भगत सिंह और पंथनिरपेक्षता

    दिनांक 28-सितंबर-2020
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अविनाश त्रिपाठी
भगत सिंह आज की तरह यूनिवर्सिटी पहुंच कर मार्क्स का नाम सुनकर क्रांतिकारी नहीं बने थे...जिस उम्र में वो खेत में बंदूक बो रहे थे उस समय कोई लेनिन का नाम भी नहीं जानता था, जब करतार सिंह सराभा को उन्होंने अपनी आदर्श बनाया तब अक्टूबर क्रांति हुई तक नहीं थी

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पिछले दिनों वामपंथी मिजाज वाली एक पत्रिका ने भगत सिंह पर लंबा चौड़ा लेख लिखा। अपने लेख में भगत सिंह के बार में बताते हुए लिखा गया कि जिस व्यक्ति (भगत सिंह) ने खुद कहा हो कि अभी तो मैंने केवल बाल कटवाए हैं, मैं सेकुलर होने और दिखने के लिए अपने शरीर से सिख पंथ का एक-एक नक्श मिटा देना चाहता हूं, आप उसके सिर पर फिर पगड़ी रख रहे हैं। हालांकि भगत सिंह ने यह बात कहां कही, किस लेख में या भाषण में, किस संदर्भ में यह बता कही गई उन्होंने नहीं बताया।
खैर लेकिन अगर मान लें कि भगत सिंह ने स्वयं को सेकुलर साबित करने के लिए केश कटवाए थे तो माकपा के बड़े नेता हरकिशन सिंह सुरजीत जो सालों तक माकपा के महासचिव रहे। वह केशधारी सिख थे तो क्या वो सेकुलर नहीं थे ? और अगर थे तो उनकी धर्मनिरपेक्षता भगत सिंह से ज्यादा आला दर्जे की थी क्योंकि वो पगड़ी के रहते हुए भी सेकुलर थे।
देखना चाहिए भगत सिंह ने केश काटने के लिए क्या समय चुना...जब वो अंग्रेजी पुलिस अधिकारी की हत्या करेंगे...और कोई पुलिस को गवाही देगा की मारने वालों में एक सरदार है और पुलिस लाहौर के चप्पे-चप्पे पर सिख युवक को तलाश रही होगी ऐसे समय में लाहौर से निकलने के लिए दुर्गा भाभी को बतौर पत्नी ( उन्हें इस बात पर सहमत करने के लिए सुखदेव थप्पड़ खा चुके थे) बनाकर शहर से निकलना होगा..राजगुरू नौकर बनेगा..यही सही समय है पहचान छुपाने के लिए नहीं...धर्मनिरपेक्षता के लिए केश कटवाने का....
इस बहस में एक नाम और जोड़ता हूं दादा भाई नौरोजी का, दादा भाई भारतीय राजनीति के पितामह, कांग्रेस के जनक थे पहले दक्षिण एशियाई जो 1892 में चुन कर ब्रिटिश संसद पहुंचे, जब दादा भाई को शपथ लेने के लिए बाइबल दी गई तो उन्होंने यह कहते हुए बाइबल पर हाथ रख कर शपथ लेने से मना कर दिया कि मैं तो ईसाई हूं ही नहीं मैं तो पारसी हूं मैं शपथ लूंगा अपने धर्म की किताब पर....शायद ही कोई हो जिसे दादाभाई की धर्मनिरपेक्षता पर शक हो....लेकिन अपने धार्मिक अधिकार पर टिके रहकर धर्मनिरपेक्ष कहलाने का जो अधिकार दादा भाई को 1890 के दशक में प्राप्त था वो मोदी 2010 के दशक में प्राप्त नहीं हुआ वो टोपी नहीं पहनने की बात कहते ही सांप्रदायिक हो गए...
अब अगर दोनों मामलो को मिला ले तो कुछ यूं बनता है कि....वामपंथियों के अनुसार भगत सिंह इसलिए से​कुलर हैं क्योंकि उन्होंने केश कटवाए और मोदी इसलिए सांप्रदायिक हैं क्योंकि उन्होंने टोपी नहीं पहनी....पगड़ी पहना सांप्रदायिकता है और टोपी पहनना धर्मनिरपेक्षता....कोई पगड़ी, तिलक, कलावा छोड़कर टोपी पहन ले तो हो गया धर्मनिरपेक्ष...यह परिभाषा इस देश को रसातल में ले जा रही है.....
अब आते हैं मूल प्रश्न पर........शिव वर्मा ने अपनी किताब संस्मृतियां में लिखा है कि जीवन के आखिरी सालों में लाला लाजपत राय का कांग्रेस से मोहभंग हो गया था तो वो हिंदू महासभा के लिए काम कर रहे थे (1925 में उन्हें हिन्दू महासभा के कलकत्ता अधिवेशन का अध्यक्ष भी बनाया गया।)...असहयोग आंदोलन के समय स्कूल छोड़ने के बाद भगत सिंह औऱ सुखदेव दोनो लाला जी के नेशनल कॉलेज में पढ़े थे। दोनों के मन में लाला लाजपत राय के लिए अटूट प्रेम और सम्मान था। साईमन कमीशन के जिस विरोध में लाला लाजपत राय शहीद हुए वो हिंदू महासभा के बैनर तले ही हो रहा था।
तो अब प्रश्न यह है कि वामपंथियों के अनुसार जिस भगत सिंह धर्मनिरपेक्षता के लिए केश काटे ...वो एक हिंदू महासभा के नेता के नेतृत्व में, हिंदू महासभा के बैनर तले साईमन कमीशन का विरोध कर रहे थे...और लाला लाजपत राय की मौत का बदला लिया और इसी केस में फांसी हुई।
कहना का मतलब यह है कि भगत सिंह आज की तरह यूनिवर्सिटी पहुंच कर मार्क्स का नाम सुनकर क्रांतिकारी नहीं बने थे...जिस उम्र में वो खेत में बंदूक बो रहे थे उस समय कोई लेनिन का नाम भी नहीं जानता था, जब करतार सिंह सराभा को उन्होंने अपनी आदर्श बनाया तब अक्टूबर क्रांति हुई तक नहीं थी। उनका परिवार आर्य समाजी था। जिस दल को उन्होंने चुना उसके पहले सेनापति बिस्मिल पक्के आर्य समाजी थे।.दूसरे सेनापति आजाद जनेऊधारी थे और खुद भगत सिंह को फांसी हुई एक हिंदू महासभा के नेता की मौत का बदला लेने के केस में...
देश को मां के रूप में स्वीकार करके लिखी गई राम प्रसाद बिस्मिल की कविता
हे मातृभूमि ! तेरे चरणों में शिर नवाऊं ।
मैं भक्ति भेंट अपनी, तेरी शरण में लाऊं ।।
माथे पे तू हो चन्दन, छाती पे तू हो माला ;
जिह्वा पे गीत तू हो, तेरा ही नाम गाऊं ।।
जिससे सपूत उपजें, श्रीराम-कृष्ण जैसे ;
उस धूल को मैं तेरी निज शीश पे चढ़ाऊं ।।
माई समुद्र जिसकी पदरज को नित्य धोकर ;
करता प्रणाम तुझको, मैं वे चरण दबाऊं ।।
सेवा में तेरी माता ! मैं भेदभाव तजकर ;
वह पुण्य नाम तेरा, प्रतिदिन सुनूं सुनाऊं ।।
तेरे ही काम आऊँ, तेरा ही मन्त्र गाऊं ।
मन और देह तुझ पर बलिदान मैं चढ़ाऊं ।।