विश्व पर्यटन दिवस— पर्यटकों को लुभाते हैं भगवान बुद्ध से जुड़े यह स्थल

    दिनांक 27-सितंबर-2020
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डॉ प्रदीप कुमार दास
 
27 सितंबर यानी विश्व पर्यटन दिवस। अक्सर घूमने—फिरने के शौकीन लोग नए—नए स्थानों के बारे में जानने को उत्साहित रहते हैं। ऐसे सभी लोग आज भगवान बुद्ध से जुड़े उन स्थानों को जान सकते हैं और कर सकते हैं उनकी यात्रा जो बौद्ध मत में पवित्र स्थान रखते हैं
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भगवान बुद्ध ने स्‍वयं महापरिनिब्‍बान सुत्‍त में कहा है कि बुद्ध के जन्‍म-स्‍थान, बुद्धत्‍व-प्राप्ति स्‍थल, प्रथम धर्मचक्रप्रवर्तन स्‍थान एवं महापरिनिर्वाण स्‍थल की यात्रा करने से पुण्‍य-लाभ प्राप्‍त होता है। गौतम बुद्ध के जन्‍म, बुद्धत्‍व, प्रथम उपदेश एवं उनके महापरिनिर्वाण (देहावसान) से जुड़े स्‍थलों को बौद्ध मत के पवित्र तीर्थ-स्‍थल माने जाते हैं। इन चार स्‍थानों को बौद्ध मत के आध्‍यात्मिक केन्‍द्र माने जाते हैं। इन स्‍थानों में मंदिर, मठ, स्‍तूप आदि अनेक पांथिक महत्‍व के स्‍मारक बने हैं। इन स्‍थानों पर देश-विदेश से बुद्ध के लाखों अनुयायी एवं अन्‍य पर्यटक पहुंचकर बुद्ध की शिक्षा से अपने आपको जोड़ते हैं। इन बौद्ध केन्‍द्रों को ही बौद्ध पर्यटन परिपथ कहते हैं।
भारत में बौद्ध परिपथ के अन्‍तर्गत बुद्ध के जीवन से जुड़े स्‍थानों में लुम्बिनी, बोधगया, सारनाथ, कुशीनगर, वैशाली, राजगीर, नालंदा, श्रावस्‍ती, संकिसा प्रमुख हैं। ये सभी बौद्ध मत से जुड़े प्रमुख तीर्थस्‍थल हैं। इन स्‍थानों के संक्षिप्‍त विवरण इस प्रकार हैं-
लुम्बिनी- यह स्‍थान वर्तमान में भारत-नेपाल की सीमा पर नेपाल के रूपनदेही जिला में स्थित है। कपिलवस्‍तु और देवदह के बीच स्थित इसी स्‍थान पर बालक सिद्धार्थ का जन्‍म 563 ईसापूर्व में हुआ था, जो बाद में बुद्ध के नाम से प्रसिद्ध हुए। पड़ोसी देश में स्थित होने के बावजूद टूर ऑपरेटर्स (पर्यटन संचालक) द्वारा इसे बौद्ध पर्यटन परिपथ में शामिल कर लिया गया है।
बोधगया- बिहार के गया जिला स्थित बोधगया का पुराना नाम उरुवेला था। यहां राजकुमार सिद्धार्थ को बोधिवृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्‍त हुआ था। इसके पश्‍चात् वे बुद्ध कहलाये। बोधगया में पर्यटकों के लिए प्रमुख आकर्षण हैं- बोधिवृक्ष, महाबोधि मंदिर, अशोक द्वारा प्रदत्‍त वज्रासन, मुचलिन्‍द झील, अनिमेष लोचन चैत्‍य, रत्‍नचंक्रमण वृक्ष, रत्‍नगारह वृक्ष, अजपाल निग्रोध वृक्ष एवं राजायतन वृक्ष। बोधगया में बड़ी संख्‍या में अनेक देशों के बौद्धों द्वारा निर्मित बौद्ध विहार हैं, जिनमें म्यांमार, श्रीलंका, जापान, थाईलैंड, तिब्‍बत आदि देशों के विहार सम्मिलित हैं।

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सारनाथ- उत्तर प्रदेश के वाराणसी के समीप स्थित यह वही स्‍थान है, जहां भगवान बुद्ध ने बुद्धत्‍व प्राप्‍त करने के बाद पहला उपदेश पांच भिक्षुओं को प्रदान किया था। इसी स्‍थान पर भगवान बुद्ध ने संघ की स्‍थापना की थी, जो बाद में भिक्षु एवं भिक्षुणी संघ के रूप में विकसित हुआ। भारत सरकार द्वारा अंगीकृत प्रसिद्ध राष्‍ट्रीय चिह्न को सारनाथ स्थित धम्‍मेख स्‍तूप के समीप सम्राट अशोक के प्रसिद्ध सिंह-स्‍तम्‍भ से लिया था। यहीं पर बुद्ध से जुड़े मूलगंधकुटी विहार और चौखंडी स्‍तूप भी विद्यमान हैं।
कुशीनगर-यह उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिला में स्थित है, जो कपिलवस्‍तु के रास्‍ते में पड़ता है। इसी स्‍थान पर रोगग्रस्‍त बुद्ध ने महापरिनिर्वाण प्राप्‍त किया था। कहा जाता है कि बुद्ध के अस्थि-अवशेष को आठ भागों में विभाजित कर तत्‍कालीन राजाओं द्वारा अपने-अपने राज्‍य में स्‍थापित कर उन पर स्‍तूपों का निर्माण किया गया। बाद में सम्राट अशोक ने बुद्ध के अस्थि-अवशेष पर अपने राज्‍य के अन्‍दर और राज्‍य से बाहर 80,000 स्‍तूपों का निर्माण कराया था। यहां पर स्थित दर्शनीय स्‍थलों में मुकुटबन्‍धन स्‍तूप, बुद्ध की लेटी हुई अवस्‍था में लाल पत्‍थर से बनी विशाल मूर्ति, थाई मंदिर, चीनी मंदिर, जापानी मंदिर, महानिर्वाण मंदिर आदि शामिल हैं।
वैशाली- इस स्‍थान को विश्‍व का पहला गणतंत्र होने का गौरव प्राप्‍त है। बिहार स्थित इसी स्‍थान पर भगवान बुद्ध ने अपना अंतिम उपदेश दिया था। यहीं भगवान बुद्ध ने नगर गणिका आम्रपाली का आतिथ्‍य स्‍वीकार करते हुए शील का उपदेश दिया था। भगवान बुद्ध ने इसी स्‍थान पर अपने सेवक शिष्‍य आनन्‍द से अपनी मृत्‍यु के बारे में भविष्‍यवाणी की थी। बुद्ध के परिनिर्वाण के 100 वर्ष बाद इसी स्‍थान पर राजा कालाशोक के संरक्षण में द्वितीय बौद्ध संगीति का आयोजन किया गया था।

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राजगीर-
बिहार में बोधगया से 70 कि.मी. की दूरी पर स्थित यह स्‍थान बुद्ध के समय में मगध राज्‍य की राजधानी थी । राजगीर के प्रसिद्ध गृद्धकूट पर्वत पर भगवान बुद्ध ने प्रज्ञापारमिता सूत्र का उपदेश दिया था। बु्द्ध के परिनिर्वाण के बाद इसी स्‍थान पर स्थित वैभार पर्वत की सप्‍तपर्णी गुफा में प्रथम बौद्ध संगीति का आयोजन किया गया था। विश्‍व प्रसिद्ध नालन्‍दा विश्‍वविद्यालय राजगीर के समीप स्थित था, जिसके खंडहर आज भी देखे जा सकते हैं।
श्रावस्‍ती- उत्तर प्रदेश में लखनऊ से लगभग 150 किमी. की दूरी पर स्थित यह स्‍थान भगवान बुद्ध को बड़ा प्रिय था। बुद्ध ने सबसे अधिक बार वर्षावास का समय यहीं बिताया था। बुद्ध के समय में यह कौशल प्रदेश की राजधानी थी, जहां बुद्ध के मित्र प्रसेनजित राज करते थे। यहीं पर बुद्ध ने पहली बार चमत्‍कार का प्रदर्शन किया था। इसी स्‍थान पर यजमान अनाथपिण्डिक ने एक विशाल विहार का निर्माण कर भगवान बुद्ध को अर्पित किया था। वर्तमान में इस स्‍थान पर विभिन्‍न देशों द्वारा निर्मित अनेक मंदिर, मठ, धर्मशाला आदि विद्यमान हैं।
संकिसा- उत्तर प्रदेश स्थित इसी स्‍थान पर भगवान बुद्ध ने तावतिंस लोक में अपनी माता को तीन महीने तक अभिधम्‍म का उपदेश देकर उतरे थे। वर्तमान में इस स्‍थान पर अनेक मंदिर, स्‍तूप, मठ एवं धर्मशालाएं मौजूद हैं।

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बौद्ध परिपथ मार्ग
पर्यटकों को बुद्ध के जन्‍म स्‍थान ल‍ुम्बिनी से ज्ञानस्‍थली बोधगया, बोधगया से प्रथम उपदेश स्‍थल सारनाथ और सारनाथ से बुद्ध के परिनिर्वाण-स्‍थल कुशीनगर का भ्रमण करवाया जाता है। यही बौद्ध परिपथ मार्ग कहलाता है। जुलाई, 2014 में भारत सरकार के तत्‍कालीन वित्तमंत्री अरुण जेटली ने बुद्ध के जीवन से जुड़े स्‍थलों की पहचान कर उसे बौद्ध पर्यटक परिपथ के रूप में विकसित करने की घोषणा की थी, जहां उच्‍च कोटि की आधुनिक सुविधा उपलब्‍ध हो। इसका उद्देश्‍य पूरे विश्‍व से अधिक से अधिक संख्‍या में पर्यटकों को आकर्षित कर पर्यटन उद्योग को बढ़ावा देना था। यह टूर संचालकों के लिए वरदान साबित हुआ, जिससे देशी और विदेशी पर्यटकों, विशेष रूप से बौद्ध पर्यटकों की संख्‍या में निरन्‍तर वृद्धि होने लगी।
पूर्व में बिहार और उत्तर प्रदेश सरकार के पर्यटन मंत्रालयों द्वारा पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए अनेक कदम उठाये गये। पहले अधिकांश पर्यटक बोधगया और सारनाथ की ही यात्रा करते थे और अन्‍य बौद्ध पर्यटन स्‍थल उपेक्षित रहते थे। इससे पर्यटन उद्योग को कोई खास लाभ नहीं होता था। एक अध्‍ययन के अनुसार अब भारत के आधुनिक पर्यटक घूमने-फिरने में अधिक खर्च करने में समर्थ होते हैं। आजकल बड़ी संख्‍या में ऐसे पर्यटक होते हैं, जो बुद्ध के जीवन से जुड़े सभी पर्यटन स्‍थलों की यात्रा करना चाहते हैं। लेकिन समुचित आधारभूत संरचना की कमी, मूलभूत नागरिक सुविधा के अभाव, सड़कों की बुरी स्थिति तथा सीधे हवाई सम्‍पर्क की सुविधा न होने के कारण पर्यटक इन पर्यटन-स्‍थलों की यात्रा नहीं कर पाते हैं।
ऐसी स्थिति में तत्‍कालीन वित्तमंत्री द्वारा बौद्ध परिपथ के पांच पर्यटन केन्‍द्रों के विकसित करने की घोषणा से पर्यटन क्षेत्र के पुनरुद्धार की उम्‍मीद बढ़ी। हालांकि यह एक व्‍ययसाध्‍य योजना थी, जिसमें केन्‍द्र सरकार की ओर से शुरुआती तौर पर 500 करोड़ रुपये आवंटित किये गये। वर्तमान में बौद्ध परिपथ लगभग 16 राज्‍यों एवं 30 से अधिक देशों के पर्यटकों को आकर्षित करता है। इस प्रकार इस उद्योग के उत्तरोत्तर विकास से बौद्ध पर्यटन परिपथ एक बड़े लक्ष्‍य को प्राप्‍त कर सकता है।
बौद्ध पर्यटन परिपथ के संचालन में भारतीय रेल ने सबसे बड़ी भूमिका निभाई है। बौद्ध पर्यटन परिपथ के अन्‍तर्गत आने वाले प्राय: अधिकांश बौद्ध केन्‍द्रों की सैर करवाने का बेड़ा भारतीय रेल ने संभाल लिया है। आईआरसीटीसी बौद्ध पर्यटन रेलगाड़ी नई दिल्‍ली से यात्रा शुरू करते हुए गया, राजगीर, नालन्‍दा, वाराणसी, सारनाथ, लुम्बिनी, कुशीनगर और श्रावस्‍ती होते हुए आगरा तक जाती है। इस विशेष रेलगाड़ी में एसी प्रथम और एसी द्वितीय श्रेणी के शयनयान में कुल 175 यात्रियों को सैर करने की सुविधा उपलब्‍ध है।
 
 
 
भारत के अन्‍य बौद्ध पर्यटन स्‍थल इस प्रकार हैं-
अरुणाचल प्रदेश- बोमडिला, तवांग मठ

सिक्किम- कलिम्‍पोंग, रुमटेक मठ, युकसोम मठ, रालंग मठ, पेमायोंगचे मठ, टशीदिंग मठ

जम्‍मू कश्‍मीर- हरवां, अम्‍बरनी, परिहासपुरा

लदाख— हेमिस मठ, पेथुब मठ, ठिगसे मठ, रिजोंग मठ, देस्किद मठ, बरदन
               मठ, जोंगखुल मठ, करशा मठ, शरछुखुल मठ, आनले मठ

हिमाचल प्रदेश— क्‍यी मठ, स्‍पीति, किन्‍नौर, धर्मशाला, बीर

हरियाणा— सुघ स्‍तूप, यमुनानगर, आसंग

मध्‍य प्रदेश— सरदारह, सांची स्‍तूप, मुराकोट

महाराष्‍ट्र— एलोरा गुफा, कन्‍हेरी गुफा, अजन्‍ता गुफा, पितलखोरा, नासिक गुफा, इगतपुरी

पश्चिम बंगाल— दार्जिलिंग, कोलकाता संग्रहालय

आन्‍ध्र प्रदेश— अमरावती, सलिहुंदा, बोरा गुफा, नागार्जुनकोंडा ।

(लेखक लेह स्थित केंद्रीय बौद्ध विद्या संस्थान (समवत विश्वविद्यालय ) में प्रवक्ता हैं।)