कश्मीरी हिन्दुओं को पलायन के लिए मजबूर करने वालों के विरुद्ध अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत कार्रवाई को ब्रिटेन संसद में प्रस्ताव पेश, कहा-इस्लामी जिहाद का शिकार हुए

    दिनांक 19-सितंबर-2020   
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जम्मू-कश्मीर से 30 वर्ष पहले पलायन करने वाले कश्मीरी हिन्दुओं को सुकून देने वाली एक खबर ब्रिटेन से आई है। इस खबर के पीछे हैं, कश्मीरी हिन्दुओं के हक-हुकूक के लिए पिछले तीस वर्षों से संघर्षरत एक ब्रितानी राजनेता। उनके प्रयासों से ब्रिटेन की संसद में न केवल कश्मीरी हिन्दुओं पर एक प्रस्ताव पेश किया गया, उन्हें पलायन के लिए मजबूर करने वालों को ‘नरसंहार’ को लेकर बने अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत सजा देने की भी मांग की गई।





जम्मू-कश्मीर से 30 वर्ष पहले पलायन करने वाले कश्मीरी हिन्दुओं को सुकून देने वाली एक खबर ब्रिटेन से आई है। इस खबर के पीछे हैं, कश्मीरी हिन्दुओं के हक-हुकूक के लिए पिछले तीस वर्षों से संघर्षरत एक ब्रितानी राजनेता। उनके प्रयासों से ब्रिटेन की संसद में न केवल कश्मीरी हिन्दुओं पर एक प्रस्ताव पेश किया गया, उन्हें पलायन के लिए मजबूर करने वालों को ‘नरसंहार’ को लेकर बने अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत सजा देने की भी मांग की गई।

संसद में प्रस्ताव रखते हुए कहा गया कि कश्मीरी हिन्दू जिहादी आंदोलन के शिकार हुए हैं। संसद में यह प्रस्ताव ब्रिटेन की सत्तारूढ़ पार्टी के सांसद बॉब ब्लैकमैन ने पेश किया। इसे डेमोक्रेटिक यूनियनिस्ट पार्टी के सांसद जिम शैनॉन एवं लेबर पार्टी के सांसद वीरेंद्र शर्मा का भी समर्थन प्राप्त था। इस दौरान सदन में इस्लामिक जिहाद के शिकार कश्मीरी हिन्दुओं के परिवारों के प्रति सहानुभूति जताई गई।

अर्ली डे मोशन यानी ईडीएम ब्रिटिश सांसद अपनी राय को आधिकारिक तौर पर रखने या किसी अहम मुद्दे पर सदन के ध्यानाकार्षण के लिए लाए जाते हैं। किसी प्रस्ताव को ज्यादा सांसदों का समर्थन मिलता है तो उस पर संसद में बहस कराई जाती है। हालांकि, ऐसे ईडीएम काफी कम ही होते हैं, जिन पर सदन में बहस होती है।



ब्रिटेन के सदन में कश्मीरी पंडितों पर यह प्रस्ताव गत दिनों आया। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, प्रस्ताव में कश्मीरी पंडितों के सामूहिक पलायन को ‘नरसंहार’ की श्रेणी में रखने की मांग की गई। इस दौरान भारत सरकार से अपील की गई कि संयुक्त राष्ट्र में नरसंहार के अपराध रोकने के लिए हुए समझौते पर हस्ताक्षर करने केे नाते अपना अंतरराष्ट्रीय दायित्व का निर्वाह करे। इंटरनेशनल लेवल पर नरसंहार के लिए पृथक कानून है।

ब्रिटिश सांसद बॉब ब्लैकमैन कहते हैं, कि 30 साल पहले अपना घर छोड़ने को मजबूर कश्मीरी हिन्दू परिवार आज न्याय के इंतजार में हैं। कश्मीरी हिंदुओं के अत्याचार के खिलाफ वह करीब तीन दशकों से आवाज उठा रहे हैं। उनके अधिकारों के लिए अभियान का हिस्सा भी रहे। भारत में नरसंहार अपराध से जुड़ा कानून नहीं, इसलिए न्याय में देरी हुई। दोषियों को आज तक सजा नहीं मिली है। ब्रिटेन में नरसंहार जैसे अपराध की सजा तय करने के लिए अलग से कानून है। उसने अंतरराष्ट्रीय समझौते पर हस्ताक्षर किए है। उन्होंने उम्मीद जताते हुए कहा कि भारत सरकार अपने नागरिकों के प्रति अपनी प्रतिबद्धताओं को पूरा करेगी एवं अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत नरसंहार से जुड़े अपराधों को रोकने एवं दोषियों को सजा दिलाने के मामले में निराश नहीं करेगी। जेनोसाइड कन्वेंशन, 1948 के तहत युद्ध के दौरान भी ऐसे अपराध दंडनीय हैं। चाहे उन्हें कोई शीर्ष अधिकारी ही क्यों ना अंजाम दे। 1959 में भारत ने इस कन्वेंशन पर हस्ताक्षर किए थे लेकिन इसे लेकर अलग से कानून नहीं बनाया। कुछ लोगों का कहना है कि नरसंहार को लेकर अलग से कानून की जरूरत नहीं, क्योंकि भारत में ऐसे अपराधों से निपटने के लिए पहले से कानून मौजूद है।

बॉब ब्लैकमैन ने भारत सरकार से नरसंहार कानून को लेकर अपना रुख बदलने की अपील की। ब्लैकमैन ने कहा कि ब्रिटेन में मौजूद भारतीय समुदाय को भी अपने स्थानीय सांसदों के जरिए कश्मीरी हिन्दुओं के न्याय के लिए आवाज उठानी चाहिए। इससे कश्मीरी पंडितों के लिए लाए गए प्रस्ताव को और समर्थन मिलेगा। अर्ली डे मोशन यानी ईडीएम ब्रिटिश सांसद अपनी राय को आधिकारिक तौर पर रखने या किसी अहम मुद्दे पर सदन के ध्यानाकार्षण के लिए लाए जाते हैं। किसी प्रस्ताव को ज्यादा सांसदों का समर्थन मिलता है तो उस पर संसद में बहस कराई जाती है। हालांकि, ऐसे ईडीएम काफी कम ही होते हैं, जिन पर सदन में बहस होती है।

उल्लेखनीय है कि ब्रिटिश सांसद बॉब ब्लैकमैन कश्मीर मुद्दे पर काफी मुखर रहे हैं। जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने पर बॉब ब्लैकमैन ने भारत का समर्थन किया था। कहा था, पूरा जम्मू-कश्मीर संप्रभु भारत का हिस्सा है।