आधुनिकतम तकनीकों तक पहुंच चुकी है हिंदी

    दिनांक 14-सितंबर-2020
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बालेन्दु दाधीच

अगर आज भी आपको लगता है कि हिंदी में कंप्यूटर और मोबाइल पर ऐसा नहीं किया जा सकता या वैसा नहीं किया जा सकता तो शायद आपको पूरी जानकारी नहीं है या फिर आप बहुत पुरानी तकनीकों के साथ नए दौर को जीत लेने की कोशिश में हैं। हिंदी बुनियादी तकनीकी समस्याओं से ऊपर उठ चुकी है और अधिकांश मामलों में जो कुछ अंग्रेजी में किया जा सकता है, वही हिंदी में भी किया जा सकता है।
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जी हां, शीर्षक का तात्पर्य स्पष्ट है। अगर आज भी आपको लगता है कि हिंदी में कंप्यूटर और मोबाइल पर ऐसा नहीं किया जा सकता या वैसा नहीं किया जा सकता तो शायद आपको पूरी जानकारी नहीं है या फिर आप बहुत पुरानी तकनीकों के साथ नए दौर को जीत लेने की कोशिश में हैं। हिंदी बुनियादी तकनीकी समस्याओं से ऊपर उठ चुकी है और अधिकांश मामलों में जो कुछ अंग्रेजी में किया जा सकता है, वही हिंदी में भी किया जा सकता है। फिर भले ही वह कोई भी क्षेत्र हो- ऑनलाइन या ऑफलाइन, मोबाइल या कंप्यूटर, ब्राउज़र या सॉफ़्टवेयर, क्लाउड या कृत्रिम बुद्धिमत्ता (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस)। बातें अब टेक्स्ट इनपुट या टाइपिंग, फॉन्ट, कीबोर्ड आदि से बहुत आगे बढ़ चुकी हैं। अब भी अगर कोई टाइपिंग की दिक्कतों में अटका है तो शायद वह कहीं न कहीं अपने दौर के तकनीकी घटनाक्रम से कटा हुआ है। मैं अपने लंबे अनुभव के आधार पर यह बात कह रहा हूँ।

हम एक लंबे अरसे से भारतीय भाषाओं, खासकर हिंदी के प्रति तकनीकी कंपनियों के बढ़ते रुझान की चर्चा करते रहे हैं। एक क्षेत्र जो हमारी चर्चाओं से प्रायः अछूता रह जाता है और डिजिटल माध्यमों पर हिंदी के प्रयोग में जिसका गहन योगदान गंभीर विमर्श से विस्मृत रहा है, वह है दूरसंचार और मोबाइल उपकरणों का क्षेत्र। पिछले कुछ वर्षों में डिजिटल माध्यमों पर होने वाले हिंदी संवाद में कंप्यूटर पीछे है, मोबाइल आगे है। उसकी वजह स्पष्ट है-भारत में लगभग एक अरब मोबाइल फोनों की मौजूदगी जो हमारे देश के अधिकांश परिवारों को दूरसंचार तकनीकों से जोड़ रहे हैं। मोबाइल फोन को भले अब तक गंभीर उत्पादकता का उपकरण नहीं माना जा सकता है लेकिन जहां तक सामग्री के उपभोग और संवाद का प्रश्न है, वह एक मजबूत मंच बनकर सामने आया है। इस माध्यम से जितनी बड़ी संख्या में लोग जुड़े हैं उसी के अनुरूप भारतीय भाषाओं में मांग पैदा हो रही है और जहाँ पर मांग होती है वहाँ पर आपूर्ति की आवश्यकता तथा गुंजाइश दोनों प्रकट हो जाती हैं।

नतीजा यह है कि आज मोबाइल पर हिंदी में काम करना कंप्यूटर के जितना ही, बल्कि अनेक लोगों की राय में कंप्यूटर से भी अधिक, सरल-सुगम-सुविधाजनक बन चुका है। न सिर्फ टाइपिंग के नवाचारयुक्त तौर-तरीके आ चुके हैं बल्कि पूरे के पूरे उपकरण की भाषा को बदलकर हिंदी में तब्दील किया जा सकता है। हिंदी में बोलकर टाइप करने से लेकर बोलकर निर्देश देने तथा खोज करने जैसी आश्चर्यजनक प्रतीत होने वाली घटनाएं भी अब हमें चौंकाती नहीं हैं क्योंकि मोबाइल ने उनके बारे में तेजी से जागरुकता पैदा कर दी है। इतना ही नहीं, अब भारतीय भाषाओं को लक्ष्य बनाकर पूरी की पूरी संचालन प्रणालियां (ऑपरेटिंग सिस्टम) और यहाँ तक कि मोबाइल उपकरण भी बाजार में आ गए हैं।


फेसबुक और एपल ने भी हिंदी की ओर कदम बढ़ाए हैं। फेसबुक अपने यहाँ आने वाली टिप्पणियों का अनुवाद करने की सुविधा दे रहा है तो एपल की युक्तियों पर भी हिंदी में काम करना आसान हुआ है।

कुछ साल पहले माइक्रोमैक्स नामक कंपनी ने यूनाइट के नाम से एक अलग मोबाइल फोन ही निकाल दिया था जिसे भारतीय भाषाओं में काम करने के लिए खास तौर पर डिजाइन किया गया था। इस मोबाइल फोन में पहले से ही भारतीय भाषाओं के एप्लीकेशन, कीबोर्ड, फॉन्ट और सुविधाएँ मौजूद थीं और अपनी भाषा में काम करने के लिए अलग से कुछ डाउनलोड करने की अनिवार्यता नहीं है। इससे प्रेरित होकर अब दूसरी कंपनियाँ भी हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में सक्षम स्मार्टफोन लांच करने में जुटी हैं। इंडस ओएस के नाम से भारतीय भाषाओं का एक ऑपरेटिंग सिस्टम आ गया है जिसे बड़ी संख्या में मोबाइल फोनों पर स्थापित किया गया है। इसकी लोकप्रियता का आलम यह है कि एंड्रोइड के बाद इंडस ओएस के दूसरे नंबर का सबसे लोकप्रिय मोबाइल फोन ऑपरेटिंग सिस्टम होने का दावा किया जा रहा है। यानी एपल के आईओएस ऑपरेटिंग सिस्टम को इस खांटी भारतीय भाषायी ऑपरेटिंग सिस्टम ने पीछे छोड़ दिया है।



हिंदी और भाषायी बाजार की मजबूती की कुछ मिसालें हैं ये। लेकिन बात दूरसंचार तक ही सीमित नहीं है। एक तरफ डिजिटल इंडिया को व्यावहारिक दृष्टि से सफल बनाने के लिए सरकार भारतीय भाषाओं में तकनीक को प्रोत्साहित करने में जुटी है तो दूसरी ओर ई-कॉमर्स के क्षेत्र में अचानक इन भाषाओं की अहमियत समझी जा रही है। अमेजॉन के सीईओ जेफ बेजोस ने कभी बयान दिया था कि भारत में ई-कॉमर्स के क्षेत्र में स्थानीय बाजार खरबों अमेरिकी डॉलर का है। इस बाजार तक पहुँचने में भारतीय भाषाओं की अहम भूमिका होने वाली है। अमेजॉन खुद अपनी वेबसाइट और वेब सेवाओं को भारतीय भाषाओं में ला चुकी है। उसके स्मार्ट स्पीकर अलेक्सा को अब हिंदी में बोलकर निर्देश दिए जा सकते हैं। इस क्षेत्र की दो और लोकप्रिय वेबसाइटों- फ्लिपकार्ट और स्नैपडील ने आपको अंग्रेजी के साथ-साथ हिंदी और कुछ अन्य भाषाओं में भी सेवाएं लेने का विकल्प दे दिया है। दूरसंचार और ई-कॉमर्स के क्षेत्र में हमारी भाषाओं का बढ़ता दखल एक बड़ी घटना है क्योंकि अब तक हम इन भाषाओं की तरक्की को कंप्यूटर और भाषायी वेबसाइटों तक ही देखकर खुश हो जाते थे। जिन सेवाओं में अब भाषायी दखल हुआ है वे जन-जन से जुड़ी हुई सेवाएँ हैं और इस जुड़ाव के दूरगामी परिणाम होने तय हैं।

गूगल ने कुछ साल पहले भारतीय भाषाओं का प्रयोग करने वाले 50 करोड़ लोगों को इंटरनेट पर लाने की बात की तो एक अरसे बाद एक बार फिर भारतीय भाषाओं और भारतीय उपभोक्ता की शक्ति का अहसास हुआ था। इससे पहले भी इनपुट मैथड एडीटर (आईएमई), इंटरफ़ेस लोकलाइजेशन, ब्लॉग, ईमेल सेवाओं, मशीन अनुवाद तकनीकों, ध्वनि से पाठ रूपांतरण आदि के क्षेत्रों में हिंदी से संबंधित खासी तरक्की हम देख चुके थे। लेकिन गूगल की तरफ से शुरू किया गया इंडियन लैंग्वेज इंटरनेट एलायंस (आईएलआईए) इस सबसे बड़ी इंटरनेट कंपनी की तरफ से भारतीय भाषाओं के प्रति उपजी विशेष दिलचस्पी का द्योतक था।

बात गूगल तक सीमित नहीं रही। माइक्रोसॉफ्ट ने भी बड़े पैमाने पर हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में नई तथा क्रांतिकारी तकनीकों के विकास पर फोकस किया है। वैसे माइक्रोसॉफ्ट ही वह कंपनी है जिसके ऑपरेटिंग सिस्टमों के जरिए यूनिकोड की शक्ति भारतीय उपभोक्ता तक पहुँची और वह हमारी भाषाओं में भी उसी सरलता तथा सहजता के साथ काम करने में सक्षम हुआ जैसे अंग्रेजी में। इस बीच फेसबुक और एपल ने भी हिंदी की ओर कदम बढ़ाए हैं। फेसबुक अपने यहाँ आने वाली टिप्पणियों का अनुवाद करने की सुविधा दे रहा है तो एपल की युक्तियों पर भी हिंदी में काम करना आसान हुआ है।