तथाकथित स्त्री अधिकारों की बात करने वाले और नारीवाद का डंका पीटने वाले संगठन कंगना मामले पर क्यों साधे हैं चुप्पी ?

    दिनांक 11-सितंबर-2020   
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डॉ अंशु जोशी

फिल्म अभिनेत्री कंगना का ऑफिस बेरहमी से तोड़ दिया गया, लेकिन तथाकथित स्त्री अधिकारों की बात करने वाले, मोमबत्ती लेकर बात—बात पर जुलूस निकालने वाले, नारीवाद का डंका पीटने वाले, अपने आप को प्रगतिशील और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का पक्षधर घोषित करने वाले संगठन और कार्यकर्ता नदारद हैं। महाराष्ट्र सरकार के खिलाफ उनके मुंह से एक शब्द भी नहीं निकल रहा

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तमाम झोला और मोमबत्ती छाप तथाकथित नारीवादियों और महाराष्ट्र सरकार के नाम,
पिछले कुछ दिनों से कंगना के साथ लिए जा रहे राजनीतिक बदले पर काफी कुछ देख, सुन और समझ रही हूँ। आश्चर्यचकित हूँ कि एक स्त्री के साथ सिर्फ इसलिए ये सब किया जा रहा है क्योंकि वह बेख़ौफ़ हैं और अपनी बेबाक राय सबके साथ साझा कर लेती हैं। वह सालों से मुंबई की होकर भी आज इसलिए मुंबई की नहीं क्योंकि एक साथी कलाकार की मौत पर निष्पक्ष जांच की मांग की। उसका ऑफिस बेरहमी से सिर्फ इसलिए तोड़ दिया गया क्योंकि उसने महाराष्ट्र सरकार से कुछ सीधे सवाल किये जिसका उसे एक भारतीय नागरिक होने के नाते अधिकार है। उसे धमकियां दी जा रही हैं, क्योंकि वह राजनीतिक चालों की बिसात के बीच न्याय की मांग रख रही है। ऐसे लोगों और घटनाओं को बेनकाब कर रही हैं, जो समाज के लिए जानना आवश्यक है। और इन सबके बीच देखती हूँ कि तमाम तथाकथित स्त्री अधिकारों की बात करने वाले, मोमबत्ती लेकर बात—बात पर जुलूस निकालने वाले, नारीवाद का डंका पीटने वाले, अपने आप को प्रगतिशील और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का पक्षधर घोषित करने वाले संगठन और कार्यकर्ता नदारद हैं। वाह रे खोखला नारीवाद और खोखले नारीवादी!

पहले आपने कंगना के काम पर फब्तियां कसीं। पर आप भूल गए कि विभिन्न प्रकार के चरित्रों का निर्वहन करना एक कलाकार का अधिकार है। फिर आपने उसके चरित्र को निशाना बनाया। आप यहां भी भूल गए कि आप ही अपने नारीवादी भाषणों और जुलूसों में चिल्ला—चिल्ला कर कहते हैं कि एक स्त्री के चरित्र पर कीचड़ उछालने से निकृष्टतम कार्य और कुछ नहीं हो सकता। और ये कि व्यक्ति का व्यक्तिगत जीवन उसका अपना सरोकार होता है। संजय दत्त की वजह से सैकड़ों की जान चली जाय, उन पर देश द्रोही गतिविधियों के लिए टाडा लगे, वे जमानत के बाद अपने पिता के साथ सीधे मातोश्री जाएं,  वे गर्वोक्ति कर बताएं कि कितनी स्त्रियों के साथ उनके अवैध शारीरिक सम्बन्ध रहे या उन्होंने कौन—कौन से ड्रग्स का सेवन किया तो कोई बात नहीं, संजू जैसी फिल्में बना कर उन्हें महिमा मंडित कर दिया जाता है। वे एक पुरुष हैं तो न शिव सेना को इस पर कुछ कहना है न मोमबत्ती ब्रिगेड को। पर कंगना के चरित्र हनन से ऑफिस तोड़ने तक के सारे हथकंडे आप अपना सकते हैं।

तमाम नारीवादी जो वैसे तो हर बात पर स्त्री अधिकारों का बिगुल बजाने से नहीं चूकते, यहाँ एक स्त्री की अस्मिता पर प्रहार पर चुप्पी साधे बैठे हैं। आज यही कंगना अगर वामपंथी होतीं तो आप तुरंत सक्रिय हो जाते, जुलूस निकालते, अवार्ड वापसी शुरू कर देते, पानी पी—पी कर सरकार को कोसना शुरू कर देते, पर आप बिलकुल चुप हैं। और ये चुप्पी मुझे स्पष्ट कर देती हैं कि आप एक राजनीतिक एजेंडे के तहत काम करते हैं, जिसमें आपको स्त्री के अधिकारों की लड़ाई से कोई लेना देना नहीं है। आपके लिए स्त्री अधिकारों की लड़ाई बड़ी "सेलेक्टिव" है। एक ऐसी लड़की जो सुदूर हिमाचल से आ, पुरुष प्रधान कार्यक्षेत्र में अपना नाम और मुकाम बनाती है,आपको वामपंथ के काले चश्में से देखने पर दिखाई नहीं देगी, क्योंकि वह आपके जला दो, मिटा दो जुलूसों का हिस्सा नहीं है, क्योंकि वे शाहीन बाग़ नहीं गयी, या उसने जेएनयू जाकर नारीवाद की ठेकेदारनियों की पीठ थपथपा उन्हें टीवी और सोशल मीडिया पर मशहूर नहीं किया। अच्छा ही है, कम से कम मेरे जैसे साफ़—साफ़ देख पाने वाले लोगों के लिए आपका खोखला नारीवाद साफ़ है। 

बहरहाल, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव से ऐसे कार्य की आशा बिलकुल नहीं थी। मैं मानती हूँ कि कई बार राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं सोचने समझने की शक्ति क्षीण कर देती हैं, पर यहाँ तो लगता है इन्होंने कांग्रेस की टोपी कुछ इस तरह पहन ली है कि सब शक्ति ही समाप्त हो गयी है। अव्वल तो बाला साहेब जैसी कद्दावर शख्सियत के बेटे को सोनिया माइनो के आगे नतमस्तक देख बड़ा दुःख हुआ। आखिर कंगना ने ऐसा क्या किया कि पूरी शिव सेना को उसके पीछे लगा दिया? आज आपने कंगना को क्षेत्रीय राजनीति का शिकार बनाया पर ये याद रखिये कि मुंबई एक कॉस्मोपोलिटन शहर है और उसे मुंबई बनाने में विभिन्न प्रान्त से आये लोगों का योगदान है। दूसरा, इस राष्ट्र का संविधान हर भारतीय नागरिक को ये अधिकार देता है कि वह भारत में कहीं भी जाकर रह और बस सकता है। कंगना यदि सुशांत के लिए न्यायिक जांच की मांग करती हैं या यदि ड्रग्स के रैकेट के बारे में कुछ जानकारी साझा करती हैं तो उसमें आपको क्या आपत्ति है? एक दिन का नोटिस देकर बीएमसी उनका पूरा ऑफिस तहस नहस कर देती है, क्या सभी डिफाल्टर्स के साथ यही और ऐसे ही किया जाता है ? देवी—देवताओं पर अभ्रद टिप्पणी और चित्र

बनाने वालों पर शिवसेना को गुस्सा क्यों नहीं आता ? हिंदुत्व पर छिछोरे कार्यक्रम बनाने वालों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर इस राष्ट्र की संस्कृति का अपमान करने वालों पर शिवसेना क्यों कुछ नहीं करती ? क्या उद्धव सरकार को नहीं लगता कि एक स्त्री के साथ ऐसा अशोभनीय व्यवहार कर आप स्वयं अपना नाम ख़राब कर रहे हैं ? यकीनन महाराष्ट्र सरकार के इस तरह के व्यवहार से चार कंगना और सामने आएंगीं। देखिएगा।
(लेखिका जेएनयू में सहायक प्राध्यापक हैं)