खिलाफत के 100 साल-8 : खिलाफत के खोल में हिंसा

    दिनांक 23-सितंबर-2020
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डॉ. श्रीरंग गोडबोले

खिलाफत आंदोलन का अगस्त 1920 से मार्च 1922 तक का दूसरा चरण जोर-जबरदस्ती और नरसंहार का चरण था। हिंसक मुस्लिमों की भीड़ ने जगह-जगह उपद्रव किए। चौरीचौरा थाने में 21 पुलिस वालों को जिंदा आग के हवाले कर दिया गया
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फरवरी 1922, चौरीचौरा: उपद्रवियों की भीड़ द्वारा फूंका गया पुलिस वाहन

खिलाफत और असहयोग आंदोलन आपस में जुड़े हुए थे, यह एक गलतफहमी है। असहयोग आन्दोलन भारत को स्वतंत्रता दिलाने के उद्देश्य से प्रारंभ किया गया था, इस चर्चित विषय पर डॉ. आंबेडकर का विश्लेषण अत्यधिक महत्वपूर्ण है। वे लिखते हैं,‘‘श्री गांधी खिलाफत के लिए न केवल मुसलमानों से सहमत थे बल्कि इस काम में उनके मार्गदर्शक और मित्र भी बन गए। इसमें श्री गांधी ने जो महत्वपूर्ण भूमिका अदा की उससे उस आन्दोलन और असहयोग आन्दोलन में जो सबंध था वह क्षीण हो गया, क्योंकि अधिकतर लोग यह विश्वास करते थे कि कांग्रेस ने ही असहयोग आन्दोलन शुरू किया है और वह इसलिए कि यह स्वराज पाने का एक साधन है।   

   यह विचार सब जगह घर कर गया था क्योंकि अधिकांश लोग यही देखकर संतुष्ट हो गए थे कि असहयोग आन्दोलन और 7-8 सितम्बर, 1920 को कलकत्ता में होने वाले कांग्रेस के विशेष अधिवेशन में  संबंध था, परन्तु जिसने भी सितंबर 1920 के बाद की स्थिति का अवलोकन किया है, वह जानता है कि यह विचार सही नहीं है। सच्चाई यह है कि असहयोग आन्दोलन का उद्गम खिलाफत आन्दोलन से हुआ था, न कि स्वराज के लिए कांग्रेस के आंदोलन के रूप मेें और कि इसे खिलाफतवादियों ने तुर्की की मदद के लिए शुरू किया था, कांग्रेस ने केवल खिलाफतवादियों की मदद के लिए इसे अपनाया था। इसका मूल उद्देश्य स्वराज नहीं, बल्कि खिलाफत था और स्वराज का गौण उद्देश्य बनाकर उससे जोड़ दिया गया था, ताकि हिन्दू भी उसमें भाग लें और यह बात नीचे दिए गए तथ्यों से स्पष्ट हो जाती है।

खिलाफत आंदोलन की शुरुआत 27 अक्तूबर, 1919 को मानी जा सकती है, क्योंकि इसी दिन देशभर में खिलाफत सम्मेलन हुए। इन सम्मेलनों में मुसलमानों ने इस संभावना पर विचार किया कि क्या असहयोग करके अंग्रेज सरकार को खिलाफत की गलती दूर करने के लिए विवश किया जा सकता है। 10 मार्च, 1920 को कलकत्ता में खिलाफत सम्मलेन हुआ और उसमें यह फैसला कर लिया गया कि आन्दोलन के लक्ष्य को आगे बढ़ाने के लिए असहयोग सर्वोत्तम हथियार हो सकता है। 9 जून, 1920 को इलाहाबाद में खिलाफत सम्मेलन हुआ और वहां सर्वसम्मति से इस बात को दोहराया गया कि असहयोग का सहारा लिया जाए। इस काम के लिए एक कार्यकारी समिति गठित की गई जो विस्तृत कार्यक्रम तैयार करके उसे लागू करे।

खिलाफत आंदोलन की शुरुआत 27 अक्तूबर, 1919 को मानी जा सकती है, क्योंकि इसी दिन देशभर में खिलाफत सम्मेलन हुए। इन सम्मेलनों में मुसलमानों ने इस संभावना पर विचार किया कि क्या असहयोग करके अंग्रेज सरकार को खिलाफत की गलती दूर करने के लिए विवश किया जा सकता है


22 जून, 1920 को मुस्लिमों ने वायसराय को सन्देश भेजा जिसमें कहा गया था कि यदि पहली अगस्त 1920 से पूर्व तुर्क लोगों की शिकायतें दूर न की गईं तो वे असहयोग आन्दोलन शुरू कर देंगे। 30 जून, 1920 को इलाहाबाद में खिलाफत कमेटी की बैठक हुई जहां यह तय किया गया कि वायसराय को एक महीने का नोटिस देकर असहयोग आन्दोलन शुरू कर दिया जाए। 1 जुलाई, 1920 को यह नोटिस दिया गया और 1 अगस्त, 1920 से असहयोग आन्दोलन शुरू हो गया। इस संक्षिप्त विवरण से पता चलता है कि असहयोग आन्दोलन खिलाफत कमेटी के खिलाफत सम्मलेन में पहले ही शुरू हो चुका था; और यह स्वराज के लिए नहीं, बल्कि खिलाफत आन्दोलन को बढ़ाने में मुसलमानों की सहायता करने के लिए था। कलकत्ता में कांग्रेस के विशेष अधिवेशन में जो प्रस्ताव पारित किया गया, उससे यह बात स्पष्ट हो जाती है।’’ (डॉ.आंबेडकर, संपूर्ण वाड्मय, खंड 15, पाकिस्तान या भारत का विभाजन, डॉ. बी. आर. आंबेडकर, डॉ. आंबेडकर प्रतिष्ठान, नई दिल्ली, 2013 पृ.137-139) 

असहयोग की खिलाफतवादी योजना
28-29 फरवरी, 1920 को मौलाना आजाद ने कलकत्ता में खिलाफत कॉन्फ्रेंस की अध्यक्षता की। उन्होंने कहा कि शरीयत के अनुसार किसी भी मुस्लिम का इस्लाम के गैर-मुस्लिम शत्रुओं के साथ मवाला (सहयोग) एक पाप है। हालांकि उन्होंने बड़ी चतुराई से इस श्रेणी से हिंदुओं को बाहर रखा था। उन्होंने असहयोग को इस्लामी ‘तर्क-ए-मवालत’ (सामाजिक बहिष्कार) के रूप में परिभाषित किया और इसे मुसलमानों के लिए अनुशंसित किया क्योंकि उनके लिए यही एकमात्र उपाय बचा था। (खिलाफत मूवमेंट इन इंडिया,1919-1924, मुहम्मद नईम कुरैशी, लंदन विश्वविद्यालय को प्रस्तुत किया गया शोध प्रबंध, 1973, पृ.8) 11 मई, 1920 को जिन शांति-शर्तों की घोषणा की गई उन्हें तुर्की की स्वतंत्रता को नष्ट करने और उसके साम्राज्य को छीनने वाला बताया गया। खिलाफतवादियों ने कांग्रेस के हिंदू नेताओं का समर्थन प्राप्त करने के लिए, गांधी जी के परामर्श से सेंट्रल खिलाफत कमेटी की एक विशेष बैठक की। यह जून, 1920 के पहले सप्ताह में इलाहाबाद में आयोजित की गई जिसमें हिंदू-मुस्लिम नेताओं ने सहभागिता की। (उल्लेखनीय है यह वही बैठक है जिसका उल्लेख ऊपर आंबेडकर ने किया है) बैठक में, असहयोग की परिकल्पना चार चरणों में की गई: 1. उपाधियों और मानद पदों का त्याग, 2. सरकार की सिविल सेवाओं में पदों का त्याग, इससे पुलिस को बाहर रखा जाना, 3. पुलिस और सेना में सेवा का इस्तीफा, और 4. करों के भुगतान से इनकार।

तेज हुए खिलाफत के नारे
गांधीजी ने दिसंबर 1919 में खिलाफत मुद्दे पर सरकार द्वारा घोषित शांति समारोह के बहिष्कार की वकालत की। वह पंजाब के मुद्दे (जलियांवाला बाग हत्याकांड और मार्शल लॉ) को बहिष्कार के कारणों में जोड़ने के लिए तैयार नहीं थे। खिलाफत कॉन्फ्रेंस की हिंदू-मुस्लिम संयुक्त बैठक (24 नवंबर, 1919) को संबोधित करते हुए गांधीजी ने कहा, ‘व्यक्तिगत रूप से मुझे लगता है कि पंजाब के लोगों की जो भी पीड़ा हो, हम एक स्थानीय मुद्दे पर खुद को इस समारोह से अलग नहीं कर सकते हैं जो कि संपूर्ण साम्राज्य से जुड़ा हुआ है...और इसके लिए खिलाफत ही वह मुद्दा है जिस पर हम शांति समारोह में शामिल होने से इनकार कर सकते हैं।’ हालांकि, खिलाफतवादियों ने पंजाब मुद्दे का फायदा उठाना शुरू कर दिया, क्योंकि इसने व्यापक जन असंतोष को उभारा  था। गांधीजी ने भी अब खिलाफत के साथ पंजाब के मुद्दे को एक चारे के रूप में इस्तेमाल करना शुरू कर दिया, ताकि हिंदुओं को असहयोग आंदोलन के प्रति आकर्षित किया जा सके। (कुरैशी, उक्त, पृ.112-13) पारंपरिक और  संवैधानिक रास्तों से कांग्रेस का हटना एक बड़ा मुद्दा माना गया जिसके लिए कलकत्ता में 4-9 सितंबर, 1920 को कांग्रेस का एक विशेष सम्मेलन बुलाया गया। (द हिस्ट्री आॅफ इंडियन नेशनल कांग्रेस, पट्टाभि सीतारमैया, सीडब्ल्यूसी, मद्रास, 1935 , पृ. 336)

हिंदू नेतृत्व का विरोध
असहयोग आंदोलन के प्रति कई हिंदू नेताओं के धुर विरोध ने खिलाफतवादियों को चिंतित कर दिया। मुस्लिम नेता एक भारतीय राष्ट्र के निर्माण हेतु हिंदुओं के साथ अपने मतभेद समाप्त करने के इच्छुक नहीं थे। (हिस्ट्री आॅफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया, आर.सी. मजूमदार, खंड 3, पृष्ठ 64) गांधी एक खिलाफतवादी के रूप खिलाफत फंड के व्यय पर देश का दौरा कर रहे थे। इसका अन्य हिंदू नेताओं ने विरोध किया क्योंकि उन्हें लगता था कि यह सेन्ट्रल खिलाफत कमेटी द्वारा संचालित आंदोलन था। उदारवादियों ने इसे अपनी अवधारणा में ‘विचित्र और पूरी तरह से अव्यावहारिक’ पाया। श्रीमती एनी बेसेंट (1847-1933), जो भारत में थियोसोफी एवं होम रूल लीग की अगुआ थीं, ने इसे ‘राष्ट्रीय आत्महत्या’ बताया। सर पी.एस. सिवास्वामी अय्यर (1864-1946), जो मद्रास प्रेसीडेंसी के एडवोकेट-जनरल रहे, ने इसे ‘देश के लिए आपदा से भरा’ अभियान माना। वी.एस. श्रीनिवास शास्त्री (1869-1946) ने इसे अतार्किक और हानिकारक बताया, साथ ही अप्रैल 1920 में भविष्यवाणी भी की कि शीघ्र ही आंदोलन हिंसक हो जाएगा। मद्रास प्रेसीडेंसी के ही एडवोकेट जनरल रहे श्रीनिवास अयंगर (1874-1941)) ने इस आन्दोलन के तीसरे और चौथे चरण को ‘निश्चित रूप से अवैध और असंवैधानिक’ करार दिया। ऐसे ही विचार पंडित मदन मोहन मालवीय ने व्यक्त किये। कांग्रेस के संस्थापक सदस्य सुरेंद्रनाथ बनर्जी (1848-1925) ने भी इस संबंध में अपना सार्वजनिक अस्वीकार जारी किया। (कुरैशी, उक्त, पृ.154-155)

कांग्रेस के ‘अतिवादी’ इस विषय पर एकमत नहीं थे। हालांकि यह सार्वजनिक रूप से माना जा रहा था कि तिलक खिलाफत आंदोलन के साथ नहीं थे। परन्तु तिलक द्वारा 1920 में कांग्रेस के भीतर स्थापित डेमोक्रेटिक स्वराज पार्टी के मेनिफेस्टो के अनुसार ‘यह पार्टी खिलाफत से जुड़ी समस्या के मुस्लिम मान्यताओं और कुरान के सिद्धांतों के अनुरूप समाधान के लिए मुस्लिमों के दावे का समर्थन करती थी। (पट्टाभि सीतारमैया, उक्त, पृ. 327) मोतीलाल नेहरू हिंसा फैलने से चिंतित थे। सी. आर. दास, बी.सी. पाल, जी.एस. खापर्डे, एन.सी. केलकर, विट्ठलभाई पटेल जैसे अन्य नेता भी इससे सशंकित थे। (कुरैशी, उक्त, पृ. 154-156) गांधीजी और खिलाफतवादियों, दोनों के लिए कलकत्ता (सितंबर 1920) में कांग्रेस का विशेष सत्र महत्वपूर्ण था।

स्वराज से पहले खिलाफत
हिंदुओं को अपनी ताकत दिखाने के लिए खिलाफतवादियों ने कांग्रेस से असहयोग पर चर्चा करने से पहले अपना सम्मेलन (5 सितंबर, 1919) आयोजित किया। खिलाफत कॉन्फ्रेंस ने सर्वसम्मति से पुष्टि की कि असहयोग एक अत्यंत बाध्यकारी मजहबी दायित्व था। शौकत अली और अन्य खिलाफतवादियों के अत्यधिक दबाव के कारण मुस्लिम लीग ने भी सेन्ट्रल खिलाफत कमेटी का अनुसरण करने का निर्णय लिया। हालांकि जिन्ना ने इसके विरुद्ध चेतावनी दी थी। ‘श्री गांधी का तात्कालिक उद्देश्य कांग्रेस के विशेष सत्र को उनके पंथ में परिवर्तित करना था...लेकिन श्री गांधी ने इस हेतु सूक्ष्मता के साथ तैयारियां की थीं। बॉम्बे और मद्रास से खिलाफत स्पेशल ट्रेनों से कांग्रेस के प्रतिनिधियों को भरकर लाया गया जिन्हें पक्ष में वोट देने के लिए शपथ दिलाई गई थी। राष्ट्रवादियों ने शिकायत की कि खिलाफतवादियों ने सभागार को बंद  कर दिया था और बहुमत के साथ छेड़छाड़ की थी।’ (स्पीचिस एंड राइटिंग्स आॅफ एम.के. गांधी, इंट्रोडक्शन बाय सी. एफ. एंड्Ñयूज, मद्रास, 1922, पृ.46-48) असहयोग समिति में असहयोग के प्रस्ताव पर तीन दिन तक  बहस चली  जिसे बहुत कम बहुमत से स्वीकार किया गया था; 132 के मुकाबले 144 वोट से। मुस्लिम प्रभुत्व ने असहयोग के पक्ष में पलड़ा झुका दिया था। (कुरैशी,उक्त, पृ.158)

असहयोग के संकल्प को आगे बढ़ाते हुए, गांधीजी ने कहा, ‘‘भारत के मुसलमान सम्माननीय व्यक्ति और अपने पैगंबर के विश्वास के अनुयायियों के रूप में नहीं रह सकते हैं, यदि वे किसी भी कीमत पर इसका सम्मान सुरक्षित नहीं रख पाते हैं तो। पंजाब के साथ क्रूरतापूर्ण और बर्बर व्यवहार किया गया है। और इन दो गलतियों को दूर करने के लिए ही मैंने इस देश के सामने असहयोग की योजना दी है।’’ पंजाब का मुद्दा स्पष्ट रूप से एक बाद में आया हुआ विचार था। यह याद किया जा सकता है कि रॉलट एक्ट और जलियांवाला बाग हत्याकांड के बाद भी, गांधीजी  ने दिसंबर 1919 में अमृतसर कांग्रेस अधिवेशन में ‘असहयोग के एक हल्के रूप’ का भी विरोध किया था। उन्होंने पंजाब के मुद्दे पर सरकार के शांति समारोह संबंधी आदेश का बहिष्कार करने पर विचार करने से भी इनकार कर दिया था। अब एक वर्ष के भीतर, वह जोर-शोर से असहयोग की वकालत कर रहे थे, जबकि साथ ही साथ इसमें पंजाब का मुद्दा भी शामिल था। (मजूमदार, उक्त, पृ.9) असहयोग के संकल्प पर मुस्लिम वोट की संख्या पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए। ऐसा कहा जाता है कि वोटों के लिए बड़ी संख्या में कलकत्ता के टैक्सी ड्राइवरों को चोरीछुपे लाया गया। उस सत्र में 5,000 से अधिक प्रतिनिधि थे, हालांकि जिनमें से आधे ने मतदान नहीं किया था। असहयोग पर प्रस्ताव, 804 वोट के विरुद्ध 1,826 वोट से पारित हो गया। (खिलाफत मूवमेंट इन इंडिया : 1919-1924, ए.सी. नीमायर, मार्टिनस निजॉफ, 1972, पृ.109)

अप्रैल, 1920 में सेंट्रल खिलाफत कमेटी द्वारा लाये गए असहयोग प्रस्तावों की तुलना (जो कि गांधीजी द्वारा तैयार किए गए थे) यदि सितंबर,1920 में कांग्रेस के विशेष सत्र द्वारा अनुमोदित प्रस्ताव से करें, तो पता चलता है कि खिलाफतवादी, कांग्रेस से कहीं आगे जाने के लिए तैयार थे। और लगभग एक साल बाद, जब असहयोग आंदोलन मुसलमानों की शिकायतों का निवारण करने में विफल रहा, गांधीजी ने लिखा, ‘अपने धैर्यपूर्ण गुस्से के कारण मुसलमानों ने कांग्रेस और खिलाफत संगठनों से अधिक जोरदार और तत्काल कदम उठाने की मांग करनी शुरू कर दी। मुसलमानों के लिए स्वराज का अर्थ है, और होना भी चाहिए, खिलाफत के सवाल को सफलतापूर्वक हल करने में हिंदुस्थान की योग्यता। इसलिए यदि स्वराज प्राप्ति का मतलब ऐसे कार्यक्रम में अनिश्चित विलम्ब होना है, जिसमें उन्हें यूरोपीय समुद्रों में नपुंसकों की तरह तुर्की का विनाश देखना पड़े, तो मुसलमान प्रतीक्षा करना अस्वीकार करते हैं। इस दृष्टिकोण से सहानुभूति न रखना असंभव है। यदि मुझे कोई प्रभावकारी तरीका समझ में आता तो मैं अविलम्ब प्रसन्नतापूर्वक उसका अनुमोदन कर देता। यदि स्वराज की गतिविधियों को मुल्तवी करने से हम खिलाफत के उद्देश्य की प्राप्ति की दिशा में आगे बढ़ सके तो मैं खुशी से ऐसा करने को तैयार हूं। इस कारण करोड़ों मुसलमानों को जो पीड़ा हो रही है, उसे शांत करने के लिए यदि मुझे असहयोग के बाहर भी कोई मार्ग सूझेंगे तो मैं बड़ी खुशी से उन्हें अपना लूंगा।’’ (मजूमदार, उक्त, पृ.96)

कट्टर इस्लामी शिकंजा 
सेंट्रल खिलाफत कमेटी ने अपनी प्रचार समिति द्वारा प्रशिक्षित वेतनभोगी व्याख्याताओं को नियुक्त किया, साथ ही, प्रचार-प्रसार करने के लिए गुप्त कार्यकर्ताओं और दूतों को नियुक्त किया। हर शाम, मुस्लिम कार्यकर्ताओं ने बड़े शहरों की गलियों में ड्रिल और परेड की। खाकी कपड़ों में चाकू और भाले से लैस खिलाफत कार्यकर्ताओं ने खिलाफत की मांगों के समर्थन में राजनीतिक बैठकें कीं और असहयोग ने हिंसा का समर्थन करने वाले आन्दोलन का रूप धारण कर लिया। ‘इस्लाम खतरे में’ या ‘क्रिश्चियन ताकतों का छल’ जैसे अपने पुराने विषय का उपयोग कर, पैम्फलेट्स, कविताओं और वाद-विवाद के द्वारा लोगों की भावनाओं को भड़काया गया। धनराशि की मांग के लिए प्रत्यक्ष अपील के अलावा, सेंट्रल खिलाफत कमेटी ने ‘कागजी मुद्रा’ जारी की, जो एक रुपये की रसीदों के रूप में थीं, जो आकार-प्रकार में एक-एक रुपये के नोट से मिलती-जुलती थी, लेकिन इसमें उर्दू में कुरान के उद्धरण छपे थे।

सेंट्रल खिलाफत कमेटी ने अपनी प्रचार समिति द्वारा प्रशिक्षित वेतनभोगी व्याख्याताओं, गुप्त कार्यकर्ताओं और दूतों को नियुक्त किया। मुस्लिम कार्यकर्ताओं ने बड़े शहरों में ड्रिल परेड की। खाकी कपड़ों में चाकू -भाले से लैस कार्यकर्ताओं ने खिलाफत के समर्थन में राजनीतिक बैठकें कीं , इसने हिंसा का समर्थन करने वाले आन्दोलन का रूप धारण कर लिया



उलेमा ने पंथनिरपेक्षता के खिलाफ असहयोग का इस्तेमाल करने की भी इच्छा व्यक्त की; जिसमें विधायी निकायों को उलेमाओं की समिति द्वारा, ‘विधर्मी’ न्यायालयों को शरिया अदालतों और सरकारी स्कूलों को दारुल उलूम द्वारा प्रतिस्थापित किया जाना था। जमीयत-उल-उलमा-ए-हिंद ने कुरान और पैगंबर के कथनों पर आधारित एक मुत्तफिक (सामूहिक) फतवा जारी किया जो असहयोग आंदोलन की मांगों का मद-दर-मद समर्थन करता था। (कुरैशी, उक्त, पृ.160-177;  यह भी देखें, खिलाफत मूवमेंट: रिलीजियस सिम्बोलिज्म एंड पोलिटिकल मोबिलाइजेशन इन इंडिया, गेल मिनॉल्ट, आॅक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1982, पृ. 146) मार्च 1921 को जमीयत-उल-उलेमा ने बरेली में यह निर्धारित किया कि असहयोग के विरोधियों को मजहबी न्यायाधिकरणों के माध्यम से दंडित किया जाए। (कुरैशी, उक्त, पृ. 191) खिलाफतवादियों ने कांग्रेस की विशाल मशीनरी और उसके सभी फंडों पर कब्जा कर लिया, जिसमें तिलक स्वराज फंड भी शामिल था, जिसमें कुल मिलाकर एक करोड़ पांच लाख रुपए थे। (कुरैशी, उक्त, 178; मिनॉल्ट, उक्त, पृष्ठ 126, 132) खिलाफत फंड के ब्योरों और आॅडिट की मांग मार्च 1920 से बढ़ रही थी, लेकिन जुलाई 1920 तक कुछ भी नहीं हुआ। कई लोग यूरोप में खिलाफत प्रतिनिधिमंडल के भव्य खर्च से हैरान थे। (मिनॉल्ट, उक्त, पृ.137)

अमीर को आमंत्रण
1921 की गर्मियों में खिलाफत के कुछ नेताओं के भाषणों का स्वर पहले की तुलना में अधिक हिंसक हो गया। मुत्तफिक फतवे की प्रतियां, जिसमें सेना की सेवा को हराम घोषित किया गया था, फरवरी से मई 1921 तक गुप्त रूप से वितरित की गई थीं। इस प्रतिबंधित फतवे को भारतीय सेना की कई इकाइयों के बीच पर्चे के रूप में वितरित किया गया। सैनिकों को रिश्वत देने के लिए खिलाफत फंड में से बड़ी धनराशि का उपयोग किया जा रहा था। (कुरैशी, उक्त, पृ.205) 1920-21 में अफगानिस्तान के अमीर को भारत पर आक्रमण करने के लिए आमंत्रित करने की साजिश रची गई थी। 18 अप्रैल,1921 को मुहम्मद अली ने मद्रास में ‘भारत पर अफगान आक्रमण की स्थिति में भारतीय मुसलमानों के कर्तव्यों’ के विषय पर भाषण दिया। उन्होंने कहा कि अगर अमीर ने भारत को अधीन बनाने के लिए आक्रमण किया तो मुस्लिमों को इस हमले का विरोध करना चाहिए। लेकिन अगर उसका उद्देश्य  इस्लाम और खलीफा के उत्पीड़कों को हराने के लिए था, तो यह भारतीय मुस्लिमों का कर्तव्य होगा कि वे भारत सरकार से सभी सहयोग वापस ले लें, यहां तक कि अफगानों के साथ मिलकर इस्लाम की लड़ाई लड़ें। इस विचार के कारण हिंदुओं में बेचैनी बढ़ गई। गांधीजी ने यंग इंडिया में लिखा,‘‘मैं एक तरह से अफगानिस्तान के अमीर की मदद जरूर करूंगा, अगर उन्होंने ब्रिटिश सरकार के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया, मैं खुलकर अपने देशवासियों से कहूंगा; कि एक ऐसी सरकार की सहायता करना अपराध होगा, जिसने सत्ता में बने रहने हेतु राष्ट्र का विश्वास खो दिया है।’’ (नीमायर, उक्त, पृ. 129-130)

उ.प्र. के गवर्नर बटलर ने वायसराय लॉर्ड रीडिंग को दिए एक नोट (12 जनवरी 1922) में यह निष्कर्ष निकाला था कि ‘इसमें कोई शक नहीं है कि मुस्लमान उपद्रवी तत्व हत्या और किसी भी तरह की हिंसा के लिए तत्पर हैं।’ कई स्थानों पर अवज्ञा की भावना भीड़ और पुलिस के बीच मुठभेड़ में परिवर्तित हो गई, विशेष रूप से उ.प्र. और बंगाल में। (कुरैशी, उक्त, पृ.221)। मुस्लिम रक्त-पिपासा के बारे में बटलर के शब्द भविष्यवाणी साबित हुए!

चौरीचौरा नरसंहार
4 फरवरी, 1922 को गोरखपुर जिले के चौरीचौरा थाने पर 3000-5000 प्रदर्शनकारियों की भीड़ ने चढ़ाई कर दी। इस मुठभेड़ में भीड़ ने पुलिस पर पथराव किया जिसके जवाब में पुलिस ने पहले हवा में और फिर भीड़ पर गोलियां चलाईं। जब भीड़ को पता चला कि पुलिस के पास गोला-बारूद की कमी है, तो उसने पुलिस को भागने पर मजबूर कर दिया। इनमें से कुछ बाहर खेतों में भाग गए जबकि कुछ ने थाने की इमारत में शरण ली। भीड़ ने थाना भवन में आग लगा दी, जिसमें सभी 21 पुलिस वाले और चौकीदार मारे गए। सब-इंस्पेक्टर के एक नौकर, जो एक छोटा लड़का था, की भी हत्या कर दी गई। ज्यादातर पुलिसकर्मियों को लाठी-डंडों और ईंट-पत्थरों से पीट-पीटकर मार डाला गया और कई शवों पर भालों के निशान भी थे। गांधीजी ने सार्वजनिक रूप से इस हिंसा पर पश्चाताप किया और अपने आंदोलन को अचानक बंद कर दिया। (कुरैशी, उक्त, पृ. 223) सबाल्टर्न इतिहास की आड़ में, चौरीचौरा की घटना को किसानों के प्रकोप के रूप में चित्रित करने का प्रयास किया जा रहा है। इसके लिए शाहिद अमीन द्वारा लिखित इवेंट, मेटाफोर, मेमोरी: चौरी चौरा, 1922-1992 (आॅक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1995) का अध्ययन करने की आवश्यकता है। चौरी चौरा आगजनी करने वालों की मजहबी प्रेरणाएं बढ़ा-चढ़ा कर दिखाई गई हैं। लेकिन इसी किताब से उद्धृत तथ्य तो झूठ नहीं बोल सकते। 1921-22 की सर्दियों में, खिलाफत और कांग्रेस स्वयंसेवी संगठनों को एक समग्र नेशनल वॉलंटियर कोर में मिला दिया गया था। 1921 के मध्य में, चौरीचौरा थाने के एक मील पश्चिम में एक गांव छोटकी डुमरी में ऐसे वॉलंटियरों की एक ग्राम इकाई (मंडल) स्थापित की गई थी। चौरा के एक व्यक्ति लाल मोहम्मद साई ने गोरखपुर जिला कांग्रेस और खिलाफत समितियों के एक पदाधिकारी को इस ग्राम की इकाई की स्थापना के लिए आमंत्रित किया था। खिलाफत के प्रमुख मौलवी सुभानुल्लाह ही जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष भी थे। (अमीन, उक्त, पृ.14-16)

वह शनिवार का दिन था जब खाल और चमड़े  के लिए विशेष हाट भोपा में लगा हुआ था, जो रेल गोदाम के नजदीक था। भोपा में आस-पास के गांवों के अधिकांश मुस्लिम किसान इस चमड़े की हाट में आते थे। भोपा के मुस्लिम प्रभुत्व को एक मस्जिद द्वारा समझा जा सकता था, जो बाजार के सामने ही थी। अधिकांश हिंदू शनिवार को भोपा से दूर रहते थे, खालों की बदबू इस व्यापार से जुड़े किसी प्रतिबद्ध व्यापारी को छोड़कर, अन्य किसी को यहां से दूर रखने के लिए पर्याप्त थी। (अमीन, उक्त, पृ. 24-25) मेवा लाल (जिसने अपने पिता से यह वृत्तान्त सुना था) ने बताया, ‘‘वहां कहा जा रहा था, तुम क्या मारोगे, हम मारेंगे’। उसके अनुसार 'थाना जलाने में मदनपुर के पठानों का हाथ था, वे सब व्यापारी थे। (अमीन, उक्त, पृ.231) हमलावरों की मजहबी संरचना और प्रेरणाओं को वफादारी से छुपा कर रखा गया है। इन भयावह वर्षों में जोर-जबरदस्ती और नरसंहार का प्रतिनिधित्व करने वाली दो घटनाएं सामने आई। अफगानिस्तान के लिए एक हिजरत (सामूहिक मुस्लिम उत्प्रवास) के रूप में दबाव था; तो नरसंहार ने बर्बर मोपला जिहाद का रूप ले लिया।
 (लेखक ने इस्लाम, ईसाई मत, समकालीन बौद्ध-मुस्लिम संबंध, शुद्धि आंदोलन और पांथिक जनसांख्यिकी पर पुस्तकें लिखी हैं)