सहज स्वभाव, गहन प्रभाव

    दिनांक 21-सितंबर-2020   
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श्रेष्ठ चिंतक, संगठक और दीर्घद्रष्टा नेता भारतीय मजदूर संघ के संस्थापक श्री दत्तोपंत ठेंगड़ी की जन्मशती के अवसर पर याद आते हैं संगठन हेतु उनके दिए सूत्र और देश व समाज को उनका महती योगदान

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श्री दत्तोपंत ठेंगड़ी

जिस समय स्वर्गीय दत्तोपंत ठेंगड़ी जी ने भारतीय मजदूर संघ की स्थापना की, वह साम्यवाद के वैश्विक आकर्षण, वर्चस्व और बोलबाले का समय था। उस परिस्थिति में राष्ट्रीय विचार से प्रेरित शुद्ध भारतीय विचार पर आधारित एक मजदूर आंदोलन की शुरुआत करना तथा अनेक विरोध और अवरोधों के बावजूद उसे लगातार बढ़ाते जाना, यह पहाड़-सा काम था। श्रद्धा, विश्वास और सतत परिश्रम के बिना यह काम संभव नहीं था। तब उनकी कैसी मन:स्थिति रही होगी, इसे समझने के लिए एक दृष्टांत-कथा याद आती है—

 अभी वसंत की बयार बहनी शुरू भी नहीं हुई थी। आम पर बौर भी नहीं आया था। तभी सर्द पवन के झोंकों के थपेड़े सहता हुआ एक जन्तु अपने बिल में से बाहर निकला। उसके रिश्तेदारों ने उसे बहुत समझाया कि अपने बिल में ही रहकर आराम करो, ऐसे समय बाहर निकलोगे तो मर जाओगे। पर उसने किसी की एक न सुनी। बड़ी ही मुश्किल से वह आम्रवृक्ष के तने पर चढ़ने लगा। ऊपर आम की डाल पर झूमते हुए एक तोते ने उसे देखा। अपनी चोंच नीचे झुकाते हुए उसने पूछा, ‘अरे ओ जन्तु, इस ठंड में कहां चल दिए?’

‘आम खाने।’ जंतु ने उत्तर दिया।
तोता हंस पड़ा। उसे वह जन्तु मूर्खों का सरदार लगा। उसने तुच्छता से कहा, ‘अरे मूर्ख, आम का तो अभी इस वृक्ष पर नामोनिशान नहीं है। मैं उपर—नीचे सभी जगह देख सकता हूं!’

‘तुम भले ही देख सकते होगे,’ जंतु ने अपनी डगमग चाल चलते हुए कहा, ‘पर मैं जब तक पहुंचूंगा तब वहां आम अवश्य होगा।’
इस जन्तु के जवाब में किसी साधक की सी जीवनदृष्टि है। वह अपनी क्षुद्रता को नहीं देखता। प्रतिकूल संजोगों से वह घबराता नहीं है। ध्येय का कोई भी चिन्ह दिखाई न देने के बावजूद उसे अपनी ध्येयप्राप्ति के विषय में सम्पूर्ण श्रद्धा है। अपने एक-एक कदम के साथ फल भी पकते जायेंगे, इस बारे में उसे रत्तीभर संदेह नहीं है।

उसके रिश्तेदार या तोता-पंडित चाहे कुछ भी कहें, उसकी उसे परवाह नहीं है।
उसके अंतर्मन में तो बस एक ही लगन है और एक ही रटन-
‘हरि से लागी रहो मेरे भाई, तेरी बनत बनत बन जाई।’
और आज हम देखते हैं कि भारतीय मजदूर संघ भारत का सर्वाधिक बड़ा मजदूर संगठन है।


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श्री ठेंगड़ी जी के साथ चर्चा में भारतीय चिंतन की गहराइयों के विविध पहलू सहज खुलते थे। मजदूर क्षेत्र में साम्यवादियों के वर्चस्व के कारण कामगार संगठनों की भाषा या नारे भी साम्यवादियों की शब्दावली में हुआ करते थे। उन्होंने साम्यवादी नारों के स्थान पर अपनी भारतीय विचार शैली का परिचय कराने वाले नारे गढ़े। ‘उद्योगों का राष्ट्रीयकरण’  के स्थान पर उन्होंने कहा—हम ‘राष्ट्र का औद्योगीकरण-उद्योगों का श्रमिकीकरण और श्रमिकों का राष्ट्रीयकरण’ चाहते हैं


अच्छे संगठक का यह गुण होता है कि आप कितने भी प्रतिभावान क्यों ना हों, अपने सहकारियों के विचार और सुझाव को खुले मन से सुनना और योग्य सुझाव को सहज स्वीकार भी करना। ठेंगड़ी जी ऐसे ही संगठक थे। जब श्रमिकों के बीच कार्य प्रारम्भ करना तय हुआ तब उस संगठन का नाम ‘भारतीय श्रमिक संघ’ सोचा गया था। परंतु जब इससे सम्बंधित कार्यकर्ताओं की पहली बैठक में यह बात सामने आई कि समाज के जिस वर्ग के बीच हमें कार्य करना है, उनके लिए ‘श्रमिक’ शब्द समझना आसान नहीं होगा। कुछ राज्यों में तो इसका सही उच्चारण करने में भी दिक़्कत आ सकती है, इसलिए ‘श्रमिक’ के स्थान पर आसान शब्द ‘मजदूर’ का उपयोग करना चाहिए। उसे तुरंत स्वीकार किया गया और संगठन का नाम ‘भारतीय मजदूर संघ’ तय हुआ।
संगठन में काम करना मतलब ‘मैं’ से ‘हम’ की यात्रा करना होता है। कर्तृत्ववान व्यक्ति के लिए यह आसान नहीं होता। वह अपने ‘मैं’ के प्रेम में पड़ता है। किसी तरह यह ‘मैं’ व्यक्त होता ही रहता है। संतों ने कहा है कि इस ‘मैं’ की बात ही कुछ अजीब है। वह अज्ञानी को छूता तक नहीं है। पर ज्ञानी का गला ऐसा पकड़ लेता है कि उसका छूटना बड़ा कठिन होता है। पर संगठन में, संगठन के साथ और संगठन के लिए काम करने वालों को इससे बचना ही पड़ता है। ठेंगड़ी जी ऐसे ही थे। सहज बातचीत में भी उनके द्वारा कोई महत्व की बात, दृष्टिकोण या समाधान दिए जाने को भी कहते समय ‘मैंन’ ऐसा कहा, ऐसा कहने के स्थान पर वे हमेशा ‘हमने’ ऐसा कहा, ही कहते थे। इस ‘मैं’ का ऊर्ध्वीकरण आसान नहीं होता। परन्तु ठेंगड़ी जी ने इसमें महारत प्राप्त की थी, जो एक संगठक के लिए बहुत आवश्यक होती है।

ठेंगड़ी जी की एक और बात लक्षणीय थी कि वे सामान्य से सामान्य मजदूर से भी इतनी आत्मीयता से मिलते थे, उसके कंधे पर हाथ रखकर, साथ चहलकदमी करते हुए उससे बातें करते थे कि किसी को भी नहीं लगता था कि वह एक अखिल भारतीय स्तर के नेता, विश्वविख्यात चिंतक से बात कर रहा है। बल्कि उसे ऐसी अनुभूति होती थी मानो वह अपने किसी अत्यंत आत्मीय बुजुर्ग, परिवार के ज्येष्ठ व्यक्ति से मिल रहा है। यह करते समय ठेंगड़ी जी की सहजता विलक्षण होती थी।

उनका अध्ययन बहुत व्यापक और गहरा था। अनेक पुस्तकों के सन्दर्भ और अनेक नेताओं के किस्से उनके साथ बातचीत में आते थे। पर एक बात जो मेरे दिल को छू जाती थी, वह यह  थी कि कोई एक किस्सा या चुटकुला जो ठेंगड़ी जी ने अनेक बार अपने वक्तव्य में सुनाया होगा, वही किस्सा या चुटकुला यदि मेरे जैसा कोई अनुभवहीन, कनिष्ठ कार्यकर्ता सुनाने लगता तो वे कहीं पर भी उसे जरा भी आभास नहीं होने देते थे कि वे यह किस्सा जानते हैं। यह संयम आसान नहीं है। मैं तो यह जानता हूं, ऐसा कहने का या जताने का मोह अनेक बड़े, अनुभवी कार्यकर्ताओं को होता है, ऐसा मैंने कई बार देखा है। पर ठेंगड़ी जी उसे ऐसी लगन से, ध्यानपूर्वक सुनते थे कि मानो पहली बार सुन रहे हों। उस पर भावपूर्ण प्रतिसाद भी देते थे और तत्पश्चात उसके अनुरूप और एक नया किस्सा या चुटकुला अवश्य सुनाते थे। जमीनी कार्यकर्ता से इतना जुड़ाव और लगाव श्रेष्ठ संगठक का ही गुण है।

अपना कार्य बढ़ाने की उत्कंठा, इच्छा और प्रयास रहने के बावजूद अनावश्यक जल्दबाजी नहीं करना, यह भी श्रेष्ठ संगठक का गुण है। परमपूजनीय श्री गुरुजी कहते थे—‘धीरे-धीरे जल्दी करो’। जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए। महाराष्ट्र में मेरे एक किसान मित्र श्री शरद जोशी द्वारा निर्मित ‘शेतकारी संगठन’ नामक किसान आंदोलन में विदर्भ प्रदेश के प्रमुख नेता थे। बाद में उस आंदोलन से उनका मोहभंग हुआ, तब मेरे छोटे भाई के साथ उनकी बातचीत चल रही थी। मेरा भाई भी तब किसानी करता था। मेरे भाई को लगा कि किसान संघ का कार्य अभी-अभी शुरू हुआ है तो इस किसान नेता को किसान संघ के साथ जोड़ना चाहिए। उसने मुझसे बात की। मुझे भी यह सुझाव अच्छा लगा। यह एक बड़ा नेता था।

ठेंगड़ी जी की एक  बात लक्षणीय थी कि वे सामान्य से सामान्य मजदूर से भी इतनी आत्मीयता से मिलते थे, उसके कंधे पर हाथ रखकर, साथ चहलकदमी करते हुए उससे बातें करते थे कि किसी को भी नहीं लगता था कि वह एक अखिल भारतीय स्तर के नेता, विश्वविख्यात चिंतक से बात कर रहा है। बल्कि उसे ऐसी अनुभूति होती थी मानो वह अपने किसी अत्यंत आत्मीय बुजुर्ग, परिवार के ज्येष्ठ व्यक्ति से मिल रहा है। यह करते समय ठेंगड़ी जी की सहजता विलक्षण होती थी।

किसान संघ का कार्य श्री ठेंगड़ी जी के नेतृत्व में शुरू हो चुका था। इसलिए यह प्रस्ताव लेकर मैं अपने भाई के साथ नागपुर में ठेंगड़ी जी से मिला। ठेंगड़ी जी उस किसान नेता को जानते थे। मुझे पूर्ण विश्वास था कि किसान संघ के लिए एक अच्छा प्रसिद्ध किसान नेता मिलने से किसान संघ का कार्य बढ़ाने में सहायता होगी और इसलिए ठेंगड़ी जी उसे तुरंत आनंद के साथ स्वीकार करेंगे। परन्तु पूर्वभूमिका बताकर जैसे ही मैंने यह प्रस्ताव उनके सामने रखा, ठेंगड़ी जी ने उसे तुरंत अस्वीकार किया। मुझे बहुत आश्चर्य हुआ। बाद में ठेंगड़ी जी ने मुझे कहा कि हम इसलिए इस नेता को नहीं लेंगे क्योंकि  हमारा किसान संघ बहुत छोटा है। वह इतने बड़े नेता को पचा नहीं पायेगा और यह नेता हमारे किसान संघ को अपने साथ खींचकर ले जायेगा। हम ऐसा नहीं चाहते हैं। इस पर मैंने कहा कि  यदि किसान संघ उसे स्वीकार नहीं करेगा तो भाजपा के लोग उसे अपनी पार्टी में शामिल कर चुनाव भी लड़ा सकते हैं। इस पर ठेंगड़ी जी ने शांत स्वर में कहा कि भाजपा को जल्दबाजी होगी, पर हमें नहीं है। उनका यह उत्तर इतना स्पष्ट और आत्मविश्वासपूर्ण था कि मेरे लिए यह एक महत्वपूर्ण सीख बन गया। और तब जाकर श्री गुरूजी की 'धीरे-धीरे जल्दी करो' उक्ति का गूढ़ार्थ मेरी समझ में आया।

 श्री ठेंगड़ी जी श्रेष्ठ संगठक के साथ साथ एक दार्शनिक भी थे। भारतीय चिंतन की गहराइयों के विविध पहलू उनके साथ बातचीत में सहज खुलते थे। मजदूर क्षेत्र में साम्यवादियों का वर्चस्व एवं दबदबा था इसलिए सभी कामगार संगठनों की भाषा या नारे भी साम्यवादियों की शब्दावली में हुआ करते थे। उस समय उन्होंने साम्यवादी नारों के स्थान पर अपनी भारतीय विचार शैली का परिचय कराने वाले नारे गढ़े। ‘उद्योगों का राष्ट्रीयकरण’ के स्थान पर उन्होंने कहा—हम ‘राष्ट्र का औद्योगीकरण-उद्योगों का श्रमिकीकरण और श्रमिकों का राष्ट्रीयकरण’ चाहते हैं। श्रम क्षेत्र में अनावश्यक संघर्ष बढ़ाने वाले असंवेदनशील नारे-‘हमारी मांगें पूरी हों-चाहे जो मजबूरी हो’ के स्थान पर उन्होंने कहा ‘देश के लिए करेंगे काम-काम के लेंगे पूरे दाम’। यानी, श्रम के क्षेत्र में भी सामंजस्य और राष्ट्रप्रेम की चेतना जगाने का सूत्र उन्होंने नारे में इस छोटे से बदलाव से दे दिया। भारतीय मजदूर संघ और भारतीय किसान संघ के अलावा अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, स्वदेशी जागरण मंच, प्रज्ञा प्रवाह, विज्ञान भारती आदि संगठनों की रचना की नींव में ठेंगड़ी जी का योगदान और सहभाग रहा है। उन्होंने भारतीय कला दृष्टि पर जो निबंध प्रस्तुत किया वह आगे जा कर संस्कार भारती का वैचारिक अधिष्ठान बना।
 श्री ठेंगडी जी के समान एक श्रेष्ठ चिंतक, संगठक और दीर्घद्रष्टा नेता के साथ रहकर, संवाद कर, उनका चलना, उठना-बैठना, उनका सलाह देना, यह सब प्रत्यक्ष अनुभव करने का, सीखने का सौभाग्य मिला। श्री ठेंगड़ी जी की जन्मशती के मंगल अवसर पर उनकी पावन स्मृति को मेरी विनम्र श्रद्धांजलि।              
(लेखक रा.स्व. संघ के सहसरकार्यवाह हैं)