शुक्ल द्वादशी थी। इसी तिथि को वामन अवतार हुआ था। इन दिनों केरल में परंपरागत 10 दिवसीय ओणम पर्व मनाया जा रहा है। पहला दिन वामन जयंती के रूप में भी मनाया जाता है। कार्यक्रम में लोगों को बताया गया कि यह पौराणिक कथा प्रकृति की रक्षा की प्रेरणा देती है। कथा के अनुसार राजा बली स्वभाव से बड़े दानी थे। दान देने की प्रवृत्ति के कारण वे दानी से महादानी कहलाने लगे। इसके बाद दानी होने का अहंकार उन पर हावी होने लगा। दान में पेड़-पौधे, जमीन आदि का अंधांधुंध दान होता देख ईश्वरी सत्ता को चिंता हुई। प्रकृति का संतुलन बिगड़ता देख पालनकर्ता विष्णु ने छोटे कद के वामन के रूप में भारत में जन्म लिया। यथा समय राजा बली की यज्ञशाला में हो रहे हवन-समापन के अवसर पर उन्होंने राजा बली से दान में तीन कदम भूमि मांगी। राजा बली ने हां भर दी। देखते ही देखते अपना विराट रूप धारण कर वामन ने पहले में स्वर्ग और दूसरे कदम में नर्क को नाप लिया। तीसरा कदम अब कहां रखा जाए यह पूछने पर राजा बली ने अपना सर उनके चरणों पर रख दिया। वामन ने राजा बली को पाताल लोक पहुंचा दिया। इस पौराणिक कथा का निहितार्थ यही है कि भगवान वामन ने असूरराज राजा बली से तीन चीजें दान में मांगीं। पहली चीज उनके राज की उपजाऊ जमीन अर्थात् स्वर्ग, दूसरी चीज बंजर जमीन अर्थात् नर्क और तीसरी बात नतमस्तक होकर दानवीर होने के अहंकार का त्याग। दान में अपने राज की पूरी जमीन दे देने के बाद अहंकार करने का कोई साधन ही नहीं रहा। आज के परिप्रेक्ष्य में मानव जाति विकास के नाम पर प्रकृति का विनाश जिस गति से कर रही है उसे देखते हुए आज भी समाज को वामन भगवान की इसी मानसिकता से प्रकृति की ओर देखना होगा। उपजाऊ जमीन की रक्षा, बंजर जमीन का संवर्धन एवं पाताल अर्थात् जमीन के अंदर बहते पानी एवं खनिज संपदा का सदुपयोग।  - लक्ष्मीनारायण भाला

श्री भागवत ने कहा कि भारत में जीने का तरीका अलग है। हमारे पूर्वजों ने अस्तित्व के सत्य को पहचान लिया था। हम भी प्रकृति के अंग हैं, यह भाव शुरू से है। जिस तरह शरीर के सभी अंग काम करते हैं तो शरीर चलता है, और शरीर में प्राण नहीं रहता है तो शरीर के सभी अंग धीरे-धीरे काम करना बंद कर देते हंै। उसी तरह प्रकृति और मनुष्य का संबंध है। उन्?होंने कहा कि पेड़ में भी प्राण है, यह शुरू से भारत के लोग जानते हैं। शाम में पेड़ को नहीं छुआ जाता था। अपने यहां घरों में सबका पोषण करने का भाव शुरू से रहा है। चींटी, गाय, कुत्ता व जरूरतमंद आदि को भोजन घरों में कराया जाता रहा है। अपने जीवन जीने के तरीके में क्या करना है और क्या नहीं करना है, यह तय है, लेकिन भटके हुए तरीके के प्रभाव में आकर सब भूल गए। इसलिए अब पर्यावरण दिवस के रूप में मनाकर स्मरण कराना पड़ रहा है। परंतु जिस तरह इसे मना रहे हैं, उसी तरह दूसरे दिनों में इसे मनाते हुए आने वाली पीढ़ी में प्रकृति को जीवंत रखने का भाव जगाना है। ऐसा करेंगे, तब 350 वर्ष में जो क्षति हुई है, उसे अगले 200 वर्ष में ठीक कर सकते हैं।

सरसंघचालक ने कहा कि सृष्टि सुरक्षित रहेगी तभी मानव जाति सुरक्षित रहेगी। इस बात को हमें अपने आचरण में उतारना होगा। संपूर्ण सृष्टि के पोषण के लिए अपने जीवन को सुंदर बनाना होगा। सबकी उन्नति के लिए काम करने का भाव रखते हुए आगे
बढ़ना होगा।