उपन्यास-गेशे जम्पा। सातवीं कड़ी

    दिनांक 02-सितंबर-2020
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नीरजा माधव
तिब्बती शरणार्थियों की एक बड़ी संख्या हमारे भारत देश में है। चीन की विस्तारवादी नीति के परिणामस्वरूप एक अहिंसक धार्मिक देश तिब्बत पराधीन हो गया। 1959 में इसका चरमोत्कर्ष देखने को मिला जब तिब्बत के राष्ट्राध्यक्ष परम पावन दलाई लामा को अपने लाखों अनुयायियों के साथ अपना देश छोड़ भारत में शरण लेनी पड़ी।  भारत में रह रहा तिब्बती समुदाय तिब्बत में रह रहे चीनी सत्ता से संघर्षरत तिब्बतियों की सबसे बड़ी ताकत बने रहे। 19वीं सदी के अन्त तक तिब्बत स्वतंत्र था। तिब्बत के राजनीतिक, सांस्कृतिक और मानवीय अधिकारों के प्रश्न पर छाई वैश्विक चुप्पी को तोड़ने और उन्हें स्वाधीनता दिलाने की जद्दोजहद करता है सुप्रसिद्ध लेखिका नीरजा माधव द्वारा लिखा भारत में हिन्दी साहित्य का पहला उपन्यास-गेशे जम्पा। प्रस्तुत है इस उपन्यास की सातवीं कड़ी

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हे भगवान, पिनये सो गई। मेरी गोद सूनी हो गई थी। अब कोन् चोग् भी...। मां बिलख पड़ी थी। सहमे से जम्पा जाकर मां की गोद में बैठ गए। मां, कोन् चोग् भैया को क्या हुआ?...बोलो मां। जम्पा अपनी हथेलियों से मां की आंखों से आंसू पोंछते हुए बोल पड़े। चुप रहो जम्पा की मां। यह समय रोने का नहीं है। बाहर कभी भी गश्ती पुलिस आ सकती है। पिताजी ने मां को समझाया था।

जम्पा ने भी इधर 10-15 दिनों में नंग् गर चे के आसपास सैनिक वेश में कई घुड़सवारों को घूमते देखा था। उस दिन भी युम्-डोग्-छो के हरे-भरे मैदान में भेड़ों को चराते हुए जम्पा अपने दोस्त के साथ एक ऊंची-सी चट्टान पर बैठे खेल रहे थे। वहां से दूर तक युम्-डोग्-छो का घेरा दिखाई पड़ रहा था। ‘मैं राजा हूं। तुम मेरे लिए जल ले आओ।’ जम्पा ने ऊंची चट्टान पर बैठ अपने दोस्त को आदेश दिया। राजा और मंत्री का खेल चल रहा था। भेड़ें सरोवर के मैदानी भाग में इत्मीनान से चर रही थीं। ‘जी, अच्छा महाराज’ कहते हुए दोस्त जैसे ही पीछे मुड़ा, जम्पा ने फुसफसाकर कहा था-अरे, वो देखो। घोड़े पर सिपाही। छिप जाओ। और वे दोनों चट्टान के पीछे छिप गए थे। पहाड़ी की ओर से चार घुड़सवार सैनिक निकले थे। वे तिब्बती थे या चीनी, इसका भेद जम्पा न कर सके थे। बस घर के आसपास उड़ती भयानक खबरों को सुन-सुनकर उनके मन में भी अनजाना-सा भय था सैनिकों के नाम पर। घोड़ों की टापों की आवाज दूर चली गई तो धीरे-से उन्होंने चट्टान के पीछे से झांका था। वे सभी पहाड़ों के पीछे ओझल हो चुके थे। राजा-मंत्री का खेल भूल गया था उन्हें। जल्दी-जल्दी भेड़ों को हांककर घर आए थे। मां को बताया तो उसने उन्हें सीने से चिपका लिया। बोली कुछ नहीं थी। कोन्-चोग् भैया और मग्-पा घर लौटे थे तो जम्पा ने सिपाहियों के बारे में बताया-कोन्-चोग् भैया, चारों सिपाहियों ने भूरे रंग का कोट पहन रखा था और सिर पर रोएं वाली टोपी थी। खींचकर पत्थर क्यों नहीं मारा? कोन्-चोग् भैया के स्वर में गहरी घृणा थी।
क्यों रे कोन्-चोग्, क्या सिखा रहा है जम्पा को? क्या यही है हमारा धर्म? मां उखड़ पड़ी थी भैया के ऊपर। तुम नहीं समझतीं मां! धीरे-धीरे इनकी संख्या बढ़ती ही जा रही है हमारे नगर में। अब तो गांवों तक में भी फैल रहे हैं। विकास के नाम पर सड़कें बना रहे हैं, बिना उचित मूल्य के भूमि अधिगृहित कर रहे हैं। निरीह किसानों की उपजाऊ जमीनें हड़प रहे हैं। उन्हीं से श्रम करवा रहे हैं और मजदूरी के नाम पर शोषण कर रहे हैं। उस पर से कहते हैं कि ‘हमें गर्व है कि तिब्बत अपनी मातृभूमि में वापस आ रहा है’। आप जानती हैं सासू-मां कि हमारे यहां एकाएक इतनी महंगाई क्यों बढ़ गई है? अनाज का दाम दस गुना और मक्खन नौ गुना क्यों हो गया है? मग्-पा ने बताया तो मां का कौतूहल जाग पड़ा था। क्यों मग्-पा? मां ने पूछा। अभी दो हजार टन जो हमारे देश से उन लोगों ने अपने हजारों सैनिकों के खाने के लिए लिया है। बहुत बड़ा क्षेत्र अपने खेमे के लिए हथिया लिया है उन लोगों ने। इसीलिए जहां भी ये सैनिक जाते हैं, लोग बच्चों द्वारा उन पर कंकड़-पत्थर फिंकवाते हैं। नारेबाजी होती है विरोध में।
मग्-पा की उस दिन की चिंता किस तरह शनै: शनै: साक्षात स्वरूप ग्रहण करने लगी थी, इसका जीता-जागता प्रमाण जम्पा थे। हमारी सरकार का भी तो दोष है इसमें। क्यों यह उन्हें यहां आने दे रही है? मां के तेवर कुछ उग्र थे।
धोखा किया गया सासू-मां! धोखे से करारनामे पर हस्ताक्षर करवाया गया कि चीन और तिब्बत में कुछ साम्राज्यवादी आक्रामक शक्तियां घुस आई थीं, जिन्हें खदेड़ने के लिए चीन ने जनता की मुक्तिसेना को तिब्बत में आने की आज्ञा दी और करार की एक धारा में कहा कि 'हमें विश्वास है कि तिब्बती जनता संगठित होकर इस साम्राज्यवादी शक्ति को तिब्बत से भगा देगी और अपनी मातृभूमि-बड़े परिवार चीन के साथ जुड़ जाएगी'। जबकि इतिहास बताता है कि 1912 के बाद से तिब्बत में कोई विदेशी शक्ति नहीं थी। मग्-पा मां को बता रहे थे।
उस करारनामे में कई धाराएं हैं जिसमें कई वायदे हैं, जैसे-कृषि का विकास, तिब्बती लोगों के धर्म, संस्कृति और विश्वास की रक्षा करते हुए जीवन-स्तर सुधारना, राजनीतिक प्रणाली को न बदलना, लोगों के ऊपर इन सुधारों को स्वीकार करने के लिए दबाव न डालना आदि कई लुभावने सपने हैं जिनको क्रियान्वित करने के बहाने वे हमारे यहां घुस आए हैं, पर सबसे खतरनाक धाराएं वे हैं जिनमें तिब्बती सेना का चीनी सेना में विलय और विदेशी नीति से संबंधित सभी अधिकारों से तिब्बत को वंचित करना है। यही हमारी अस्मिता के लिए खतरा है और उनकी खोटी नियति का संकेत। इसके लिए हम सबको विरोध करना है।
पर उनका सामना करना कोई आसान काम नहीं है मग्-पा। मां सशंकित थीं। हमें संगठित होना होगा मां। कुछ त्याग नहीं करेंगे तो हमारी आने वाली पीढ़ियां हमें क्षमा नहीं करेंगी। पर कैसे? मां अब भी चिन्तित थीं। मग्-पा ने जोश के साथ बताया-अपना गुरु देश है सासू-मां, भारत। कितने सौ वर्षों की अंग्रेजों की गुलामी को किस तरह यहां के लोगों ने संगठित होकर समाप्त कर दिया। हम क्यों नहीं कर सकते?
उनके साथ तो विश्व-जनमत भी था। कई देशों में जाकर उन लोगों ने अपनी बात उठाई थी। पर हम तो शुरू से ही एकाकी रहे हैं। संयुक्त राष्टÑ संघ में भी सम्मिलित नहीं हुए। दूसरे देशों से किसी प्रकार का राजनयिक संबंध नहीं रहा। इस हाल के लिए भी तो हम ही दोषी हैं मग्-पा। कोन्-चोग् भैया हताश थे। निराश होने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि जागने और जगाने की आवश्यकता है। हमारे जो लोग इन छलावों के कुचक्र में फंसकर अपना समर्थन उन्हें दे रहे हैं, उन्हें वापस लौटाने का प्रयास करना है।


घर के भीतर घुस आए चार-पांच सिपाहियों में से एक ने आदेश दिया तो दूसरे ने पिताजी के ऊपर अपनी राइफल तान ली। जम्पा चिल्लाकर एक सिपाही के पैर से लिपट गए थे-मत मारो मेरे पिताजी को...।
और उस दिन के बाद कोन्-चोग् भैया तथा मग्-पा बाहर गए तो फिर मग्-पा ही घायलावस्था में लौटे थे। कोन्-चोग् भैया के गुरिल्ला संगठन में चले जाने और नोर्बूलिड्खा की ताजा घटना के बारे में मग्-पा द्वारा जानकारी पाकर मां और पिताजी सहम उठे थे।
ठक्...ठक्! एक तेज दस्तक दरवाजे पर हुई तो मां की सिसकियां भी सहम गई थीं। वह जल्दी से मग्-पा को पीछे वाले दरवाजे से बाहर जाने का संकेत कर स्वयं कोठरी की छोटी-सी खिड़की के पास आई थीं-कौन है? उन्होंने आवाज को थोड़ा कड़क बनाया था। जम्पा ने देखा था, मग्-पा लंगड़ाते हुए तेजी से पिछले दरवाजे से बाहर निकल गए थे। पिताजी ने लपककर उस दरवाजे को बंद कर लिया था।
खोलो। हमें तलाशी लेनी है। बाहर से एक रौबीली आवाज आई थी। किसलिए? मां ने अपने स्वर में हैरत वाला भाव भर लिया था। खोलो तो बताता हूं। बूटों की ठोकर से दरवाजे के पल्ले भड़भड़ा उठे। मां ने डरी निगाहों से पिताजी की ओर देखा था।  पिताजी ने इशारे से उन्हें रुकने का संकेत किया और स्वयं बढ़कर किवाड़ की सिटकिनी खोल दी। लोहे की रॉड उतारकर एक किनारे कर ही रहे थे कि तब तक तेज धक्के के साथ खुलता हुआ दरवाजा उनके चेहरे से आ टकराया था। वे बौखलाकर एक तरफ लुढ़क पड़े थे।
अरे, क्या हुआ, जम्पा के पिताजी? मां ने उन्हें अपने अंक में संभाल लिया था। मारो बदतमीज को। घर के भीतर घुस आए चार-पांच सिपाहियों में से एक ने आदेश दिया तो दूसरे ने पिताजी के ऊपर अपनी राइफल तान ली। जम्पा चिल्लाकर एक सिपाही के पैर से लिपट गए थे-मत मारो मेरे पिताजी को...। इसी बीच मां ने लपककर पिताजी के सीने पर तनी उस सिपाही की बंदूक की नाल पकड़कर ऊपर की ओर घुमा दी। ट्रिगर दब चुका था। पर गोली ऊपर मिट्टी और फूस की छत को भेदती हुई निकल गई। मां और उस सिपाही में मल्ल-युद्ध जैसी स्थिति हो गई थी। तभी जम्पा को ठोकर मारते हुए उस सिपाही ने अपना हंटर निकाल लिया था और मां की कमर पर एक तेज वार किया। मां तिलमिला उठी थीं। पिताजी ने देखा तो क्रोध से बौखला उठे। लपककर उन्होंने हंटर वाले सिपाही की गर्दन पकड़ ली थी और झुकाकर दीवार से दो-तीन बाहर टक्कर दे दी। उसकी चीख सुनकर दोनों सिपाही पलटकर पिताजी से जूझ पड़े थे। वे उन्हें बूटों और हंटरों से पीट रहे थे, साथ ही ताने भी मार रहे थे-बहुत बड़े नेता हुए हो। अब कहो अपने साथियों से कि आकर बचाएं तुम्हें, कहो अपने धर्मगुरु से कि दिखाएं कोई चमत्कार!
क्यों मार रहे हो तुम लोग निर्दयतापूर्वक। हमारा दोष तो बताओ। मां चीखते हुए पिताजी को ढकते हुए उन पर लेट गई थीं। कुछ देर के लिए हंटरों की बौछार उन पर होने लगी थी। जम्पा का रो-रोकर बुरा हाल था। एक सिपाही ने सबको रोकते हुए कहा-
रुक जाओ। पहले पूछ लो कि कोई भागकर यहां छिपा था या नहीं? हां, हां, बताओ जी। अभी कुछ देर पहलीे इधर कोई भागता हुआ आया था? दूसरे सिपाही ने अपना हाथ रोकते हुए कड़ककर पूछा। नहीं...। मग्-पा को बचाने के लिए मां की कमजोर आवाज गूंजी थी। ऐसे नहीं बताएगी! इसके बच्चे को पकड़ लो। (जारी...)