योगी सरकार : तीन साल में तीन लाख हुई नियुक्तियां

    दिनांक 24-सितंबर-2020   
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तीन वर्ष में योगी सरकार ने 3 लाख से अधिक नियुक्तियां करके रिकार्ड कायम किया है. औसतन एक लाख से अधिक नियुक्तियां प्रति वर्ष की गई हैं.पारदर्शिता और ईमानदारी के कारण यह सब कुछ संभव हो पाया

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उल्लेखनीय है कि सपा सरकार में नियुक्ति करने वाले आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों की ही नियुक्तियां विवादित रहीं. इनमें से कुछ को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बर्खास्त कर दिया और कुछ के कार्य करने पर रोक लगा दिया था. यही वजह थी की सपा सरकार में नियुक्ति करने वाले आयोग चयन प्रक्रिया पर ध्यान देने के बजाय मुकदमेबाजी में ही उलझे रहे.
पिछली सपा सरकार में पी.सी.एस.प्री का प्रश्न पत्र लीक हुआ. लोक सेवा आयोग की साख पर बट्टा लगा. उस दौरान की गई नियुक्तियों की आज भी सीबीआइ जांच चल रही है. तत्कालीन लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष को इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्णय के बाद पद छोड़ना पड़ा था. सपा सरकार में उप – निरीक्षक और सिपाही दोनों भर्तियों में पद विज्ञापित होने के बाद नियमों में परिवर्तन किया गया था. इलाहाबाद हाईकोर्ट से चयन प्रक्रिया पर रोक लगाई गई थी. सपा सरकार में माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन बोर्ड के अध्यक्ष की नियुक्ति की गई थी. सरकार ने उन्हें बर्खास्त कर दिया. दूसरे अध्यक्ष को भी कुछ महीने बाद सरकार ने बर्खास्त कर दिया. इसके बाद बोर्ड के तीसरे अध्यक्ष को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बर्खास्त कर दिया. इस बोर्ड के अयोग्य सदस्यों के काम-काज पर इलाहाबाद हाईकोर्ट को रोक लगानी पड़ी. करीब चार वर्ष इसी में नष्ट हो गए. उच्चतर शिक्षा सेवा आयोग के अध्यक्ष और दो सदस्यों को हाईकोर्ट ने अयोग्य घोषित कर दिया जिसकी वजह से आयोग में नियुक्ति प्रक्रिया लटकी रही.
योगी आदित्यनाथ की सरकार ने विगत तीन वर्षों में 3 लाख 526 नौकरियां दी हैं. इसके अतिरिक्त वर्तमान समय में 85 हजार 629 पदों पर नियुक्ति की प्रक्रिया चल रही है. दोनों को जोड़ दिया जाए तो 3,86,155 नियुक्तियां हो जाती हैं. जबकि पिछली सपा सरकार ने 2 लाख 5 हजार नियुक्तियां की थीं. बसपा के शासन काल की बात करें तो 91 हजार बेरोजगार युवकों को नियुक्तियां दी गई थीं. कार्मिक विभाग के आंकड़ों के अनुसार अभी तक योगी सरकार ने प्रति वर्ष एक लाख बरोजगार युवकों को नौकरियां दी हैं. उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग ने मात्र तीन वर्ष में 26,103 पदों पर अभ्यर्थियों का चयन किया है. पिछली सपा सरकार में लोक सेवा आयोग की नियुक्तियां विवादों में घिरी हुई थीं. लोक सेवा आयोग के उस समय के अध्यक्ष अनिल यादव को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बर्खास्त कर दिया था. सपा शासनकाल में 26 हजार अभ्यर्थियों का चयन हुआ था मगर इनमें से बहुत सी नियुक्तियों की सीबीआई जांच चल रही है. योगी सरकार में 141 उप जिलाधिकारी , 184 पुलिस उपाधीक्षक, 4,108 एलोपैथिक डाक्टर, 773 होम्योपैथ डाक्टर, 969 आयुर्वेदिक चिकित्सक एवं 535 डेंटल सर्जन नियुक्त किये गए. 610 न्यायिक मजिस्ट्रेट चयनित किये गए. लोक सेवा आयोग के आकंड़ों के अनुसार 6,566 अधिकारियों को पदोन्नति दी गई जबकि पिछली सरकार में 1,588 अधिकारियों को प्रोन्नत किया गया था.
वर्ष 2012 की चुनावी सभाओं में अखिलेश यादव के यह घोषणा करते ही कि शिक्षित बेरोजगार युवकों को भत्ता मिलेगा. इस कदर भीड़ उमड़ी कि प्रदेश के कई जनपदों में भीड़ पर काबू पाने के लिए पुलिस को लाठी चार्ज तक करना पडा. प्रदेश के बेरोजगार युवकों का अखिलेश यादव ने विश्वास जीत लिया था. युवाओं को विश्वास हो गया था कि सपा की सरकार आने पर शिक्षित बेरोजगार युवकों को रोजगार मिलेगा , जिसे रोजगार नहीं मिलेगा उसे भत्ता मिलेगा.युवा, अखिलेश की हर जन सभा में खूब उमड़े थे और और वोट भी दिया था. चुनाव बाद सपा को प्रचंड बहुमत मिला और अखिलेश यादव मुख्यमंत्री बने. सरकार बनते ही सपा सरकार की कार्य प्रणाली कुछ ऐसी रही कि लगातार रिक्त पद विज्ञापित हुए मगर नियुक्तियों का विवाद अदालती लड़ाई में उलझ कर रह गया.
बसपा के शासन काल , वर्ष 2011 में दरोगा भर्ती विज्ञापित हुई थी. उसकी नियुक्ति प्रक्रिया चल रही थी. उसमें अभ्यर्थियों के लिए 10 किलोमीटर की दौड़ का नियम तय किया गया था. जैसे ही वर्ष 2012 में सपा की सरकार आई तब दरोगा भर्ती के नियमों में परिवर्तन कर दिया गया. बदले हुए नियम के अनुसार पुरुष अभ्यर्थियों के लिए 35 मिनट में 4.8 किलोमीटर और महिला अभ्यर्थियों के लिए 20 मिनट में 2.4 किलोमीटर की दौड़ का मानक तय किया गया था. इसके पहले पुरुष अभ्यर्थियों के लिए 60 मिनट में 10 किलोमीटर और महिला अभ्यर्थियों के लिए 35 मिनट में 4.8 किलोमीटर का मानक तय किया गया था. प्रदेश सरकार के इस नए नोटिफिकेशन को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी गई. याचिका में आरोप लगाया गया कि पुराने नियम के हिसाब से कई अभ्यर्थी दौड़ पूरी कर चुके थे और इस तरीके से भर्ती प्रक्रिया के बीच में बदलाव किया जाना विधि विरूद्ध है. नए नोटिफिकेशन पर हाईकोर्ट ने रोक लगा दी. सितम्बर 2013 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने निर्णय दिया कि जिस तरह खेल के नैसर्गिक सिद्धांत के अंतर्गत खेल शुरू होने के बाद खेल के नियम में परिवर्तन नहीं किया जा सकता है. ठीक उसी तरह से दरोगा भर्ती की दौड़ की परीक्षा शुरू हो जाने के बाद उसमें किया गया परिवर्तन गैर कानूनी है.
सपा शासन काल में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 34 हजार कांस्टेबलों की चयन प्रक्रिया के परिणाम घोषित करने पर रोक लगा दिया था. सिपाही भर्ती की परीक्षा में लिखित और शारीरिक परीक्षा कराई जाती थी. मगर उस समय प्रदेश सरकार ने केवल शारीरिक परीक्षा के आधार पर पुलिस सिपाही भर्ती करने का निर्णय लिया और इस सिपाही भर्ती में भी नियमों में परिवर्तन पद विज्ञापित होने के बाद किया गया था.
उतर प्रदेश का लोक सेवा आयोग, जहां से प्रदेश के लिए डिप्टी एस.पी. और एस. डी. एम. जैसे महत्वपूर्ण अधिकारी का चयन होता है. सपा शासनकाल में चयन प्रक्रिया इस कदर विवादित रही कि छात्र सड़कों पर उतर आये थे. सपा सरकार बनने के बाद डॉ. अनिल यादव , उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष नियुक्त किये गए थे. डॉ. अनिल यादव ने लोक सेवा आयोग की नौकरियों में त्रि स्तरीय आरक्षण व्यवस्था लागू कर
दिया जिसके बाद प्री , मेंस और इंटरव्यू तीनों में आरक्षण दिए जाने का प्रावधान था. इस त्रि स्तरीय आरक्षण व्यवस्था के खिलाफ पूरे प्रदेश के छात्रों ने आन्दोलन किया था. आन्दोलन के चलते कई दिनों तक प्रयागराज और उसके आसपास के जनपदों में कानून व्यवस्था बे- पटरी हो गई थी. हाईकोर्ट ने त्रि स्तरीय आरक्षण व्यवस्था पर रोक लगा दिया. इसी बीच मुलायम सिंह यादव ने इस मामले में दखल दिया और लोक सेवा आयोग के त्रि स्तरीय आरक्षण व्यवस्था को रद्द करवा दिया.
इसके बाद, 29 मार्च 2015 को पी. सी. एस. प्री की परीक्षा आयोजित कराई जा रही थी. शाम को दूसरी पाली की परीक्षा होनी थी.
पहली पाली का पर्चा लीक हो गया. पहले तो लोक सेवा आयोग यह मानने को तैयार ही नहीं हुआ कि पर्चा लीक भी हुआ है. अगले दिन 30 मार्च 2015 को देर शाम तक आयोग में बैठक चली. बैठक के बाद आयोग ने यह माना कि पर्चा लीक हुआ था और तब पहली पाली की परीक्षा निरस्त की गई . उधर प्रतियोगी छात्र संघर्ष समिति मांग करने लगी कि हजारों अभ्यर्थियों ने दूसरी पाली की परीक्षा छोड़ दिया था इसलिए दूसरी पाली की परीक्षा भी निरस्त की जाय. मगर आयोग ने दूसरी पाली की परीक्षा नहीं निरस्त किया जिसके चलते सड़क पर छात्रों का उग्र आन्दोलन हुआ. त्रि स्तरीय आरक्षण और फिर पी.सी.एस. पेपर लीक मामले के बाद डॉ. अनिल यादव काफी विवादित हो चुके थे. यह भी आरोप लगा था कि डॉ. अनिल यादव के गृह जनपद आगरा में उनका आपराधिक इतिहास है और इनकी नियुक्ति राजनितिक प्रभाव के चलते हुई थी. इलाहाबाद हाईकोर्ट के सामने वह कागज़ भी पेश हुआ था जिसमें सभी आवेदकों ने अध्यक्ष पद के लिए आवेदन अपने घर से भेजा था मगर डॉ. अनिल यादव का आवेदन समाजवादी पार्टी के केन्द्रीय कार्यालय से कार्मिक विभाग को फैक्स किया गया था. उनकी नियुक्ति की प्रक्रिया और उनके आपराधिक इतिहास को लेकर प्रतियोगी छात्र संघर्ष समिति ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में जन हित याचिका दायर किया था. हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि डॉ. अनिल यादव की नियुक्ति के समय उनका आपराधिक रिकार्ड छिपाया गया था और चयन प्रक्रिया पारदर्शी नहीं थी. इसके बाद डॉ. अनिल यादव को अध्यक्ष का पद छोड़ना पड़ा था.
उस समय जन सूचना अधिकार अधिनियम के अंतर्गत मांगे गए जवाब में लोक सेवा आयोग ने उत्तर दिया था कि आयोग द्वारा की गई भर्तियों के सम्बन्ध में इलाहाबाद हाईकोर्ट में उस समय 406 याचिकाएं दाखिल की गई थीं. इसमें जन हित याचिकाओं को नहीं जोड़ा गया था. जन सूचना अधिकार में मांगी गई जानकारी के क्रम में आयोग ने यह भी बताया था कि नियुक्ति संबंधी जो विवाद हाईकोर्ट में चल रहे थे. उन मुकदमों की पैरवी के लिए आयोग को वर्ष 2013 - 14 में 29 लाख 98 हजार रुपये खर्च करने पड़े थे. वित्तीय वर्ष 2014 - 15 में 46 लाख 96 हजार रुपये आयोग को कानूनी पैरवी के लिए भुगतान करना पड़ा था. इसी प्रकार वर्ष 2015 - 16 में आयोग को 33 लाख 69 हजार रुपये खर्च करने पड़े थे. इस तरह से तीन वर्षों में लोक सेवा आयोग ने केवल मुकदमेबाजी के चक्कर में एक करोड़ से अधिक धनराशि खर्च किया था.
माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन बोर्ड में चार वर्ष तक लटकी रही थीं भर्ती प्रक्रिया
माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन बोर्ड में अध्यक्ष और सदस्यों का मामला कुछ इस कदर विवादित रहा कि सपा शासनकाल में भर्ती प्रक्रिया शुरू नहीं की जा सकी. सपा सरकार बनने के बाद डॉ. धनंजय गुप्ता को कार्यवाहक अध्यक्ष बनाया गया था. गुप्ता पहले बोर्ड में सदस्य के पद पर थे. वर्ष 2013 में डॉ. देवकी नन्दन शर्मा को माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन बोर्ड का अध्यक्ष नियुक्त किया गया. डॉ. देवकी नंदन शर्मा का करीब 11 महीने का कार्यकाल ठीक ठाक चल रहा था मगर इसी दौरान उन्हें कैंसर हो गया और जिसके बाद उन्होंने यह पद छोड़ दिया. बोर्ड के ही सदस्य डॉ. आशा राम को बोर्ड का अध्यक्ष नियुक्त किया गया. डॉ. आशा राम के कार्यकाल में विवादों की शुरुआत हुई. डॉ आशाराम ने जो वेतन आहरित किया था. उसमें भी विवाद हुआ और उसकी शिकायत शासन तक हुई. डॉ. आशा राम का बोर्ड के सचिव से भी विवाद हुआ. उसके बाद उन्होंने सचिव के कमरे में ताला बंद करा दिया. अध्यक्ष और सचिव का विवाद भी शासन के संज्ञान में पहुंचा. वर्ष 2013 में प्रधानाचार्यो के पद के लिए लिखित परीक्षा कराई गई थी, उसका इंटरव्यू होना था. डॉ. आशा राम पर आरोप यह भी लगा था कि उन्होंने उन प्रधानाचार्य पद के अभ्यर्थियों को बिना काल लेटर भेजे इंटरव्यू शुरू करा दिया था. कुछ अभ्यर्थियों का इंटरव्यू हो भी गया था मगर यह बात लोगों की जानकारी में आ गई जिसके बाद काफी विवाद हुआ . इस विवाद के चलते डॉ. आशा राम को अध्यक्ष पद से हटा दिया गया था. वर्ष 2014 से वर्ष 2015 के बीच बोर्ड में अध्यक्ष का पद रिक्त था
इसलिए इस सत्र को ही शून्य कर दिया गया था. उस दौरान कोई पद नहीं विज्ञापित किया गया था. इस तरह से करीब डेढ़ वर्ष तक बोर्ड में कोई भी चयन प्रक्रिया नहीं हुई. उसके बाद डॉ. परशुराम पाल को अध्यक्ष नियुक्त किया गया था. डॉ. पाल ने काम काज कुछ आगे बढ़ाया था मगर कुछ ही महीनों के कार्यकाल के बाद डॉ. परशुराम पाल को अचानक हटा दिया गया. डॉ. पाल पर यह आरोप लगा था कि बसपा की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती की एक जनसभा में डॉ. परशुराम पाल की होर्डिंग लगी हुई थी. किसी ने उस होर्डिंग की फोटो खींच कर समाजवादी पार्टी के प्रमुख नेताओं के यहां पहुंचा दिया था.
इसके बाद बोर्ड की सदस्य अनीता यादव को अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी सौंपी गई. अनीता यादव के कुछ महीनों के कार्यकाल के बाद सनिल कुमार को बोर्ड का अध्यक्ष नियुक्त किया गया. इनकी नियुक्ति को लेकर भी इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई. मामला विवादित होने के बाद सनिल कुमार भी अध्यक्ष पद से बर्खास्त किये गए .
इसी बीच इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक याचिका और दायर हुई जिसमें यह आरोप लगाया गया कि बोर्ड में जो भी सदस्य हैं. वो इतनी योग्यता नहीं रखते कि प्रधानाचार्य पद के अभ्यर्थियों का इंटरव्यू ले सकें. प्रधानाचार्य पद के अभ्यर्थी का इंटरव्यू जिन सदस्यों द्वारा लिया जा रहा था. दो सदस्य ऐसे थे जो सदस्य बनने के पहले इंटर कालेज के एल. टी. ग्रेड के टीचर थे और हाई स्कूल के छात्र - छात्राओं को ही पढ़ा सकने के लिए अधिकृत थे. बोर्ड की सदस्य आशालता सिंह, इंटर कालेज की अध्यापक थीं. एक अन्य सदस्य ललित श्रीवास्तव भी हाई स्कूल के विद्यार्थियों को पढ़ाने के लिए अध्यापक पद पर नियुक्त थे और उसके पहले वो बाबू के पद भी रह चुके थे. इन लोगों को सपा सरकार ने बोर्ड का सदस्य बना दिया था. ये लोग बकायदे इंटर कालेज के प्रवक्ता और प्रधानाचार्य पद के अभ्यर्थियों का इंटरव्यू ले रहे थे. याचिका की सुनवाई करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इन सदस्यों को प्रथम दृष्टया अयोग्य माना. इनके काम करने पर रोक लगा दिया था. इसके कुछ समय बाद याची अभिलाषा मिश्रा ने अचानक अपनी याचिका को “नाट प्रेस” कर दिया. आयोग के दोनों सदस्यों ने यह मानते हुए की कोर्ट की लगी हुई रोक हट गई. अपना काम काज शुरू कर दिया था मगर उसके बाद प्रतियोगी छात्र संघर्ष समिति ने एक नई याचिका दायर किया और इलाहाबाद हाईकोर्ट से यह गुहार लगाई कि इन दोनों सदस्यों के काम करने पर रोक लगाई जाय. हाईकोर्ट ने उस याचिका की सुनवाई करते हुए दोनों सदस्यों के काम काज पर दोबारा रोक लगाई.
माध्यमिक शिक्षा चयन बोर्ड में प्रधानाचार्य के 550 पद वर्ष 2011 में विज्ञापित हुए थे इसकी चयन प्रक्रिया को लेकर विवाद इलाहाबाद हाईकोर्ट में पहुंचा था. इसमें इंटरव्यू हो चुका था. परिणाम घोषित करने पर हाईकोर्ट से रोक लगा दी गई थी. वर्ष 2013 में करीब 900 पद विज्ञापित हुए थे. इन सब नियुक्तियों की प्रक्रिया वर्ष 2016 में शुरू हो पाई थी.
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उच्चतर शिक्षा सेवा आयोग के अध्यक्ष और सदस्य को किया था बर्खास्त
उच्चतर शिक्षा सेवा आयोग , परास्नातक और स्नातक महाविद्यालयों में प्रवक्ता और प्राचार्यों की नियुक्ति करता है. सपा के शासन काल में उच्चतर शिक्षा आयोग में अध्यक्ष के पद पर राम वीर सिंह यादव को नियुक्त किया गया. आयोग में रूदल सिंह और डॉ अनिल कुमार सिंह को सदस्य नियुक्त किया गया. इन तीन लोगों की नियुक्तियों को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी गई. अध्यक्ष और दोनों सदस्यों को अयोग्य घोषित करके पद से बर्खास्त कर दिया गया था. इसके बाद बोर्ड में केवल एक सदस्य रामेन्द्र बाबू चतुर्वेदी रह गए थे जो कोरम के अभाव में किसी भी नियुक्ति प्रक्रिया को शुरू नहीं कर पाए थे.
 
उत्तर प्रदेश उच्चतर शिक्षा सेवा आयोग आधिनियम 1980 की धारा 4. 2 ( क ) के अनुसार आयोग का सदस्य वही हो सकता है जिसमे निम्न में से कोई एक योग्यता हो 
1 – उत्तर प्रदेश न्यायिक सेवा का पूर्व या वर्तमान सदस्य , जिसने
न्यायाधीश या उसके समक्ष कोई अन्य पद धारण किया हो .
2 – भारतीय प्रशासनिक सेवा का पूर्व या वर्तमान सदस्य , जिसने राज्य
सरकार के सचिव या राज्य सरकार के अधीन उसके समकक्ष पद धारण किया हो .
3—किसी विश्वविद्यालय का वर्तमान या पूर्व कुलपति
4 -- किसी विश्वविद्यालय का वर्तमान या पूर्व प्रोफ़ेसर
5--- स्नातकोतर महाविद्यालय के प्राचार्य पद का 10 वर्ष का अनुभव रखने
वाला व्यक्ति .
6--- स्नातक महाविद्यालय के प्राचार्य पद का 15 वर्ष का अनुभव हो .
7 – वर्ष 2004 में उत्तर प्रदेश सरकार ने अर्हताओं की सूची में एक सातवां
मानक यह जोड़ दिया था कि ऐसा भी व्यक्ति आयोग का सदस्य बन सकेगा जिसने राज्य सरकार की राय में शिक्षा में बहुमूल्य योगदान दिया हो.