पाकिस्तान: 'इंसानियत' की बात करने वाले मुसलमान अपनी ही कौम के दुश्मन बन बैठे हैं

    दिनांक 17-सितंबर-2020   
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इंसानियत की बात करने वाले मुसलमान अपनी ही कौम के खून के प्यासे हुए पड़े हैं। मौजूदा समय में पाकिस्तान में शिया और अहमदिया समुदाय की स्थिति किसी से छिपी नहीं रह गयी है। उन्हें मारा जा रहा है, प्रताड़ित किया जा रहा, युवकों की हत्याएं की जा रही हैं। हालत यह कि शिया समुदाय ख़ौफ़ में जीने को मजबूर है और उनके खिलाफ खुली जंग का एलान कर दिया गया है


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इमरान खान का ‘नया पाकिस्तान’ ‘जिहाद’ की नई राह पर चल पड़ा है। अभी तक पाकिस्तान पोषित जिहादी भारत, अफग़ानिस्तान, ईरान सहित अन्य पड़ोसी देशों के विरुद्ध हथियार उठाते रहे। अब उन्होंने अपने ही देश के उन तमाम कौमों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है, जिन्होंने पाकिस्तान की तरक्की में साथ दिया।


गौरतलब है कि कट्टरपंथी ज्यादातर हिंदुओं, ईसाइयों एवं सिखों को प्रताड़ित करते रहे। उनकी बहू—बेटियों का अपहरण किया, कन्वर्जन कराया, उनके साथ हिंसात्मक ढंग से पेश आते रहे। अब उन्होंने देश के शिया एवं अहमदिया समुदाय के विरुद्ध खुली जंग का एलान कर दिया। भारत तोड़क और पाकिस्तान को बनाने वाले मोहम्मद अली जिन्ना शिया थे, जबकि पाकिस्तान का खाका तैयार करने वाले तथा भारत के बंटवारे से पहले हिंदुस्थान-पाकिस्तान की सीमा तय करने में अगुवा चौधरी मोहम्मद जफरूल्ला खान अहमदिया मुसलमान थे। मगर ‘नबूवत’ एवं ‘नमाज’ के तरीकों की आड़ में दोनों  कौमों के खिलाफ कट्टरपंथियों एवं जिहादियों ने संघर्ष शुरू कर दिया है।

पिछले शुक्रवार कराची के हाई वे ‘शहराह-ए-कैदन’ पर लाखों कट्टरपंथियों ने रैली कर इसके स्पष्ट संकेत दे दिए हैं। इस रैली के तुरंत बाद कोहत के बाजार में एक आतंकवादी ने शिया दुकानदार जमील अब्बास के बेटे कमर अब्बास के सीने में पिस्तौल से ताबड़-तोड़ छह गोलियां उतार बता दिया कि आगे क्या होने वाला है। ‘अहले सुन्ना वल जमात’ द्वारा आयोजित रैली में शिया एवं अहमदियों को निशाना बनाने वाले आतंकवादी संगठन ‘सिपह-ए-सहाबा’ के लोग हथियार के साथ शरीक हुए। इसमें दूसरे इस्लामी संगठनों एवं राजनीतिक दलों के नेताओं ने भी शिरकत की। रैली में नारा लगाया गया ‘शिया काफिर है, गद्दार है।’
 
रैली में कट्टरपंथियों के आक्रमक रवैय से पाकिस्तान सहित विश्व भर के शिया एवं अहमदिया समुदाय के लोग सशंकित हैं। उन्हें लगता है कि पाकिस्तान में बसे लोगों की अब खुलेआम ‘नस्ल-कुशी’ यानी नस्ल बर्बादी का खेल शुरू हो जाएगा। पहले यह ढके-छुपे ढंग से हो रहा था। ऐसी आशंका को देखते हुए आल इंडिया शिया हुसैनी फंड ने संयुक्त राष्ट्र को पत्र लिखकर हस्तक्षेप की मांग की है। फंड के महासचिव सैयद हसन मेंहदी द्वारा संयुक्त राष्ट्र संघ को लिखे पत्र में कहा गया कि पाकिस्तान का शिया समुदाय भयभीत है। पिछले तीन दशक में उनकी कौम के 30 हजार लोगों की कट्टरपंथी हत्या कर चुके हैं। प्रत्येक वर्ष मुहर्रम पर शियाओं को निशान बनाया जाता है। उन्हें पैगंबर के नवासों के सम्मान में ‘मर्सिया’ पढ़ने की इजाज़त नहीं। ऐसा ही पत्र विश्व के अलग-अलग हिस्से में बसे अहमदियाओं की ओर से भी संयुक्त राष्ट्र को लिखा गया है। 

शिया-अहमदिया को बता रहे गद्दार, जनसंहार का खड़यंत्र
एक षड़यंत्र के तहत पाकिस्तान में शिया एवं अहमदिया समुदाय को देश विरोधी होने का प्रचार किया जा रहा है। ताकि उनके खिलाफ आम जनता भड़ जाए। नए दौर के जिहादी उन्हें देश का दुश्मन बता रहे हैं। इसे साबित करने को झूठी कहानियां गढ़ी जा रही हैं। माहौल बनाया जा रहा कि देश का बहुसंख्यक आम सुन्नी समुदाय भड़क जाए। इस साजिश के तहत शियाओं के बारे में कहा जा रहा कि सीरिया के लड़ाकों को मात देने के लिए जिस गुप्त सेना ‘जैनबियून ब्रिगेड’ का गठन किया गया, उसे खड़ा करने में पाकिस्तान के शियाओं ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है।

देश के हजार से अधिक शिया संगठन इसे खड़ा करने में आगे-आगे रहें। ऐसे भ्रामक प्रचार से पाकिस्तान में शियाओं के प्रति माहौल खराब हुआ है। मुहर्रम के दौरान उन्हें जगह-जगह निशाना बनाया गया। एक दुष्प्रचार यह भी है कि पिछले महीने मुहर्रम के आशूरा जुसलू में शियाओं ने इस्लाम विरोधी टिप्पणियां कीं। ‘मर्सिया’ पढ़ते समय कुछ ऐसी बातें कही गईं जो ईशनिंदा की श्रेणी में आती हैं। पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों को प्रताड़ित करने के लिए ‘ईशनिंदा’ कानून विरोधी हथियार के तौर पर इस्तेमाल करते हैं। ऐसे दुष्प्रचार के कारण मुहर्रम के स्मरणोत्सव में शियाओं पर हथगोले फेंके गए। शासन-प्रशासन भी शिया एवं अहमदिया के विरुद्ध मोर्चा खोलने वाले कट्टरपंथियों के साथ खड़ा नजर आ रहा है। इसका प्रमाण है पत्रकार बेलाल फारूकी की गिरफ्तारी। उन्होंने जब कट्टरपंथियों की कराची रैली और मुहर्रम के मौके पर शियाओं के खिलाफ कट्टरपंथियों की करतूतों का अपने अखबार में खुलसा किया तो उन्हें देश विरोधी बताकर गिरफ्तार कर लिया गया।


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पाकिस्तान में  शियाओं की आबादी ठीक ठाक है। बावजूद इसके उनकी मजहबी मान्यताओं के कारण उन्हें अहमित नहीं दी जाती। नौकरियों या कोई और क्षेत्र, हर जगह हाशिए पर रखा जाता है। साथ ही उन्हें पाकिस्तान छोड़ने को मजबूर किया जा रहा। बलूचियों एवं सिंधियों की तरह शिया एवं अहमदियों के बच्चे भी रहस्यमय तरीके से गायब किए जा रहे। 16 नवंबर 2016 को सेना के लोग आधी रात को नईम हैदर को उठा ले गए थे, जिसका आज तक पता नहीं चला। खबरों की

मानें तो  सिकंदर किरमानी की रिपोर्ट के अनुसार, केवल 2016-18 में शिया समुदाय के 140 लोग रहस्यमय तरीके से गायब हो गए। जबकि 2018 में गायब हुए 1500 शियाओं का मामला अब तक अनसुलझा है। समीर अब्बास को विभिन्न आरोपों में एक साल तक हिरासत में रखा गया। अभी तक ऐसी कार्रवाईयां सरकारी स्तर पर हो रही थी। आतंकवादियों ने अब उनके विरुद्ध खुला जिहाद छेड़ दिया है। पिछले शुक्रवार कराची के अलावा देश के अन्य हिस्सों में शिया-अहमदिया के विरुद्ध प्रदर्शन हुए, जिसमें आतंकवादी संगठन ‘सिपह-ए-सहाबा’ के  जिहादी गाड़ियों पर संगीन हथियार लेकर घूमते दिखे ताकि दहशत फैलाई जा सके। शिया समुदाय के मेहंगदी रिजवी ने ट्वीट कर इसे ‘काला शुक्रवार’ बताया, जबकि अमेरिकी अखबार ‘फ्रीस प्रेस जर्नल’ की रिपोर्ट में आशंका जताई गई कि-‘‘रैली से अल्पसंख्यकों में भय पैदा होगा। पाकिस्तान में हिंसा के एक नए दौरान की शुरुआत हो चुकी है।’’ आल इंडिया शिया हुसैनी फंड के महासचिव सैयद हसन मेंहदी ने ऐसी आशंकाओं को भांप कर ही संयुक्त राष्ट्र को पत्र लिखकर तत्काल हस्ताक्षेप की मांग की है।

अल्पसंख्यकों में अहमदिया गए गुज़रे
अहमदियाओं का मामला शिया समुदाय से थोड़ा भिन्न है। उन्हें मुसलमान माना ही नहीं जाता। इस्लामिक नज़रिए से हजरत मोहम्मद आख़िरी पैगंबर हैं। अहमदिया इस पंथ के जनक मिर्जा गुलाम अहमद को अपना पैगंबर मानते हैं। शियाओं की तरह अहमदिया के नमाज पढ़ने का तरीका भी सुन्नियों से भिन्न है। इस बिना पर अहमदियों को इस्लाम से खारिज कर दिया गया। भारत सहित विश्व के अन्य देशों में इस बिना पर उनके साथ भेद-भाव का सलूक नहीं किया जाता। सुन्नी उनके मामलों में हस्तक्षेप नहीं करते, पर पाकिस्तान में ऐसा नहीं है। वहां 1974 में कानून में संशोधन कर उनसे न केवल मुसलमान होने का अधिकार छीन लिया गया, उन्हें हिंदू, सिख, ईसाई की तरह अल्पसंख्यकों की श्रेणी में डाल दिया गया। पाकिस्तान में आज स्थिति  है कि कोई अहमदिया किसी को ‘अस्सलाम ओ अलैकुम’ नहीं कह सकता।

इमरान खान की तहरीक इंसाफ सरकार में उनके प्रति अत्याचार बढ़े हैं। उनकी सरकार ने अहमदिया सलाहकार को हटा दिया। इस वर्ष मजहबी नज़रिए से राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग गठित किया गया, अहमदिया उससे भी बाहर रखे गए। पाकिस्तान में अहमदियों की आबादी करीब 25 लाख है। अधिकतर यह पंजाब के रबवा जिले में रहते हैं।  बड़ी संख्या में अहमदिया भारत के पंजाब, राजस्थान एवं मुंबई में भी हैं। पुरुष एवं महिलाएं खास तरह की टोपी एवं बुर्के पहनने के कारण दूर से पहचाने जा सकते हैं। 1974 में कानून में संशोधन कर अहमदियों को इस्लाम से खारिज करने के बाद से उनका पाकिस्तान से पलायन जारी है। उनका मजहबी स्थल ‘कादियां’ भी पंजाब से इंग्लैंड स्थानांतरित कर दिया गया। वैज्ञानिक परवेज हुदभाय कहते हैं, उसी दौरान 1980 में ‘इलेक्ट्रोवीक यूनिफिकेशन’ के लिए  भौतिकी का नॉबेल सम्मान जीतने वाले इकलौते पाकिस्तानी वैज्ञानिक अब्दुल सलाम देश छोड़कर विदेश जा बसे। 2016 में इस्लामाबाद के कायदे-आजम यूनिवर्सिटी ने उन्हें सम्मानित करने के लिए कार्यक्रम किया गया था, पर जमात-ए-इस्लामी’ के छात्र संगठन के विरोध के कारण वह इसमें शामिल नहीं हो सके।

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हालांकि बाद में वह न केवल नवाज शरीफ सरकार में वैज्ञानिक सलाहकार बनें बल्कि भौतिकी से विदेश में पीएचडी करने वाले पांच छात्रों को उनके नाम पर स्कॉलरशिप देने का ऐलान भी किया गया। अब्दुल सलाम को पाकिस्तान का अंतरिक्ष एवं परमाणु कार्यक्रम का जनक माना जाता है। अहमदिया पंथ के अब्दुल सलाम अपवाद हैं। पाकिस्तान का आम अहमदिया बहुत ज्यादा त्रस्त है। यह कौम व्यापार-कारोबार  के लिए पहचानी जाती है। कट्टरपंथियों ने उनसे कारोबारी रिश्ता नहीं रखने का एलान किया है। भारत के पंजाब के ‘कादियां’ के 121 वें जलसे में भाग लेने पाकिस्तान से आए रसूर अहमद व अशफाक अहमद बताते हैं कि एक बार उनके समुदाय ने झांग जिले में  मजहबी गीत का कार्यक्रम आयोजित किया था, जिसमें उनके समुुुदाय की एक छात्रा को पांचवां स्थान  मिला। उसके बाद कट्टरपंथी उनके पीछे पड़ गए। प्रतियोगिता में पांचवें नंबर पर आने वाली  छात्रा को जान से मारने की धमकी दी गई। पाकिस्तान में ईशनिंदा के आरोप में तीन अहमदिए फांसी के फंदे से झूल चुके हैं। हाल के दिनों में उनकी मस्जिदों में नमाज व अजान की  अदायगी पर भी रोक लगा दी गई। पुलिस ने कुछ दिनों पहले चार युवाओं को ईशनिंदा में गिरफ्तार किया था। उनमें से तीन को जमानत पर छोड़ दिया गया पर चौथे की पुलिस कस्टडी में गोली मार कर हत्या कर दी गई। पत्रकार महबूब की रिपोर्ट कहती है कि एक बार एक ही झटके में 13 अहमदियों को मौत के घाट उतार दिया गया ।

फैसलाबाद में अहमदिया की एक मस्जिद जला दी गई। हाल के दिनों में 260 अहमदियों को मौत के घाट उतारा गया है। पाकिस्तान के स्वतंत्र लेखक मिर्जा उस्मान अहमद कहते हैं, "अहमदियों को लेकर भ्रम फैलाया जा रहा कि यह यहूदी समर्थक एवं ‘इस्लाम के दुश्मन’ हैं। इस वर्ष 8 मई को न्यूज चैनल ‘अलजीरा’ ने पाकिस्तान के अहमदियों के साथ भेद-भाव पर एक विस्तृत रिपोर्ट प्रसारित की थी। वेबसाइट ‘पुलिट्जर सेंटर’ में प्रकाशित अयीहाल चौधरी की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि पाकिस्तान के सशस्त्र बलों में एक दशक तक सेवाएं देने वाले 38 वर्षीय एयरोनॉटिक इंजीनियर अली अख्तर को पहले पदावनत एवं बाद में बर्खास्त इसलिए कर दिया गया कि सुन्नी से अहमदिया पंथ  में शामिल हो गए थे। अहमदिया समुदाय के निदेशक कमर सुलेमान ऐसी घटनाओं पर चिंता जताते हुए कहते हैं, ‘‘संविधान के अनुसार अहमदिया मुसलमान नहीं, जब कि वे कुरान-हदीस सभी मानते हैं। सिर्फ मिर्जा गुलाम अहमद को पैगंबर मानने की उन्हें सजा मिल रही है। देश में दुश्मन बताकर उनके बच्चे गायब किए जा रहे हैंं।’’ 42 वर्षीय शाजिया शमून के तीन बेटे एवं भतीजे कुछ दिनों पहले ऐसे गायब किए गए जिनका आज तक पता नहीं चल पाया है। अहमदिया समुदाय के प्रति बढ़ते अत्याचार से संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार विशेषज्ञ भी चिंतित हैं। ऐसी घटनाआंें पर रोक लगाने के लिए पाकिस्तान सरकार से ठोस कदम उठाने की सिफारिश भी कर चुके हैं। ह्यूमन राइट वॉच ग्रुप के एशिया निदेशक ब्रैड एडम्स ने हिंदू, ईसाइयों एवं सिंखों से भी अधिक पीड़ित अहमदियों को बताया है।