भारत की बड़ी सामरिक सफलता

    दिनांक 16-सितंबर-2020   
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रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन ने हाल ही में ध्वनि की गति से छह गुना तेज गति से मार करने वाले हाइपरसोनिक मिसाइल तकनीक का सफल परीक्षण किया है। स्वदेश में विकसित इस मिसाइल तकनीक से देश के रक्षा तंत्र को बहुत बल मिलेगा। यह तकनीक अभी तक अमेरिका, रूस और चीन के पास ही थी
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डीआरडीओ द्वारा विकसित हाइपर टेक्टनोलॉजी डिमॉन्स्ट्रेटर व्हीकल का सफलतापूर्वक परीक्षण किया है।


एरत ने मिसाल तकनीक में एक और बड़ी कामयाबी हासिल की है। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) ने हाइपरसोनिक मिसाइल तकनीक का सफलतापूर्वक परीक्षण कर लिया है। यह हवा में ध्वनि की गति से छह गुना तेज गति से लक्ष्य पर निशाना साधने में सक्षम है। अमेरिका, रूस और चीन के बाद भारत चौथा ऐसा देश बन गया है, जिसने अपने दम पर हाइपरसोनिक तकनीक विकसित किया है। ओडिशा तट के पास डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम कॉम्पलेक्स से मानव रहित स्क्रैमजेट हाइपरसोनिक स्पीड फ्लाइट का सफल परीक्षण किया। हाइपरसोनिक क्रूज मिसाइल प्रणाली के विकास को आगे बढ़ाने की दिशा में यह बड़ा कदम है। इस तकनीक के सफल परीक्षण के बाद ध्वनि की रफ्तार से छह गुना अधिक तेज रफ्तार से दागी जाने वाली मिसाइलों के निर्माण का रास्ता साफ हो गया है। अगले पांच साल में भारत अपनी पहली हाइपरसोनिक मिसाइल तैयार कर सकता है। भारत के पास ब्रह्मोस जैसी सुपर सोनिक मिसाइल पहले से ही है ।


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एचएसटीडीवी की सफल प्रायोगिक उड़ान के साथ भारत ने अत्यधिक जटिल प्रौद्योगिकी को प्राप्त करने के अपने सामर्थ्य का प्रदर्शन किया है, जो घरेलू रक्षा उद्योग के साथ भागीदारी में अगली पीढ़ी के हाइपरसोनिक यान निर्माण के लिए एक महत्वपूर्ण मंच के रूप में काम करेगा। प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में ये भारत की ऊंची छलांग है, क्योंकि दुश्मन देश इसका पता ही नहीं लगा सकते। यह परमाणु बम की तरह युद्ध में गेम चेंजर है। इसमें दुश्मन को प्रतिक्रिया देने का मौका ही नहीं मिलेगा।  -रवि कुमार गुप्ता, पूर्व वैज्ञानिक, डीआरडीओ

देश में विकसित ‘हाइपरसोनिक प्रौद्योगिकी निदर्शक यान’ (एचएसटीडीवी) का सफल प्रायोगिक उड़ान परीक्षण बहुत महत्वपूर्ण है। इससे भविष्य में लंबी दूरी तक मार करने वाली मिसाइल प्रणाली और हवाई रक्षा प्रणाली को मजबूती मिलने की उम्मीद है। एचएसटीडीवी को डीआरडीओ ने विकसित किया है, जो हाइपरसोनिक प्रणोदन प्रौद्योगिकी पर आधारित है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने एचएसटीडीवी की सफल प्रायोगिक उड़ान पर डीआरडीओ को बधाई दी और इसे एक ‘महत्वपूर्ण उपलब्धि’ करार दिया। उन्होंने ट्वीट किया, ‘आत्मनिर्भर भारत की प्रधानमंत्री की परिकल्पना की दिशा में इस महत्वपूर्ण उपलब्धि पर मैं डीआरडीओ को बधाई देता हूं। मैंने परियोजना से जुड़े वैज्ञानिकों से बात की और उन्हें इस महान उपलब्धि पर बधाई दी।’ असल में हाइपरसोनिक टेक्नोलॉजी डिमांन्स्ट्रेटर व्हीकल न केवल हाइपरसोनिक और लंबी दूरी तक मार करने वाली क्रूज मिसाइल के व्हीकल की तरह प्रयोग किया जा सकेगा, बल्कि इसके कई नागरिक फायदे भी हैं। इसकी मदद से छोटे उपग्रहों को कम लागत में प्रक्षेपित किया जा सकता है। हाइपरसोनिक तकनीक के आधार पर भारत मिसाइल के क्षेत्र में अगले कुछ वर्षों में दुनिया का सबसे ताकतवर देश भी बन सकता है। एचएसटीडीवी के परीक्षण में स्क्रैमजेट इंजन सहित प्रक्षेपण और क्रूज वाहन के मापदंडों की निगरानी कई ट्रैकिंग राडार, इलेक्ट्रो-आॅप्टिकल द्वारा की गई थी। स्क्रैमजेट इंजन ने उच्च गतिशील दबाव और बहुत अधिक तापमान पर काम किया। हाइपरसोनिक वाहन के क्रूज चरण के दौरान प्रदर्शन की निगरानी के लिए बंगाल की खाड़ी में एक जहाज भी तैनात किया गया था। सभी प्रदर्शन मापदंडों ने अभियान की शानदार सफलता का संकेत दिया है। डीआरडीओ ने कहा कि यह परीक्षण भविष्य में अधिक महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों, सामग्रियों और हाइपरसोनिक वाहनों के विकास का मार्ग प्रशस्त करेगा। यह भारत को उन चुनिंदा देशों की श्रेणी में खड़ा कर दिया है, जिनके पास यह तकनीक है।

ब्रह्मोस: सबसे तेज सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल
भारत के पास ब्रह्मोस जैसी उन्नत और दुनिया की सबसे तेज सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल है, जिसके दूसरे संस्क्रण का भी सफल परीक्षण हो चुका है। क्रूज मिसाइल उसे कहते हैं जो कम ऊंचाई पर तेजी से उड़ान भरती है। इसके कारण यह राडार की पकड़ में नहीं आती है। ब्रह्मोस की विशेषता यह है कि इसे जमीन, हवा, पनडुब्बी, युद्धपोत से यानी कहीं से भी दागा जा सकता है। यही नहीं, इस मिसाइल को पारम्परिक प्रक्षेपक के अलावा उर्ध्वगामी यानी वर्टिकल प्रक्षेपक से भी दागा जा सकता है। ब्रह्मोस के नए संस्करण का हाल ही में सफल परीक्षण किया गया था। इससे मिसाइल की मारक क्षमता में और भी वृद्धि हुई है। क्रूज मिसाइलों का लक्ष्य या तो पहले से तय रहता है या फिर वे लक्ष्य का पता लगाकर उसे ध्वस्त करती हैं। यह सबसोनिक, सुपरसोनिक और हाइपरसोनिक गति से लक्ष्य पर निशाना साध सकती हैं। बाकी मिसाइलों के मुकाबले ये जमीन के काफी नजदीक रहती हैं, इसलिए उन्हें मिसाइल रोधी प्रणाली जल्द नहीं पकड़ पाती। भारतीय सेना के तीनों अंगों के लिए ब्रह्मोस मिसाइल के अलग-अलग संस्करण बनाए गए हैं। थल सेना, वायु सेना और नौसेना की जरूरतों के हिसाब से ब्रह्मोस को अलग-अलग उद्देश्यों के लिए तैयार किया गया है। ब्रह्मोस को दुनिया की सबसे तेज सुपरसोनिक मिसाइल माना जाता है, क्योंकि इसकी गति 2.8 मैक है, जो ध्वनि की गति से लगभग तीन गुना अधिक है। दुश्मन की सीमा में घुसकर लक्ष्य भेदने में सक्षम ब्रह्मोस मिसाइल इसी गति से हमला करने में सक्षम है। मिसाइल तकनीक में दुनिया की कोई भी दूसरी मिसाइल तेज गति से आक्रमण के मामले में ब्रह्मोस की बराबरी नहीं कर सकती है। इसकी खूबियां इसे दुनिया की सबसे तेज मारक मिसाइल बनाती है। यहां तक कि अमेरिका की टॉम हॉक मिसाइल भी इसके आगे नहीं टिकती। ब्रह्मोस की सफलता का आकलन इस बात से भी लगाया जा सकता है कि भारत अब इसे दूसरे देशों को बेचने की दिशा में काम कर रहा है। इसके अलावा स्वदेशी संचालन शक्ति प्रणाली से लैस ‘निर्भय’ क्रूज मिसाइल का भी परीक्षण किया जा चुका है।

बैलिस्टिक मिसाइलों का खजाना
बैलिस्टिक मिसाइल को सीधे धरती के वायुमंडल की ऊपरी परत में छोड़ा जाता है। वे वायुमंडल के बाहर चलती हैं और वारहेड मिसाइल से अलग होकर सीधे लक्ष्य पर गिरता है। रॉकेट से छोड़ी जाने वाली इस मिसाइल में स्वनिर्देशित हथियार प्रणाली लगी होती है, जो परमाणु बम भी ले जा सकती है। इनको जमीन के अलावा विमान, जहाज या पनडुब्बी? से भी प्रक्षेपित किया जा सकता है। भारत के पास अग्नि, पृथ्वी, के-4,5,6, सूर्या, सागरिका, प्रहार, धनुष जैसी बैलिस्टिक मिसाइलों की एक पूरी खेप है।

परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम पृथ्वी-5
भारत के पास पृथ्वी-5 जैसी अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल (आईसीबीएम) भी है। आईसीबीएम वैसी मिसाइलें होती हैं, जिनकी मारक क्षमता कम से कम 5,500 किलोमीटर होती है। यह अपने साथ परमाणु व अन्य विस्फोटक ले जा सकती हैं। भारत के अलावा अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस, उत्तर कोरिया के पास ही आईसीबीएम हैं। 2018 में भारत ने 5,5 00 किलोमीटर मारक क्षमता वाली पृथ्वी-5 का सफल परीक्षण किया था।

शत्रु मिसाइल को हवा में नष्ट करने की क्षमता
पिछले दिनों भारत ने किसी भी बैलेस्टिक मिसाइल हमले को बीच में ही नाकाम करने में सक्षम इंटरसेप्टर मिसाइल का सफलतापूर्वक परीक्षण किया था। बहुस्तरीय बैलिस्टिक मिसाइल रक्षा प्रणाली विकसित करने के प्रयासों के अंतर्गत स्वदेश निर्मित सुपरसोनिक इंटरसेप्टर मिसाइल का परीक्षण हुआ था। यह मिसाइल धरती के वातावरण के 30 किलोमीटर की ऊंचाई के दायरे में आने वाली किसी भी बैलिस्टिक मिसाइल को बीच में ही मार गिराने में सक्षम है। राडार आधारित इस प्रणाली में लक्ष्य को खोजने का कार्य उससे मिलने वाले डाटा से किया जाता है। पृथ्वी के वातावरण से मिसाइल के बाहर जाते ही हीट शील्ड निकलती है और इंफ्रारेड सीकर खुल जाता है, जिससे लक्ष्य को निशाने पर लिया जाता है। मिसाइल रोधी प्रणाली में संवेदनशील राडार की सबसे ज्यादा अहमियत होती है। ऐसे राडार बहुत पहले ही वायुमंडल में आने वाले बदलाव को भांप कर आ रही मिसाइलों की स्थिति का पता लगा लेते हैं। शत्रु मिसाइल का पता लगते ही निर्देशन प्रणाली सक्रिय हो जाती है। इस प्रकार, शत्रु मिसाइल की तरफ इस इंटरसेप्टिव मिसाइल को दाग दिया जाता है। इस मिसाइल का काम दुश्मन की मिसाइल को सुरक्षित ऊंचाई पर ही हवा में नष्ट करना होता है। शत्रु मिसाल का पता लगाकर पलटवार करने की प्रक्रिया में महज कुछ सेकेंड का ही अंतर होता है। मिसाइल कवच के बारे में पहली बार अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन के समय में अधिक जिक्र हुआ। रीगन ने शीतयुद्ध के दौरान स्ट्रेटेजिक डिफेंस इनिशिएटिव (एसडीआई) का प्रस्ताव दिया था। यह एक अंतरिक्ष आधारित हथियार प्रणाली थी, जिसके सहारे अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल (आईसीबीएम) को अंतरिक्ष में मार गिराने की बात की गई थी। लेजर किरणों से लैस इस हथियार को मीडिया ने स्टार वार का नाम दिया था।

भारत के पास ब्रह्मोस जैसी उन्नत और दुनिया की सबसे तेज सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल है, जिसके दूसरे संस्क्रण का भी सफल परीक्षण हो चुका है। क्रूज मिसाइल उसे कहते हैं जो कम ऊंचाई पर तेजी से उड़ान भरती है। इसके कारण यह राडार की पकड़ में नहीं आती है। ब्रह्मोस की विशेषता यह है कि इसे जमीन, हवा, पनडुब्बी, युद्धपोत से यानी कहीं से भी दागा जा सकता है। यही नहीं, इस मिसाइल को पारम्परिक प्रक्षेपक के अलावा उर्ध्वगामी यानी वर्टिकल प्रक्षेपक से भी दागा जा सकता है।

भारत के लिए यह मिसाइल रक्षा कवच बहुत जरूरी हो गया था, क्योंकि चीन और पाकिस्तान लगातार अपने मिसाइल कार्यक्रमों को बढ़ावा दे रहे हैं। चीन के पास बैलेस्टिक मिसाइलों का जखीरा है। ऐसे में अपनी सुरक्षा के लिए यह जरूरी हो गया था कि दुश्मन की मिसाइल को हवा में ही नष्ट करने की प्रणाली विकसित की जाए। 1962 के युद्ध में हम चीन से हार चुके हैं और पाकिस्तान के साथ तो दो बार सीधी जंग हो चुकी है। लेकिन अब यदि युद्ध का माहौल बनता है तो यह पहले की अपेक्षा बिल्कुल दूसरे ढंग से लड़ा जाएगा। इसमें परमाणु बम से लैस मिसाइलों का भी इस्तेमाल किया जा सकता है। जिस तरह आजकल परमाणु हथियारों और मिसाइलों के आतंकवादियों के हाथों में पड़ने की आशंका जताई जा रही है, उससे भी चिंतित होना स्वाभाविक है। अमेरिका, रूस, इजरायल, जैसे देशों के पास यह तकनीक है। लेकिन यदि भारत पर इस तरह के हमले होते हैं तो ऐसी स्थिति में हमारे पास बचने का उपाय नहीं था। नतीजतन इन सभी पहलुओं को देखते हुए भी भारत का मिसाइल रोधी प्रणाली से लैस होना बहुत जरूरी था। आज महानगरों की घनी आबादी को देखते हुए भारत के लिए इस तरह की प्रणाली की सख्त जरूरत थी। इस मिसाइल कवच के विकसित होने से हमारे ऊर्जा स्रोतों, जैसे- तेल भंडार और परमाणु प्रतिष्ठानों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकेगी।
कुल मिलाकर पहले इंटरसेप्टर मिसाइल, फिर ब्रह्मोस जैसी सुपरसोनिक मिसाइल और अब हाइपर सोनिक मिसाइल के सफल परीक्षण से भारत का सामरिक रक्षा तंत्र काफी मजबूत हुआ है।
(लेखक मेवाड़ यूनिवर्सिटी में निदेशक और टेक्निकल टुडे पत्रिका के संपादक हैं )