जूझने का नाम है जिंदगी

    दिनांक 24-सितंबर-2020
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उमेश चतुर्वेदी की फेसबुक वॉल से 
पहले अभाव था, अवसाद नहीं था, अब वैसा अभाव नहीं है, जैसा दो-तीन दशक पहले था, लेकिन अवसाद जबरदस्त है। लेकिन इसी अवसाद में आगे बढ़ना है। जिंदगी से जूझना है और अगर इस जूझन में कोई टूट रहा है तो उसे भी बचाना है।    

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कुछ साल पहले की बात है..जिस टीवी चैनल में काम कर रहा था..वहां ‘इंटर्नशिप’ करने एक लड़की आई। वह लिख भी बढ़िया लेती थी और जो काम प्रशिक्षु से आमतौर पर कराए जाते हैं, उन्हें भी कुशलता से कर देती थी। ऐसे लोगों के प्रति मेरे मन में कुछ ज्यादा ही आदर होता है, तो उसके प्रति भी हो गया था। ‘इंटर्नशिप’ के दूसरे ही हफ्ते वह ‘फेसबुक फ्रेंड’ बन गई। करीब तीन हफ्ते बाद की बात है। मेरे किसी परिचित का देहांत हुआ था, नींद उचटी हुई थी। लिहाजा फोन लेकर मैं बालकनी में जा बैठा।
अचानक एक ‘पोस्ट’ पर निगाह पड़ी। लिखा था, ‘सब कुछ खत्म हो गया।’ ‘पोस्ट’ उसी लड़की का था। दो-तीन दिन से दफ्तर नहीं आ रही थी। इसकी जानकारी उसने दे भी दी थी। ‘पोस्ट’ पढ़कर मैं आशंकित हो गया। मैंने उसे ‘मैसेज’ भेज पूछा क्या हुआ? उसने कोई जवाब नहीं दिया। दोबारा ‘मैसेज’ भेजा, तो जवाब आया, ‘‘सब कुछ खत्म और अब मैं भी जा रही हूं।’’
मेरा डरना स्वाभाविक भी था। मैंने उसे फोन लगा दिया। वह अपनी बालकनी में थी। शुक्र है उसने फोन उठा लिया। दूसरी तरफ सन्नाटा था। मैंने उससे पूछा क्या हुआ बताओ। कुछ देर में वह फूट पड़ी। पता चला कि उसके माता-पिता अलग होने का फैसला ले चुके हैं। और वह इसके बाद के हालात को सोच टूट चुकी थी। बहरहाल, मेरे फोन से उसका ध्यान बंटा, वह रोती रही।
जब लगा कि वह फिर बात सुन सकती है, मैंने उससे रसोई में जाकर एक गिलास पानी पीने को बोला। फिर मैंने उसे सुझाव दिया कि अभी जाकर सो जाए। नींद न आ रही तो कुछ सुने। जिस देवी-देवता में उसकी आस्था हो, उनका नाम ले। मैंने उसकी जमकर बड़ाई की। उसके लिखने, काम करने को याद किया। उसकी लेखन-शैली की प्रशंसा की। फिर मैंने उससे वादा लिया कि वह दोबारा आत्महत्या के बारे में नहीं सोचेगी और दफ्तर में मिलने का वादा लिया।
दो दिन बाद वह दफ्तर आई। आते ही उसने मुझसे सिर्फ तीन शब्द कहे, ‘थैंक यू सर’ और अपने काम में जुट गई। बहरहाल, वह एक अच्छे संस्थान में काम कर रही है और खुशहाल जीवन जी रही है।
यह अनुभव साझा करने का मकसद सिर्फ इतना बताना है कि जब भी लगे कि आपका कोई परिचित, साथी, दोस्त, सहकर्मी टूट रहा है, यह आभास कराने में देर न लगाएं कि आप उसके साथ हैं।
मेरे गांव में करीब एक दशक पहले एक सज्जन पारिवारिक कलह के चलते शाम की ट्रेन के सामने कूदने जा पहुंचे। उनकी गतिविधियों को संदेहास्पद किसने पाया, जिनके साथ उनकी मुकदमेबाजी चल रही थी। बहरहाल, ट्रेन आते देख वे सज्जन सक्रिय हुए और उनका दुश्मन भी। भागकर पटरियों के पास पहुंचा और उन्हें पकड़ लिया। एक जिंदगी बच गई। उसने मजाक में कहा था, ‘‘आप चले जाएंगे तो मुकदमा किससे लड़ेंगे?’’
उदारीकरण में जिंदगी लगातार दुश्वार हुई है। पहले अभाव था, अवसाद नहीं था, अब वैसा अभाव नहीं है, जैसा दो-तीन दशक पहले था, लेकिन अवसाद जबरदस्त है। लेकिन इसी अवसाद में आगे बढ़ना है। जिंदगी से जूझना है और अगर इस जूझन में कोई टूट रहा है तो उसे भी बचाना है।