न्यायपालिका के साथ करिए ‘न्याय’

    दिनांक 16-सितंबर-2020   
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अदालतों में मुकदमों का अंबार लगा है। लोगों को बरसों तक न्याय नहीं मिल पा रहा है। न्यायालयों में न्यायाधीश और अन्य कर्मचारियों की भारी कमी है। इन सबको ठीक करने के लिए  ‘अखिल भारतीय न्यायिक सेवा’ का गठन किया जाना चाहिए, जिसकी अनुशंसा कई आयोगों ने भी की है



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देश की अदालतों में लंबित मुकदमों की बढ़ती संख्या, दशकों तक न्याय की आस नहीं और निचली अदालतों में करीब 25 प्रतिशत  न्यायिक पदों का रिक्त होना, ये ऐसे तथ्य हैं जो न्याय-व्यवस्था की मौजूदा स्थिति को बयां करते हैं। अधनीस्थ अदालतों की स्थिति को देखकर लोगों की त्वरित न्याय पाने की उम्मीदें टूटने लगी हैं। अब ऐसा लगने लगा है कि देश की न्याय-प्रणाली, विशेषकर अधीनस्थ न्यायपालिका, को इस अंधेरी सुरंग से बाहर निकालने के लिए सरकार को कठोर कदम उठाने होंगे। विशेषज्ञ मान रहे हैं कि इस समस्या और चुनौती का सामना बहुप्रतीक्षित ‘अखिल भारतीय न्यायिक सेवा’ का सृजन करके ही किया सकता है।
यह सही है कि केंद्र सरकार के इस तरह के प्रयास से कई राज्य और उच्च न्यायालय सहमत नहीं हैं, लेकिन अगर अधीनस्थ अदालतों में रिक्त पदों पर भर्तियों के लिए उच्चतम न्यायालय को दखल देना पड़े तो फिर क्यों नहीं एक केंद्रीय व्यवस्था के अंतर्गत न्यायाधीशों के पद पर नियुक्ति के लिए भी प्रतियोगी परीक्षा की प्रणाली शुरू कर देनी चाहिए।

न्याय-व्यवस्था की जो स्थिति है, उसे देखते हुए अब जरूरी हो गया है कि ‘अखिल भारतीय न्यायिक सेवा’ गठित करने के 60 साल पुराने संकल्प और 44 साल पहले 1976 में संविधान में किए गए संशोधन को लागू किया जाए।

भारत की 21वीं सदी की न्यायपालिका के लिए जरूरी है कि न्याय की आस में उसका दरवाजा खटखटाने वाले व्यक्ति को शीघ्र न्याय मिले, लेकिन मौजूदा व्यवस्था में इसकी उम्मीद करना अब मृग-मरीचिका जैसा होता जा रहा है।

अदालतों में आज भी करीब साढ़े तीन करोड़ मुकदमे लंबित हैं और इनमें से 85,873  मुकदमे तो 30 साल से भी ज्यादा समय से लंबित हैं। इसी तरह 4.18 लाख से ज्यादा मुकदमे तो 20 से 30 साल पुराने हैं जिनके भाग्य का फैसला होना है। अधीनस्थ अदालतों में ही करीब तीन करोड़ मुकदमे लंबित हैं, जबकि इन अदालतों के लिए न्यायाधीशों और न्यायिक अधिकारियों के कुल 22,474 स्वीकृत पदों में से लगभग 25 प्रतिशत हमेशा खाली ही रहते हैं।
सूत्रों की मानें तो नरेंद्र मोदी सरकार न्यायपालिका से संबंधित विभिन्न पहलुओं को ध्यान में रखते हुए ही ‘अखिल भारतीय न्यायिक सेवा’ के गठन के लिए प्रस्तावित विधेयक को अंतिम रूप देने में लगी है। विधेयक के मसौदे पर न्यायपालिका के साथ ही राज्यों की राय भी ली जा रही है। अगर इसके हितधारकों में मोटे तौर पर सहमति बन गई तो बहुत संभव है कि निकट भविष्य में विधेयक का मसौदा मंत्रिमंडल में मंजूरी के लिए रखा जाएगा।

अधीनस्थ न्यायपालिका की स्थिति के बारे में शायद सहजता से यकीन न हो, लेकिन हकीकत यह है कि अदालतों में आज भी करीब साढ़े तीन करोड़ मुकदमे लंबित हैं और इनमें से 85,873  मुकदमे तो 30 साल से भी ज्यादा समय से लंबित हैं। इसी तरह 4.18 लाख से ज्यादा मुकदमे तो 20 से 30 साल पुराने हैं जिनके भाग्य का फैसला होना है। अधीनस्थ अदालतों में ही करीब तीन करोड़ मुकदमे लंबित हैं, जबकि इन अदालतों के लिए न्यायाधीशों और न्यायिक अधिकारियों के कुल 22,474 स्वीकृत पदों में से लगभग 25 प्रतिशत हमेशा खाली ही रहते हैं।

यह भी कम दिलचस्प तथ्य नहीं है कि एक ओर कई राज्य और उच्च न्यायालय अखिल भारतीय न्यायिक सेवा के गठन के पक्ष में नहीं हैं, लेकिन दूसरी ओर अधीनस्थ अदालतों में न्यायाधीशों के रिक्त पदों पर नियुक्तियों की गति तेज करने के लिए शीर्ष अदालत को हस्तक्षेप करना पड़ रहा है और वह इस दिशा में हो रही प्रगति की निगरानी भी कर रही है।

सरकार ही नहीं, बल्कि उच्चतम न्यायालय और विधि आयोग भी भारतीय प्रशासनिक सेवा और भारतीय पुलिस सेवा की तरह ही न्यायिक सेवा में अखिल भारतीय स्तर पर प्रवेश परीक्षा के माध्यम से न्यायाधीशों और न्यायिक अधिकारियों की भर्ती के पक्षधर हैं। संसद की स्थाई समिति ने भी 14 साल पहले मई, 2006 में अपनी रपट में जिला स्तर के न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए अखिल भारतीय न्यायिक सेवा के सृजन की दिशा में तेजी से कदम उठाने की सिफारिश की थी।

अधीनस्थ न्यायिक सेवा चूंकि राज्य और उच्च न्यायालय के अधीन होती है और वही इसके लिए परीक्षा का आयोजन करते हैं, इस वजह से अधिकांश राज्य सरकारों और उच्च न्यायालयों की अखिल भारतीय न्यायिक सेवा में दिलचस्पी कम है। उन्हें लगता है कि नई व्यवस्था के बाद जिले की न्यायपालिका की कमान अखिल भारतीय न्यायिक सेवा के माध्यम से चयनित जिला न्यायाधीश के हाथ में रहेगी तो फिर उच्च न्यायालय का अधीनस्थ न्यायपालिका पर नियंत्रण कम हो जाएगा।

सरकार इस तरह की आशंकाओं के प्रति जागरूक है और बहुत संभव है कि प्रस्तावित कानून में ही यह प्रावधान हो कि जिला न्यायाधीश तथा जिले की न्यायपालिका सहित सारी अधीनस्थ न्यायपालिका उच्च न्यायालय के नियंत्रण और निर्देश में ही काम करेगी। यह ऐसा सवाल नहीं है जिसके लिए बहुत चिंता की जाए। 
केंद्र सरकार अखिल भारतीय न्यायिक सेवा को लेकर राज्यों और उच्च न्यायालयों के रवैये तथा भाषाई समस्या की चुनौतियों के प्रति भी सजग है। संभव है कि अखिल भारतीय न्यायिक सेवा के विधेयक के मसौदे में ही इस प्रतियोगिता के माध्यम से चयनित न्यायाधीशों की कार्यप्रणाली को उच्च न्यायालय के नियंत्रण में सौंप दिया जाए, ताकि राज्य स्तर पर न्यायिक व्यवस्था प्रभावित न हो।

वैसे उच्चतम न्यायालय का भी यही मत रहा है कि अधीनस्थ न्यायपालिका में नियुक्तियों के लिए केंद्रीयकृत प्रवेश परीक्षा का आयोजन होगा तो इसमें कानून की बेहतर जानकारी रखने और प्रतिभाशाली तथा योग्य व्यक्तियों का चयन संभव हो सकेगा जो न्यायपालिका की छवि सुधारने में मददगार होगा।

विभिन्न राज्यों में अधीनस्थ न्यायिक सेवा में भर्ती के लिए पिछले कुछ वर्षों के दौरान हुई परीक्षा और इनके नतीजों को लेकर उठे विवाद के परिप्रेक्ष्य में शीर्ष अदालत भी चाहती है कि न्यायाधीश पद के लिए होने वाली परीक्षा में एकरूपता हो और इसके लिए एक रूपरेखा तैयार की जानी चाहिए। शीर्ष अदालत ने तो इस दिशा में उचित कदम उठाने का निर्देश भी केंद्र सरकार को दिया था, लेकिन कुछ राज्य सरकारें और उच्च न्यायालय इससे सहमत नहीं हो रहे हैं।

केंद्र सरकार का हमेशा से यही मानना रहा है कि अधीनस्थ न्यायपालिका की सेवा में मेधावी और कानून के मामले में प्रवीण युवकों को आकर्षित करने के लिए इसे अखिल भारतीय सेवा बनाना ज्यादा उपयुक्त होगा। यही नहीं, अखिल भारतीय न्यायिक सेवा के माध्यम से सरकार दलितों, वनवासियों, अन्य पिछड़े वर्गों, महिलाओं आदि समाज के विभिन्न वर्गों का न्यायिक सेवा में प्रतिनिधित्व सुनिश्चित हो सकेगा।

सरकार का मानना है कि अगर अखिल भारतीय न्यायिक सेवा का गठन होता है तो इसमें अन्य सेवाओं की तरह आरक्षण का प्रावधान होगा और इससे न्यायिक सेवा में समाज के विभिन्न वर्गों का समुचित प्रतिनिधित्व भी सुनिश्चित किया जा सकेगा।
राज्य स्तर पर अधीनस्थ न्यायपालिका में न्याय प्रदान करने की व्यवस्था में सुधार की लंबे समय से आवश्यकता महसूस की जा रही है। इसी को ध्यान में रखते हुए 1976 में संविधान में 42वां संशोधन कर इसे अनुच्छेद 312 में शामिल किया गया था और इसमें स्पष्ट किया गया था कि अनुच्छेद 236 में प्रदत्त जिला न्यायाधीश से नीचे के किसी भी न्यायिक पद को इसके दायरे में शामिल नहीं किया जाएगा।

इस संशोधन का मतलब स्पष्ट था कि अखिल भारतीय सेवा की तर्ज पर ही अखिल भारतीय न्यायिक सेवा के लिए प्रवेश परीक्षा का आयोजन होगा। इस सेवा के लिए चयनित न्यायिक  अधिकारियों का एक ‘पूल’ तैयार किया जाएगा और इससे उनके ‘कॉडर’ बनाए जा सकते हैं। हां, राज्यों की भाषाई स्थिति को ध्यान में रखते हुए यह सुझाव दिया गया था कि इस परीक्षा में उत्तीर्ण होने वाले अभ्यर्थियों की सूची राज्य सरकार और उच्च न्यायालय के पास उचित कार्यवाही के लिए भेजी जाएगी।

अखिल भारतीय न्यायिक सेवा के गठन का राज्यों द्वारा विरोध की एक वजह अदालतों में स्थानीय कामकाज की व्यवस्था है। ऐसा महसूस किया जा रहा है कि अधीनस्थ न्यायपालिका के स्वरूप में बदलाव के साथ ही इसके कामकाज की भाषा में भी बदलाव होगा। इसलिए भाषाई समस्या की ओर भी ध्यान देना आवश्क होगा, क्योंकि स्थानीय भाषा के ज्ञान का अभाव न्यायिक व्यवस्था की क्षमता प्रभावित कर सकता है।
देश में अखिल भारतीय न्यायिक सेवा के सृजन का विचार सबसे पहले 1958 में विधि आयोग ने अपनी 14वीं रपट में सरकार के सामने रखा। इसके बाद आठवें, 11वें और 16वें विधि आयोग ने भी इस सेवा के सृजन पर जोर दिया। यही नहीं, 1961, 1963 और 1965 में उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों के सम्मेलनों में भी इसके पक्ष में विचार रखे गए थे।
सरकार का मानना है कि आईएएस और आईपीएस अधिकारी भाषा के अवरोध पार करते हुए विभिन्न राज्यों में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। इसी तरह न्यायपालिका के मामले में गहन भाषा प्रशिक्षण से इस समस्या से उबरा जा  सकता है।
कई राज्यों ने दंड प्रक्रिया संहिता और भारतीय दंड संहिता में प्रदत्त शक्ति का इस्तेमाल करते हुए अपने यहां निचली अदालतों में स्थानीय भाषा में ही कामकाज का प्रावधान कर रखा है, ताकि समाज के सभी वर्गों के लोग अदालती कार्यवाही समझ सकें और उसके आदेशों तथा फैसलों को पढ़ सकें। मसलन, तमिलनाडु की अदालतों में तमिल, केरल की अदालतों में मलयाली, असम में असमी और हिन्दी-भाषी राज्यों की अदालतों में हिन्दी भाषा में कामकाज होता है।

उच्चतम न्यायालय ने मई, 2017 में अधीनस्थ न्यायपालिका में 5,000 से भी ज्यादा रिक्त स्थानों से संबंधित एक मामले की सुनवाई के दौरान न्यायाधीश के पद के लिए समान प्रवेश परीक्षा और चयन प्रक्रिया अपनाने का सुझाव दिया था।

मई, 2017 में तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश जगदीश सिंह खेहड़ की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने कुछ राज्यों और उच्च न्यायालयों की इस आशंका को दूर करने का प्रयास किया था कि अखिल भारतीय प्रतियोगी परीक्षा के माध्यम से न्यायाधीशों का चयन करना देश के संघीय ढांचे के खिलाफ होगा। न्यायालय का कहना था कि इस परीक्षा के माध्यम से सफल अभ्यर्थियों की मेधा सूची तैयार करके उसे राज्य सरकारों को सौंपने का विचार है।

देश में अखिल भारतीय न्यायिक सेवा के सृजन का विचार सबसे पहले 1958 में विधि आयोग ने अपनी 14वीं रपट में सरकार के सामने रखा। इसके बाद आठवें, 11वें और 16वें विधि आयोग ने भी इस सेवा के सृजन पर जोर दिया गया। यही नहीं, 1961, 1963 और 1965 में उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों के सम्मेलनों में भी इसके पक्ष में विचार रखे गए थे।

नरेंद्र मोदी सरकार अधीनस्थ न्यायपालिका में लंबित मुकदमों की विशाल संख्या और इनके निबटारे में हो रहे विलंब की चुनौतियों से प्रभावी तरीके से निबटने के इरादे से अखिल भारतीय न्यायिक सेवा का सृजन करना चाहती है।

सरकार का विचार अच्छा है, लेकिन इससे पहले उसे अधीनस्थ न्यायपालिका में न्यायाधीशों के रिक्त पदों पर नियुक्तियों के काम को गति प्रदान करनी होगी। इसके अलावा, राज्यों की आबादी के अनुपात में वहां न्यायाधीशों और न्यायिक अधिकारियों और सहायक कर्मचारियों की संख्या में वृद्धि करनी होगी। इसके अलावा, अदालतों के नए कक्षों के निर्माण के साथ ही दूसरी बुनियादी सुविधाओं में सुधार भी करना होगा।

सरकार को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि अधीनस्थ न्यायालयों में पर्याप्त संख्या में अदालत कक्ष और आवासीय इकाइयों का निर्माण भी किया जाए।

उम्मीद की जानी चाहिए कि सरकार इस दिशा में ठोस कदम उठाएगी, ताकि आम लोगों को समय पर न्याय मिल सके।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)