राष्ट्रीय शिक्षा नीति- 2020 : हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं की अनदेखी!

    दिनांक 15-सितंबर-2020
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डॉ़ ओम प्रभात अग्रवाल 

नई शिक्षा नीति में हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं के साथ न्याय नहीं हुआ है। इसमें शिक्षा माध्यम के रूप में अंग्रेजी के लिए रास्ता खुला छोड़ा गया है, जबकि हिंदी सहित अन्य भाषाओं को ऐच्छिक स्थान ही दिया गया है। ग्रेड पांच/आठ तक शिक्षण माध्यम की अनुशंसा के लिए जो शब्दावली प्रयुक्त हुई है, वह अत्यंत विवादास्पद है
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 नई शिक्षा नीति में बोलियों को भाषा की संज्ञा देकर क्या हिंदी के साथ न्याय हुआ है? 


लंबी प्रतीक्षा के पश्चात भारत की नई शिक्षा नीति की घोषणा हो गई है। नई नीति अब तक की शिक्षा व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन की संवाहक और देश की प्रगति का माध्यम है। हालांकि शिक्षण माध्यम के रूप में हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं को अनिवार्य रूप से प्रतिष्ठित करने का सपना एक बार फिर दिवा स्वप्न ही प्रतीत होता है। यह भारतीय भाषाओं का दुर्भाग्य ही है कि 1950 में स्वतंत्र भारत के संविधान में अपना न्यायोचित स्थान प्राप्त करने के उपरांत भी वे व्यावहारिक रूप से भारत के शिक्षा तंत्र में अपनाए जाने की प्रतीक्षा ही कर रही हैं। यह सत्य है कि सामान्य भारतीय अंग्रेजी को पूर्ण रूप से अपना तो नहीं पाया, परंतु उसको अपना बना लेने की होड़ में सम्मिलित अवश्य है। सामान्य रूप से शिक्षित भारतीय मातृभाषा की तरह सरलता से अंग्रेजी में कामकाज करने की स्थिति में तो नहीं आ सका, परंतु अंग्रेजी की ऊंची प्रतिष्ठा के सामने उसने सिर अवश्य नवा दिया। दूसरे शब्दों में, स्वतंत्र भारत में शिक्षा के अभूतपूर्व प्रसार के साथ अंग्रेजी संवाद की भाषा तो नहीं बन सकी, परंतु भारतीय भाषाओं में दैनंदिन कार्य कर सकने वालों की संख्या अवश्य ही अत्यधिक बढ़ी। इसीलिए हिंदी जैसी भाषा ने विज्ञापनों से तो अंग्रेजी को विस्थापित कर दिया अथवा पाठक संख्या की दृष्टि से समाचारपत्रों में ऊंची छलांग लगाई, परंतु अवसरों के निरंतर बढ़ते जाने के बावजूद जनमानस में यह सोच गहरी पैठी रही कि अवसरों की भाषा तो अंग्रेजी ही है।

   इन पंक्तियों के लेखक ने अभी कुछ दिन पूर्व यह देखकर दांतों तले उंगली दबा ली कि एक प्रतिष्ठित अंग्रेजी समाचारपत्र का विज्ञापन दूरदर्शन के विभिन्न चैनलों पर हिंदी में किया जा रहा है। इस पैरा में उपर्युक्त बातों का इससे अच्छा प्रमाण और क्या हो सकता है। अहर्निश भारतीय भाषाओं की चिंता करने वालों को बहुत आशा थी कि इस बार इन भाषाओं को न्यायोचित स्थान अवश्य मिलेगा, परंतु दुर्भाग्य से इस बार भी ऐसा नहीं हो पाया। यह मान लेने के बाद भी कि ‘बच्चे अपनी मातृभाषा में सार्थक अवधारणाओं को अधिक शीघ्रता से सीखते हैं’, उन्हें ऐच्छिक स्थान ही दिया गया। ग्रेड पांच तक (बल्कि आठ तक) माध्यम के रूप में मातृभाषा (जैसे- हिंदी) की अनुशंसा करके भी सब कुछ ‘यदि संभव हो’ पर छोड़ दिया गया है। यानी अंग्रेजी माध्यम विद्यालयों के लिए एक मार्ग खुला छोड़ दिया गया। इसका परिणाम भी शीघ्र ही सामने आ गया।

  नई शिक्षा नीति की घोषणा होने के तुरंत बाद हरियाणा सरकार दो सौ ‘बस्ता विहीन’ मॉडल विद्यालयों की योजना के तहत माध्यम के रूप में अंग्रेजी की ही घोषणा कर बैठी। दिल्ली सरकार ने भी अंग्रेजी माध्यम के सौ नये विद्यालयों की घोषणा की और उत्तर प्रदेश में प्राथमिक स्तर से ही अंग्रेजी पर जोर दिए जाने का निष्च्य प्रकट किया गया। इसी प्रकार, आंध्र प्रदेश ने कक्षा छ: तक सरकारी विद्यालयों में अंग्रेजी माध्यम अनिवार्य कर दिया। यही नहीं, ग्रेड पांच/आठ तक शिक्षण माध्यम की अनुशंसा के लिए जो शब्दावली प्रयुक्त हुई है, वह भी अत्यंत विवादास्पद है। इसमें लिखा है, ‘घर की भाषा/मातृभाषा/स्थानीय भाषा/क्षेत्रीय भाषा।’ क्या यह सब गड्ड-मड्ड नहीं कर देता? कहीं यह हिंदी जैसी भाषा की क्षेत्रीय बोलियों का इस रूप में स्वीकरण तो नहीं है? दूसरे शब्दों में, आयोग का मंतव्य कहीं यह तो नहीं कि हरियाणा में हरियाणवी, उत्तर प्रदेश में क्षेत्रानुसार अवधी, भोजपुरी अथवा ब्रज तथा राजस्थान में डिंगल आदि माध्यम होंगे। अगर ऐसा है तो हिंदी को शिक्षा के क्षेत्र में न्यायोचित स्थान की बात ही बेमानी है। वह तो अपनी बोलियों की भीड़ में ही गुम हो जाएगी। बोलियों को भाषा की संज्ञा देना ही आपत्तिजनक है। उपरोक्त शब्दावली अनेकों विवादों, मुकदमों आदि के लिए निश्चित रूप से द्वार खोल रही है।
अहर्निश भारतीय भाषाओं की चिंता करने वालों को बहुत आशा थी कि इस बार इन भाषाओं को न्यायोचित स्थान अवश्य मिलेगा, परंतु दुर्भाग्य से इस बार भी ऐसा नहीं हो पाया। यह मान लेने के बाद भी कि ‘बच्चे अपनी मातृभाषा में सार्थक अवधारणाओं को अधिक शीघ्रता से सीखते हैं’, उन्हें ऐच्छिक स्थान ही दिया गया। ग्रेड पांच तक (बल्कि आठ तक) माध्यम के रूप में मातृभाषा (जैसे- हिंदी) की अनुशंसा करके भी सब कुछ  ‘यदि संभव हो’ पर छोड़ दिया गया है।

माध्यम संबंधी यह उलझन आगे भी दिखती है। इसमें लिखा है, ‘‘उच्चतर गुणवत्ता वाली पाठ्यपुस्तकों को घरेलू भाषा/मातृभाषा दोनों में उपलब्ध कराया जाएगा।’’ इसका भी अर्थ यही समझ में आता है कि अगर हिंदी की बोलियों में भी पाठ्यपुस्तकें तैयार की जाएंगी, तो वही अनावश्यक विवाद निश्चित रूप से मानक हिंदी की स्थिति को कमजोर करेगा और राष्ट्रीय स्तर पर उसकी स्वीकार्यता पर प्रश्न चिह्न लगाएगा। इसी तरह, विज्ञान और गणित में द्विभाषी पुस्तक लाने की योजना है ताकि विद्यार्थी मातृभाषा (हिंदी) और अंग्रेजी, दोनों भाषाओं में विषय को समझ सकें। यह निरर्थक प्रयास तो होगा ही, जनमानस में यह विश्वास भी दृढ़ करेगा कि हिंदी जैसी भारतीय भाषाएं इन विषयों की शिक्षा में सक्षम ही नहीं हैं। आज से 50 वर्ष पूर्व भी इन पंक्तियों का लेखक उत्तर प्रदेश में कक्षा 12 तक विज्ञान हिंदी माध्यम से पढ़ा और आगे अंग्रेजी माध्यम अपनाने में कोई कठिनाई नहीं हुई। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के रसायन के एक प्रोफेसर ने जर्मनी से जर्मन भाषा में मात्र तीन माह के प्रशिक्षण के बाद अपना शोध प्रबंध जर्मन में लिखा। अत: यदि पुस्तकें केवल मातृभाषा में प्रस्तावित होतीं तो भी उच्चतर कक्षाओं में विद्यार्थियों के समक्ष कोई कठिनाई नहीं आती, क्योंकि एक भाषा के रूप में तो त्रिभाषा सूत्र के अंतर्गत वह अंग्रेजी का अध्ययन प्रारंभ से करता ही होगा। हिंदी भी अपनी इस भूमिका के लिए पूरी तरह सक्षम है। भारत सरकार का वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग लगभग 8 लाख तकनीकी शब्दों को हिंदी में रूपांतरित कर चुका है। अनेकों विज्ञान शोध जर्नल (विज्ञान परिषद अनुसंधान पत्रिका, भारतीय वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान पत्रिका आदि) हिंदी में प्रकाशित हो रहे हैं तथा भोपाल के अटल बिहारी वाजपेयी विश्वविद्यालय में इंजीनियरिंग की शिक्षा का माध्यम हिंदी है, आदि आदि।

नई शिक्षा नीति की उपरोक्त द्विभाषिक व्यवस्था अंतत: हिंदी जैसी भाषाओं के मार्ग में एक बड़ा रोड़ा ही सिद्ध होगी। इतनी बाधाओं के होते हुए भी यह कहा जा सकता है कि देसी भाषाओं में विद्यार्थी की रुचि जाग्रत करने एवं उसमें भाषा के सही स्वरूप को हृदयंगम करने संबंधी कुछ कार्यक्रम जैस ‘‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’’ अथवा पैरा 4.21 में वर्णित कार्यक्रम निश्चित रूप से स्तुत्य हैं। हिंदी आदि अनेक भाषाएं अब बहुत आगे बढ़ चुकी हैं। यहां तक कि हिंदी को तो अब अवसरों की भाषा भी बेहिचक कहा जा सकता है। हिचक और वह भी व्यर्थ की तथा केवल काल्पनिक, लगातार हिंदी आदि भारतीय भाषाओं का मार्ग बाधित कर रही हैं। इसे दूर किए बिना देसी चिंतकों का सपना अधूरा ही रहेगा।    (लेखक केंद्रीय हिंदी समिति के सदस्य रह चुके हैं)