बाहरी मदद से बढ़े चीनी कम्युनिस्ट

    दिनांक 23-सितंबर-2020
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प्रो. कुसुमलता केड़िया

अब भले ही चीन के कम्युनिस्ट नेता अमेरिका को आंख दिखा रहे हैं, लेकिन उन्हें यहां तक पहुंचाने में अमेरिका और रूस जैसे देशों का ही योगदान है 

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कम्युनिस्ट पार्टी के अधिवेशन को संबोधित करते शी जिनपिंग (फाइल चित्र)

चीन की कम्युनिस्ट पार्टी का संपूर्ण चीन पर कब्जा होने में चीन की आंतरिक शक्तियों के स्थान पर बाहरी शक्तियों की ही मुख्य भूमिका है, क्योंकि कम्युनिस्ट स्वयं ही बाहरी शक्तियों के ‘एजेंट’ हैं। 17वीं शताब्दी में मिंग शासकों ने जहां खेती और व्यापार के विकास पर ध्यान केंद्रित किया, वहीं यूरोपीय समूहों ने चारों तरफ फैल कर मिंग शासन के प्रशासकों को भ्रष्ट करने के कई हथकंडे अपनाए और इस कारण प्रशासन खोखला होता चला गया। अफीम की खेती पर बहुत अधिक जोर देने के कारण कई जगह फसलों में गिरावट आई और अकाल की स्थितियां भी आइं। जगह-जगह विद्रोह होने लगे जिसका लाभ यूरोपीय समूहों ने उठाया। मानचूओं ने स्थिति का लाभ उठाकर चीन के कई स्थानों पर कब्जा कर लिया। इस बीच यूरोपीय समूह अपना प्रभाव फैलाते रहे। 18वीं शताब्दी में चीन में 3 प्रमुख सम्राट हुए - कांगसी, योंग झोन और किन लोंग। परंतु 19वीं शताब्दी के प्रारंभ तक यूरोपीय व्यापारी चीन में छा गए और चीनी मिट्टी के बर्तनों तथा सूती वस्त्रों की बिक्री यूरोप के बाजारों में बढ़ी। रेशमी वस्त्रों की भी मांग होने लगी।

अलग-अलग हिस्सों में डचों, अंग्रेजों और पुर्तगालियों ने अपने व्यापारिक अड्डे बनाए और वे चीनियों के साथ घुल-मिल गए तथा उनमें फूट को बढ़ावा देते रहे। म्यांमार के जरिए ब्रिटिश समूह म्यांमार से सटे इलाके में तेजी से फैले और चीन तथा ब्रिटेन की मैत्री बढ़ने लगी। मानचूओं के विरुद्ध चीनियों के भीतर ईसाई मिशनरियों ने विद्रोह फैलाया और 19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में यूरोपीय राष्ट्रवाद से प्रभावित विचार चीन में व्यापक हो गए। इस बीच अफीम युद्ध भी शुरू हुआ अर्थात् अफीम की खेती अ‍ैर व्यापार में एकाधिकार को लेकर इंग्लैण्ड, पुर्तगाल और हालैण्ड आपस में भिड़ गए। जैसा कि जान की ने अपनी पुस्तक ‘चाईना : ए हिस्ट्री’ के अध्याय 15 में लिखा है, ‘‘ईसाई मिशनरियों की प्रेरणा और किसानों के विद्रोह के मिश्रण से चीन में भयंकर विद्रोह फैल गया। शासन के द्वारा विद्रोहियों को कुचला जाने लगा, कई करोड़ लोग मार डाले गए। हक्का समुदाय के लोग विद्रोहियों में सबसे आगे थे। हक्काओं के बीच ईसाइयों ने गहरी पैठ बनाई और जगह-जगह भगवान बुद्ध की मूर्तियों तथा मठों को नष्ट करने लगे। इसका नेतृत्व पादरी हांग ने किया।’’

इन्हीं विद्रोहियों में से आगे चलकर पहले राष्ट्रवादी और फिर कम्युनिस्ट नेता उभरे। मानचू शासकों को बाहरी आक्रमणकारी शासक बताया जाने लगा जिससे चीन को मुक्त करने का अभियान चला, परंतु इस अभियान को चला रहे लोग स्वयं यूरोपीय ईसाइयत के ‘एजेंट’ ही थे। इन्होेंने बड़े पैमाने पर गुरिल्ला लड़ाकुओं को एकत्रित किया और लड़ाकों की एक नई वेषभूषा तथा रहन-सहन की शैली विकसित की और ईसाइयों के नेता हांग ने खुद को चीन का दैवीय शासक घोषित कर दिया। पहला ‘लांग मार्च’ हांग ने ही आयोजत किया जो 2 साल तक चला। इसमें विभिन्न ईसाई संस्थाओं ने बहुत धन दिया। फ्रेंच, अमेरिकी तथा ब्रिटिश ईसाई संस्थाओं ने इस अभियान को चलाने में भरपूर मदद की। विद्रोहियों के विरुद्ध चीनी राजा किंग ने ब्रिटेन की नौसेना और सेना की सहायता मांगी जिसके बदले में ब्रिटेन ने चीन में चुंगी दरों को हटाए जाने और अफीम के व्यापार में एकाधिकार की मांग की। लुटेरों और डकैतों से सुरक्षा के नाम पर ब्रिटेन ने चीन में भी वैसी ही सेना अपने लिए बना ली जैसी भारत में भारतीय सैनिकों को भर्ती कर बना ली थी।  इस सेना की मदद से इंग्लैण्ड और फ्रांस ने चीन के अनेक हिस्सों पर कब्जा कर लिया और वहां अपनी शर्तों पर व्यापार करने लगे।
जापान ने रूस को 1905 में हराया था इसलिए रूस जापान से बदला लेना चाहता था और साथ ही चीन को जापान के प्रभाव से मुक्त रखना चाहता था। जापान के विरुद्ध रूस और अमेरिका दोनों अपने-अपने ढंग से चीन की मदद कर रहे थे। अमेरिका ने वहां राष्ट्रवादी समूहों को बढ़ावा दिया और च्यांग काई शेक का साथ दिया, जबकि रूस ने कम्युनिस्ट पार्टी को बढ़ावा दिया और बहुत बड़ी धनराशि पार्टी के विस्तार के लिए दी
इसी बीच जापान ने चीन पर आक्रमण किया और उसके बड़े हिस्से को अपने कब्जे में ले लिया। रूस भी मौके का फायदा उठाकर चीन में हस्तक्षेप करने लगा। रूस ने मानचू शासकों से संधि कर ली और उत्तरी चीन में अपना प्रभाव फैलाने लगा।
20वीं शताब्दी के प्रारंभ में यूरोपीय प्रभावों से चीन के भीतर चार प्रमुख नए समूह खड़े हुए-रिपब्लिकन, नेशनलिस्ट, कम्युनिस्ट और चीनी संस्कृति के पक्षधर। इनमें से प्रत्येक का नेता ईसाई मिशनरियों के प्रभाव वाला है। चीनी संस्कृति की बात करने वाले यूंग विंग अमेरिका जाकर पढ़ाई की थी और उसने यूरोप की तर्ज पर चीनी संस्कृति का उद्धार करने की बात कही थी। सन यात सेन ईसाई हो गए थे और उन्होंने रिपब्लिकन और नेशनलिस्ट आंदोलनों को प्रेरणा दी। च्यांग काई शेक भी यूरोपीय ईसाई राष्ट्रों से प्रभावित नेता बनकर उभरे और अनेक कम्युनिस्ट नेता भी पादरियों की सहायता से उभरे। 20वीं शताब्दी में संपूर्ण चीन में हजारों छोटी-छोटी जागीरें थीं, ऐसा जान की ने अपनी उक्त पुस्तक के अध्याय 16 में बताया है।

1931 में जापानियों ने मनचूरिया पर कब्जा कर लिया और चीन के भी एक हिस्से पर कब्जा करने में सफल हो गए। दूसरे महायुद्ध में जर्मनी और जापान साथ थे तथा इंग्लैण्ड, फ्रांस और अमेरिका से उनका युद्ध हो रहा था जिसमें बाद में रूस भी इंग्लैण्ड के साथ आ गया। इसलिए जापान को रोकने के लिए रूस और अमेरिका दोनों ने चीन को भरपूर सहायता उपलब्ध कराई। जापान ने रूस को 1905 में हराया था इसलिए रूस जापान से बदला लेना चाहता था और साथ ही चीन को जापान के प्रभाव से मुक्त रखना चाहता था। इस प्रकार जापान के विरुद्ध रूस और अमेरिका दोनों अपने-अपने ढंग से चीन को मदद कर रहे थे। अमेरिका ने वहां राष्ट्रवादी  समूहों को बढ़ावा दिया और च्यांग काई शेक का साथ दिया, जबकि रूस ने कम्युनिस्ट पार्टी को बढ़ावा दिया और बहुत बड़ी धनराशि पार्टी के विस्तार के लिए दी।

इस धन को स्वीकार करने पर चीन की कम्युनिस्ट पार्टी में आरंभ में कुछ हिचक थी परंतु माओ खुलकर इसके समर्थन में आए और इसलिए वे रूस के चहेते बन गए। रूस ने अन्य अनेक प्रभावशाली कम्युनिस्ट नेताओं को हाशिए पर डलवा दिया और माओ त्से तुंग को ही नेता स्वीकार करने के लिए चीनी कम्युनिस्ट पार्टी पर दबाव डाला। इस प्रकार माओ त्से तुंग के नेतृत्व का उदय हुआ। संयुक्त राज्य अमेरिका च्यांग काई शेक का साथ देता तो रहा, परंतु साथ ही युद्ध छिड़ने पर वह रूस को भी सहन करता रहा और इस प्रकार 1911 में पहले राष्ट्रवादियों ने मानचू शासन हटाकर चीनी गणराज्य की स्थापना की घोषणा की। जिन्हें रूस की सहायता से हराकर कम्युनिस्टों ने 1949 में चीनी गणराज्य की स्थापना की घोषणा की। महायुद्ध में साथ देने के लिए अमेरिका भी चीन के प्रति अनुकूल रहा और उधर स्तालिन ने खुलकर नीतिगत तथा धन की भरपूर मदद देकर चीनियों को सत्ता पर कब्जा करने की प्रेरणा और सहायता दी।
इस प्रकार चीन में जनवादी गणराज्य तो स्थापित हुआ ही, इंग्लैण्ड, फ्रांस तथा अमेरिका के शत्रु देशों मंगोलिया और मंचूरिया के भी बड़े हिस्से को नए चीनी गणराज्य में शामिल करने में सहायता दी। इस तरह महायुद्ध के कारण और उसमें विजेता पक्ष का साथ देने के कारण चीनी कम्युनिस्ट पार्टी को पहली बार एक बहुत बड़े इलाके का शासक बनने का सौभाग्य मिला।
(लेखिका अंतरराष्ट्रीय राजनय की विशेषज्ञ हैं)