समानता-समावेश का हिन्दू विचार

    दिनांक 15-सितंबर-2020   
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हिंदुत्व ऐसी विचारधारा है जो विभिन्न आस्थाओं के बीच अंतर का प्रचार या महिमामंडन करने के बजाय उनका पालन करने वाले विभिन्न भारतीय समुदायों में मौजूद समानताओं का आदर करती है। हमारा लक्ष्य समरूपता नहीं, बल्कि समावेश है। सदियों से भारत में यही भाव बना रहा है

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पश्चिम में तेजी से बढ़ रही है हिन्दू धर्म को अपनाने वालों की संख्या       (फाइल चित्र)

भारत में धर्म का उद्देश्य किन्हीं खास मत—मतों को बौद्धिक स्वीकृति देना या मानव जाति के बीच समरूपता स्थापित करना नहीं, बल्कि विविधता में समान भावों का गुलदस्ता संजोना है। उपनिषद् में कहा गया है-‘एकं सत् विप्र:बहुदावदन्ति’(सत्य एक है, बुद्धिमान जन इसे अलग-अलग तरह से परिभाषित करते हैं)। यही विचार हमारे विश्व दृष्टिकोण की आधारशिला है। भारत में धर्म में किन्हीं विशेष मतावलंबियों और उनसे भिन्न पंथों के बीच किसी अंतहीन संघर्ष के लिए कोई जगह नहीं। जहां अब्राह्मिक मतों में उनके पैगंबरों की वाणी को ही अलौकिक माना गया है और बाकी सब लौकिक, वहीं धर्म की हमारी अवधारणा कुटुंब की तरह मिल—जुलकर रहने के भाव को परिलक्षित करती है। धर्म का लक्ष्य अध्यात्म है, आध्यात्मिक भाव का रूपांतरण नहीं। यह अविद्या (अज्ञान) से विद्या (ज्ञान) और बोध (बुद्धि) तक पहुंचने का मार्ग है। जब विद्या प्राप्त होती है, तो सारी मलिनता धुल जाती है। यह हिंदू सार्वभौमिकता है जिसमें भिन्नता का भाव नहीं। जबकि पश्चिम में उभरे सभी विचार दोहरे आयामों और वैचारिक टकराव में ही उलझे रहे हैं।
अब्राह्मिक मतों के गर्भ से जन्मे इन सभी पंथों का अंतिम उद्देश्य एक ही मत की सत्ता की स्थापना करना है, जबकि सनातन चिंतन का उद्देश्य विश्व को ‘एक ईश्वरीय स्वरूप’ में विकसित करना है। यही कारण है कि श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं: ‘जब भी धर्म का नाश होता है तो मैं धरती पर अवतरित होता हूं।’ यदा यदा हि धर्मस्य, ग्लानिर्भवति भारत:! यानी भगवान धर्म की स्थापना के लिए जन्म लेते हैं, किसी और पंथ को स्थापित करने के लिए नहीं; और इस अवतरण का उद्देश्य मानवता को धर्म मार्ग पर ले जाना होता है।

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बहुसंस्कृतिवाद की विफल नीति के कारण ब्रिटेन के मुसलमान ‘राष्ट्र के अंदर एक अलग राष्ट्र’ बन रहे हैं।       
— ट्रेवर फिलिप्स,पूर्व अध्यक्ष, समानता और मानवाधिकार आयोग, ब्रिटेन

ईसाइयत की देन बहुसंस्कृतिवाद
भारत की सभ्यता की आधारशिला है धर्म। हम पर अक्सर कई बाहरी विचारों को थोपा गया-उदारवाद, पंथनिरपेक्षता, साम्यवाद, मानवतावाद और बहुसंस्कृतिवाद आदि, जो  मूलत: ईसाई मत से पनपे हैं। पश्चिम में विफल बहुसंस्कृतिवाद विचारधारा को-जो ‘आत्मिक अपराध बोध’ की प्रक्रिया को बढ़ावा देने वाले उदारवादी ईसाई मत का अगला चरण था-सुनियोजित तरीके से उत्कृष्ट पंथ के तौर पर प्रचारित कर ‘अनेकता में एकता’ या ‘हिंदू सार्वभौमिकता’ के भारतीय चिंतन को कमजोर करने का षड्यंत्र रचा गया। बहुसंस्कृतिवाद समावेशी भाव के विपरीत है और समानताओं को दरकिनार कर मतभेदों पर पोषित होता है। बहुसंस्कृतिकवाद पश्चिम में नस्लवाद, लिंगभेद और 1960 के दशक से पहले, इंसानों के बीच व्याप्त हिंसक वैर-भाव के खिलाफ एक सहिष्णु समाज बनाने के उद्देश्य से उभरा। वास्तव में, इसके आगमन से राज्यों के अंदर समानांतर समाजों का उदय होने लगा, जिनमें कुछ कट्टरपंथी विचार भी जड़ें जमाने लगे। परिणामस्वरूप अराजकता, संघर्ष, अलगाववाद का वातावरण तैयार होने लगा और ऐसी आशंकाएं उभरने लगीं कि कहीं अल्पसंख्यक समुदाय उनको आश्रय दे रहे समाज का ही अधिग्रहण न कर लें जो मौजूदा सामाजिक व्यवस्था में तथाकथित ‘पीड़ित’ की तख्ती लटकाए घूम रहा है।

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कश्मीर में सिकंदर बुतशिकन के आदेश पर ध्वस्त किए गए मार्तण्ड सूर्य मंदिर के भग्नावशेष


कई यूरोपीय देशों ने अपनी धरती पर आने वाले मुसलमानों की अनेक कल्याणकारी योजनाओं, वित्तीय सहायता और प्रोत्साहन राशियों से मदद की, पर वे मेजबान देशों की सांस्कृतिक मुख्यधारा से कटकर ही रहे। फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति निकोलस सरकोजी ने फरवरी 2011 में स्वीकार किया था कि बहुसंस्कृतिवाद उनके देश में विफल हो चुका है। उन्होंने कहा, ‘हमारे मुसलमान साथियों को अन्य मतावलम्बियों की तरह ही अपने मजहबी अस्तित्व को जीने और अपने मजहब का पालन करने की आजादी है...लेकिन यह तभी संभव जब फ्रांसीसी इस्लाम हो, न कि फ्रांस में इस्लाम।’ पूर्व आॅस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री जॉन हॉवर्ड जैसे कई पश्चिमी राजनेताओं ने बहुसंस्कृतिवादी नीतियों पर विरोध व्यक्त किया है। ब्रिटेन के समानता और मानवाधिकार आयोग के पूर्व अध्यक्ष  ट्रेवर फिलिप्स ने अपने बहुप्रचारित अध्ययन में लिखा है, ‘बहुसंस्कृतिवाद की विफल नीति के कारण ब्रिटेन के मुसलमान ‘राष्ट्र के अंदर एक अलग राष्ट्र’ बन रहे हैं।’ फिलिप्स के अनुसार ब्रिटेन की ‘युवा पीढ़ी पर, जिसमें कई मुसलमान भी हैं, ऐसे मूल्यों की बलि चढ़ने का खतरा मंडरा रहा है जो हममें से अधिकांश लोगों की आस्थाओं के विरुद्ध है।’ उन्होंने अखंडता का माहौल तैयार करने के उद्देश्य से सख्त रुख अपनाते हुए नीति के पुनरीक्षण की मांग की।

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भारतीयकरण का अर्थ सभी लोगों को हिंदू धर्म में परिवर्तित करना नहीं है। हम सभी को यह एहसास कराएं कि हम इस मिट्टी की संतान हैं, हमें इस धरती के प्रति अपनी निष्ठा रखनी चाहिए। हम एक ही समाज का हिस्सा  हैं और हमारे पूर्वज एक ही थे। हमारी आकांक्षाएं भी समान हैं। इसी भाव को समझना ही वास्तविक अर्थों में भारतीयकरण है। भारतीयकरण का मतलब यह नहीं है कि किसी को अपना संप्रदाय त्यागने के लिए कहा जाए। हमने न तो यह कभी कहा है और न ही कहेंगे, बल्कि हमारा मानना है कि संपूर्ण मानव समाज एक ही पंथ-प्रणाली का पालन करें, यह कतई उपयुक्त नहीं।
— रा.स्व.संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्रीगुरुजी

जहां पश्चिम में मुस्लिम अखंडता का विषय एक ‘ज्वलंत’ मुद्दा बना हुआ है, भारत में इस संबंध में स्थिति बेहतर है। इसके पीछे हमारी भूमि के कण-कण में पिरोए सनातन धर्म के मूल्य हैं जिनके स्पर्श ने इस्लाम के मानवीय भाव को जाग्रत रखने में मदद की है। हमें यह ध्यान रखना होगा कि झूठे वादों और आख्यानों की बुनियाद पर अखंडता की स्थाापना संभव नहीं। इसका मूलमंत्र है ईमानदारी। बहुसंख्यवाद के काल्पनिक खतरे का सामना करने के लिए हम पर पंथनिरपेक्षता और बहुसंस्कृतिवाद के पश्चिमी विचारों को थोपा गया है। 1972 में प्रकाशित परम पूजनीय गुरुजी के साथ एक साक्षात्कार में जब डॉ. सैफुद्दीन जिलानी ने हिंदुओं और मुसलमानों के बीच सौहार्द कायम करने संबंधी कदम उठाने के लिए सुझाव मांगा तो गुरु जी ने जवाब दिया: ‘कुछ विशिष्ट बातों का तुरंत सुझाव देना मुश्किल है। लेकिन इस पर गंभीरता से विचार करना जरूरी है। व्यापक स्तर पर किए जाने वाले प्रयासों में पंथ संबंधित वास्तविक शिक्षा पहला कदम हो सकता है। आजकल के राजनेता जिस पंथविहीन शिक्षा को बढ़ावा दे रहे हैं, उससे इतर सच्ची, अच्छी, धार्मिक शिक्षा महत्वपूर्ण है, जिससे लोगों को इस्लाम और हिंदू धर्म का सच्चा ज्ञान हासिल हो सके; लोगों को सिखाया जाए कि हर मत व्यक्ति को सच्चा, शुद्ध बनने और कल्याणकारी कर्म करने को कहता है...फिर, दूसरा कदम है इतिहास का सही और तथ्याधारित पाठ। आज हमें इतिहास का विकृत रूप पढ़ाया जा रहा है। अगर अतीत में मुगल आक्रमणकारियों ने बर्बरता की तो आज हमें यह स्पष्ट करना चाहिए कि हमलावर विदेशी थे और वे अतीत का हिस्सा हैं। हमें आज मुसलमानों को बताना होगा कि वे इस देश का हिस्सा हैं, आक्रामकता उनकी विरासत नहीं। जो सच है उसका पाठ देने के बजाय, मुसलमानों को एक विकृत और गलत संस्करण पढ़ाया जा रहा है। सत्य को लंबे समय तक छिपाया नहीं जा सकता। आप इसे लाख छिपाएं, अंतत: यह बाहर आता ही है और पहले से भी ज्यायदा नकारात्मक भावनाएं पैदा करता है। इसलिए, मेरा कहना है कि इतिहास को वैसा ही पढ़ाया जाए, जैसा वह था। जैसे, इतिहास में दर्ज है कि अफजल खान को शिवाजी ने मारा था, इस बात को बताते हुए आप यह कहें कि एक विदेशी आक्रमणकारी को हमारे राष्ट्रीय नायक ने खराब संबंधों के कारण मार दिया था। हमें उन्हें बताना चाहिए कि हम सभी एक राष्ट्र के वासी हैं। इसलिए हमारी विरासत अफजल खान की नहीं है। लेकिन ऐसा कहने की किसी में हिम्मत नहीं है। मैंने इतिहास को तोड़-मरोड़कर पेश करने के चलन की पहले भी कई बार निंदा की है और आज भी इसकी निंदा करता हूं।’

अंतर नहीं, समानता
विश्व के सभी देशों को कभी न कभी अखंडता के मुद्दे से निपटना होगा और इसका सबसे अच्छा तरीका हिंदुत्व का मार्ग प्रदान करता है जिसमें विभिन्न मतों का पालन करने वाले भारतीय समुदायों की जीवनशैली में मौजूद अंतरों का प्रचार या गुणगान करने के बजाय उनके बीच मौजूद समानताओं को तरजीह दी गई है। हमारा लक्षित उद्देश्य समरूपता नहीं, बल्कि समावेश है और यही भारत की स्थायी भावना के अनुरूप है। जैसा कि विवेकानंद कहते हैं-‘हम सिर्फ सार्वभौमिक सहिष्णुता में ही विश्वास नहीं करते, बल्कि हम सभी पंथों को सच मानते हैं।’ यह हिंदू सार्वभौमिकता है। यह अधिक शक्तिशाली और स्थाायी है और हमारी समस्याओं के लिए ‘पश्चिमी स्रोतों से थमाए गए पूर्वप्रयुक्त समाधानों’ के मुकाबले एक बेहतर और ज्यादा उपयुक्त समाधान प्रदान करती है। जब रा.स्व.संघ ‘भारतीयकरण’ के बारे में बात करता है, तो वह इसी दृष्टिकोण से बात करता है, हालांकि वामपंथी उदारवादियों ने अल्पसंख्यक समुदायों के बीच इस संबंध में भ्रामक प्रचार को हवा दी है। ‘भारतीयकरण’ की अवधारणा को स्पष्ट करना बेहद महत्वपूर्ण है। यह एक अखंड और समावेशी ‘भारतीय संस्कृति’ को गढ़ने के लिए अन्य संस्कृतियों और आस्थाओं को निष्प्राण करने का प्रयास कभी नहीं करती। इस संदर्भ में मैं श्री गुरुजी को पुन: उद्धृत करना चाहूंगा। उसी साक्षात्कार में डॉ. जिलानी को श्री गुरुजी कहते हैं-‘भारतीयकरण निश्चित रूप से जनसंघ का दिया नारा था। इसमें भ्रांति क्यों? भारतीयकरण का अर्थ सभी लोगों को हिंदू धर्म में परिवर्तित करना नहीं है। हम सभी को यह एहसास कराएं कि हम इस मिट्टी की संतान हैं, हमें इस धरती के प्रति अपनी निष्ठा रखनी चाहिए। हम एक ही समाज का हिस्सा  हैं और हमारे पूर्वज एक ही थे। हमारी आकांक्षाएं भी समान हैं। इसी भाव को समझना ही वास्तविक अर्थों में भारतीयकरण है। भारतीयकरण का मतलब यह नहीं है कि किसी को अपना संप्रदाय त्यागने के लिए कहा जाए। हमने न तो यह कभी कहा है और न ही कहेंगे, बल्कि हमारा मानना है कि संपूर्ण मानव समाज एक ही पंथ-प्रणाली का पालन करें, यह कतई उपयुक्त नहीं।’

प्रकृति और हिंदू विचार
बाइबिल के पहले अध्याय में परमेश्वर ने आदम और हव्वा को ‘पृथ्वी को भरने और उसे अपने वश में करने’ का निर्देश दिया। यहूदी पंथ, जिसने पहली बार एकेश्वरवाद का विचार पेश किया जो सभी अब्राह्मिक मतों का मूल दर्शन है, मूर्तिपूजक पंथ के विरुद्ध था जिसमें प्रकृति की शक्तियों का प्रतिनिधित्व करने वाली काया को दिव्य स्वरूप माना गया था, जो कई मायनों में हिंदू धर्म के रीति-रिवाजों और मान्यताओं के समान था। अब्राह्मिक मतों में परमेश्वर पृथ्वी और प्रकृति की शक्तियों से परे आकाश में वास करता है।

प्रकृति से ईश्वर का यह अलगाव विभिन्न व्यापक प्रभाव पैदा करता है। अब्राह्मिक पंथावलंबियों ने कल्पना की कि प्रकृति-आधारित मूर्तिपूजकों की तुलना में पुरुषों ने प्राकृतिक क्रम में उत्कृष्ट स्थान हासिल किया है। हिब्रू बाइबिल कहती है कि ईश्वर ने लौकिक संसार को पुरुष से कमतर बनाया है और उसे ‘ईश्वर की रचना पर प्रभुता सौंपी है’। परमेश्वर ने ‘सब कुछ उसके पैरों के नीचे रखा है-सभी भेड़ों और बैलों, और मैदान के जानवरों, हवा के पक्षियों और समुद्र्र की मछलियों, समुद्र्री मार्गों से गुजरने वाली सभी चीजों को’। न्यू टेस्टामेंट में ‘एपोस्टल टू दि रोमन्स’ में पॉल (दि एपोस्टल) कहता है- ‘जिन्होंंने परमेश्वर के सत्य को झूठ में बदल दिया और सर्वशक्तिमान सृष्टिकर्ता से अधिक जीवों की पूजा और सेवा की... परमेश्वर ने उन्हें उनकी अधम प्रवृत्तियों के भंवर में ही छोड़ दिया, यहां तक कि उनकी स्त्रियां भी प्राकृतिक आचरण के बजाय अप्राकृतिक आचरण करने लगीं।’ (रोमन्स, 1: 25 और 26)

बाइबिल की अवधारणा के अनुसार परमेश्वर के स्वर्ग और मानव-शासित पृथ्वी के बीच का अलगाव निरपेक्ष है, प्रकृति की पूजा करने का अर्थ मूर्तिपूजा है। इसीलिए मूर्तिपूजक हिंदुओं का कन्वर्जन करने या उन्हें मार देने के विचार को बढ़ावा मिला। ईसाई और बाद में मुगलों ने ‘मूर्तिपूजकों’ का नरसंहार और उनके मंदिरों को नष्ट करना खुदा की खिदमत माना। गोवा और केरल में सेंट जेवियर के नेतृत्व में पुर्तगालियों ने और अन्य स्थानों पर मुगल आक्रमणकारियों ने हजारों मंदिरों को नष्ट किया।


बाइबिल की अवधारणा के अनुसार परमेश्वर के स्वर्ग और मानव-शासित पृथ्वी के बीच का अलगाव निरपेक्ष है और प्रकृति की पूजा करने का अर्थ मूर्तिपूजा है। ऐसी परिभाषा के तहत ही मूर्तिपूजक समुदायों और हिंदुओं का कन्वर्जन करने या उन्हें मार देने के विचार को बढ़ावा मिला। ईसाई और बाद में मुगलों ने ‘मूर्तिपूजकों’ का नरसंहार और उनके मंदिरों और पूजा स्थलों को नष्ट करना खुदा की खिदमत माना। गोवा और केरल में सेंट जेवियर के नेतृत्व में पुर्तगाली आक्रमणकारियों और देश के बाकी हिस्सों में मुगल आक्रमणकारियों द्वारा हजारों मंदिरों को नष्ट कर दिया गया था। पर्यावरण इतिहासकार क्लेरेंस जे. ग्लेकेन के अनुसार, पश्चिमी सभ्यता के पांथिक और दार्शनिक विचारों में ईसाई मत से लिए गए, एक प्रमुख विचार के तहत माना गया है कि मनुष्य पापी है, इसलिए ‘ब्रह्मांड में वास करने वाले परमेश्वर के स्वर्ग से निष्कासित कर पृथ्वी पर भेज दिया गया है।’ बाइबल की यही मान्यता आज दुनिया के सभी पर्यावरणीय मुद्दों की जड़ है।

पश्चिम में रूढ़िवादी ईसाइयों के बीच पर्यावरण को कोई खास तरजीह नहीं दी गई। वे लगातार प्रचार करते रहे हैं  कि पर्यावरण के मुद्दे पर होने वाली बहस निरर्थक शोर-शराबा और ‘धोखाधड़ी’ मात्र है। समस्या का एकमात्र स्थायी समाधान प्रकृति की शक्तियों का सम्मान करना है। हिंदू दर्शन प्रकृति को माता मानता है और यही सबसे अच्छा तरीका है।


उभरते पर्यावरणीय संकट और इस आरोप के मद्देनजर कि यह समस्या ‘ईसाई अहंकार और पुरुष केंद्रित भाव’ से उपजी है, कुछ ईसाई संप्रदायों द्वारा ‘स्टीवर्डशिप’ सिद्धांत जैसी नई अवधारणाओं के प्रस्ताव के जरिए इसे प्रचारित करने का प्रयास किया गया। लेकिन यह बाइबिल के मूल दर्शन से ज्यादा अलग नहीं। इसके अलावा, पश्चिम में रूढ़िवादी ईसाइयों के बीच इसे कोई खास तरजीह नहीं दी गई। वे इस सिद्धांत का लगातार प्रचार करते रहे हैं कि पर्यावरण के मुद्दे पर होने वाली बहस निरर्थक शोर-शराबा और ‘धोखाधड़ी’ मात्र है। समस्या का एकमात्र स्थायी समाधान प्रकृति की शक्तियों का सम्मान करना है। हिंदू दर्शन प्रकृति को माता मानता है और यही सबसे अच्छा तरीका है।

मार्क्सवाद के आगमन के साथ प्रकृति और मनुष्य के बीच की खाई और चौड़ी हो गई। अगर यहूदी मतों के नजरिए से स्पष्ट करें तो मार्क्स ने इस विभाजन के आधार पर अपनी राजनीतिक विचारधारा को परिभाषित किया। उनका तर्क था कि मानव जाति का विकास प्रकृति के साथ लगातार हुए टकराव से हुआ। मार्क्सवाद मूल रूप से एक ‘उत्पादवादी’ विचारधारा है जिसमें समावेश के लिए जगह नहीं। यही वजह है कि इसमें  पर्यावरण के संबंध में नाममात्र सरोकार या चिंता दिखाई देती है। इसलिए, इतिहास और कुछ नहीं बल्कि प्रकृति को वश में करने के मनुष्य के प्रयासों की कवायद मात्र है। इसी अपरिपक्व और निराशात्मक आधार पर साम्यवादियों ने अपनी विचारधारा और समकालीन विकास मॉडल का निर्माण किया है।
   (लेखक प्रज्ञा प्रवाह के अखिल भारतीय संयोजक हैं)