‘‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार से इंकार नहीं किया जा सकता’’

    दिनांक 16-सितंबर-2020
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निर्मल यादव
हाल ही में उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति ए. के. सीकरी ने आनलाइन आयोजित एक संगोष्ठी में कहा है कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार से इंकार नहीं किया जा सकता। उस गोष्ठी में उन्होंने और बहुत कुछ कहा है। उम्मीद है कि उनकी इस बात से न्यायपालिका में सुधार के लिए नई बहस छिड़ेगी
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न्यायमूर्ति ए. के. सीकरी

दिल्ली के बाटला हाउस से लेकर हाल ही में न्यायपालिका के बारे में वकील प्रशांत भूषण की कथित टिप्पणी के मामले तक ‘अदालत की अवमानना’ के विषय पर शुरू हुई बहस भले ही विचारधारा के स्तर पर विभिन्न दिशाओं में बंट गई, हो लेकिन इस सबके बीच न्यायमूर्ति ए. के. सीकरी ने इस मुद्दे पर खुले संवाद की एक सकारात्मक पहल का आगाज किया है। इस पहल का अंजाम तो भविष्य में तय होगा लेकिन उच्चतम न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति सीकरी ने विभिन्न विचारधाराओं के चश्मे से इस मुद्दे को देख रहे लोगों से अदालत की अवमानना को समूची व्यवस्था के प्रति गंभीर बताते हुए इस विषय को व्यापक दायरे में देखने की जरूरत पर बल दिया है।

न्यायमूर्ति सीकरी ने ‘न्यायपालिका की जवाबदेही और न्यायाधीशों का मूल्यांकन’ विषय पर हाल ही में आयोजित आॅनलाइन संगोष्ठी में अदालत की अवमानना, न्यायपालिका में भ्रष्टाचार और बार संगठनों की भूमिका सहित विभिन्न विषयों पर विस्तार से चर्चा करते हुए इन मुद्दों से जुड़े जनता के सवालों पर भी बेबाकी से अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि वे अभिव्यक्ति की आजादी के पुरजोर समर्थक हैं और इस अधिकार से जुड़ी संवैधानिक मर्यादाओं का पालन करते हुए न्यायपालिका की समस्याओं से जुड़े मुद्दों पर सार्वजनिक बहस के हिमायती हैं।

सामाजिक संगठन ‘जिज्ञासा’ द्वारा आयोजित संगोष्ठी में भागीदारी कर रहे लोगों के सवालों के जवाब में उन्होंने कहा कि व्यवस्था से जुड़े सभी अंग, चाहे वह कार्यपालिका हो या विधायिका और न्यायपालिका, व्यवस्था के इन सभी अंगों में समस्याओं की गुंजाइश से इंकार नहीं किया जा सकता है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में समस्याओं के समाधान का सर्वमान्य हल आपसी विचार-विमर्श से ही निकल सकता है।

हालांकि न्यायमूर्ति सीकरी ने प्रशांत भूषण द्वारा उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों पर भ्रष्टाचार में लिप्त होने के आरोपों के बारे में कहा, ‘‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार से इंकार नहीं किया जा सकता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि तथ्यात्मक आधार बताए बिना न्यायाधीशों के खिलाफ इस तरह के आरोप लगा दिए जाएं। इस तरह की प्रवृत्ति न्यायपालिका की कार्यप्रणाली को प्रभावित करती है।’’

भारत में प्रति 10,00000  की आबादी पर न्यायाधीशों की संख्या 25 है, जबकि अमेरिका में यह संख्या 125, ब्रिटेन में 110 और चीन में 300 है। न्यायाधीशों की कमी का ही परिणाम है कि भारत में औसतन प्रतिदिन प्रत्येक न्यायाधीश के लिए 50 से 60 मामले सुनने को सूचीबद्ध होते हैं। एक न्यायाधीश के लिए इतने मामलों की सुनवाई कर पाना न व्यावहारिक है और न ही मुमकिन।

उन्होंने कहा, ‘‘हमारे देश में न्यायाधीशों के खिलाफ दुराशय से भी आरोप लगाए जाते हैं और इसमें वकील भी शामिल होते है। मैं यह नहीं कहता हूं कि न्यायाधीश को जवाबदेह नहीं होना चाहिए, बल्कि न्यायाधीश अपने फैसलों के लिए स्वयं जवाबदेह होता है।’’  न्यायमूर्ति सीकरी ने कहा कि इस तरह के आरोप ईमानदार न्यायाधीशों की निष्ठा पर प्रहार साबित होते हैं। इसलिए न्यायाधाीशों  के खिलाफ दुराशय से प्रस्तुत की जाने वाली फर्जी शिकायतों को रोकने के लिए और अधिक कारगर उपाय किए जाने की जरूरत है। उन्होंने इसके लिए अदालत की अवमानना संबंधी प्रावधानों को और अधिक सख्त बनाने की जरूरत से भी इंकार नहीं किया।

उन्होंने कहा कि बार संगठनों को यह साहस दिखाना चाहिए कि न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति के समय आयोजित होने वाले समारोह में उनका सिर्फ गुणगान करने के बजाय उनके कार्यकाल का सार्वजनिक तौर पर निष्पक्ष मूल्यांकन करें। उन्होंने कहा कि इसे एक सकारात्मक पहलू के रूप में देखा जाना चाहिए, क्योंकि इससे अंततोगत्वा समूची न्यायपालिका का हित होगा।    
न्यायमूर्ति सीकरी ने कहा कि न्यायपालिका की निष्पक्ष कार्यप्रणाली और न्यायतंत्र में भ्रष्टाचार की समस्या, दो अलग-अलग पहलू हैं। उन्होंने कहा कि भारत की न्यायिक प्रणाली में बिना किसी भेदभाव के नागरिक अधिकारों के महत्व को समझने के लिए कसाब मामले को दुनिया भर में नजीर के तौर पर देखा जाता है। उन्होंने कहा कि आतंकवाद के आरोप में पकड़े गए पाकिस्तान के नागरिक को भी न्यायिक परीक्षण के दौरान वे सभी विधिक अधिकार दिए गए जो एक भारतीय नागरिक को मुहैया कराए जाते हैं। उन्होंने कहा कि इस तरह के तमाम मामलों ने भारत में निष्पक्ष न्यायपालिका की साख को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजबूत किया है। साथ ही इस तथ्य को भी दुनिया के समक्ष सच साबित किया कि भारत में ‘विधि का शासन’ कायम है।

न्यायमूर्ति सीकरी ने कहा, ‘‘जहां तक न्यायपालिका में भ्रष्टाचार का सवाल है तो इस समस्या से कोई भी इंकार नहीं कर सकता है। इसका मूल कारण अदालतों में लंबित मामलों की अधिकता है।’’ उन्होंने स्पष्ट किया कि देश की सभी अदालतों में लगभग तीन करोड़ मामले लंबित हैं और इनमें लगभग 2.6 करोड़ मामले निचली अदालतों में लंबित हैं। यही वजह है कि निचली अदालतों में भ्रष्टाचार का स्तर उच्च अदालतों की अपेक्षा अधिक है। उन्होंने कहा कि लंबित मामलों की अधिकता के कारण न्याय में विलंब होता है और यहीं से भ्रष्टाचार भी पनपता है।

इस समस्या के समाधान के सवाल पर उन्होंने कहा कि मामलों के लंबित होने का कारण अदालतों में न्यायाधीशों के पद रिक्त होना है। न्यायमूर्ति सीकरी ने कहा कि उच्च न्यायालयों में ही न्यायाधीशों के 30 प्रतिशत पद खाली हैं, जबकि पूरे देश में मौजूद निचली अदालतों को कुल 23,000 न्यायाधीशों की दरकार है। इस कमी के पूरा होने पर ही लंबित मामलों की समस्या से निपटा जा सकेगा।

देश की सभी अदालतों में लगभग तीन करोड़ मामले लंबित हैं और इनमें लगभग 2.6 करोड़ मामले निचली अदालतों में लंबित हैं। यही वजह है कि निचली अदालतों में भ्रष्टाचार का स्तर उच्च अदालतों की अपेक्षा अधिक है। लंबित मामलों की अधिकता के कारण न्याय में विलंब होता है और यहीं से भ्रष्टाचार भी पनपता है।

  उन्होंने आंकड़ों के हवाले से आबादी में न्यायाधीशों की हिस्सेदारी का जिक्र करते हुए कहा कि भारत में प्रति 10,00000  की आबादी पर न्यायाधीशों की संख्या 25 है, जबकि अमेरिका में यह संख्या 125, ब्रिटेन में 110 और चीन में 300 है। उन्होंने कहा कि न्यायाधीशों की कमी का ही परिणाम है कि भारत में औसतन प्रतिदिन प्रत्येक न्यायाधीश के लिए 50 से 60 मामले सुनने को सूचीबद्ध होते हैं। एक न्यायाधीश के लिए इतने मामलों की सुनवाई कर पाना न व्यावहारिक है और न ही मुमकिन। न्यायमूर्ति सीकरी ने कहा कि भारत में न्यायाधीशों के ईमानदार और अपने कर्तव्य के प्रति निष्ठावान होने का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि देश में न्यायाधीश छुट्टी के दिन भी अपने घर पर सात से आठ घंटे काम करते हैं और फैसले लिखने में अवकाश के समय का सदुपयोग करते हैं।

उन्होंने न्यायपालिका के इन सकारात्मक पहलुओं को भारत में न्याय व्यवस्था के प्रति लोगों के विश्वास की वजह बताया। उन्होंने न्यायाधीशों की जवाबदेही के बारे में कहा कि न्यायाधीश अपने फैसलों के प्रति जवाबदेह होता है। भारत में आज भी लोगों का न्यायपालिका पर विश्वास कायम है। पिछले 70 साल में  विधायिका और कार्यपालिका की तुलना में लोगों का न्यायपालिका के प्रति विश्वास बढ़ा है, यह इस बात का संकेत है कि न्यायिक फैसलों के प्रति लोगों में विश्वास कायम है। उन्होंने कहा, ‘‘हालांकि मुझे यह स्वीकार करने में हिचक नहीं है कि पिछले कुछ सालों में इस विश्वास को थोड़ी ठेस पहुंची है। इस विश्वास को कायम रखने के लिए न्यायाधीशों को पूरी ईमानदारी और निष्ठा से अपने काम को सुचारू रखना होगा और इसके लिए  उनको अपने फैसलों के जरिए अपनी जवाबदेही को भी बरकरार रखना होगा।’’

उम्मीद है कि न्यायमूर्ति सीकरी की इन बातों पर पूरे देश में चर्चा होगी और लोगों का न्यायपालिका के प्रति विश्वास और मजबूत होगा।