गेशे जम्पा -9

    दिनांक 17-सितंबर-2020
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नीरजा माधव
तिब्बती शरणार्थियों की एक बड़ी संख्या हमारे भारत देश में है। चीन की विस्तारवादी नीति के परिणामस्वरूप एक अहिंसक धार्मिक देश तिब्बत पराधीन हो गया। 1959 में इसका चरमोत्कर्ष देखने को मिला जब तिब्बत के राष्ट्राध्यक्ष परम पावन दलाई लामा को अपने लाखों अनुयायियों के साथ अपना देश छोड़ भारत में शरण लेनी पड़ी।  भारत में रह रहा तिब्बती समुदाय तिब्बत में रह रहे चीनी सत्ता से संघर्षरत तिब्बतियों की सबसे बड़ी ताकत बने रहे। 19वीं सदी के अन्त तक तिब्बत स्वतंत्र था। तिब्बत के राजनीतिक, सांस्कृतिक और मानवीय अधिकारों के प्रश्न पर छाई वैश्विक चुप्पी को तोड़ने और उन्हें स्वाधीनता दिलाने की जद्दोजहद करता है सुप्रसिद्ध लेखिका नीरजा माधव द्वारा लिखा भारत में हिन्दी साहित्य का पहला उपन्यास-गेशे जम्पा। प्रस्तुत है इस उपन्यास की नौवीं कड़ी
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देवयानी,  एक मिनट मेरी बात सुनोगी? उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा था। जी, कहिए। वह उनकी ओर देखने लगी थी, लेकिन अंतर में विचार उमड़-घुमड़ रहे थे।

साबरमती के संत को तो जानती हो न? वे हमारे आदर्श हैं। उन्होंने हिंसा से नहीं, बल्कि अहिंसात्मक तरीके से अंग्रेजों का सामना किया। परंतु गेला, क्षमा करिएगा, मैं सहमत नहीं हूं आपके कथन से। आपको क्या लगता है कि केवल उनकी अहिंसा के कारण ही हमें आजादी मिली?  चंद्रशेखर आजाद, भगतसिंह, लाला लाजपतराय या सुभाषचंद्र्र बोस जैसे अनेक क्रांतिकारियों का कोई योगदान नहीं था? सिर कटा लेने का जज्बा उस समय के लगभग हर युवा भारतीय खून में हिलोरें ले रहा था। नरम और गरम, दोनों धाराएं एक साथ प्रवाहमान थीं। चौतरफा दबाव पड़ा था अंग्रेजी हुकूमत पर, तब जाकर हम स्वतंत्र हो पाए थे। देवयानी उनकी अप्रसन्नता की परवाह किए बिना गर्व से बोलती जा रही थी। कुछ क्षण के लिए गेशे जम्पा निरुत्तर से हो उठे थे।

दरअसल, परम पावन जी किसी भी प्रकार की हिंसा का समर्थन नहीं कर सकते। उनका मानना है कि हिंसात्मक कार्य से सत्य की साधना नहीं की जा सकती। यदि साधन ही सही नहीं है तो उसका साध्य हितकर कैसे होगा? इसलिए हम तिब्बत की मुक्ति को विश्व-शांति और मानव-कल्याण की साधना के रूप में देखते हैं। ये बोलते हुए उनकी दृष्टि सामने दीवार पर थी। देवयानी उनके चेहरे को ध्यान से देख रही थी।  कक्ष में अन्य अध्यापक भी बैठे उनकी बातें सुन रहे थे।

तो क्या आपको लगता है कि दूर देश में बैठकर इन नीतियों के बल पर तिब्बत आजाद  हो जाएगा?

देवयानी का अगला प्रश्न उभरा था। बगल में बैठे बालेंदु थपलियाल द्वारा फुस-फुसाकर देवयानी को इस प्रकार के प्रश्न न करने की सलाह देने की आवाज भी उनके कानों में पड़ी थी।

नहीं, नहीं, थपलियाल! संकोच मत करो। इस बिंदु पर खुलकर चर्चा होनी चाहिए। छिपाने से तो छोटा-सा फोड़ा भी नासूर बन जाता है। भारतीयों के मन में अक्सर यह प्रश्न कौंधता है कि हम दूसरे देशों में बैठकर किस प्रकार आजादी की बात कर सकते हैं? इसके लिए तो हमें मैदान में उतरना ही होगा। इस दिशा में हम प्रयास कर भी रहे हैं कि अहिंसा में विश्वास रखने वाले लोगों को समूह में धीरे-धीरे वहां भेजें। अब दूसरे देश में रहकर अपनी मुक्ति-साधना को चलाना कठिन है। गेशे जम्पा की आवाज संयत थी। देवयानी एकाएक ग्लानि बोध से भर उठी। गेला, मुझे क्षमा करें। मेरा आशय कतई यह नहीं है कि हम आप सबको भार.. मेरा मतलब, भारत में आप लोगों का रहना हमें भारी लग रहा है।

तिब्बती लोग स्वभाव से ही धर्मगुरु और प्रकृति के पुजारी रहे हैं इसलिए उन लोगों ने कभी प्रकृति से छेड़छाड़ नहीं की। रत्नगर्भा पृथ्वी का दोहन कभी नहीं किया गया, जैसा कि विश्व के अधिकांश राष्ट्र करते हैं। इसीलिए वहां का पर्यावरणीय पक्ष बहुत समृद्ध था। पर आज चीन उसका दुरुपयोग कर रहा है।

तुम्हें दुखी होने की आवश्यकता नहीं देवयानी। हम तुम्हारी भावना समझते हैं। भारत भी यथासंभव हमारी मदद कर रहा है। चीन के साथ उसकी अपनी अलग नीतियां हैं। हम अपनी सीमा से परे जाकर कुछ अपेक्षा नहीं करते। हम भी चाहते हैं कि भारत-चीन संबंध अच्छे रहें। परंतु इसके लिए भी जरूरी है कि तिब्बत जैसा शांतिप्रिय देश ‘बफर स्टेट’ की भूूमिका निभाता रहे, अन्यथा समस्या हो सकती है दो महाशक्तियों के बीच।

देवयानी ने आगे कोई तर्क नहीं किया था। बस, कुछ देर यूं ही उनके चेहरे को एकटक देखती रही थी। बालेंदु थपलियाल आज्ञा लेकर अपनी कक्षा लेने चले गए थे। धीरे-धीरे उनका कक्ष खाली हो गया, परंतु देवयानी किसी ऊहापोह में बैठी रही थी। उन्होंने ही पूछा था-आज पीरियड नहीं है, देवयानी?

जी, है...कहीं आपने मेरी बातों को अन्यथा तो नहीं लिया सर? वह उलझन में थी।

वे मुस्कुरा उठे थे उसकी निश्छलता पर।

नहीं,  क्यों अन्यथा लूंगा? तुमने क्या अनुचित कहा?

दरअसल, मुझे महसूस हो रहा है कि यह सब नहीं कहना चाहिए था मुझे।

क्यों? क्या इसलिए कि मैं इस संस्थान का अध्यक्ष हूं? इसीलिए असत्य प्रिय बोलना चाहिए?  वे हंस पड़े थे।
परंतु कड़वा सत्य भी तो बोलने से मना किया गया है हमारे नीतिशास्त्रों में। मां ब्रूयात् सत्यमप्रियम्। वह भी धीरे-से हंस पड़ी। उसकी आंखों में जीवन डोल उठते देखा था उन्होंने। बैठो।  चाय पीकर जाना। उन्होंने कॉलबेल दबाई थी। वह कुछ असहज हो उठी। शायद पहला अवसर था जब वह उनके कक्ष में अकेली थी, अन्यथा अक्सर बैठक अथवा किसी विचार-विमर्श के दौरान अन्य कर्मचारियों के साथ ही वह उनके कक्ष में बैठती थी। देवयानी की असहजता का अनुमान उन्हें भी हो रहा था, परंतु स्वयं को तटस्थ रखने का प्रयास करते हुए अपनी मेज पर रखी पत्रिका उलटने-पलटने लगे थे वे।

देवयानी की आंखें भी कक्ष में चारों ओर भटक रही थीं। अक्सर ही दिखाई पड़ने वाली दीवारों पर टंगी पेंटिंग और तिब्बती हस्तशिल्प की कलात्मक अभिव्यक्तियों को ध्यान से देखते हुए उनके नए अर्थ तलाशने लगी थी देवयानी। सामने ही टंगे एक चित्र पर उसकी दृष्टि ठहर गई थी। आयताकार झंडे के बीच में प्रकाश बिखेरता सूर्य, जिससे छह लाल और छह नीली किरणें निकलती हुई दिखाई पड़ रही थीं। वातावरण की बोझिलता को दूर करने का एक सूत्र मिला था उसे।

सर, इस झंडे में जो सूर्य है उससे निकलती ये नीली और लाल किरणें किस बात की प्रतीक हैं? प्रश्न टेढ़ा है। वे हंसे थे। पत्रिका बंद करते हुए आगे कहा-ये तिब्बत की जातियों का एक प्रतीक है। झंडे में जो ये तीन तरफ पीले रंग का बार्डर है, वह बौद्ध धर्म का प्रतीक है। इसका तात्पर्य है कि बौद्ध धर्म ही तिब्बत का राष्टÑीय धर्म है? देवयानी को बातों का सिसिला जारी रखने का अवसर मिला।

बहुत स्पष्ट है। जैसे इस्लामिक देश होते हैं, हिन्दू राष्ट्र हैं वैसे ही तिब्बत का भी अपना एक धर्म रहा है। चूंकि इस धर्म की जन्मस्थली भारत है, इसीलिए  हम इसे अपना गुरु देश मानते हैं। इस तरह आप भी हमारी गुरू हैं। वे खिलखिलाकर हंस पड़े थे। शांत गंभीर चेहरा बच्चों की-सी निर्मलता से दिपदिपा उठा।

अरे गेला, बस, आप भी...देवयानी झेंप उठी। उसे कोई जवाब नहीं सूझा तो उसने पुन: अपनी बात झंडे पर ही केन्द्र्रित कर दी।

अच्छा, यह झंडे में जो सफेद त्रिभुुज है और इसमें दो शेरों के बीच में रत्न की चमकती मशाल है वह भी नि:संदेह कोई प्रतीक ही होगा!

हां, सफेद त्रिभुुज बर्फीले पर्वत का प्रतीक है, क्योंकि तिब्बत को बर्फभूूमि माना जाता है। बीच में रत्न की चमकती मशाल को अब मैं अपने ढंग से परिभाषित करता हूं। चूंकि तिब्बती लोग स्वभाव से ही धर्मगुरु और प्रकृति के पुजारी रहे हैं इसलिए उन लोगों ने कभी प्रकृति से छेड़छाड़ नहीं की। रत्नगर्भा पृथ्वी का दोहन कभी नहीं किया गया, जैसा कि विश्व के अधिकांश राष्टÑ करते हैं। इसीलिए वहां का पर्यावरणीय पक्ष बहुत समृद्ध था। पर आज चीन उसका दुरुपयोग कर रहा है। तिब्बत की भूमि पर परमाणु बम बनाना, उसका परीक्षण करना...और फिर उच्छिष्ट को नदियों में बहाने का काम कर रहा है वह। तिब्बत के अदो-जोड़, छुसुमजोड़ में सोना, चांदी, क्रोम, अखेस्टोम आदि बहुत मिलते हैं। उनका चेहरा अपने देश की दुर्दशा याद कर पुन: गंभीर हो उठा।

यह झंडा तो आपकी निर्वासित सरकार का है न गेला? देवयानी का स्वर कोमल था। हूं....अपनी दोनों हथेलियों के बीच अपने चेहरे को थाम, मेज पर दोनों कुहनियों को टिकाकर वे शांत बैठ गए थे। चाय पीकर आज्ञा मांग देवयानी चली थी, पर उनका शांत चित्त अस्थिर कर गई थी। उनका मन उस दिन के हरे-भरे परंतु उदास जोत की चढ़ाई-उतराई में पुन: भटकने लगा।

खारु-ला पार होने के बाद ग्यांची से कुछ दूर छू-शोर-ग्य-पोन् और ल्ह-दाड् गांव था। जम्पा पिताजी के साथ उंगली पकड़े खारु-ला की चढ़ाई चढ़ रहे थे।

आगे-आगे सामान लादे खच्चर को पिताजी हांकते चल रहे थे। बहुत थक जाने पर सामान के गट्ठरों पर उन्हें भी बैठा देते। स्वयं पीछे-पीछे  पैदल चलते। खारु-ला से पहले मिट्टी काली थी इसलिए नदी का पानी भी काला दिखाई देता था। पहाड़ी चोटियों पर यत्र-तत्र बर्फ दिखाई पड़ रही थी। रास्ते में छोटी-छोटी चट्टानें पड़ी थीं। दूर तक फैले मैदान में हरी घास उगी थी जिसमें चमरियां और भेड़ें चर रही थीं। चरवाहों के चेहरे भय और उत्सुकता से भरे हुए दिखाई देते थे। पास के पहाड़ की तलहटी में धूप के छोटे-छोटे पौधों की पंक्तियां दिखाई दे रही थीं। इसे सुखाकर और इसमें कुछ सुगंध मिलाकर यहां लोग धूपबत्ती बनाते हैं। यह भी उनका मुख्य व्यवसाय है। पिताजी जम्पा को बातों में उलझाए हुए थे। बीच-बीच में वे सशंकित दृष्टि से इधर-उधर देख भी लेते थे। क्या उनके घर के बच्चे भी चले जाएंगे?
  जम्पा का प्रश्न शायद पिताजी को बेध गया था। (जारी...)