विश्व पर्यटन दिवस (27 सितम्बर) पर विशेष : चलो चलें आस्था की डगर

    दिनांक 27-सितंबर-2020
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डॉ. संदीप कुलश्रेष्ठ
देशाटन, तीर्थाटन जैसे शब्द खूब प्रचलित रहे हैं हमारी सभ्यता, संस्कृति में। प्राचीन काल से ही भारतवर्ष में अपनी धरती के एक से दूसरे कोने तक जाना पुण्य कार्य माना गया है। आदिशंकराचार्य ने चार धाम की स्थापना कर देश को एक सांस्कृतिक सूत्र में पिरोया।कोरोना संक्रमण के इस दौर में विश्व पर्यटन दिवस पर, आइए चर्चा करें सांस्कृतिक पर्यटन से जुड़े स्थलों और सरकार के स्तर पर पर्यटन को बढ़ावा देने की कोशिशों की
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भारत के जन-जन की आस्था का केन्द्र है वाराणसी का गंगा तट
भारत को विश्व में सबसे पुरानी सभ्यताओं में से एक माना जाता है जिसकी अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत है। भारतीय संस्कृति में आध्यात्मिकता के साथ भौतिकता का अद्भुुत सामंजस्य देखने को मिलता है।  इसकी उदारता तथा समन्वयवादी गुणों ने अन्य संस्कृतियों को आत्मसात तो किया परंतु अपने मूल को भी संरक्षित किया। भारतीय सनातन परंपरा में यात्राओं का विस्तृत वर्णन देखने को मिलता है जिसमें एक लोक से दूसरे लोक की यात्रा; भगवान श्री राम की श्रीलंका तक वनगमन यात्रा; बुद्ध, महावीर, आदि शंकराचार्य से लेकर गुरुनानक देव सरीखे महापुरुषों ने राष्ट्र को यात्राओं के माध्यम से एक सूत्र में पिरोने का काम किया है। इतिहास साक्षी है कि नालंदा, तक्षशिला, विक्रमशिला आदि विश्वविद्यालयों ने विश्व के प्रत्येक कोने से छात्रों, शोधकर्ताओं व आचार्यों को भारत आने को प्रेरित किया। शंकराचार्य द्वारा चार धाम की स्थापना के पीछे कदाचित राष्ट्रीय एकता व संस्कृतियों के आदान-प्रदान को धर्म के साथ जोड़कर अध्यात्म के एक नए युग की शुरुआत करने का लक्ष्य भी रहा होगा। भारतीय संस्कृति अतिथि देवो भव: तथा वसुधैव कुटुंबकम् के साथ समस्त ब्रह्मांड के कल्याण में विश्वास रखती है।

सांस्कृतिक पर्यटन की ऐतिहासिकता
इस परिकल्पना के साथ हमारे यहां सांस्कृतिक विरासत व नैसर्गिक पर्यटन तेजी से उभरेगा। भारत में पर्यटन की पृष्ठभूमि ईसा पूर्व 5000 वर्ष पुरानी मानी जाती है, सनातन व वैदिक परंपराओं में उसे तीर्थाटन व देशाटन भी कहा गया है। इसका व्यवस्थित उल्लेख वेदों, उपनिषदों व अन्य धार्मिक ग्रंथों में कई प्रसंगों के माध्यम से मिलता है जिनमें भागवत्पुराण, त्रिपुरा रहस्य और अद्वैत वेदांत आदि प्रमुख हैं। महाभारत, रामचरितमानस आदि ग्रंथों में भी यातायात व संदेश वाहन के विभिन्न तरीकों का प्रामाणिक वर्णन मिलता है जहां तीर्थाटन, वन विहार, नौका विहार, पुष्पक विमान (चार्टर्ड फ्लाइट) आदि शब्द, जो कि पर्यटन एवं यात्रा से जुड़े हैं, का उल्लेख मिलता है। चार धाम, सप्तपुरी, 12 ज्योतिर्लिंग व 51 शक्तिपीठों की यात्रा भारतीय दर्शन में अपनी अहम भूमिका रखती है। कदाचित भविष्यवेत्ता के रूप में हमारे प्रधानमंत्री ने सांस्कृतिक पर्यटन को बढ़ाने की बात रखी थी व कहा कि हमें दूसरे राज्यों व दूसरे देशों के लोगों का स्वागत करना चाहिए। भारत में प्रत्येक राज्य व पंथ में अलग-अलग उत्सव आयोजित किए जाते हैं, चाहे वह होली हो, दीवाली, पिहू या पोंगल हो।

आस्था से नाता
विश्व पर्यटन संगठन के अनुसार पर्यटक भीड़-भाड़ से दूर ऐसे वैकल्पिक स्थलों की ओर जाना चाहता है जिनमें सांस्कृतिक, प्राकृतिक आकर्षण हो। वह देखना चाहता है हम्पी का विरुपाक्ष मंदिर, तंजौर का बृहदीश्वर मंदिर, कुंभकोनम का अरिवत्सवारा, केरल स्थित गुरुवायुर मंदिर और ओरछा का रामराजा मंदिर। सुदूर उत्तर-पूर्वी राज्य अपनी नैसर्गिक सुंदरता के कारण पर्यटकों को और अधिक लुभाएंगे। यहां गुवाहाटी विख्यात स्थित कामाख्या मंदिर, मणिपुर के गोविंद जी मंदिर, अरुणाचल का मलिनिथान मंदिर व त्रिपुरा स्थित त्रिपुरेश्वरी मंदिर की अपनी एक अलग ही छवि व महत्ता है।

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ओरछा में बेतवा नदी के किनारे बनीं प्राचीन छतरियां, पास ही रामराजा का भव्य मंदिर है

‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ एक ऐसा अभियान है जो कोविड-19 से पहले शुरू किया गया था और आज के चुनौतीपूर्ण परिवेश में पूरी तरह खरा उतर रहा है। एक राज्य के पर्यटकों के दूसरे राज्य में जाने से रोजगार व अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा जो आत्मनिर्भर भारत के लिए मील का पत्थर साबित होगा। इससे सामाजिक व सांस्कृतिक सद्भाव तो बढ़ेगा ही, साथ ही ‘अनेकता में एकता, भारत की विशेषता’ उक्ति भी चरितार्थ होगी।

सेवा क्षेत्र को मिलेगी पहचान
सरकार द्वारा घोषित अतिरिक्त संपाश्रविक मुक्त तरलता समर्थन प्राप्त करने के लिए देश में यात्रा पर्यटन और आतिथ्य व्यवसायों के लाभ के लिए काम करेंगे। बैंकों और एनबीएफसी के माध्यम से एमएसएमई व्यवसाय के लिए 3 लाख करोड़ रुपए की संपाश्रविक मुक्त स्वचालित ट्रेनों की घोषणा सेवा प्रदाताओं को प्रोत्साहित करने में दीर्घकालीन रूप से सहायक साबित होगी। वर्तमान में जहां कोविड-19 के कारण एकाकीपन, अवसाद, पारिवारिक व मानसिक तनाव तथा अन्य पारिवारिक समस्याएं अपने चरम पर हैं, उसे दूर करने में पर्यटन यंत्र का कार्य करेगा। वास्तव में पर्यटन का मुख्य उद्देश्य ही आनंद व चित्त को प्रसन्न रखना है। आज के समय में भौतिक प्रसन्नता व संपन्नता के स्थान पर मानसिक व भावनात्मक प्रसन्नता व संपन्नता होना अत्यंत आवश्यक है। लॉकडाउन में घर में रहते हुए भारतीयों ने इस बात को अच्छी तरह महसूस किया है। अमेरिका, इटली जैसे भौतिक रूप से संपन्न राष्ट्र इस बात को महसूस करने पर मजबूर हैं। भारतीय दर्शन एवं संस्कृति मानव को आत्मिक शांति प्रदान करती है और यही कारण है कि देश में आने वाले विदेशी वृंदावन, मथुरा, बनारस और अयोध्या की गलियों में शान्ति को खोजते हैं, तो ऋषिकेश में योग और केरल में आयुर्वेदिक पर्यटन से लाभान्वित होने के इच्छुक रहते है।

ग्रामीण पर्यटन का अवदान
27 सितंबर, 2020 का दिन विश्व पर्यटन दिवस है। भारत में 65 प्रतिशत से अधिक आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है। इस क्षेत्र के पास शहरी क्षेत्र की 35 प्रतिशत आबादी को देने के लिए बहुत कुछ है जिसमें कृषि, प्रकृति, खाद्य एवं भोजन, संस्कृति एवं साहसिक पर्यटन प्रमुख हैं। ग्रामीण समुदाय की विशिष्ट परंपराओं, रीति-रिवाजों को सहेज व संरक्षित कर आज के समयानुसार विकसित करने के साथ महिलाओं व युवाओं को रोजगार प्रदान कर आर्थिक विकास की मुख्यधारा में लाया जा सकता है। भारत के संदर्भ में ग्रामीण पर्यटन का विकास देश को एक नई राह प्रदान कर सकता है, जैसे काश्तकारी, शिल्पकारी, पच्चीकारी, बुनाई-कढ़ाई, मिट्टी व लकड़ी के खिलौने, बर्तन आदि का क्रय पर्यटकों की यात्रा को और भी यादगार बना सकता है। पर्यटक जानना चाहता है ग्रामीण गीत, संगीत, नृत्य, पाक कला, खेल व  मनोरंजन को। इस लिए वह राजस्थान के जैसलमेर एवं हिमाचल के सुदूर क्षेत्रों की सैर करना चाहता है। आवश्यकता इस बात की है कि ग्रामीणों को इन योजनाओं का सीधा लाभ मिले और उनकी भागीदारी भी सुनिश्चित की जाए। आवश्यक हो तो ग्राम पंचायतों को भी योजना निर्माण में शामिल किया जाए। गुजरात का होडका, सिक्किम का लोचन, मेघालय का मावलांग, असम का माजुली एवं राजस्थान में समौद ग्रामीण पर्यटन के सजीव उदाहरण हैं जिनकी सैर करने के बाद पर्यटक आनंदित एवं भाव विभोर हो जाता है।

संक्रमण काल है यह
विगत कुछ माह में कोरोना वायरस के कारण हुए वैश्विक परिवर्तन से पर्यटन जगत भी अछूता नहीं रहा है। पर्यटन हितधारकों ने कभी इस अभूतपूर्व स्थिति के बारे में सोचा तक नहीं था। विश्व पर्यटन संगठन के द्वारा जारी चौंकाने वाले आंकड़ों पर गौर करें तो पता चलता है कि 180 मिलियन अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों के आवागमन पर कोविड-19 का दुष्प्रभाव  पड़ा है, पर्यटन उद्योग को 195 बिलियन डॉलर के निर्यात राजस्व की हानि का सामना करना पड़ रहा है। साथ ही लगभग 120 मिलियन प्रत्यक्ष पर्यटन नौकरियों पर भी खतरा मंडरा रहा है। संभवत ऐसी विपत्ति का सामना पर्यटन जगत ने पहली बार किया है। एशिया प्रशांत क्षेत्र में तो यह स्थिति और भी भयावह है और भारत भी इससे अछूता नहीं है। 2018 के आंकड़ों के अनुसार पर्यटन का भारत के घरेलू सकल उत्पाद में योगदान 9 प्रतिशत से अधिक था लेकिन आज निराशा का वातावरण बना है।

पर्यटन समुदाय को संभवत: विश्व का सबसे बड़ा समुदाय माना जाता है जिसमें छोटे दुकानदार, शिल्पकार, कलाकार, टूरिस्ट गाइड, आॅटो रिक्शा वाले से लेकर बड़े उद्यम, जैसे नागरिक विमानन, होटल उद्योग, क्रूज कंपनियां आदि आते हैं। राष्ट्र की अर्थव्यवस्था, रोजगार, विदेशी मुद्रा विनिमय व सांस्कृतिक-सामाजिक सहिष्णुता हेतु पर्यटन एक महत्वपूर्ण घटक की भूमिका का निर्वाह करता है। पर्यटन के गुणात्मक प्रभाव के कारण सरकारें भी इसकी महत्ता को नजरअंदाज नहीं कर पातीं हैं।

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केरल का गुरुवायूर मंदिर करोड़ों श्रद्धालुओं को आकर्षित करता रहा है हर साल

 भारत में यह अजीब विडंबना है कि इस पर्यटन रूपी पिरामिड का निचला हिस्सा लघु उद्यमियों के द्वारा प्रमुखता से मजबूती प्राप्त करता है। भारत में पर्यटन के असंगठित क्षेत्र के 75 प्रतिशत से अधिक निचले पायदान पर कार्यरत लोगों की मासिक आय 15000 रु. से भी कम हैै। कोरोना काल में इसका भविष्य भी अनिश्चितता के दौर से गुजर रहा है। ऐसे विषम समय में इसकी उत्तरजीविता व पुनरुत्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। आवश्यकता इस बात की है कि इन सभी पर्यटन हितधारकों को साथ लेकर आगे बढ़ना होगा और उनमें परस्पर विश्वास और सद्भावना का माहौल बनाना होगा। भारत सरकार के विभिन्न मंत्रालयों द्वारा इस संबंध में कई कदम उठाए गए हैं जिनमें पर्यटन मंत्रालय, नागरिक विमानन मंत्रालय, वित्त मंत्रालय, गृह व श्रम मंत्रालय प्रमुख हैं। विशेष रूप से पर्यटन मंत्रालय ने आॅनलाइन माध्यम से हितधारकों के लिए ठोस कदम उठाए हैं; नागरिक विमानन मंत्रालय ने बबल फ्लाइट्स व वंदे भारत मिशन के माध्यम से कुछ देशों से संपर्क बनाया हुआ है। पर ज्यादातर राष्ट्रों की अंतरराष्ट्रीय सीमाएं अभी पर्यटकों के लिए बंद हैं।

नदियों से जुड़े तीर्थ

हिन्दुस्थान एक समय इतना बड़ा और एकजुट देश नहीं था। बहुत राजा थे यहां। बहुत झंडे थे उनके। हरेक का अपना-अपना सिक्का चलता था। फिर भी अफगानिस्तान से लेकर बर्मा तक यह भरतखंड ही कहलाता था। पूरे हिस्से में एक ही तरह की अर्थव्यवस्था चलती थी। तीर्थ हम सबको बांधे हुए थे। राज्य अलग-अलग थे मगर तीर्थ सबके लिए एक थे। आम मान्यता थी कि हर आदमी को ये तीर्थ करने ही हैं। इतने धाम घूमना ही है। वे सबके लिए एक थे और सबके लिए छूट थी। तीर्थों के बल पर हम सब कहीं न कहीं एक होते रहे हैं। तीर्थ किसको कहते हैं? तीर्थ वह क्षेत्र माना जाता है जहां कोई भी नदी उत्तरवाहिनी हो जाती है। हमारी सारी नदियां पूरब से पश्चिम, उत्तर से दक्षिण बहती हंै। जहां भी कोई नदी उत्तरवाहिनी होती है वही क्षेत्र तीर्थ क्षेत्र है। गंगा काशी में उत्तरवाहिनी है, वह तीर्थ क्षेत्र है। और कहीं वह उत्तरवाहिनी नहीं है। गंगा का पूरा किनारा तीर्थ क्षेत्र नहीं माना जाता। गोदावरी का पूरा किनारा तीर्थ क्षेत्र नहीं माना जाता। जहां संगम होते हैं वे भी तीर्थ माने जाते हैं। हम गंगा गोदावरी को मिलाने की बात करते हैं, इससे हमारा सारा तीर्थ ही खत्म हो जाएगा। हजारों सालों से हम मिलकर रहे तो इन्हीं तीर्थों की वजह से। नहीं तो यहां काशी जाने की किसको पड़ी है? या किसी को काशी से रामेश्वरम जाने की क्या पड़ी होती? जब लोग रामेश्वरम से काशी जाते हैं तो यहां की रेत लेकर जाते हैं और जब काशी से लौटते हैं, तो गंगा जल लेकर रामेश्वरम में अर्पित करना होता है। हम तीर्थों के बल पर एक रहे हैं। देश और राष्टÑ सब अलग-अलग रहे मगर तीर्थों के कारण हम एक रहे। तीर्थों की वजह से अर्थव्यवस्था एक रही। पुराणों में नदियां से जुड़े तीर्थों की विस्तृत जानकारी उपलब्ध है।      - रविन्द्र शर्मा गुरुजी



2020-21 में कई नवीन परिदृश्य उभर कर सामने आएंगे, जिनमें सर्व प्रमुख घरेलू पर्यटन है, अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधित आवागमन के कारण अब घरेलू पर्यटन अपनी महती भूमिका निभाएगा, इसलिए राज्य सरकारें अपने पर्यटन विभाग को इस हेतु चुस्त-दुरुस्त करने में लगी हैं। यह अजीब संयोग है कि देश के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने कदाचित अपनी दूरदृष्टि के कारण भारी कठिनाइयों को चिन्हित कर लिया था और गत वर्ष ही मन की बात कार्यक्रम के माध्यम से देश के नागरिकों से आग्रह किया था कि वे अपनी छुट्टियां देश के अंदर ही व्यतीत कर घरेलू पर्यटन को बढ़ायें। वे देश के 7 सर्वश्रेष्ठ स्थानों को चयनित कर अपने अनुभव व फोटो साझा करें। और सुखद संयोग देखिए आज तो विश्व पर्यटन संगठन इसी बात को दोहरा रहा है।
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मंदाकिनी नदी के किनारे रमणीक चित्रकूट धाम
नए काल के नए चलन
पर्यटन व्यवसायियों को पर्यटकों की चिति को समझना होगा और अपनी सेवाओं और उत्पादों को नए कलेवर में ढालकर पर्यटकों को संतुष्ट करने के प्रयास करने होंगे। विश्व पर्यटन संगठन ने कोरोना काल में विश्वास को पर्यटन की नई मुद्रा बताया है अत: व्यवसायों को इस ओर विशेष ध्यान देना होगा। लिहाजा पर्यटकों को ऐसी सुविधाएं और सेवाएं प्रदान की जाएं जिनसे प्रदाताओं व पर्यटकों के मध्य विश्वास कायम हो सके व पर्यटक घर से बाहर निकलकर यात्रा करने हेतु बिना डरे आतुर हो सके। आज का पर्यटक अपने शहर के आसपास भीड़ से दूर अपने परिवार के साथ अपने वाहन से जाने की चाहत रखता है व सप्ताहांत पर्यटन को अपनाना चाहता है। होटल में सुरक्षा व स्वास्थ्य के कारण से वह ‘होमस्टे’ को भी प्राथमिकता देने लगा है। खाद्य एवं पेय पदार्थों के सेवन में भी वह प्रतिरोधक क्षमता वर्धक को प्राथमिकता दे रहा है।

भगवान श्रीराम के वनवास से जुड़े प्रमुख स्थल

श्रृंगवेरपुर      लखनऊ रोड पर, प्रयागराज के पास
तमसा नदी    वर्तमान में मध्य प्रदेश में स्थित
प्रयागराज     उत्तर प्रदेश (भारद्वाज मुनि से वातार्लाप)
महर्षि वाल्मीकि आश्रम    मध्य प्रदेश में स्थित
चित्रकूट       सतना, मध्य प्रदेश में
पंचवटी       नासिक, महाराष्ट्र में
दंडकारण्य    पंचवटी के पास
शबरी            छत्तीसगढ़ में
किष्किंधा    तुंगभद्रा नदी, कर्नाटक राज्य में
पंपापुर        किष्किंधा के पास
रामेश्वरम     तमिलनाडु में
श्रीरामसेतु    रामेश्वरम और श्रीलंका के मध्य


कोविड-19 ने पर्यटन में  नए नियमों, प्रोटोकॉल व मानक संचालन प्रक्रिया (स्टैंडर्ड आपरेटिंग प्रोसीजर) को भी जन्म दिया है। पर्यटन क्षेत्र में कार्यरत लोगों को डिजिटल टेक्नोलॉजी, सोशल मीडिया मार्केटिंग मल्टी स्किलिंग, अपस्किलिंग, रिस्किलिंग जैसी जरूरतों को आत्मसात करना होगा, पर्यटकों में विश्वास जगाना होगा तभी वे व्यवसायी के बताए पर्यटन स्थल होटल व परिवहन के साधनों का उपयोग करेंगे और टूर पैकेज क्रय करेंगे। व्यवसाया को इस हेतु पर्यटकों की सुरक्षा व स्वच्छता के प्रमाण भी दर्शाने होंगे जिनमें सैनिटाइजर, मास्किंग, फेस शील्ड का प्रयोग कर सामाजिक दूरी के नियमों का परिपालन आवश्यक है।

पर्यटकों के स्वास्थ्य को सर्वोपरि मानते हुए पैकेज में तनाव प्रबंधन आत्मविश्वास निर्माण, योग एवं ध्यान, स्वानुशासन आदि को भी शामिल करना होगा। पर्यटन सेवा प्रदाताओं को पर्यटक को बदली हुई मानसिकता के साथ सामंजस्य बिठाना होगा। भारतीय संस्कृति व दर्शन इस वैश्विक चुनौती का सामना अपनी सुदृढ़ नींव के साथ करते हुए पर्यटन जगत को एक नई दिशा व दशा देने में सक्षम है।
(लेखक भारतीय पर्यटन एवं यात्रा प्रबंधन संस्थान के निदेशक रहे हैं)