खिलाफत के 100 साल-7: खिलाफत और गांधी जी

    दिनांक 17-सितंबर-2020
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डॉ. श्रीरंग गोडबोले
तत्कालीन कांग्रेस में कई ऐसे नेता थे जिन्हें खिलाफत आंदोलन को लेकर शुरू से ही शक था, लेकिन गांधी जी की अब्दुल बारी और अली बंधुओं जैसे मुस्लिम नेताओं से नजदीकी थी। वे चाहते थे कि गांधी जी अपने हिन्दू अनुयायियों को खिलाफत आंदोलन से जुड़ने को प्रेरित करें
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 महात्मा गांधी

साधारणत: यह कहा जा सकता है कि अपनी शक्ति के क्षीण होने के पहले खिलाफत आन्दोलन दो चरणों में विभाजित था। पहला चरण (दिसम्बर 1918-जुलाई 1920) निवेदन और प्रोत्साहन का था। इसमें जनमत तैयार करना, संगठन बनाना प्रस्ताव पारित करना और सरकार को याचिकाएं देना मुख्य कार्य थे। दूसरा चरण (अगस्त, 1920-मार्च 1922) अवपीड़न और नरसंहार का था। ये दोनों चरण इस्लाम के परंपरागत कार्य व्यवहार का रेखांकित करते हंै, जिसमें कहा गया है कि उम्मा के कमजोर होने तक मजहब का ‘पैगाम’ उपयुक्त है, परन्तु इसके बाद जब पर्याप्त मात्रा में शक्ति अर्जित कर ली जाए तो यह बड़े पैमाने पर हिंसा पर बल देता है।

प्रथम विश्वयुद्ध के बाद मुस्लिम असंतोष
1915 से 1918 के मध्य हुई गुप्त संधियों और युद्धकालीन समझौतों में तुर्की के ओटोमन साम्राज्य का विघटन मुख्य मांग थी। खिलाफत और इस्लाम के पाक स्थानों के संरक्षण के मुद्दों के साथ तुर्की का पतन निकटता से जुड़ा हुआ था। ये ऐसे मुद्दे थे जो भारत के मुस्लिमों को प्रिय थे। भारत के मुस्लिमों को यह भी डर था कि तुर्क ओटोमन साम्राज्य के पतन से भारत के भीतर उनके राजनीतिक महत्व पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। भारतीय मुस्लिमों ने यह शिकायत की कि अंग्रेजों के प्रति वफादारी ने उन्हें कोई लाभ नहीं पहुंचाया। 1918 में वायसराय लॉर्ड चेम्सफोर्ड और ब्रिटिश कैबिनेट में भारत के मंत्री सर एडविन मोंटेग्यू द्वारा संवैधानिक सुधारों पर एक संयुक्त रिपोर्ट प्रकाशित हुई, जिसे मोंटफोर्ड रिपोर्ट के नाम से जाना जाता था। रिपोर्ट में कहा गया कि ‘‘1909 में मोहम्मडंस को पृथक निर्वाचन क्षेत्रों के साथ विशेष प्रतिनिधित्व दिया गया था...मोहम्मडंस ने इन्हें स्थायी मान लिया है, और इसे वापस लेने का कोई भी प्रयास कड़े विरोध की श्रृंखला को प्रोत्साहित करेगा और इस समुदाय की वफादारी पर भारी दबाव डाल देगा। मोहम्मडंस पृथक प्रतिनिधित्व और सांप्रदायिक निर्वाचन को अपने एकमात्र पर्याप्त सुरक्षा उपायों के रूप में मानते हैं...और हम आश्वस्त हैं कि...वर्तमान प्रणाली को बनाए रखा जाना चाहिए...लेकिन हम ऐसा कोई कारण नहीं देखते कि ऐसे प्रान्तों में सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व स्थापित किया जाए जहां मोहम्मडंस मतदाता बहुमत में हों।’’

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 गांधी जी के निकट मित्र रहे थे अली बंधु

(द रिपोर्ट आॅन इंडियन कॉन्स्टिट्यूशनल रिफॉर्म्स, लंदन,1918, पृ.188) यह सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व को खत्म करने का सुझाव नहीं था, परन्तु यह मुस्लिम-बहुल प्रांतों में मुस्लिम नेताओं की मुश्किलें बढ़ाने के लिए पर्याप्त था। प्रेस एक्ट (1910) और डिफेंस आॅफ इंडिया एक्ट (1915) का इस्तेमाल अक्सर कॉमरेड, हमदर्द, अल-हिलाल, अल-बालघ और जमींदार जैसी मुस्लिम पत्रिकाओं के प्रकाशन को बाधित करने के लिए किया जाता था। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रमुख नेता, जैसे महमूद अल-हसन, अली बंधु, अबुल कलाम आजाद और हसरत मोहानी हिरासत में थे। युद्ध के दौरान जिन प्रमुख नेताओं को नजरबंद कर दिया गया था, उनमें से केवल मौलाना अब्दुल बारी, डॉ. अंसारी, हकीम अजमल खान और मुशीर हुसैन किदवई राजनीतिक रूप से सक्रिय थे। 1917 की शुरुआत से, हिरासत में लिए गए मुस्लिम नेताओं को रिहा करने के लिए एक आंदोलन शुरू किया गया था। (खिलाफत मूवमेंट इन इंडिया 1919-1924, मुहम्मद नईम कुरैशी, लंदन विश्वविद्यालय के लिए प्रस्तुत शोध प्रबंध, 1973, पृ.51, 52)

गांधी जी का जुनून
1915 में गांधी जी दक्षिण अफ्रीका में सफल सत्याग्रह अभियान चलाने के बाद भारत लौटे थे। 1917 की सर्दियों में उन्हें हिरासत में लिए गए मुस्लिम नेताओं की रिहाई के अभियान में शामिल होने के लिए तैयार कर लिया गया था। उनके मुस्लिम मित्रों का दायरा अब और विस्तृत  हो गया और जिसमें अली बंधु, हकीम अजमल खान और मौलाना अब्दुल बारी शामिल थे। अप्रैल, 1918 में दिल्ली इम्पीरियल वॉर कॉन्फ्रेंस में बड़ी दृढ़ता से तुर्की के संबंध में मुस्लिम दृष्टिकोण प्रस्तुत करने के बाद वे इन नेताओं के लिए सम्मान के पात्र बन गए। (कुरैशी, उक्त, पृष्ठ 53) फरवरी 1919 में, रॉलेट एक्ट को इम्पीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल द्वारा पारित किया गया था। इसने कुछ राजनीतिक मामलों को बिना किसी जिरह और बिना किसी मुकदमे के संदिग्धों को नजरबंद करने की अनुमति दी। इसके परिणामस्वरूप व्यापक असंतोष फैला, जिसका चरम 13 अप्रैल, 1919 को अमृतसर के जलियांवाला बाग में हुए नरसंहार में देखने को मिला।

मुस्लिम लीग के नेता चौधरी खलीकुज्जमां ने अपने संस्मरण में मुसलमानों के ‘मूर्खतापूर्ण उत्साह’ का वर्णन किया, जो स्वामी श्रद्धानंद को दिल्ली में मस्जिद के अंदर ले गए थे। संभवत: इन घटनाओं के कुछ तीस साल बाद नेहरू ने बुद्धिमान बनते हुए ‘गांधी जी द्वारा विभिन्न असंतोषों के बीच कृत्रिम एकता’ की रचना की बात की। 


अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत से ही गांधी जी पर ‘हिंदू-मुस्लिम एकता’ का जुनून सवार था। आम्बेडकर ने गांधी जी के इस अजीबोगरीब चरित्र का वर्णन इस प्रकार किया, ‘‘अपने करियर की शुरुआत में श्री गांधी ने भारत के लोगों को छह महीने के भीतर स्वराज प्राप्त करने का वादा करके चौंका दिया। श्री गांधी ने कहा कि वह चमत्कार कर सकते हैं यदि केवल कुछ शर्तों को पूरा किया जाए तो। इनमें से एक शर्त हिंदू-मुस्लिम एकता की उपलब्धि थी। श्री गांधी यह कहते हुए कभी नहीं थकते हैं कि हिंदू-मुस्लिम एकता के बिना कोई स्वराज नहीं है। श्री गांधी ने न केवल इस नारे को भारतीय राजनीति में वैधता प्रदान की, बल्कि उन्होंने इसे वास्तविकता में लाने के लिए कड़ी मेहनत की है। श्री गांधी ने रॉलेट एक्ट के खिलाफ सत्याग्रह शुरू करने की अपनी मंशा की घोषणा करते हुए, मार्च 1919 में निर्धारित किया था कि सभाओं में आने वाले जनसमूह को हिंदू-मुस्लिम एकता का संकल्प लेना चाहिए। रॉलेट एक्ट के खिलाफ सत्याग्रह के अभियान में ऐसा कुछ भी नहीं था जिसके कारण हिंदुओं और मुसलमानों के बीच कोई भी टकराव हो सकता था। फिर भी श्री गांधी ने अपने अनुयायियों से प्रतिज्ञा लेने को कहा। इससे पता चलता है कि वह हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रति शुरू से ही कितने आग्रहशील थे।’’(पाकिस्तान आॅर पार्टीशन आॅफ इंडिया, बी.आर. आम्बेडकर, थाकर एंड कंपनी लिमिटेड, 1945, पृ.135,136) यह संभव है कि 1917 की सर्दियों में मुस्लिम नेताओं के साथ उनकी आरंभिक बातचीत ने उन्हें गांधी जी की हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रति आजीवन प्रभावित किया।

गांधी-बारी प्रतिदान
तुर्की के भविष्य पर चिंता की पहली सार्वजनिक अभिव्यक्ति 30-31 दिसंबर, 1918 को दिल्ली में आयोजित आॅल इंडिया मुस्लिम लीग के सम्मलेन में हुई थी। हालांकि, तुर्की को लेकर आंदोलन ज्यादातर उत्तर प्रदेश, बंगाल, पंजाब, बॉम्बे और सिंध के बड़े शहरों में केंद्रित था। जाहिर है, मुस्लिम लामबंदी पर्याप्त नहीं थी। पैन-इस्लामिक एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए हिंदू समर्थन की आवश्यकता थी। भारत में स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास के लिए स्रोत सामग्री (खंड 3, महाराष्ट्र सरकार, पृ.139) 3 मार्च 1919 की अपनी रिपोर्ट में कहती है, ‘‘मार्च 1919 में गांधी अब्दुल बारी के अतिथि के रूप में लखनऊ में थे। ...एक मुखबिर की रिपोर्ट है कि श्री गांधी ने कुछ समय पहले मौलवी अब्दुल बारी से मुलाकात की और उनके साथ सत्याग्रह आंदोलन (रॉलेट बिल के खिलाफ) पर चर्चा की। कहा जाता है कि गांधी आंदोलन की सफलता के बारे में सबसे अधिक आशावादी थे। उन्होंने अब्दुल बारी से कहा कि उनके पास हर शहर में एजेंट हैं और निष्क्रिय प्रतिरोध का विचार अधिकारियों के अधीनस्थ नौकरों और सेना तक फैलेगा। हिन्दू-मुस्लिम एकता पूर्ण होगी और सरकार पंगु हो जाएगी। इस बात पर सहमति बनी कि जब आंदोलन अपने चरम पर हो तब उलेमाओं, मौलवियों और आम मोहम्मडंस की एक बड़ी बैठक होगी, जिसमें अब्दुल बारी को शेख-उल-इस्लाम चुना जाना चाहिए और मुस्लिमों को खिलाफत, पाक स्थानों आदि के बारे में मांग करनी चाहिये।

हिंदू इन मांगों का समर्थन करेंगे जिन्हें महामहिम वायसराय को इस चेतावनी के साथ प्रस्तुत किया जाना चाहिए कि उनकी गैर-स्वीकृति का मतलब जिहाद होगा। हिंदुओं की सहायता के बदले में अब्दुल बारी, शेख-उल-इस्लाम के रूप में एक फतवा जारी करते हुए घोषणा करेंगे कि मूल रूप से इब्राहिम द्वारा बलिदान किया गया जानवर एक भेड़ थी, गाय नहीं, और यह कि भविष्य में गाय का बलिदान निषिद्ध होगा। कहा जाता है कि यह योजना देश के विभिन्न हिस्सों में हिंसा के व्यापक प्रकोप के कारण बर्बाद हो गई।’’(पृ.139) गांधी जी और अब्दुल बारी, दोनों एक-दूसरे का उपयोग कर रहे थे और जिन मुद्दों पर वे डटे हुए थे वे उनके अपने निजी लाभ के लिए थे। गांधी जी ने मुस्लिम समर्थन हासिल करने और इसके द्वारा एकजुट भारत का सर्वमान्य नेतृत्व करने के लिए खिलाफत मुद्दे का शोषण किया। अन्यथा, उन्होंने खुद स्वीकार किया कि उन्हें तुर्की की ऐसी कुछ परवाह भी नहीं थी, लेकिन भारत के मोहम्मडंस को थी...और उन्होंने इसकी  हिमायत करना उचित समझा।’ अब्दुल बारी के लिए गांधी जी के समर्थन का अर्थ खिलाफत आंदोलन को मजबूत करना और शायद उप-महाद्वीप के 'शेख-उल-इस्लाम' के रूप में व्यक्तिगत प्रसिद्धि थी। इसके लिए वह अपने पहले के रुख को संशोधित करने और गोरक्षा का प्रचार करने के लिए तैयार था। (कुरैशी, उक्त, पृ.59-60) रॉलेट के विरुद्ध सत्याग्रह अल्पकालिक था जिसे गांधी जी द्वारा 18 अप्रैल, 1919 को निलंबित कर दिया गया था।

इस्लामी एकीकरण
19 मार्च 1919 को, फिरंगी महल से जुड़े बॉम्बे के कुछ धनी मुस्लिम व्यवसायियों ने बॉम्बे खिलाफत कमेटी की स्थापना के लिए धन दिया। मई, 1919 के मध्य में अफगानिस्तान के अमीर अमानुल्लाह ने अंग्रेजों के साथ युद्ध छेड़ दिया। अखिल-इस्लामवादियों ने अमीर के एजेंटों के साथ तालमेल बनाने में कोई समय नहीं गंवाया। अब्दुल बारी ने एक भड़काऊ पुस्तिका का प्रसार किया और एक लंबा जिहादी पर्चा उत्तर प्रदेश में दिखाई दिया, जिसमें एक मजहबी युद्ध की आवश्यकता पर जोर दिया गया था। (खिलाफत मूवमेंट इन इंडिया 1919-1924, ए.सी. नीमायर, मार्टिनस निजॉॅफ, 1972, पृ. 75; कुरैशी, उक्त, पृ.67 भी देखें) तुर्की के मामले की पैरवी करने के लिए लंदन में प्रतिनिधिमंडलों, अखिल-इस्लामी समाजों के प्रयास और भारत में आंदोलन के बावजूद कोई अनुकूल परिणाम नहीं निकला। उनकी भावनाओं को और अधिक एकजुट अभिव्यक्ति देने के लिए, सितंबर 1919 में लखनऊ में एक आल इंडिया मुस्लिम कांफ्रेंस आयोजित की गई थी, जिसमें विभिन्न राजनीतिक विचारों के लगभग एक हजार महत्वपूर्ण मुस्लिम नेताओं ने भाग लिया था। सम्मेलन द्वारा दो अहम निर्णय लिए गए; पहला, एक केंद्रीय को-आॅर्डिनेटिंग इकाई की स्थापना और दूसरा, 17 अक्तूूबर, 1919 को 'खिलाफत दिवस' के रूप में मनाना। मुस्लिम लीग एक आक्रामक सरकार विरोधी मत को आगे बढ़ाने के लिए अनिच्छुक थी, इसलिए केवल खिलाफत के प्रश्न के लिए एक अस्थायी संगठन स्थापित करना आवश्यक समझा गया। बॉम्बे की खिलाफत कमेटी को पूरे देश में बनने वाली शाखाओं के साथ एक केंद्रीय निकाय के रूप में नामित किया गया था। परिणामस्वरूप, 11 नवंबर, 1919 को हुई एक बैठक में, बॉम्बे खिलाफत कमेटी ने इसका शीर्षक बदलकर ‘द सेंट्रल खिलाफत कमेटी आॅफ इंडिया, बॉम्बे’ कर दिया। (कुरैशी, उक्त, पृ.71)

सेंट्रल खिलाफत कमेटी
सेंट्रल खिलाफत कमेटी या जैसा कि इसे जमात-ए-खिलाफत-ए-हिंद के रूप में भी जाना जाता था, ने अमृतसर (दिसंबर 1919) और बॉम्बे (फरवरी 1920) में फिर से बैठकें कीं। अपने संविधान के अनुसार, सेंट्रल खिलाफत कमेटी के उद्देश्य थे-तुर्की के लिए न्यायपूर्ण और सम्मानजनक शांति सुरक्षित करना; खिलाफत के मुद्दे का निपटारा; इस्लाम के पाक स्थानों और जजीरत-उल अरब (अरब प्रायद्वीप) में भी शरीयत की मान्यताओं के अनुरूप समाधान; माननीय श्री लॉयड जॉर्ज द्वारा 5 जनवरी, 1919 को किये गए वायदों को पूरा करने और लॉर्ड हार्डिंग द्वारा तुर्की साम्राज्य की अखंडता के संरक्षण के बारे में दिये गए वचन को पूर्ण करने; उपरोक्त उद्देश्य के लिए ब्रिटिश मंत्रियों, भारत के वायसराय और ब्रिटिश जनता से संपर्क करना; भारत के अंदर और बाहर प्रचार कार्य और इस तरह के अन्य कार्य करना और ऐसे कदम उठाना जो इन उद्देश्यों की पूर्ती के लिए जिन्हें आवश्यक समझे जाएं।   

सेंट्रल खिलाफत कमेटी का मुख्यालय बॉम्बे में था और इसमें 200 सदस्य शामिल थे। बाद में 1923 में ये बढ़कर 250 हो गए। बॉम्बे को 54 सीटें दी गर्इं, सिंध को 20, मद्र्रास को 15 और शेष सीटें अन्य प्रांतों को गईं। प्रांतीय खिलाफत कमेटियों को सेंट्रल खिलाफत कमेटी के साथ संबद्धता में काम करने की आवश्यकता थी और जहां ऐसी समितियां मौजूद नहीं थीं वहां केंद्र्रीय निकाय को ही कार्य करना था। केंद्र्रीय और प्रांतीय कमेटियों को धन एकत्र करना था। सौ से अधिक स्थानीय समितियों और एक विशाल सदस्यता के साथ, यह सबसे शक्तिशाली मुस्लिम निकाय बन गया, जब तक कि 1920 के दशक के उत्तरार्ध में मुस्लिम लीग एक बार फिर से महत्वपूर्ण नहीं हो गई। (कुरैशी, उक्त, पृ. 72) इसके अलावा इसमें तथाकथित खिलाफत कार्यकर्ता और खिलाफत स्वयंसेवक भी थे। कुछ स्थानों पर ऐसे लोगों को नियुक्त किया गया था जो उन लोगों से चार आना प्रति व्यक्ति चंदा वसूला करते थे जो खिलाफत के सदस्य बनना चाहते थे। (नीमायर, उक्त, पृ. 85) सामूहिक सदस्यता के स्तर पर, कांग्रेस और खिलाफत अनुयायियों के बीच उन वर्षों में कोई स्पष्ट अंतर नहीं किया जाता था। मुस्लिम लीग में समान लोगों के साथ कांग्रेस संगठन और कार्यालयों को जोड़ना भी असामान्य नहीं था, और कांग्रेस और खिलाफत कांफ्रेंस और सेंट्रल  खिलाफत कमेटी पर भी यही नियम लागू हुआ। ऐसा इसलिए था क्योंकि कांग्रेस ने 1920 की गर्मियों से खिलाफत की मांगों को पूरी तरह से स्वीकार कर लिया था। विशेष रूप से, पंजाब, सिंध, बॉम्बे, उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल और मद्रास में बड़ी बैठकें हुईं। आंदोलन गांवों तक भी फैल रहा था। इसमें न केवल मुस्लिम जनता, बल्कि मुस्लिम उदारवादियों ने भी भाग लिया। एक अपवाद के रूप में कुछ उदार मुस्लिमों ने, विशेष रूप से जिन्ना ने खिलाफत आंदोलन को ‘एक झूठा मजहबी उन्माद’ माना, जिसमें अंत में कुछ भी अच्छा नहीं होने वाला था, ना तो सामान्य रूप से भारत के लिए और ना ही  विशेष रूप से भारतीय मुस्लिमों के लिए। (नीमायर, उक्त, पृ. 86-90)

उल्लेखनीय है कि खिलाफत आंदोलन की इन शुरुआती अभिव्यक्तियों में, हिंदुओं या स्वराज के साथ सहयोग का कोई उल्लेख नहीं किया गया है। इसके विपरीत, सिंध में खिलाफत कांफ्रेंस के अध्यक्ष सेठ हाजी अब्दुल्ला हारुन, जो 1911-1913 के दौरान में सिंध रेड क्रीसेंट सोसाइटी के प्रमुख व्यक्ति थे, ने ‘चरमपंथियों’ और होम रूल आन्दोलनकारियों के एकजुट होने की कड़ी शिकायत की थी। (नीमायर, उक्त, पृ. 91)

हिंदू गलतफहमी
खिलाफत आंदोलन के समर्थकों को खिलाफत आंदोलन द्वारा प्रदान की गई तथाकथित हिंदू-मुस्लिम एकता पर संदेह था। 1913 में ही, मुहम्मद अली ने हिंदू और मुस्लिम नेताओं को ‘आवश्यक के लिए आकस्मिक गलती’ और ‘समस्याओं के शब्दों की बाढ़ में डूबने’ के खिलाफ एक समान चेतावनी दी थी।

गांधी जी के प्रयासों और उनके ऐसे दावों के बावजूद कि, इक्कीस करोड़ हिंदू, मुस्लिमों की उनकी इच्छित शर्तों को प्राप्त करने में मदद करने के लिए सरकार से भिड़ने को तैयार थे, खिलाफत दिवस (17 अक्तूबर, 1919) के कार्यक्रम में हिंदू-मुस्लिम एकता का ऐसा कोई उत्साह नहीं देखा गया। केवल ढाका, बॉम्बे, लखनऊ, हैदराबाद (सिंध), सुकुर और कुछ अन्य स्थानों पर हिंदू मुसलमानों के प्रदर्शन में शामिल हुए।

इस घटना के कई साल बाद, मुस्लिम लीग के नेता चौधरी खलीकुज्जमां ने अपने संस्मरण में मुसलमानों के ‘मूर्खतापूर्ण उत्साह’ का वर्णन किया, जो स्वामी श्रद्धानंद को दिल्ली में मस्जिद के अंदर ले गए थे। संभवत: इन घटनाओं के कुछ तीस साल बाद नेहरू ने बुद्धिमान बनते हुए ‘गांधी जी द्वारा विभिन्न असंतोषों के बीच कृत्रिम एकता’ की रचना की बात की। (नीमायर, उक्त, पृ.93) बहुसंख्यक हिंदुओं के लिए, खिलाफत आंदोलन के मजहबी और यहां तक कि, राजनीतिक पहलुओं में बहुत कम अपील थी। उनके नेताओं में, पंडित मदनमोहन मालवीय (1861-1946) शायद मुख्य संदेहवादी थे। दिसंबर, 1918 में कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने खिलाफत मुद्दे पर समर्थन देने के लिए चित्तरंजन दास (1870-1925) की याचिका को खारिज कर दिया था। शंकरन नायर (1857-1934, 1897 कांग्रेस अधिवेशन के अध्यक्ष) खिलाफतवादियों के उद्देश्यों के लिए खुले तौर पर आलोचनात्मक थे! लोकमान्य तिलक (1856-1920) इसी तरह के एक और संशयवादी थे। वल्लभभाई पटेल (1875-1950) और इंदुलाल के. याज्ञिक (1892-1972, 1918 में गांधी जी के खेड़ा सत्याग्रह में भाग लेने वाले) ने खिलाफत के ‘पाक मकसदों’ पर कई ‘पवित्र चुटकुलों और मजाक’ का आदान-प्रदान किया। बिपिन चंद्र्र पाल (1858-1932), जिन्होंने हमेशा अखिल-इस्लामवाद के वायरस के खौफ से आगाह किया, वह भी इसे अपना समर्थन देने से कतरा रहे थे। मोतीलाल नेहरू (1861-1931) ने माना कि खिलाफत के सवाल की तुलना में देश के अन्दर और हमारे आसपास ऐसी बहुत से मुद्दे हैं, जिन पर हमें ध्यान देना चाहिए। गोपालकृष्ण गोखले के अनुयायी वी.एस. श्रीनिवास शास्त्री (1869-1946), जिन्हें गांधी जी ‘बड़े भाई’ के रूप में संबोधित करते थे, ने भी गांधी जी को सलाह दी थी कि वे खिलाफत आंदोलन से दूर  रहें क्योंकि ‘उन्हें भारत सरकार को शर्मिंदा करने का कोई अधिकार नहीं था’। कुछ अन्य लोग भी थे जिन्होंने केवल मौखिक समर्थन दिया था और कुछ ऐसे थे जिन्होंने गोरक्षा से जुड़ी शर्त को मुस्लिमों के साथ सहयोग की एक पूर्व अनिवार्य शर्त माना। (कुरैशी, उक्त, पृ. 74-75) गांधी जी के प्रयासों और उनके ऐसे दावों के बावजूद कि, इक्कीस करोड़ हिंदू, मुस्लिमों की उनकी इच्छित शर्तों को प्राप्त करने में मदद करने के लिए सरकार से भिड़ने को तैयार थे, खिलाफत दिवस (17 अक्तूबर, 1919) के कार्यक्रम में हिंदू-मुस्लिम एकता का ऐसा कोई उत्साह नहीं देखा गया। केवल ढाका, बॉम्बे, लखनऊ, हैदराबाद (सिंध), सुकुर और कुछ अन्य स्थानों पर हिंदू मुसलमानों के प्रदर्शन में शामिल हुए और हड़तालों में सहभागिता की। (कुरैशी, उक्त, पृ. 76)

सामूहिक सदस्यता के स्तर पर, कांग्रेस और खिलाफत अनुयायियों के बीच उन वर्षों में कोई स्पष्ट अंतर नहीं किया जाता था। मुस्लिम लीग में समान लोगों के साथ कांग्रेस संगठन और कार्यालयों को जोड़ना भी असामान्य नहीं था।  कांग्रेस और खिलाफत कांफ्रेंस और सेंट्रल  खिलाफत कमेटी पर भी यही नियम लागू हुआ। ऐसा इसलिए था क्योंकि कांग्रेस ने 1920 की गर्मियों से खिलाफत की मांगों को पूरी तरह से स्वीकार कर लिया था।

1920 में सेंट्रल खिलाफत कमेटी की एक बैठक में, ‘‘चरमपंथी मुस्लिम नेताओं ने अफगान सेना में शामिल होने की वकालत की, जो भारत से अंग्रेजों को भगाने के लिए आक्रमण कर सके। हिंदू नेताओं ने इस पर स्पष्टीकरण की मांग की और यह स्पष्ट किया कि ऐसे किसी भी खतरे के संकेत पर हिंदू सहयोग करना बंद कर देंगे।’’ (नीमायर, उक्त, पृ.95)

अनुनय से जबरदस्ती तक
सभी प्रयासों के बावजूद, प्रधानमंत्री लॉयड जॉर्ज के भाषणों ने गंभीर संदेह पैदा किया कि तुर्की को वह समाधान मिलेगा जो खिलाफत आन्दोलनकारी उम्मीद कर रहे थे। ब्रिटिश सरकार ने युद्ध के अंत का जश्न मनाने के लिए दिसंबर, 1919 में भारत में शांति समारोह का आह्वान किया था। जब 23 नवंबर 1919 को आल इंडिया खिलाफत कांफ्रेंस का पहला सत्र दिल्ली में शुरू हुआ तो सर्वसम्मति से इस शांति समारोह का मजहबी कर्तव्य के रूप में बहिष्कार करने का निर्णय लिया गया। जिम्मेदार ब्रिटिश मंत्रियों के समक्ष अपनी मांग रखने के लिए ब्रिटेन में प्रतिनिधिमंडल भेजने का निर्णय लिया गया। यदि यह वांछित परिणाम लाने में विफल रहा, तो ब्रिटिश सामानों का बहिष्कार शुरू करने का निर्णय लिया गया, इसके पश्चात भी यदि आवश्यकता पड़ती तो सरकार के साथ सहयोग की क्रमिक समाप्ति की जानी थी। असहयोग के बारे में गांधी जी ने ब्रिटिश सामान के बहिष्कार और हिंसा पर मुस्लिम समुदाय के आग्रह को दरकिनार करने का सुझाव दिया था। खिलाफत आंदोलन के लिए महत्वपूर्ण हिंदू समर्थन पाने के लिए, अगले दिन (24 नवंबर, 1919) को हिंदू और मुस्लिम प्रतिनिधियों की एक विशेष संयुक्त बैठक हुई। गांधी जी को मनाने के लिए उन्हें अध्यक्ष बनाया गया और उनके ब्रिटिश सामानों के बहिष्कार के प्रस्ताव को वापस ले लिया गया। हिंदू अनुमोदन प्राप्त करने के लिए, फजलुल हक ने पंजाब के मुद्दे (जलियांवाला बाग हत्याकांड और मार्शल लॉ) को खिलाफत के मुद्दे से जोड़ने का प्रस्ताव दिया था। लेकिन यह प्रस्ताव इसलिए छोड़ दिया गया क्योंकि गांधी जी इसके विरोध में थे। वह चाहते थे कि खिलाफत का मुद्दा असहयोग का एकमात्र आधार हो। खिलाफतवादियों ने शांति समारोहों का सफलतापूर्वक बहिष्कार किया। 

सेन्ट्रल खिलाफत कमेटी में उदारवादी व्यापारी नेताओं को दरकिनार कर दिया गया और अली बंधु खिलाफत आंदोलन के नेता बन गए। अप्रैल और मई, 1920 में बॉम्बे में सेन्ट्रल खिलाफत कमेटी की बैठकों में असहयोग के सिद्धांत को स्वीकार किया गया था और इसके आरम्भ की योजना बनाने के लिए एक समिति नियुक्त की गई। जून, 1920 में इलाहाबाद में आल इंडिया खिलाफत कांफ्रेंस ने ‘बिना और देरी के’ असहयोग को बल देने का संकल्प लिया; यद्यपि वायसराय को ‘एक महीने की चेतावनी’ दी गई थी। जहां खिलाफतवादियों ने बिना खास विरोध किये असहयोग कार्यक्रम स्वीकार कर लिया वहीं कांग्रेस को ऐसा करने में अधिक समय लगा। प्रारंभ में खिलाफतवादी कांग्रेस से एक अच्छा सौदा करने के लिए तैयार थे। उनके कार्यक्रम में पुलिस और सेना से इस्तीफा देना और करों का भुगतान करने से इनकार करना शामिल था, जबकि कांग्रेस के कार्यक्रम में प्रारंभ में लोगों को सेना में भर्ती के लिए खुद को प्रस्तुत न करने की सलाह देने की परिकल्पना की गई थी। इन व्यापक रूप से भिन्न कार्यक्रमों ने कांग्रेस में हिंदू नेताओं के भीतर की लहर को प्रतिबिंबित किया। गांधी जी ने कांग्रेस के भीतर खिलाफत आंदोलन के विरोध को कैसे बेअसर किया और इसे खिलाफत के लिए आन्दोलन करने को कैसे मजबूर किया, यह एक अलग कहानी है। गांधी जी
जैसे सहयोगी के साथ अनुनय का समय समाप्त हो गया था;
अब खिलाफतवादियों के लिए जबरदस्ती और नरसंहार का

समय था! (क्रमश:)
(लेखक ने इस्लाम, ईसाइयत, समकालीन बौद्ध-मुस्लिम संबंध, शुद्धि आंदोलन और धार्मिक जनसांख्यिकी पर पुस्तकें लिखी हैं)