गेशे जम्पा -10

    दिनांक 23-सितंबर-2020
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नीरजा माधव
हमारे भारत देश में तिब्बती शरणार्थियों की एक बड़ी संख्या है। चीन की विस्तारवादी नीति के परिणामस्वरूप एक अहिंसक धार्मिक देश तिब्बत पराधीन हो गया। 1959 में इसका चरमोत्कर्ष देखने को मिला जब तिब्बत के राष्ट्राध्यक्ष परम पावन दलाई लामा को अपने लाखों अनुयायियों के साथ अपना देश छोड़ भारत में शरण लेनी पड़ी।  भारत में रह रहा तिब्बती समुदाय तिब्बत में रह रहे चीनी सत्ता से संघर्षरत तिब्बतियों की सबसे बड़ी ताकत बना हुआ है। 19वीं सदी के अन्त तक तिब्बत स्वतंत्र था। तिब्बत के राजनीतिक, सांस्कृतिक और मानवीय अधिकारों के प्रश्न पर छाई वैश्विक चुप्पी को तोड़ने और उन्हें स्वाधीनता दिलाने की जद्दोजहद करता है सुप्रसिद्ध लेखिका नीरजा माधव द्वारा लिखा भारत में हिन्दी  का पहला उपन्यास-गेशे जम्पा। प्रस्तुत है इस उपन्यास की दसवीं कड़ी

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द्रवित भाव से पिताजी ने उनका सिर सहलाया और बोले थे-नहीं बेटा, सब कैसे जा सकेंगे? फिर तुम तो वहां बेहतर जीवन के लिए जा रहे हो। जब योग्य बन जाओगे तो हम वापस बुला लेंगे। फिर आप भी क्यों नहीं चल रहे हैं साथ? जम्पा मचल उठे। मां घर पर अकेली कैसे रहेगी? हूं...? पिताजी ने बहलाने का प्रयास किया। तो लौट चलो। मां को भी ले लेते हैं। अभी थोड़ी ही दूर तो आए हैं। वे पुन: मचल उठे। नहीं बेटा, कितनी दूर तो आ गए हम नड्गर-चे से। उतना लंबा-चौड़ा युम डोग्-छो पार किया। मीलों मैदान फिर खारु-ला की चढ़ाई और उतराई और अब ग्यांची पहुंचने वाले हैं हम। ना बाबा ना, मेरी तो हिम्मत नहीं लौटने की। पिताजी ने उन्हें मनाया था।

कहीं हमारे न रहने पर वे सिपाही आ गए तो मां क्या करेगी? उसको बांधकर ले जाएंगे। जम्पा रुआंसे हो उठे थे। नहीं, मां दरवाजा नहीं खोलेगी। पिताजी ने तर्क दिया।  इतनी जल्दी वे सब नहीं आएंगे। पिताजी ने आगे कहा, जानते हो जम्पा! जाड़े में यह नदी बर्फ बन जाती है और इस पार से उस पार लोग पैदल ही जाते हैं।

पहाड़ी पर चढ़ते ही एकाएक तेज आंधी आई थी जिसने उन लोगों को एक प्राकृतिक गुफा में बैठने के लिए विवश कर दिया था। कुछ ही देर में एक तेज बारिश का झोंका आकर चला गया था। कुछ देर के लिए जम्पा प्रकृति के मनोहर दृश्य में अपनी सुध-बुध खो बैठे थे। सामने नदी के आर-पार सुंदर इंद्रधनुष उग आया था। अद्भुुत सौंदर्य था उसका। दोनों छोरों पर पहाड़ स्तंभ की तरह खड़े थे और उन पर मेहराब की तरह टिका था रंग-बिरंगा इंद्रधनुष। बीच की उपत्यका में चमरी चराने वाले डोकपा लोगों के तंबूनुमा घर दिखाई पड़ रहे थे। जम्पा पिताजी के साथ मंत्रमुग्ध से बढ़े जा रहे थे। एकाध जगह चमरी के हल से खेत जोतते हुए किसान भी दिखाई पड़े थे।

चाय पी जाए? पिताजी ने उनके थके चेहरे को निहारते हुए पूछा था। हां। जम्पा ने कहा। चलते-चलते सचमुच उन्हें भूख और प्यास दोनों लग रही थी। कुछ ही दूर स्थित एक छोलदारी में वे रुके थे। लकड़ी के प्याले में मक्खन-मिश्रित चाय और सत्तू खाकर वे पुन: चल पड़े थे। शाम होने से पहले ही उन्हें दूसरे गांव पहुंच जाना था जहां से अन्य साथियों को भी साथ लेकर भारतीय सीमा की ओर बढ़ना था उन्हें। ल्-दोड् से पहले ही छु-शोर ग्य-पोन गांव पड़ा था। इस उपत्यका में कितने ही खंडहर और बस्तियों के ध्वंसावशेष दिखाई पड़े थे जम्पा को। इसमें कौन रहता है? उत्सुकता जागी थी जम्पा की। रहते नहीं, रहते थे। पिताजी ने खच्चर को एक घर के सामने रोकते हुए कहा। कहां गए? वे लोग भी गांव छोड़कर चले गए? जम्पा का स्वर दुखी था। तभी उस घर के भीतर से एक बूढ़ी महिला बाहर आई थी। आ गए तुम थुप्तेन? आओ, भीतर आ जाओ। उसने पिताजी को नाम से संबोधित कर कहा।

हां दीदी, ये जम्पा है। बच्चे तैयार हैं न? पिताजी अंदर की ओर बढ़ते हुए पूछ रहे थे। हां, सब तैयार हैं। बस, उनके बाप को समझाओ। वो भी जाने की जिद किए हुए है। कहता है, यहां मरने के लिए कौन रहेगा? अब तुम्हीं बताओ, पूरा तिब्बत खाली करके हम उन्हें सौंप जाएं? यह कोई बात हुई? मरना ही होगा तो कहीं भी मर जाएंगे। तिब्बत में मरेंगे तो कम से कम अपनी मिट्टी में तो मिट्टी मिलेगी। चीऊ..चीऊ! पिताजी ने आवाज लगाई तो उस आदमी ने सिर उठाया था। यह उसका घरेलू नाम था शायद। क्या बात है चीऊ? पिताजी ने प्रश्न किया। भैया, देखो न, मां मुझे नहीं जाने दे रही है। मैं नहीं रहना चाहता यहां। वह रुआंसा हो उठा था।  बक ले चाहे जितना, पर तुझे नहीं जाना है। थुप्तेन जा रहा है क्या  देश छोड़कर? बूढ़ी औरत रसोई की ओर बढ़ते हुए बोली। जम्पा को लग रहा था कि काश! उनकी मां भी उन्हें उसी तरह रोक लेतीं। उस बूढ़ी महिला की निडरता और धैर्य पर आश्चर्यचकित थे जम्पा। मां कितना रो रही थी आते समय? पर यह बूढ़ी मां कितनी निर्भीक है?

मे आई कम इन, सर? देवयानी के स्वर से अतीत की शृंखला टूटकर वर्तमान से पृथक हो गई थी। गेशे जम्पा ने चौंककर पीछे देखा। आपको डिस्टर्ब तो नहीं किया मैंने? वह खिड़की के पास खड़े गेशे जम्पा को देख अचकचाकर पूछ रही थी। नहीं, नहीं, आ जाओ। मैं तुम्हारी ही प्रतीक्षा कर रहा था। एकाएक मुंह से निकले अपने ही वाक्य पर वे झेंप से गए थे। सुधारते हुए कहा था—मेरा आशय था कि मैंने तुम्हें किसी काम से बुलाया था। जी कहिए। उसके होंठों पर मधुर हंसी तैर रही थी। कुछ बच्चे आए हंै धर्मशाला से। तिब्बती शरणार्थी अपनी भाषा छोड़ कुछ नहीं जानते। तुम उन्हें हिंदी पढ़ा दो ताकि यहां के साथ सामंजस्य बैठा सकें। अपनी झेंप मिटाने के चक्कर में उन्होंने तुरंत अपना प्रस्ताव रख दिया था। बैठने के लिए भी नहीं कहा देवयानी से। तुम दोलमा माई से मिल लो। बाकी कल तुम्हें मैं समझा दूंगा। एक परिचय बच्चों से ले लो।


बच्चे तैयार हैं। हां, बस, उनके बाप को समझाओ। वो भी जाने की जिद किए हुए है। कहता है, यहां मरने के लिए कौन रहेगा? अब तुम्हीं बताओ, पूरा तिब्बत खाली करके हम उन्हें सौंप जाएं? यह कोई बात हुई? मरना ही होगा तो कहीं भी मर जाएंगे। तिब्बत में मरेंगे तो कम से कम अपनी मिट्टी में तो मिट्टी मिलेगी।

जी, अच्छा। जाऊं? वह पूछ रही थी। उसके बाल आज खुले नहीं थे। लपेटकर बनाए गए उसके जूड़े में बेला का एक सफेद फूल टंका हुआ था जो कान की बगल से दिखाई दे रहा था। ओ, हां.. यदि बैठना नहीं हो तो जा सकती हो। गेशे जम्पा को अपना ही जवाब विचित्र-सा लग रहा था। जी, टाशी डेलेक। वह ठिठकी और फिर जाने के लिए मुड़ गई थी। लोहे के मुख्य द्वार पर ठक्-ठक् की आवाज सुनकर देवयानी ने अपने कमरे की बाहरी खिड़की खोलकर झांका था। इतनी रात में उससे मिलने कोई नहीं आता।

कौन? अपने कमरे से लोब्जंग ने पूछा था। मैं हूं अनचू ढोंढप्। दरवाजा खोलिए। आगंतुक ने अपना परिचय दिया था। देवयानी ने अपनी खिड़की बंद करते हुए बाहरी प्रकाश में आगंतुक का चेहरा देखा। न जाने क्यों सभी तिब्बतियों का चेहरा उसे लगभग एक समान लगता। वही गोरा-सा रंग, पतले-पतले होंठ, छोटी-छोटी आंखें जैसे गालों की त्वचा से निकली हुईं। बस वस्त्रों में परिवर्तन कभी-कभी दिखाई पड़ जाता। कुछ भिक्षु-वेश में, तो कुछ अत्याधुनिक जीन्स की पैंट और ढीली-ढाली शर्ट में। यह आगंतुक भी ढीली, सफेद शर्ट और काले रंग की जीन्स पहने हुए था।

अरे ढोंढप्, इतनी रात में कैसे? लोब्जंग मुख्य द्वार की सिटकिनी खोलते हुए पूछ रही थी। बस ऐसे ही मां। एक मीटिंग थी यहां सारनाथ में, तिब्बती यूथ कांग्रेस की। सोचा, गेस्ट हाउस में क्या रुकूं? वह भीतर आ गया था। देवयानी खिड़की की झिरी से उसे देख चुकी थी।

बहुत अच्छा किया। सीरीड् क्यों नहीं आई? लोब्जंग पीछे से गेट बंद करते हुए पूछ रही थी। अब मीटिंग में उसको लेकर क्या चलूं? वह हंसते हुए कंधे उचकाता अंदर की ओर बढ़ा था। कौन है दीदी? छोटा भाई दीपेश आकर देवयानी की बगल में खड़ा हो गया। वही जिसके बारे में उस दिन लोब्जंग बता रही थी कि उसका सौतेला दामाद है...टनचू ढोंढप्। देवयानी ने खिड़की पूरी तरह बंद कर दी।

अच्छा, अच्छा, मखन्चूजी आए हैं? वह मजाक करते हुए हंस पड़ा। अरे दीपेश, एम.ए. कर रहे हो। कब सभ्यता आएगी? इतनी जोर से बोल रहे हो। सुन ले तो? देवयानी किंचित नाराज हो उठी थी। कौन है देवयानी? मां भी दूसरे कमरे से आ गई थीं। कोई नहीं मां। हमारे यहां नहीं है। वो मकान मालकिन के यहां आए हैं, मेहमान। लोब्जंग आंटी के पाहुनजी आए हैं मां। मखन्यू ढोंढप्जी। दीपेश ने धीरे से फुसफुसाते हुए मां के कंधों को हिला दिया था।

देवयानी को भी हंसी आ गई। कृत्रिम नाराजगी प्रकट करते हुए बोलीं थी-देख रही हो न मां? कल ही मकान मालकिन हम लोगों का बोरिया बिस्तर बंधवा देगी। उनका दामाद है टनचू ढोंढप्, दासेर पत्रिका का संपादक है वह, और दीपेश उसे...देवयानी की बात अधूरी ही थी, तभी कमरे का दरवाजा धकेलते हुए लोब्जंग प्रकट हुई थी। उसके चेहरे पर हड़बड़ाहट के साथ एक झेंप वाला भाव भी घुमड़ रहा था। वो मैदम, एक निवेदन था! जी बोलिए। देवयानी अपनी कुर्सी उनकी ओर खिसकाते हुए बोल पड़ी। वह सशंकित थी कि कहीं लोब्जंग ने दीपेश की बातें सुन न ली हों, पर लोब्जंग के निवेदन करते ही उसकी आशंका समाप्त हो गई थी। (जारी...)