कामरेड को कानूनगो पर गुस्सा क्यों आता है?

    दिनांक 23-सितंबर-2020   
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राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग और उसके अध्यक्ष प्रियंक कानूनगो की सक्रियता से बौखलाए वामपंथी-कट्टरवादी

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 प्रियंक कानूनगो

कुछ समय पहले तक देश में राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) का नाम शायद कुछ ही लोगों ने सुना होगा, लेकिन पिछले एक महीने से यह आयोग सुर्खियों में है। आखिर ऐसा क्या हो गया कि एनसीपीसीआर और इसके अध्यक्ष प्रियंक कानूनगो के खिलाफ अचानक लाखों ट्विट आने लगे हैं? दरअसल, पिछले करीब दो साल में एनसीपीसीआर ने कई ऐसे मामलों को पकड़ा है, जिनको सामने लाने की हिम्मत पहले कभी किसी ने नहीं की।

ताजा मामला ‘एल्ट न्यूज’ और जुबैर नाम के व्यक्ति का है, जिसको वामपंथी धड़ा ‘तथ्य परखने’ वाला बताता है। जुबैर और उसके समर्थक इस साइट के जरिए केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बारे में कथित तथ्य खोजते रहते हैं। इसी से पता चलता है कि इनके तथ्य किस प्रकार के होते हैं।

दरअसल, पिछले दिनों छत्तीसगढ़ के एक व्यक्ति की जुबैर के साथ ट्विटर पर कुछ बातों को लेकर कहासुनी हो गई। इससे नाराज होकर जुबैर ने उस व्यक्ति और उसकी बच्ची का फोटो ट्विटर पर डाल दिया। इसके बाद जुबैर के ट्विटर समर्थकों ने बच्ची को बलात्कार तक की धमकी दे डाली। इससे परेशान होकर उस व्यक्ति ने एनसीपीसीआर को ईमेल से एक शिकायत भेजी, जिसमें बच्ची को लेकर आ रहे धमकी भरे ट्विट्स का जिक्र था। इस पर संज्ञान लेते हुए प्रियंक कानूनगो ने इस मामले में स्थानीय पुलिस को कार्रवाई करने के लिए कहा। ट्विटर पर बच्ची की फोटो डालने के कारण मामला आईटी एक्ट की धारा 67 और आईपीसी की धारा  509 के उल्लंघन का बन गया था।

बच्ची को बलात्कार की धमकी देने से पोस्को एक्ट भी लागू हो गया। पोस्को एक्ट का सेक्शन 19 कहता है कि किसी बच्चे के साथ कोई लैंगिक अपराध हुआ है या होने की संभावना है, तो इस बारे में पुलिस को बताना ही पड़ेगा। जो पुलिस को नहीं बताएगा, वह धारा 21 पोस्को एक्ट में आरोपी हो जाएगा। इसलिए प्रियंक ने वह शिकायत पुलिस को कार्रवाई के लिए भेज दी। मामला गंभीर था लिहाजा पुलिस ने भी इस पर एफआईआर करके जांच शुरू कर दी। बस, यहीं से जुबैर और उसका पूरा गिरोह प्रियंक के खिलाफ हो गया। पहले तो जुबैर के पक्ष में और प्रियंक के खिलाफ लाखों ट्विट्स किए गए। खास बात यह है कि इनमें से आधे खाड़ी देशों से आए थे। इसके बाद भी आयोग इस मामले पर झुकने को तैयार नहीं हुआ तो प्रियंक और आयोग को दबाव में लाने के लिए दिल्ली उच्च न्यायालय में एक मानहानि का मुकदमा डाल दिया गया। खास बात यह है कि जिस मामले की पुलिस अभी जांच कर रही है, उस पर न्यायालय ने 50,00000 रु. की मानहानि का मुकदमा भी स्वीकार कर लिया।

हालांकि दूसरी बड़ी बात यह है कि इस मानहानि का मुकदमा वकील कोलिन गोंसालविस लड़ रहे हैं। इनका संबंध चर्च से है। यही कोलिन शाहीन बाग मामले में भी प्रदर्शनकारियों के वकील हैं। दरअसल, कोलिन इस मुकदमे को क्यों लड़ रहे हैं, इसका भी एक कारण है। उल्लेखनीय है कि वे चर्च से जुड़े हैं और चर्च को विदेश से सेवा कार्यों के नाम पर पैसा मिलता है, लेकिन आयोग ने ऐसे चर्चों की पोल खोलता रहा है। इसलिए कोलिन गिरोह आयोग और उसके अध्यक्ष के विरुद्ध कोई भी मामला अपने हाथ से जाने नहीं देता है। जब से प्रियंक आयोग के अध्यक्ष बने हैं तब से मिशनरीज आफ चैरिटी, डॉन बास्को जैसे संगठनों की पोल खुल रही है। मिशनरी आफ चैरिटी बच्चों को बेचने का धंधा करती है।

यह मामला सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंच गया है। एक और बड़ा मुद्दा है, जिसमें प्रियंक और बाल आयोग ने जो काम किया है, वह कई ईसाई संस्थाओं को सुहा नहीं रहा है। दरअसल, चिल्ड्रन होम्स में बच्चों को बाइबल पढ़ाई जाती है, जो कि कानून का सीधे तौर पर उल्लंघन था। इस मामले की जांच आयोग ने की और सरकारी रिपोर्ट में पहली बार आयोग ने लिखा कि जांच के दौरान हमने पाया कि कुछ होम्स में बाइबल पढ़ाई जा रही थी। यह सीधे-सीधे बच्चों के कन्वर्जन का मामला था। लिहाजा बाल आयोग और इसके अध्यक्ष का निशाने पर आना स्वाभाविक है।

यह मामला गंभीर है। उम्मीद है कि न्यायालय इंसाफ करेगा और जिहादी तत्वों पर लगाम लगाने का रास्ता साफ होगा।